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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 508 में से

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पृष्ठ 287

ज्वालाएँ निकल रही थी । प्रलय-काल के प्रचण्ड प्रभंजन से मुक्त, कुलपर्वतों की भाँति वे
परस्पर देख रहे थे, फुफकारनेवाले सर्पों की भाँति उनकी साँस वेग से चल रही थी ।
वे बड़े गर्व से शूल उठाते, खड्गों को खींचते, करवालों को आकाश में घुमाते, लाठियों
को ऊँचा करते, चक्रों को घुमाते, प्रवल मुद्गरों को सँभालने, दीर्घ खड्गों को दिखाते,
भालों को घुमाते और धनुष का टंकार करते हुए अपने क्रोध को प्रकट कर रहे थे ।
उनके इस क्रोध-प्रदर्शन के समय, उनके करवाल एक दूसरे से टकराकर स्फुलिंग
उगलते थे, परस्पर उनके केयूर तथा मुकुटों के रगड़ खाने से मोती बिखर जाते थे और
आभूषण चूर-चूर हो जाते थे । वे क्रोधोन्मत्त हो आकाश को कँपा देनेवाली गंभीर ध्वनि
से रावण से कहने लगे—'हे देव, देवता गंधर्व, दैत्य तथा किन्नर आपको देखने का भी
साहस नही करते; इन्द्र भी तो आपको देखकर भय से सिकुड़ जाता है । तब नर तथा
वानरों का साहस ही कितना है कि वे आपका सामना कर सकें ? उस दिन हम कुछ
असावधान से रहे, इसलिए उस नीच वानर ने अपनी दुष्टता से आतंक फैला दिया था ।
अब हमारे सामने किसकी शक्ति है कि लंका में प्रवेश करने का साहस करे । हे दानव-
नाथ, इतना क्यो, आप हमें शीघ्र आदेश दीजिए । हम तुरंत जाकर उन वानरों का नामो-
निशान मिटा देंगे और राजकुमारों का संहार करके वापस आयेंगे ।'

८. राक्षसवीरों को विभीषण का उपदेश

इस प्रकार की दुर्वार गर्वोक्तियाँ कहनेवाले राक्षसों को देखकर विभीषण, समस्त
इन्द्रियों को अपने वश में किये हुए योगीन्द्र की भाँति, गरजनेवाले उद्दण्ड मेघों को शांत
रखनेवाले इन्द्र की भाँति उन सब को अपने-अपने आसनों पर बैठ जाने का आदेश देकर
बोला—"हे वीरो, तुम उतावले मत बनो । किंचित् विचार करके देखो । किसी भी कार्य
को साधने के लिए पहले साम, दान, तथा भेद के उपायों का आश्रय लेना चाहिए । यदि
उनसे कार्य सिद्ध न हो, तभी दण्ड-विधान का आश्रय लेना पड़ता है । पहले ही दण्ड-
नीति को अपनाना नीति-विरुद्ध है । शत्रु के असावधान रहते समय ही, उसको जीतना
सुलभ है, या उस समय उसको जीता जा सकता है, जब कोई अन्य शत्रु उस पर आक्रमण
करने आता है और वह भगवान् की कृपा से वंचित रहता है । राम कभी असावधान
नही रहते, उनका पराक्रम दुर्वार है, उन पर कोई आक्रमण करने नहीं आता । और तो
और, वे स्वयं भगवान् है । शिव-धनुष का भंग उन्हों ने तो किया था ? वे परम विवेकी हैं,
अनुपम बाहुबल-संपन्न, तथा विजयी है । तुम चाहे जितना भी डींग हाँको, उस सूर्यकुल-
तिलक को जीतना क्या, तुम्हारे लिए संभव है ? उस वायुपुत्र की शक्ति का किंचित्
विचार करो, जिसने विशाल समुद्र को एक छोटी नहर की भाँति पार कर लिया है ।
तुम नहीं जानते कि उसने तुम्हारे देखते-देखते लंका में कैसा उत्पात मचा दिया ? उस
वानर ने राम की सेना के शौर्य का आभासमात्र दिखाया है । ऐसे अनेक वानर और
उनसे भी अधिक शक्तिशाली असंख्य वानर उनकी (राम की) सेवा में हैं । तुम लोग
राम के पराक्रम के आगे कैसे टिक सकते हो ? हे दानववीरो, क्रोधोन्मत्त हो अपने तथा
दूसरों के बल का अनुमान किये बिना, ऐसे वचन कहना क्या बुद्धिमानी है ? सुंदरियों में
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