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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 508 में से

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पृष्ठ 280

२५० रंगनाथ रामायण
उसका आलिंगन करना ही इस समय मेरे वश की बात है।" यो कहकर प्रभु ने हनुमान्
को अपने हृदय से लगा लिया ।
इस प्रकार, सुग्रीव के समक्ष राम ने हनुमान् की प्रगसा करके कहा—'हे पवनपुत्र,
मुझे बड़ी प्रसन्नता है कि तुम जानकी का पता लगाकर आये हो। मुझे अत्यन्त आनन्द का अनुभव
हो रहा है । पता नही, इस कार्य की समाप्ति कैसे होगी । मेरा मन यह सोचकर व्याकुल
हो रहा है कि इस विशाल समुद्र को लाँघकर जाने की क्षमता वानर-सेना को कैसे प्राप्त
होगी ।' इतना कहकर राम अपना सिर झुकाकर चुप हो रहे । रविपुत्र, राम के मन की
चिन्ता को दूर करने के उद्देश्य से कहने लगा—'हे देव ! आप साधारण लोगो की भाँति
इस प्रकार क्यो दुःखी हो रहे हैं ? आप क्यो कहते हैं कि हम समुद्र को पार नही कर
सकते ? हम अवश्य समुद्र को पार करेंगे, सुवेलाद्रि को पार करके लका को जीतेंगे और
रावण का सहार करके ससार का दुःख दूर करेंगे । हे राजन्, आप विचार कीजिए । मेरे
सभी वानर परिश्रमशील है ; बाहुबल से सपन्न है, और दुर्जय हैं । हे राघव, इनके
रहते हुए आप इस प्रकार क्यो चितित होते हैं ? आप तैयार हो जाइए । उद्योगी पुरुष
के लिए नभी अर्थ सद्यः फल-प्रद सिद्ध होते हैं । गत्रु सदा उत्साही व्यक्ति से भयभीत
रहते हैं, उत्साहहीन व्यक्ति से नहीं ।'
सुग्रीव के इन वचनो को सुनकर प्रभु ने हनुमान् से कहा—'ठीक है । मैं पहले
समुद्र से (मार्ग देने की) प्रार्थना करूँगा । यदि उसने नही दिया, तो अपने वाणो की अग्नि
से समुद्र को ही सुखा दूंगा, या उस पर पुल बाँधूँगा । हे पवनपुत्र, समुद्र पार करना
मेरे लिए कौन बड़ा कार्य है ? अब तुम यह तो बताओ कि उस दशकंठ के नगर में
किनने किले हैं, उसकी सेना कितनी बडी है ? उसके नगर के कितने द्वार हैं ? कितने राक्षस
उन द्वारो की रक्षा करते हैं ? उस नगर के सौधो की पंक्तियाँ कैसी हैं ? तुम तो इन
सबका पता लगाकर आये हो, इसलिए मैं तुमसे इन सब बातो का विवरण सुनना चाहता हूँ।'
२. लंका के वैभव का वर्णन
तब हनुमान् हाथ जोड़कर बड़े विनय के साथ प्रभु से इस प्रकार निवेदन करने लगा—
"हे दाशरथि, उस नगर में सतत (गण्ड-स्थलों से) मधु-धारा वहानेवाले, मुख से रौद्र भाव
प्रकट करनेवाले, पर्वताकार भद्र गजो के असंख्य समूह हैं । बहुत-से आयुधों से सज्जित,
आश्चर्यजनक तथा भयंकर दीखनेवाले, छत्रो, पताकाओ तथा विविध चिन्हो एव ध्वजाओ
से युक्त सूर्य-बिंव की प्रभा के समान मणियो से दीप्तिमान्, अश्वो एव सारथियो से युक्त
असंख्य रथ हैं । वीर रस के समुद्र की लहरो के समान दिखाई देनेवाले विविध रंगो से
युक्त, (दर्शकों की) दृष्टियो को चौंधिया देनेवाले अपनी हिनहिनाहट से सबको आश्चर्य-
चकित करनेवाले, अपने वेग में पवनदेव के अश्वो को भी मात करने की दिव्य शक्ति
रखनेवाले तथा मनोहर आकारवाले, अश्व अनगिनत सख्या में हैं । हे देव, हे राघव, वहाँ
के राक्षसवीरो की तो गिननी ही नही हो सकती है; वे ऐसे दिखाई देते हैं, मानो
बिजलियो से युक्त काले बादलो ने ही दानवो का रूप ले लिया हो, या काले पर्वत ही
मूर्त्तिमान् रौद्र वा-ना रूप धारण किये हुए हों, या जिस गरल का पान शिव ने किया था,