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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 508 में से

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पृष्ठ 296

२६६ रंगनाथ रामायण
समान जल उठे और मुझ पर ऐसा पदाघात किया कि आसन के साथ मै पृथ्वी पर गिर
पड़ा । इतने से सतुष्ट न होकर उन्होंने मुझपर खड्ग चलाना भी चाहा । किन्तु, मै किसी
तरह वहाँ से बचकर यहाँ आ गया हूँ । अब मै उसी राम भूपाल की शरण में जाऊँगा
और उनकी कृपा प्राप्त करके वही रहूँगा । अब यहाँ पर मेरे आप्त बंधु और कौन है
कि मै यहाँ रहूँ ।'
इन बातो को सुनकर कैकसी भय से मूर्च्छित हो गई और थोड़ी देर के बाद सँभल-
कर अपने पुत्र से कहने लगी—"हे वत्स, मै पूर्व से ही यह बात जानती हूँ । जिस समय
देवता, देवेन्द्र तथा ब्रह्मा ने अमृत सागर के निकट पहुँचकर भगवान् विष्णु को अपनी
विपत्तियो का वृत्तांत सुनाया, तब उन्होने कहा 'बड़ी निर्दयता से तुम्हें त्रास देनेवाले
क्रूर रावण तथा कुभकर्ण का वध करने के लिए मै सूर्यवश में जन्म लूँगा ।' तुम्हारे पिता
ने यह वृत्तांत मुझे विस्तार से सुनाया था । तब मैने भयभीत होकर अपने पति से पूछा—
'हे देव, आपके पुत्रो में कौन ऐसा पुण्यवान् है, जो आपके वश का उद्धार करेगा ?' तब
उन्होने कहा—'सत्य, धर्म, तथा पवित्रता से सपन्न, नित्य यशस्वी तुम्हारा कनिष्ठ पुत्र ही
राम की कृपा प्राप्त करके इस लका का पालन करेगा ।' इस प्रकार, कहकर तुम्हारे पिता
तपस्या करने के निमित्त मेरु पर्वत पर चले गये । हे पुत्र, सूर्यवशतिलक राम ही विष्णु है,
मानिनी सीता ही महालक्ष्मी है । क्या, तुम्हारे पिता विश्रवसु की बात मिथ्या हो
सकती है ? तुम अवश्य राम की शरण में रहते हुए सुखी रहो और राक्षस-कुल को
बचाने का प्रयत्न करो ।”
इतना कहकर उसने अपने पुत्र को आशीर्वाद दिया और उसे मंत्राक्षत देकर विदा
किया । विभीषण ने भी अपनी माता को वार-वार प्रणाम किया, और मन-ही-मन प्रसन्न
होते हुए, अपने मत्रियो के साथ आकाश की ओर इस प्रकार उड़ा, मानो यह बता रहा हो
कि रावण के पच-प्राण उसका शरीर छोड़कर इसी प्रकार उड जायेंगे । उस गुणनिधि
विभीषण को देखकर लका के लोग अपने-अपने आँगनौ में तथा गलियो में एकत्र होकर
आपस में कहने लगे—'रावण ने धर्म का त्याग करके, भाई के प्रेम को भी ठुकराकर,
विभीषण को निर्वासित किया है । नीति-रीति तथा कुशलता को उसने तिलाजलि दे दी है।
रावण का नाश तो होगा ही, अब लका की क्या दशा होगी ?' कुछ लोग मन-ही-मन
सोचने लगे कि विभीषण ही अब लका का राजा होगा । कुछ अन्य यह सोचने लगे, क्या
विभीषण के राम से मिल जाने मात्र से रावण का नाश हो सकेगा ? ऐसे भी लोग थे,
जो सोच रहे थे कि भले ही यह (विभीषण) राम के पास जाय, क्या राम इसका विश्वास
करेंगे ?
१५ विभीषण की शरणागति
विभीषण अपने मत्रियो के साथ बडे हर्ष से, आकाश-मार्ग से, रामचन्द्र के निकट
आ रहा था । तब सभी वानरो ने अत्यंत आश्चर्य से उसकी ओर अपने सिर ऐसे उठाये
मानो वे देवताओ को यह बता रहे हो कि हे देवताओ, रामचन्द्र (रावण पर) आक्रमण
करने जा रहे है, परन्तु रावण अब अपने सिर नही उठा सकेगा, उसका कुल नष्ट होगा ।