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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 293, कुल 508 में से

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पृष्ठ 293

वे तो युद्ध में वज्रसम शत्रुओं का नाश करनेवाले राम हैं । तुम्हारे हाथों से पराजित होने
के लिए वे पशुपति नहीं हैं, वे तो रण में अवश्य विजय प्राप्त करनेवाले रामचंद्र हैं । युद्ध
में उनका सामना करना इतना सहज मत समझो, जितना दिक्पालों का सामना करना है । मदांध
होकर असंभव कार्यों को साधने का विचार करोगे, तो मुँह की खाकर गिरोगे । तुम पुत्र नहीं हो,
कुलनाशक हो । तुम ही रावण के शत्रु हो । रामचन्द्र के अग्निसम बाणों के प्रहार के सामने
क्या रावण टिक सकता है ? उचित यही है कि रावण मणियों, गज-मणियों तथा अश्व-मणियों
साथ उस मानिनी-मणि (सीता) को रामचन्द्र के पास पहुँचा दे ।
१३ रावण का विभीषण को नगर से निर्वासित करना
तब रावण ने विभीषण को रोषपूर्ण दृष्टि से देखते हुए कहा—'शत्रु के साथ भी
सतत (युद्ध करते हुए) रह सकते हैं, विष उगलनेवाले सर्प के साथ भी निर्भय होकर
रह सकते हैं, किन्तु शत्रु से मिले हुए पर अपना बनकर रहनेवाले लोगों के साथ जीवन
बिताना कठिन है । तुम ऐसे ही व्यक्ति हो । इसीलिए मेरे सामने तुम बडे गर्व से शत्रु
की प्रशंसा करते रहते हो । तुम मेरे अनुज हो, इसलिए अवध्य हो ? (क्रोध से) क्या,
तुम सचमुच मेरे अनुज हो ? तुम तो मेरे ज्ञाति (गोतिया) हो ।'
कुंभकर्ण ने देखा कि ब्रह्मा का शाप प्रबल है, (अर्थात्, रावण का अंत निश्चित है),
न तो वह अपने अनुज की बातों को अनुचित कह सका, न अपने अग्रज को अनुचित
कहने से रोक ही सका । इसलिए वह बडे आदर के साथ अपने अग्रज को प्रणाम करके
सोने के लिए अपनी गुफा में चला गया । उसके चले जाने के पश्चात् विभीषण ने रावण
को देखकर कहा—'हे भाई, तुम मेरे अग्रज हो, इसलिए तुम पर आनेवाली विपत्ति की
कल्पना से भयभीत होकर मैंने तुमको उचित परामर्श दिया है । हे असुरेन्द्र, आप्त बंधुओं
के हित-वचन तुमको बुरे लगते हैं । ऐसे मंत्री बहुत कम होंगे, जो अच्छा परामर्श देते हैं
और ऐसे राजा भी बहुत कम होंगे, जो उन वचनों को सुनते हैं । मेरा धर्म है कि मै
आपके हित का विचार करके उचित परामर्श दूँ और आपका धर्म है कि आप उसे स्वीकार
करें । सीता को लौटा देना तुम्हारे लिए नीतिमगत होगा । यदि ईश्वर स्वयं प्रतिकूल हो,
तो शक्ति तथा पराक्रम आदि किस काम आयेंगे ? दशरथ के पुत्र स्वयं ईश्वर हैं, भला
उनके अतिरिक्त और कोई ईश्वर भी है ?'
विभीषण के इन वचनों को सुनकर रावण की भौंहें तन गईं, मुख विकृत हो उठा, क्रोध
के कारण आँखों से अग्नि निकलने लगी और होंठ फड़कने लगे । उसने गरजकर कहा—
'तुम मेरे सम्मुख राम को ईश्वर कहने हो ? एक साधारण मानव कहीं ईश्वर हो सकता है ?
अविवेकी पिता के द्वारा राज से निर्वासित होकर, वनों में भटकते हुए कन्द-मूल तथा
पत्तों पर जीवन व्यतीत करनेवाले को कहीं ईश्वर कहते हैं । यदि वह ईश्वर होता, तो
जब मैं उसकी पत्नी को चुराकर लाया, तभी वह मुझ पर आक्रमण करता । इसके विपरीत,
वह अपने भाई के साथ जंगलों में रोते-कलपते फिरता रहा और भटककर सुग्रीव नामक
एक वानर के आश्रम में रह रहा है । क्या, यह सब ईश्वर के ढंग हैं ? एक कायर
मानव को मेरे समान कहकर, क्यो बार-बार मेरे सामने उसकी प्रशंसा करने हो ?'