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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 508 में से

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पृष्ठ 282

२७२ रंगनाथ रामायण
के लिए मेरे अस्त्र के सिवाय (मुक्ति का) और कोई उपाय नहीं है । वह छिप कहाँ
सकता है ?' फिर उन्होंने नील को देखकर कहा—'तुम सेना के आगे-आगे ऐसे मार्ग से
चलो जो बहुत ही मनोहर हो तथा जिसमें स्वच्छ एवं मीठा जल, पके हुए फल, तथा
पेड़ों की छाया का प्राचुर्य हो । साथ-ही-साथ शत्रुजनों का भी पूरा ध्यान रखते हुए आगे
बढ़ना ।' नल उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए चल पड़ा । सुग्रीव ने सभी वानरों
को युद्ध-यात्रा पर चलने की आज्ञा दी ।
३. कपि-सेनाओं की युद्ध-यात्रा
तब वानर-सेना जहाँ-तहाँ की गुफाओं से बड़े उत्साह के साथ चली । उनके पदाघातों
की घोर ध्वनि से सब गुफाएँ गूंजने लगीं । उनके घोर हुंकार, तथा विकट अट्टहास के निनाद
आकाश तक व्याप्त हो गये । कुछ वानर भयंकर गर्जन करते हुए, अपनी शक्ति के गर्व में
झूमते हुए जा रहे थे । कुछ पके हुए फल-वृक्षों को ही अपने कंधों पर रखे हुए उनके फलों
को चबाते हुए जा रहे थे । कुछ वानर राम के समक्ष खड़े होकर कह रहे थे कि—'हे
राज भूपाल, हम अवश्य युद्ध में राक्षस-समूह के साथ रावण का वध करेंगे ।' इस प्रकार,
सभी वानरवीर अत्यधिक उत्साह से उछलते, हर्ष-निनाद करते, अपनी पूँछों को हिलाते,
पर्वत-शिखरों पर चढ़कर अपनी इच्छा से भयंकर गर्जन करने लगे । उस ध्वनि से आकाश
गूँजने लगा; पृथ्वी डोलने लगी, पहाड़ काँपने लगे, अष्ट दिग्गज धँस-से गये, आदिशेष
अत्यधिक भार का अनुभव करने लगा, कच्छप ने अपना सिर झुका लिया । उस विशाल
सेना के चलने से जो धूलि उठी वह कई रंगों से आकाश में व्याप्त होकर ऐसी दीखने
लगी, मानों उस ध्वनि के आधिक्य के कारण पृथ्वी से निःश्वास का धुआँ इस रूप में निकल
रहा हो ।
वानरों की उस विशाल सेना के अग्र भाग में नील के नेतृत्व में चलनेवाली सेना
(गरुड़ के) भयंकर मुख के समान थी दोनों पार्श्व भागों में चलनेवाली सेनाएँ दो पक्षों
की भाँति थीं; मध्य भाग में आनेवाले रामचंद्र आत्मा के समान थे; पीछे बड़े आटोप के
साथ आनेवाली सेना पूँछ की तरह प्रकट होती थी । इस तरह वह विशाल सेना ऐसी
दीख रही थी, मानो नागपाश से पीड़ित होनेवाले सूर्यवंशी राजकुमारों के संकट दूर करने
के निमित्त, गरुड़ पृथ्वी पर चल रहा हो । प्रजंघ, केशरी तथा दविमुख आदि वानर-वीर
भीड़ को हटाकर मार्ग बनाते हुए जा रहे थे । उनके पीछे अत्यधिक हर्षोल्लास से भरे
हुए हृदयों से गवय, तार, गंधमादन, हनुमान्, अंगद, शरभ, नल, जांबवान्, हर, मैन्द आदि
वानर जा रहे थे । उनके पीछे रामचंद्र, अनुज लक्ष्मण के साथ चल रहे थे । इस प्रकार,
सह्याद्रि पर पहुँचकर वही उन्होंने पड़ाव डाला । सुग्रीव ने वहाँ के विशाल वनों में,
तड़ागों के किनारे, तथा वृक्षों की छाया में सेना को ठहरने का आदेश दिया ।
दूसरे दिन पूर्ववत् सेना को रवाना करके लक्ष्मण स्वयं भी अपने प्रभु राम के साथ
चले । वानरों के चलने से धरती हिलने लगी । उस सेना-समुद्र में वीर रस का उफान-सा
उठ रहा था, उनकी शक्ति चारों ओर व्याप्त हो रही थी; (सैनिकों की) शरीर-
कांति की तरंगें उठ रही थीं; हर्ष-ध्वनियों का घोष आकाश का स्पर्श कर रहा था,