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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 288

श्रेष्ठ सुंदरी राम की पत्नी सीता जब भयभीत होकर रामचन्द्र को पुकारने लगी, तब
राक्षसेश्वर अत्यंत वेग से उन्हें उठा लाये । हम स्वयं सोचें, उन्होंने हमें कौन-सी हानि पहुँचाई है ?
तुम लोग इस बात का तो विचार करते हो कि उन्होंने खर-दूषण आदि राक्षसों
को खंड-खंड कर दिया, किन्तु तुम यह नहीं सोचते कि पहले उन राक्षसों ने ही उनको
घेरा था । क्या, राम-लक्ष्मण पर आक्रमण करना उनको उचित था ? अपने किये हुए
कर्मों के फल भोगकर वे नष्ट हो गये और अमर-लोक को प्राप्त हो गये । अब उनकी
चिंता क्यों करें ? हमारी भलाई इसी में है कि वीर वानरों के लंका में प्रविष्ट होने के
पहले, हमारे दुर्गों के उनके पदाघात से नष्ट होने के पहले ही, सौमित्र के बाण-रूपी वज्र
के गिरने के पहले, रामचन्द्र के क्रोध से उत्तेजित होने के पहले ही और उनकी क्रोधाग्नि
से लंका के भस्म होने के पहले ही, हम सीता को श्रीरामचन्द्र के पास पहुँचा दें ।
सीता को ले आने के दोष का यही परिहार है । राम-भूपाल धर्मात्मा हैं और धर्म की
सदा विजय होती है ।”
इस प्रकार विभीषण ने कई प्रकार से राक्षसवीरों को समझाया और फिर दशकंठ
को देखकर कहा—‘हे प्रभु, दुर्व्यसन सुख तथा धर्म में बाधा डालनेवाले होते हैं । अतएव
आप उनका त्याग कीजिए । धर्म-पालन सुख तथा कीर्ति प्रदान करनेवाला होता है । इसलिए
आप धर्म के पथ का अनुसरण कीजिए और नीतिज्ञ कहलाइए । हठ छोड़िए, और प्रसन्न-
चित्त होइए । यदि आप अपने समस्त कुल की रक्षा करना चाहते हैं, तो जानकी को मुक्त
कर दीजिए । उस राम से हम शत्रुता क्यों करें ?’ इस प्रकार के नीतियुक्त वचन
सुनना रावण को अप्रिय लगा । इसलिए वह तुरंत सभा-भवन छोड़कर अंतःपुर में चला गया ।
९. रावण को विभीषण का हितोपदेश
दूसरे दिन प्रातःकाल ही विभीषण संध्यावंदन आदि प्रातःकाल के नित्य कर्मों से
निवृत्त होकर अपने रथ पर सवार हो रावण के अंतःपुर को चला । उसके चारों ओर
राक्षस सैनिक उसकी सेवा में चल रहे थे । वह रमणीय तथा चित्र-विचित्र तोरणों से
अलंकृत राज-मार्ग से होकर सुंदर शिल्पों को देखते हुए रावण के उस अंतःपुर के सिंह-
द्वार पर पहुँचा, जहाँ (अश्वों की) हिनहिनाहट, (गजों की) चिंघाड़, पटह तथा शंखों के
निनाद, सेवा-कार्यों में प्रवृत्त परिचारिकाओं की पायलों का झंकार, अंतःपुर के रक्षकों के
हुंकार, सूत-मागध बंदी-जनों की स्तुति, परिवारकों के वार्त्तालाप की ध्वनि, तथा गजों की
निःश्वास-वायु के कारण बड़े वेग से फड़फड़ानेवाली पताकाओं की ध्वनि, समुद्र की तरंगों
के घोष के समान समस्त दिशाओं को वधिर बना रही थी । वह अंतःपुर विश्वस्त राक्षस-
वीरों से ऐसा रक्षित था, मानो नक्षत्रों से परिवृत्त हो । उस सौध के सिंहद्वार पर असंख्य,
गज-रथ तथ अश्वों का समूह था । ऐसे सिंहद्वार के निकट विभीषण अपने रथ से उतरा
और अंतःपुर में प्रवेश किया । वहाँ यज्ञ आदि सत्कर्मों से अनुरक्त पूजनीय ब्राह्मणों को
पुण्याहवाचन तथा शान्ति-पाठ करते हुए देखा । विभीषण उन्हें देखते हुए बड़ी प्रीति से
आगे बढ़ा और सभा-भवन में पहुँचकर अपने अग्रज को अत्यंत भक्ति के साथ प्रणाम किया।
फिर, रावण का आदेश पाकर एक उचित आसन पर बैठा ।