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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 508 में से

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पृष्ठ 292

मुँह से ऐसी विचित्र बातें सुन रहे हैं । क्या, तुम समझते हो कि राक्षस उतने शक्ति
हीन हैं ?'
११ इन्द्रजीत का विभीषण को अपने पराक्रम का परिचय देना
रामानुज की बाणाग्नि से दग्ध होना इन्द्रजीत के भाग्य में लिखा हुआ था । इसलिए
वह अत्यधिक मद से उन्मत्त हो, किसी भी प्रकार की नीति का ख्याल किये बिना कहने
लगा- "हे विभीषण सुनो । राक्षसों की शक्ति तथा प्रताप का विचार करके देखो, तो यह
निश्चय है कि हम में से अल्पशक्तिमान् भी राम तथा लक्ष्मण को जीत सकता है । तीनो
लोकों पर बड़े वैभव से राज्य करनेवाले इन्द्र को क्या मैंने पकड़कर बंदी नहीं बनाया ?
उनके ऐरावत को पकड़कर उनके दाँत मैंने नहीं तोड़े ? ये सब मेरे लिए कौन बड़ी बात थी ?
मैंने अग्नि को अपमानित किया; यम को दबा दिया, नैऋत की शक्ति को नष्ट
किया तथा वरुण को परास्त किया । दिक्पालों को इस प्रकार निष्ठुर होकर त्रास देनेवाले
मेरे प्रबल हाथों से क्या, ये मानव नष्ट नहीं होंगे ? तुम तो बहुत बढ़ा-चढ़ाकर उनकी
महिमा का राग अलाप रहे हो । हे विभीषण, सप्त समुद्रों में प्रविष्ट होकर मैं उन्हें
आलोड़ित करूँगा; मेरु तथा मंदर पर्वतों को नचा दूंगा; समस्त पृथ्वी को लाँघ जाऊँगा,
इस पृथ्वी को ऐसे उछालूँगा कि वह जाकर आकाश से टकरा जायगी, मैं समस्त लोकों
को सुखा दूंगा, सारे वनचर समूह को इस प्रकार समुद्र में डुबो दूँगा कि वे थर-थर
काँप उठेंगे; पृथ्वी का भार वहन करनेवाले उस शेष नाग को पकड़कर, उसका विष
निचोड़ दूँगा । अपने भुज-बल से सूर्य तथा चंद्र को पकड़कर उन्हें पृथ्वी पर रगड़ दूँगा ।
वनचर-समूह को पकड़कर उन्हें सूर्य तथा दिशाओं के उस पार फेंक दूँगा; युद्ध में वानरों
का रक्त भूतों को पिलाऊँगा, अपने शर-समूह से आकाश, दिशाएँ तथा पृथ्वी को ढक
दूँगा । सूर्य के रथ का जूआ पकड़कर आकाश में घुमाऊँगा और उसे पृथ्वी में दबा दूँगा।
अपने दायें और बायें हाथों में पृथ्वी तथा आकाश को ग्रहण कर उनको ऐसा मसल दूँगा
कि वे चूर-चूर हो जायँ । हे विभीषण, तुम दनुजेश्वर के भाई हो; इसलिए मैं तुम्हें कुछ
कहे बिना क्षमा करता हूँ । यदि दूसरा कोई होता, तो मैं कदापि ऐसी बातें नहीं सहता ।
ऐसी व्यर्थ की बातें क्यों करते हो ?'
१२. विभीषण द्वारा इन्द्रजीत के दंभ की निंदा
इन दर्पपूर्ण वचनों को सुनकर विभीषण अत्यंत क्रुद्ध हुआ और इंद्रजीत को देखकर
इस प्रकार कहने लगा- "तुमने सूर्यवंशज राम को क्या समझ रखा है कि ऐसे मात्सर्य-
युक्त अनुचित वचन कह रहे हो ? तुम्हारे हाथों से पराजित होने के लिए वे इन्द्र नहीं हैं;
वे तो युद्ध में भयंकर बननेवाले राम हैं । तुम्हारे द्वारा परास्त होने के लिए वे अग्नि-
देव नहीं हैं; वे तो रणनीति-कुशल राम हैं । तुममे हार जाने के लिए वे यम नहीं हैं,
वे तो रण में प्रचण्ड रूप धारण करनेवाले राम हैं । तुमने परास्त होने के लिए, वे नैऋत
नहीं हैं; वे तो युद्ध में व्योत्पादक रूप धारण करनेवाले राम हैं । तुम्हारे द्वारा विजित
होने के लिए वे वरुण नहीं हैं; वे तो रण में अत्यधिक सावधान रहनेवाले राम हैं । वे
तुममे हार जानेवाला पवन नहीं हैं, वे युद्ध-निपुण राम है। तुममे परास्त होने वाले कुबेर नहीं हैं;