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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 508 में से

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पृष्ठ 298

२६८ रंगनाथ रामायण
रक्षस भला है या बुरा । क्षत्रिय का धर्म यही है कि चाहे शत्रु ही क्यो न हो, यदि वह
शरणार्थी होकर आये, तो उसकी रक्षा करनी चाहिए । बाज के द्वारा पीछा किये जाने पर
एक कपोत ने व्याकुल होकर राजा शिवि की शरण ली थी और शिवि ने अपना शरीर
भी त्यागकर कबूतर की रक्षा की थी । जो व्यक्ति आर्त्त व्यक्ति को शरण देता है, वह
अश्वमेध यज्ञ करने से प्राप्त होनेवाले पुण्य का भागी बनता है । हे सुग्रीव, विभीषण
ही क्यो, यदि रावण ही स्वय अपना गर्व तजकर मेरी शरण में आये, तो मैं उसकी भी
रक्षा करूँगा । यही हमारे वंश की रीति है । हे भानुपुत्र, मैं उस विभीषण को शरण
दूँगा । तुम तुरंत जाकर उस भय-विह्वल विभीषण को ले आओ ।'
राम की कृपा-बुद्धि का विचार करके, सुग्रीव आँखें मुकुलित करके तथा सिर कँपाकर
कहने लगा—'हे प्रभु, अपने परम शत्रु के अनुज के शरण माँगते ही, उसे अभयदान देकर
उसकी रक्षा के लिए तत्पर होना इस संसार में आपके सिवा अन्य किस राजा के वश की
बात है !' इतना कहकर सुग्रीव अपनी सेना के साथ आकाश-पथ की ओर उड़ा और
विभीषण को देखकर बोला—'हे विभीषण, श्रीराम ने तुम्हें अभयदान दिया है । यह
सत्य-वचन है । अब तुम उनके पास चलो !' यों कहकर उसने राक्षसराज विभीषण को
अपने हृदय से लगा लिया और बड़े हर्ष से उसे राम के समक्ष ले आया ।
१७ विभीषण की स्तुति
विभीषण ने रामचन्द्र को देखकर उन्हें प्रणाम किया और उनकी स्तुति करने लगा—
“हे नित्य सत्यस्वरूप, हे नित्य कल्याण-रूप, हे नित्य जगद्रक्षक, हे नित्य देव, हे जगत्कारक,
हे जगत् के आदिवीर, हे सृष्टिकर्त्ता, हे सर्वसंगातीत, हे सर्वानुभूत, हे सर्वजगत् में पवित्र,
हे जगद्विधाता, हे गुरु-लघु रूप, हे गुरुज्ञान-रूप, हे मधुरभाषी, हे श्रेष्ठ धनुर्धर, हे पद्म-
सम-नेत्रवाले, पद्माङ्कलित शरीरवाले, हे समस्त जीवाधार, परम पवित्र-स्वरूप, कविजनो
के लिए वेद्य, करुणासिंधु, विविध शास्त्रों के आधार, वेदातवेदी, तुम ही परमात्मा हो, तुम
ही मोक्षहो, तुम ही परमविद्या हो, तुम ही संसारके कर्त्ता हो, तुम ही ससार हो, और तुम ही ससार के
हर्त्ता हो। तुम ही यज्ञ-भोक्ता हो, यज्ञ भी तुम ही हो, और यज्ञ-फल के प्रदाता तुम ही हो;
तुम ही सूर्य-चन्द्र हो, तुम ही जलधि हो, तुम ही इंद्र आदि देवता हो और पृथ्वी भी तुम ही हो ।
तुम ही त्रिमूर्ति हो और त्रिमूर्तियों के परे जो रूप है, वह भी तुम ही हो ।
क्षर तथा अक्षर तुम ही हो, क्षर तथा अक्षर के ज्ञाता भी तुम ही हो । हे शतकोटि
सूर्यसम तेजस्वी, तुम्हारी जय हो ! हे संसार-सर्प-सुपर्ण (संसार-रूपी साँप के लिए गरुड़
पक्षी के समान दीखनेवाले) तुम्हारी जय हो ! हे ललित आगमों से प्रशंसित, हे लक्ष्मीपति,
हे दयासमुद्र, हे विबुध-शत्रुनाशक, श्रेष्ठ मुनिवन्द्य, आद्यन्तरहित, हे शत्रुनाशक, हे दशरथ-
राम, दिनकर-शशि-नेत्रवाले, दिव्य चरित्रवान्, अनुपम शुभ गात्रवाले, अखिलाधार, सहस्र-
मुख आदिशेष भी क्या, तुम्हारी महिमा का वर्णन कर सकेगा ? क्या पद्मसंभव ब्रह्मा
भी तुम्हारी महिमा की स्तुति करने में समर्थ हैं ? फिर मेरी क्या शक्ति है कि मैं तुम्हारी
प्रशंसा करूँ ? तुम्हारी महिमा को जानने की शक्ति मुझमें कहाँ है ? तुम्हारी स्तुति
करने की क्षमता ही मुझमें कहाँ है । मैं दानव हूँ, चंचल चित्तवाला हूँ । हे राजन्,