रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० रंगनाथ रामायण
गये और उनसे कहा—'हे देव आज प्रभु, सभा में विराजमान हैं और आपको बुला लाने
के लिए हमें भेजा है।' यह आदेश सुनकर कुंभकर्ण अपने पुत्र कुंभ तथा निकुंभ के साथ
शीघ्र सभा-मंडप में पहुँचा। मणिमय, महिमा-समन्वित तथा नर्त्तकियो के संगीत की मधुर
ध्वनि से संपन्न उस सभा-मंडप में सिंहासनस्थ अपने अग्रज को उसने प्रणाम किया और
बड़ी नम्रता से एक उन्नत आसन पर बैठ गया। अपने भाई के साथ ही विभीषण भी आ
गया और स्वर्ण के आसन पर उपविष्ट हुआ। तब रावण सुरेश (इंद्र) के समान प्रभाव
उत्पन्न करते हुए प्रहस्त को देखकर बोला—'लंका नगर की रक्षा के लिए और भी अधिक
सैनिको को नियुक्त करो; सभी मार्गों में किले के द्वारो पर, भीतर तथा बाहर, राक्षस-
वीरो को सावधान रहने की चेतावनी देकर नियुक्त करो।'
१०. कुंभकर्ण को सीतापहरण का वृत्तांत सुनाना
उसके पश्चात् दानवेश्वर कुंभकर्ण को देखकर अत्यधिक व्यग्रता से कहने लगा—
"हे कुंभकर्ण, मैं तुम्हें एक ऐसी बात सुनाता हूँ जिसे तुमने अबतक नहीं सुना होगा। मैं एक
दिन जनपद में गया और वहाँ राम की पत्नी, भूमि-सुता कमलाक्षी सीता पर मुग्ध होकर
उन्हें यहाँ ले आया। कुछ दिन पहले हनुमान् नामक एक वानर यहाँ आया और सीता
से मिलकर उसे प्रणाम किया और कहा—'हे देवी, आपके पति राम यहाँ अवश्य आयेंगे।'
सीता उन बातो पर विश्वास किये बैठी है। वह मानव (राम) अत्यधिक साहस के साथ
समुद्र के उस पार शिविर डाले पड़ा हुआ है। वह अपने साथ, वनो में पाये जानेवाले
वानरो की एक बड़ी सेना एकत्र करके लाया है। शीघ्र मुझसे युद्ध करके सीता को
ले जाने के निमित्त वह आ रहा है। वह भले ही यहाँ आवे। मैंने इन्द्र आदि देवताओ
को परास्त किया है। जिस कैलास पर्वत पर शिव रहते हैं, उसे मैंने उठाया है। शंभु से
मैंने चंद्रहास (नामक खड्ग) प्राप्त किया है। कमलनभव ब्रह्मा का वर मुझे प्राप्त है।
तिस पर मुझे तुम्हारी शक्ति की सहायता प्राप्त है। तब, क्या एक साधारण मानव मुझे
परास्त कर सकता है ? राम कैसे मुझे युद्ध में जीत सकेगा, और कैसे उस सुंदरी को
यहाँ से ले जा सकेगा ?"
इन बातो को सुनकर कुंभकर्ण ने क्रोध में आकर सब लोगो के समक्ष रावण से
कहा—'हे रावण, राम को धोखा देकर, उनकी पत्नी को इतनी क्रूरता के साथ तुम कैसे
लाये ? क्या इस प्रकार उसे ले आना उचित था ? तुमने अपने मन में नीति का विचार
ही नहीं किया। धर्म-मार्ग का स्मरण ही नहीं किया। काम के पीछे तुमने सारे कुल को
कलंकित किया। जिस दिन तुम सीता को ले आये, उसी दिन लंका का सर्वनाश हो गया ?
इसका नाश तो अब निश्चित ही है, चाहे कैसे भी हो। तुम उस सूर्यवर्चस राम के अप्रति-
हत बाणो का लक्ष्य हुए बिना अपने भाग्य से बचकर चले आये, यही बड़ी गनीमत है।
अब मैं जाता हूँ। हे रावण, इतना बड़ा कार्य सँभालने का भार मुझ पर पड़ा है। अब
तुम वानर तथा राघवो का किंचित् भी भय किये बिना सुख भोगते रहो।'
इन बातो को सुनकर महापार्श्व ने कहा—'हे राक्षसाधीश, आप तो समस्त लोकों
के अधिपति हैं। क्या आप सीता के साथ बलपूर्वक रति-क्रीडा नही कर सकते ?' यह