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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

सदा सतप्त रहने के कारण रघुराम की अँगूठी देखकर भी मुझे विश्वास नही हो रहा है ।
तुम कौन हो ? सूर्यकुलाधिप का रूप कैसा है ? उनके अनुज सौमित्र का रूप
कैसा है ? मेरे प्रभु अब कहाँ रहते है ? उन्होंने तुम्हें कौन-सा संदेश सुनाने के लिए
भेजा है ? तुम किस प्रकार समुद्र पार करके यहाँ आये ? तुम इन सब बातों का उत्तर दो,
ताकि मुझे विश्वास हो जाय ।'
तब हनुमान् सीता से इस प्रकार कहने लगा—'हे देवी, वायुदेव के वर-प्रसाद से
केसरी नामक एक कपि-श्रेष्ठ तथा अञ्जना देवी के पुत्र के रूप में मेरा जन्म हुआ । मेरा
नाम हनुमान् है । इस पृथ्वी पर सुग्रीव नामक वानर-राजा का मैं विश्वस्त मंत्री हूँ ।
उनके भाई बालि ने उनके राज्य तथा पत्नी को उनसे छीन लिया था । तब से वे अपने
चार मंत्रियों के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर रहते थे। दशकंठ जब कपट रूप से आपको लिये
जा रहा था, तब मैंने आपका विलाप सुना और सिर उठाकर आपकी ओर देखते रहे ।
आपने भी हमें देखा और एक वस्त्र में बाँधकर अपने कुछ आभूषण पृथ्वी पर गिरा दिये ।
उन आभूषणों को सुग्रीव ने सुरक्षित रखा। उसके पश्चात् रघुराम आपका अन्वेषण

२२८ रंगनाथ रामायण
इतना कहने के पश्चात् हनुमान् ने राम का कद, उनकी अवस्था, उनकी आँखों का
सौंदर्य, कंठ का माधुर्य, मंद हँसी से युक्त मुख की शोभा, नखों की आकृति, उन्नत स्कंधों
की सुंदरता, कसी हुई कमर की मनोज्ञता, विशाल वक्ष की शोभा, कानों का रंग, चलने का
ढंग, नाभि की सुघड़ता, जाँघों की विशालता, करों की लालिमा आदि शरीरके सभी लक्षणों
का वर्णन किया । तत्पश्चात् उसने उनके शौर्य, धैर्य, ब्रह्मचर्य, उनकी शक्ति दाति, संयम
और क्षांति (क्षमा) उनकी भक्ति, युक्ति, और पितृ-भक्ति तथा उनके शील और वर्त्ताव
आदि का वर्णन किया । फिर उस पुण्यात्मा ने लक्ष्मण के रूप का भी वर्णन किया और
तब राम की अंगूठी सीता को दी ।
सीता ने अँगूठी ली और उसे देखकर ऐसी आश्वस्त हुईं, मानो उनके खोये हुए
प्राण लौट आये हों । राम के दर्शनों से भी अधिक उस अँगूठी को देखकर वह रमणी
आनंदित हुई । उन्होंने उसे अपने वक्ष से ऐसे लगाया, मानो उसे अपने हृदय-रूपी सिंहासन
पर बिठा रही हों; उनकी आँखों से आनंद के अश्रु ऐसे बहने लगे, मानो वे उस अँगूठी
को अर्घ्य-पाद्य आदि दे रही हों । वे पुलकित गात्र से उसे देखकर ऐसी मूच्छित हो गईं, मानो
धूप-दीप आदि दिखाने के पश्चात् वे उसके (उस अँगूठी के) सामने साष्टांग प्रणाम कर रही हों ।
कुछ समय के पश्चात् वे सँभल गईं और हनुमान् को देखकर कहने लगीं—
'हे कपिकुलोत्तम, हे राम-कार्य-तत्पर, हे उपकार-निरत, हे लोकोन्नत-चरित्रवान्, हे पवनकुमार,
तुमने मुझे प्राण-दान दिया है । मैं तुम्हारा प्रत्युपकार कर नहीं सकती । काकुत्स्यतिलक
की कृपा से तुम कल्पांत तक जीवित रहो ।' इस प्रकार आशीर्वाद देनेवाली जानकी को
देखकर, महान् पराक्रमी वायुपुत्र ने हाथ जोड़कर कहा—'हे देवी, मैंने आपकी वह कृपा
प्राप्त की है, जो ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र आदि देवताओं के लिए भी दुर्लभ है । मैंने आपके
दर्शन भी कर लिये । मेरे लिए यही क्या कम है ?'
तब सीता अपने प्राणनाथ तथा देवर का कुशल-समाचार पूछती हुई बोलीं—
'हे अनघ, अनुपम बलशाली रघुराम मुझसे विछुड़कर क्या धैर्यके साथ रह रहे हैं? वे तथा
उनके अनुज क्या कभी मेरा स्मरण करते हैं ? क्या वे युद्ध करने के लिए शीघ्र यहाँ
आनेवाले हैं ? तब हनुमान् ने कहा—'हे माता, अपने प्राणनाथ का वृत्तांत सुनिए । जिस
दिन से वे आपसे जुदा हुए हं वे सतत वेदना से पीड़ित रहते हैं, धरती पर सोते हैं,
निद्रा को तो वे जानते ही नहीं । मांसाहार भी उन्होंने छोड़ दिया है । वे सदा दण्डक-
वन में आपके खो जाने की बात सोचते रहते हैं । सिर किंचित् झुका लेते हैं, लंबी सांस
खींचते हैं, आँखों में आँसू भर लेते हैं, मूच्छित हो जाते हैं, धरती पर गिर पड़ते हैं और
चेतना लौटते ही उठकर चारो ओर शून्य दृष्टियों से देखने लगते हैं और व्यथा से पीड़ित
तथा व्याकुल होते हैं । कभी-कभी हाय सीता ! हाय सीता ! कहकर पुकारते हैं । सुमित्रा-
नंदन जब उनकी यह दशा देखते हैं, तब वे भी दुःखी हो जाते हैं । जब वे दोनों आपके
यहाँ रहने का समाचार सुनेंगे, तब तुरंत वहाँ से चल पड़ेंगे । वे मुझसे भी श्रेष्ठ, भयंकर
आकारवाले; अमेय पराक्रमवाले; नग, शृंग, तरु, नख तथा दाँतों को आयुधों के रूप में
प्रयोग करनेवाले; सुग्रीव, नल, अंगद आदि भयंकर वीरों को साथ लेकर, समुद्र को लाँघकर

किसी भी प्रकार यहाँ आयेंगे और आपको साथ लेकर अयोध्या जायेंगे । रावण रामके
द्वारा युद्ध में मारा जायगा । आपकी इच्छा पूर्ण होगी । पर हे माता, इतना विलव क्यो ?
चलिए, स्वय आपको अपनी पीठ पर लेकर, वडे यत्न से समुद्र को लाँघकर प्रात काल होते-
होते प्रभु के पास पहुँच जाऊँगा ।”
वायु-पुत्र के सद्गुणो से प्रसन्न होकर सीता बोली—“हे पवनसुत, तुम अवश्य ही
इस प्रकार करने की क्षमता रखते हो । सचमुच तुम्हारी शक्ति वैसी ही है । किन्तु,
हे अनघ, विवाह के दिन से अबतक लोकप्रभु, रामचन्द्र के सिवा अन्य पुरुष का स्पर्श
स्वप्न में भी मैने नही किया । यह नीच रावण मुझे यहाँ उठा लाया है, उसके स्पर्श का
दुख ही मुझे सतत सालता रहता है । उसने दुस्साहस के साथ बलात् मेरा स्पर्श किया ।
मै अन्य किसी पुरुषो के स्पर्श की कल्पना भी नही करती । तुम मेरे प्राणनाथ के विश्वास-
पात्र अनुचर हो । फिर भी, मै तुम्हारी पीठ पर बैठकर चलना नही चाहती । लोग कहेंगे
कि राम की पत्नी को धोखे से दैत्य उठा ले गया था और राम भी उसी प्रकार उसे
वापस ले आये, इसलिए यह उचित नही है । पहले एक बार चित्रकूट में रहते

२३० रंगनाथ रामायण
"हे हनुमान्, तुम सौमित्र से मेरी ओर से ये वातें कहना—'तुम मुझे अपनी माता
के समान मानते थे । अव मुझको इस प्रकार भूल जाना और मेरी दशा का विचार नहीं
करना क्या तुम्हारे लिए उचित है ? मैंने तुम्हारे जैसे पुण्यात्मा को दण्डक वन में अपशव्द
कहे थे, उसका फल मैं अव भुगत रही हूँ । अव विलव मत करो; दया दिखाओ ।' हे
पवनकुमार, तुम अंगद, रविपुत्र तथा अन्य वानरनायकों से अवसर के अनुकूल मेरे
विनीत वचन कहना, और किसी भी प्रकार उन्हें रामचंद्र तथा लक्ष्मण के साथ यहाँ ले
आना । मै वड़े साहस के साथ एक मास तक तुम्हारे, आगमन की प्रतीक्षा करूँगी । उसके
पश्चात् मै जीवित नहीं रह सकूँगी । इस अवधि के भीतर तुम अवश्य रघुराम को किसी
भी प्रकार से यहाँ ले आना । अव तुम शीघ्र यहाँ से जाओ ।"
सीता के इन वचनों को सुनकर हनुमान् विनम्र होकर वोले—'हे माता, ऐसा ही
होगा । मैं आपकी सभी वातें उनसे कह दूँगा । अव आप आश्वस्त हो जाँय । हे देवी,
मैंने आपको रघुराम की अँगूठी ला दी थी । अव मै रिक्त हाथो यहाँ से जाऊँ, यह दूत
के लिए उचित नही है । अत, आप अपने चिह्न के स्वरूप में कोई रत्न दीजिए ।' तव
सीता वोलीं—'तुम देखने में इतने छोटे हो, तव इस विशाल समुद्र को किस प्रकार
पार कर सकोगे ? महान् वल तथा पराक्रम से पूर्ण अपना सच्चा रूप तुम मुझे दिखाओ।
तुम्हारा निज रूप देखे विना मै तुम्हें अपनी चूडामणि नही दूँगी ।'
तव हनुमान् ने अपना रूप इतना ऊँचा वनाया कि सारा आकाश उनके शरीर पर
व्याप्त हो गया । चमकनेवाले नक्षत्रों का समूह पहले उनके कंठ का मालती-मल्लिका का
हार वना, फिर वक्षस्थल पर शोभित होनेवाले रजत का हार वना और उसके पश्चात्
उसके कटि-प्रदेश को अलंकृत करनेवाली चाँदी की क्षुद्र घटिकाओं की मेखला वन गया ।
ऐसा अत्यंत भयंकर रूप धारण करके जव हनुमान् सीताजी के समक्ष खड़ा हुआ, तव वे मन
ही मन भयभीत हो गईं और कहने लगीं—'हे अनुपम गात्रवाले, हे अंजनासुत, तुम्हारा
यह रूप आश्चर्यजनक है । शीघ्र ही इस रूप का उपसंहार करो ।' यो कहकर उन्होंने
हनुमान् की प्रशंसा की और उसे आशीर्वाद दिया । उसका विश्व-रूप देखकर देवता भी
उसकी प्रशंसा करने लगे । फिर पवनपुत्र ने विष्णु के समान, उस विशाल आकार को
छोड़कर लघु रूप धारण कर लिया । तव सीता ने वड़े स्नेह से हनुमान् को अपने निकट
वुलाया, अपनी साड़ी के छोर में वँधी हुई चूडामणि निकाली और वड़ी प्रीति से उसे
हनुमान् के हाथों में रखा । हनुमान् ने वड़ी भक्ति के साथ उसे ग्रहण किया और
प्रणाम करके, उनकी आज्ञा लेकर वहाँ से विदा हुआ ।
१५. अशोक-वन का ध्वंस
हनुमान् ने सोचा—मै अव रावण को अपने आगमन का समाचार वताता हूँ । फिर,
थोड़ी देर तक सोचने के पश्चात् वन का नाश करने के उद्देश्य से उसने शरीर बढ़ाया
और अपने उर से उत्पन्न ववंडर (प्रचंड वायु) के धक्कों से उस वन के वृक्षों को तोड़कर
इस प्रकार गिरा दिया, मानो वे (कपड़े के) नाने-वाने हों । फिर, नित्य अलंकृत उस अशोक-
वन में रहनेवाली रमणीय अट्टालिकाओं को पृथ्वी पर गिरा दिया; क्रीड़ा-गृहों को चूर-चूर

सुन्दरकाण्ड २३१
कर दिया, वृक्ष की शाखाओ को तोड दिया, फूलो को झाड दिया और उनके सुगंधित
मकरद को बिखेर दिया, नालो को नष्ट कर दिया, पुष्प-लताओ को तोड दिया, निकुंजो
को छिन्न-भिन्न कर दिया और तालाबो के जल को आलोडित करते हुए उसमें अच्छी तरह
तैरने लगा । हनुमान् के इस भयंकर कृत्य के कारण पिक, बक, सारस, क्रौंच, कलहंस, शुक,
शारिका, मयूर आदि सभी पक्षी आर्तध्वनि करते हुए उडने लगे । तब वन के माली जाग
पडे और हनुमान् से युद्ध करने के लिए तैयार हुए । आकाश तथा दिगंतो को अपने गर्जनो
से गुजायमान करते हुए वे हाथ में अनुपम करवाक लेकर हनुमान् पर झपटे । हनुमान्
अपने नाम, अपने आगमन-कारण तथा अपनी शक्ति का परिचय देकर बडी भयंकर गति
से एक-एक राक्षस का सहार करने लगा । इस प्रकार, अनिलकुमार ने प्रथम युद्ध का प्रारम्भ
किया और अत्यधिक शक्ति से सपन्न आठ सहस्र घोर राक्षसो का सहज ही वध कर दिया
तथा पृथ्वी पर शवो का ढेर लगा दिया । उसके पश्चात् जब हनुमान् ने गर्जन किया, तब
सीताँ की रखवाली में नियुक्त राक्षसियाँ भी भयभीत हो गई । उनका धैर्य जाता रहा ।
वे भागती हुई लोक-कंटक रावण के पास गई और कहने लगी—'हे देव, आज एक वानर
बडे साहस के साथ अशोक-वन में आया है । उसने कुछ समय तक वैदेही से बातचीत की
और उसके पश्चात् वह सारे वन को उजाडने लगा । उसने उद्यान की रक्षा करनेवाले आठ
सहस्र राक्षसो का वध कर दिया है । वह राघव का भेजा हुआ लगता है । अन्यथा, जिस
वृक्ष के नीचे सीता बैठी हुई हैं, केवल उस वृक्ष को छोडकर सारे वन को उसाड फेंकने
का दूसरा कारण क्या हो सकता है ? उसके सबध में वैदेही से हमने पूछा भी, किन्तु उन्होने
अपनी अनभिज्ञता प्रकट करके सत्य को छिपा रखा । इसमें कोई सदेह नही है कि वह वानर
राघव का दूत ही है। अब आप अवश्य अपनी शक्ति तथा पराक्रम से उसे पकडकर दण्ड दीजिए।'
१६. हनुमान् का राक्षसों का वध करना
इन बातो को सुनकर दानव-लोक-प्रभु रावण आग-बबूला हो गया । उसकी दृष्टि
भयंकर हो गई । उसकी आँखो से दीपशिखा-सी, दीप्त लौ की भाँति अग्नि-
ज्वाला निकलने लगी । उसने तुरन्त अपने अस्सी हजार अत्यंत पराक्रमी राक्षस-वीरो को
भेजा । वे बड़े उत्साह से, अपना प्रताप दिखाते हुए धनुष, अस्त्र, शूल, मुद्गर, गदा, तलवार
आदि आयुधो से युक्त हो, युद्ध के लिए सन्नद्ध हो, गर्जन करते हुए निकले ।
इतने में सूर्योदय हुआ । पर्वताकार हनुमान् का उत्साह और भी बढ गया । वह
मकर-तोरण पर चढ गया और चारो ओर से घेरकर आनेवाले तथा शस्त्रो के प्रहार से
कष्ट पहुँचानेवाले राक्षस-वीरो को देखकर बडे दर्प के साथ बोला—'हे राक्षसो, मै महान्
शूर सुग्रीव का अनुचर हूँ । राम का दूत हूँ । रामचन्द्र का कुशल-समाचार, सीताजी से
कहकर वापस जा रहा हूँ । मेरा नाम हनुमान् है । मै अत्यधिक बलवान् हूँ । प्रशसनीय
पराक्रम तथा चातुर्य के वैभव से सपन्न वीर हूँ । लकापुरी में रहनेवाले पुरुषो के लिए
में काल बनकर आया हूँ । अब तुम लोग मुझे छेडकर क्यो मरना चाहते हो ?'
इतना कहकर वह अपने रण-कौशल तथा शौर्य को प्रकट करते हुए सहस्रो राक्षस-
सैनिको को अपने भयंकर लागूल में बाँधकर उन्हें तोरण के स्तंभों से मारने लगा ।

इस प्रकार, उसने एक भी राक्षस को जीवित लौटने नहीं दिया और युद्ध में आये हुए वीरों को
निःशेष कर दिया । उद्यान के रक्षक भयभीत होकर भागे-भागे रावण के निकट पहुँचे
और कहने लगे—'हे दनुजेंद्र, अपना भीषण रण-कौशल प्रदर्शित करते हुए उस वानर ने
अपनी पूँछ से अस्सी सहस्र राक्षस वीरों का नाश कर दिया और अब मकर-तोरण पर
इठलाता हुआ बैठा है।
रावण कालांतक (शिव) की भाँति क्रोध से अभिभूत हुआ और पिंगलाक्ष, दीर्घ-
जिह्व, वक्रनास, अश्मवक्ष, तथा शत्रुओं के लिए भयंकर रूपवाले शार्दूलमुख को बुलाकर
कहा—'तुम शीघ्र जाकर उस वानर का वध करके आओ ।' रावण की आज्ञा सिर पर
रखकर वे प्रबल सेना के साथ रथों पर बैठकर चल पड़े और भयंकर गर्जन करते हुए
पवनपुत्र के निकट पहुँचकर उस पर आक्रमण करने लगे । उनकी बाण-वृष्टि से विचलित
न होकर अपनी सारी शक्ति एकत्रित करके हनुमान् ने अपनी पूँछ घुमाकर उन राक्षसों
के रथों को तोड़ डाला, सारथियों को मार डाला, रथ के घोड़ों को मार डाला हाथियों
को मार गिराया और तुरंगों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया । इस प्रकार, सारी राक्षस-सेना को
धूल में मिलाकर हनुमान् तोरण से नीचे पृथ्वी पर कूद पड़ा और अपनी पूँछ को फंदे
के समान बनाकर वक्रनास के कंठ में लपेट दिया और उसका गला घोंटकर उसे मार
डाला । इससे संतुष्ट न होकर हनुमान् ने बढ़ते हुए क्रोध, साहस तथा शौर्य से दीप्त होते
हुए, भयंकर गर्जन करते हुए, वज्र से भी कठोर दीखनेवाली अपनी मुट्ठी से अश्मवक्ष पर
ऐसा प्रहार किया कि वह रक्त उगलते हुए पृथ्वी पर लुढ़क गया । तब अनुपम भुज-बल
से झूमनेवाले उस हनुमान् को घेरकर अन्य राक्षस-वीर युद्ध करने लगे, तो हनुमान् ने
उन सब का भी संहार कर दिया । फिर, शार्दूलमुख को वेग से घुमाकर पृथ्वी पर ऐसा पटका
कि उसका सिर चूर-चूर हो गया । उसके पश्चात् उमड़ते हुए क्रोध से समस्त राक्षसों को
व्याकुल करते हुए हनुमान् ने अत्यंत क्रूरता के साथ अपनी पूँछ से बाँधकर पिंगलाक्ष को
ऐसा घुमाया, जैसे बवंडर सूखे पत्ते को घुमाता है, और फिर उसको तोरण के स्तंभ से
दे मारा ।
इस प्रकार, अपने अद्वितीय पराक्रम से उसका वध करके, हनुमान् ने दानव-सेना में
प्रवेश किया । उसने बड़े वेग से दीर्घजिह्व पर आक्रमण किया और अपनी कठोर मुष्टि
के आघात से उसे पृथ्वी पर गिरा दिया । फिर हनुमान् ने उसकी जीभ खींचकर उसका
संहार कर डाला और फिर तोरण पर जा बैठा । हनुमान् के इस घोर कृत्य को देखकर
बचे हुए दैत्य भयभीत होकर भाग गये और सारा वृत्तांत दनुजेंद्र को जा सुनाया । तब
दशकंठ ने क्रोधावेश में आकर अपने मंत्री के पुत्र रक्तरोम, शतजिह्व, रुधिरलोचन, स्तनित-
हास, शूलदंष्ट्र, दुर्मुख तथा महान् शक्तिशाली व्याघ्रकवल नामक राक्षसों को बुलाया और
कहा—'एक वानर उद्दंड होकर राक्षसों का संहार कर रहा है । तुम जाकर उसका वध
कर डालो ।'
तब वे महाबली राक्षस गर्जन करते हुए, अनुपम रथों पर बैठकर, चतुरंगिणी सेना
को साथ लेकर चल पड़े । मकर-तोरण पर अप्रतिहत शौर्य के साथ उपस्थित हनुमान् को

सुन्दरकाण्ड २३३
उन्होंने घेर लिया और उस पर श्रेष्ठ तथा दिव्य अस्त्रोंकी वर्षा करने लगे । तब पवन-
कुमार ने वडे साहस के साथ, वादलो से घिरे हुए इन्द्र के समान सुशोभित होते हुए अपने
अघटित पराक्रम से उन दैत्यो के अस्त्रो से अपने-आपको वचाते हुए, अपने नखाग्र, पैने
दाँत, चरण, कुहनी तथा करो से प्रहार करके तथा वडी-वडी शिलाओ तथा वृक्षो को
चारो ओर से वडे वेग से उन पर फेंककर उनको चूर चूर कर डाला । हाथियो पर सिंह
के समान उछलकर चढ गया और अपने कुटिल तथा भयकर नखाग्रो से उनके कुम्भस्थलो
को चीरकर मास तथा गजमुक्ताओ को विखेर दिया । फिर छलाँग मारनेवाले हिरणो की
भाँति शीघ्रगति से दौडनेवाले अश्वो को देखते-देखते निशेष कर दिया । जीव-जतुओ का
पारण करनेवाले यमराज की भाँति वडे मनोयोग से पदचर सेना को मटियामेट कर दिया ।
कुलपर्वतो पर आघात करके भयकर ध्वनि के साथ उनको भेदनेवाले वज्र के समान वह
रथो पर उछलकर चढ गया

२३४ रङ्गनाथ रामायण
यम के समान आँखो से अग्निवर्षा करते हुए (हनुमान् के प्रत्याघात की प्रतीक्षा में) खडा
रहा । इतने में हनुमान् ने उस दैत्य के रथ को अपने पदाघात से पृथ्वी पर गिरा दिया,
अपने दाँतो से उसे पकडकर उसके खंड-खंड कर दिये । फिर एक विशाल सालवृक्ष के
प्रहार से उसके रथ के अश्वो तथा सारथी को चूर-चूर कर दिया और सिंहसम गर्जन
किया । तब जम्बुमाली रथ-हीन हो ढाल तथा खड्ग हाथ में लिये, अपनी प्रचण्ड शक्ति
प्रदर्शित करते हुए, पवनसुत के भाल पर प्रहार किया, तो वह मूच्छित हो गया, किन्तु शीघ्र
ही वह सँभलकर उठा और अपनी वज्रसम मुष्टि के आघात से उसके ढाल के टुकडे-
टुकडे कर दिये । फिर, उस दैत्य को पकडकर हनुमान् ने वलात् उसका खड्ग छीन लिया
और भयंकर गति से उस राक्षस के सिर पर ऐसा प्रहार किया कि वह राक्षस पृथ्वी पर
गिर पडा । उसके पश्चात् हनुमान् ने वची हुई सेना पर आक्रमण करके उसे छिन्न-भिन्न
कर दिया । इस प्रकार, हनुमान् वडी चतुरता तथा पराक्रम से विजय प्राप्त करके तोरण
पर जा बैठा । अपने प्राण वचाकर जो लोग भाग गये थे, उन्होने हनुमान् के पराक्रम का
सारा वृत्तांत रावण को जाकर सुनाया ।
उनकी वार्तें सुनकर रावण को महान् आश्चर्य हुआ । उसने अपने मन्त्रियो को बुला
भेजा और कुछ समय तक उनके साथ परामर्श करने के पश्चात् इन्द्र को भी युद्ध में परास्त
करनेवाले, घोर पराक्रमी तथा क्रूर, विरूपाक्ष, उपाक्ष, कलहदुर्दुर, भासकर्ण तथा प्रघस
नामक पांच प्रचंड योद्धा तथा अग्र-सेनापतियो को देखकर कहा—'किसी भी लोक में वानरो
की ऐसी शक्ति हमने न देखी, न सुनी है । हमें पता नही कि यह कौन है । तुम पाँचो
वीर, अगणित सेना को साथ लेकर जाओ और अपना भीषण वल तथा युद्ध-कौशल प्रकट
करते हुए, सावधान होकर उस वानर को वंदी वनाकर मेरे सामने उपस्थित करो ।'
रावण की आज्ञा को सिर पर धारण करके, अग्नि तथा सूर्य की-सी प्रभा से दीप्त
होते हुए, वे पाँचो राक्षसवीर, असंख्य रथ, गज, तुरंग, तथा पदचर सेना को साथ लेकर
शीघ्र चल पडे और उदयाद्रि पर प्रकाशमान होनेवाले सूर्य के समान, तोरण पर विराजमान
होकर दिगंतो तक अपने तेज को व्याप्त करनेवाले तथा दैत्य-वीरो के साथ रण करने के
लिए उद्यत पवनसुत को घेर लिया । फिर, उन्होने पृथ्वी तथा आकाश को अपने भयंकर
सिंहनादो से विदीर्ण करते हुए हनुमान् पर दिव्य शस्त्रो की घोर वृष्टि आरंभ की । उन
राक्षसवीरो में दुर्धर नामक राक्षस हनुमान् का शिरच्छेदन करने के उद्देश्य से उस पर
एक साथ पाँच वाण चलाये । तब हनुमान् भयंकर क्रोध के साथ गर्जन करके आकाश की
ओर उडा । दुर्धर भी उसके साथ उडा और धनुष पर तीर चढाकर प्रलयकाल के भयंकर
मेघ की भाँति शरवृष्टि करने लगा । पवनकुमार ने उस भयंकर शर-वृष्टि को असफल
करते हुए, आकाश में और भी ऊँचा उडकर वडे वेग के साथ दुर्धर के ऊपर कूदा, जिससे
वह राक्षस चूर-चूर होकर पृथ्वी पर गिर पडा ।
इसे देखकर, विरूपाक्ष तथा उपाक्ष नामक राक्षस अति भयंकर ढंग से मुद्गरो से
सज्जित होकर आकाश में उडकर खड़े हुए और सिंहनाद करने लगे । तब हनुमान् भी
उनकी ओर लपका और उनसे भिड गया । उन्होने हनुमान् पर अपने घोर मुद्गरो का

सुन्दरकांड २३५
प्रहार किया, तो हनुमान् पृथ्वी पर गिर पड़ा। फिर तुरंत वह उठा और एक विशाल साल-
वृक्ष को उखाड़कर हुकार करते हुए उनकी ओर लपका और बड़े वेग मे उस वृक्ष को
घुमाकर उन राक्षसो पर प्रहार किया और एक ही प्रहार से उन्हें पृथ्वी पर गिरा दिया।
तब भासकर्ण तथा प्रघस नामक राक्षसो ने अनिलपुत्र पर आक्रमण किया और
अपने शूल तथा मुद्गरो की चोट से उसे व्याकुल कर दिया। उनके प्रहारो से
हनुमान् घायल हो गया और उसके अगो से रक्त बहने लगा। तब वायुपुत्र अत्यधिक क्रोधा-
वेश में आकर कुलपर्वत-सदृश एक विशाल पर्वत को उखाड़कर उन राक्षसो पर फेंका
कि राक्षस ऐसे चूर-चूर होकर गिर गये, जैसे घूस के द्वारा भीतर से खोखला बना दिये
जाने पर, ऊपर की धरती गिर जाती है।
इसके पश्चात् वायुपुत्र यमराज की भाँति राक्षस-सेना का सर्वनाश करने लगा।
हाथियो का हनन हुआ, तुरग तहस-नहस हुए, पदाति-सेना परास्त हुई, रथ ध्वस्त हुए,
शूर गिरे, महारथी मरे, सारथी दब गये, शस्त्रास्त्र चूर-चूर हो गये, महावत मारे गये,
घुड़-सवार गिर गये, छत्र झुक गये, ध्वजाएँ ध्वस्त हुई और रक्त की नदियाँ वह चली
तथा मास-खंडो से आकृष्ट हो बहुत-से भूत वहाँ एकत्रित हो गये। इस प्रकार पवन-
कुमार ने एक ही क्षण में सारी सेना का ध्वस किया और रण की आकाक्षा करते हुए
तोरण पर जा बैठा।
१७. अक्षयकुमार का हनुमान् पर आक्रमण करना
हतशेष राक्षस भागते हुए रावण के पास पहुँचे और उसे पाँचो अग्र सेनापतियो की
मृत्यु का समाचार सुनाया। तब राक्षसराज ने, रण-कौशल में निपुण, मन्मथाकार, परिष्कृत
विचारवाले, अक्षीण शौर्यवाले, भयंकर शूर तथा महावीर अक्षयकुमार को बुलाकर कहा—
'तुम जाकर बड़े यत्न के साथ उस वानर को युद्ध में मार डालो और उसका सिर काटकर
तोरण के स्तंभ पर लटका दो।'
पिता का आदेश मानकर अक्षयकुमार, शस्त्रास्त्रो से सुसज्जित तथा अपनी पताका
से अलकृत हो, उदित होनेवाले सूर्य की-सी काति मे शोभायमान होते हुए, आठ घोडे
जुते हुए रथ पर बैठकर शीघ्र गति से चला। उसके चलते समय पृथ्वी काँपने लगी, रथ
के चलने से उत्पन्न ध्वनि, घोडो की हिनहिनाहट, हाथियो की चिघाड, राक्षसो के हुकार,
तथा उस (अक्षयकुमार) के धनुष के टकार, इन सबकी सम्मिलित ध्वनियो से समस्त आकाश गूँजने
लगा। वहाँ पहुँचकर अक्षयकुमार

२३६ रंगनाथ रामायण
हनुमान् क्रोध से प्रलयकालाग्नि की भाँति भभक उठा और एक ताल-वृक्ष लेकर उससे
उसके रथ के अश्वों को मार डाला । तब वह ( राक्षसकुमार ) पृथ्वी पर खड़े होकर
हनुमान् के भाल पर दस शर ऐसे चलाये कि हनुमान् मूच्छित होकर गिर पड़ा । किंतु वह
शीघ्र ही सँभल गया और अपनी पूँछ से अक्षयकुमार पर ऐसा प्रहार किया कि वह
विचलित हो उठा । तब उसने अपनी गदा को अनिलकुमार के वक्ष पर ऐसा चलाया कि वह
मूच्छित हो गया । किन्तु, शीघ्र ही उसकी चेतना लौट आई और वह अक्षयकुमार पर
झपटकर उसकी गदा छीन ली और उसी को उस पर पूरी शक्ति से चलाया । तब अक्षय-
कुमार ने एक वाण चलाकर उस गदा को रोक लिया और अपने को वचा लिया । फिर,
वह करवाल तथा ढाल लेकर आकाश की ओर उड़ा । वायुपुत्र भी उसके साथ-साथ आकाश
में उड़ा । हनुमान् ने तब अपने शत्रु पर गदा चलाई । लेकिन, अक्षयकुमार ने अपने
खड्ग से उस गदा के दो टुकड़े कर दिये और तुरंत अपने खड्ग से हनुमान् की जाँघों
पर प्रहार किया । उस खड्ग की चोट खाकर वायुनंदन पृथ्वी पर गिर पड़ा । लेकिन,
वह तुरंत ऊपर की ओर उछला और अक्षयकुमार की दोनों टाँगें पकड़कर उसे ऐसे खींच
लिया, जैसे गरुड सर्प को अपने वश में कर लेता है । फिर, उसने अक्षयकुमार को कुम्हार
के चाक के समान बड़े वेग से चारों ओर घुमाकर पृथ्वी पर पटक दिया, तो उसका सारा
प्रताप जाता रहा । उसके सिर का मुकुट छिन्न-भिन्न हो गया और उस मुकुट के सभी
रत्न विखर गये; उसका हृदय-पिंड फट गया, आँतें निकल आईं; मांस-पेशियाँ छिन्न-
भिन्न होकर गिर पड़ीं । आँख की पुतलियाँ कुचल गईं, सारा शरीर विदीर्ण हो गया
और रक्त की धारा उगलते हुए उस राक्षस ने अपने प्राण छोड़ दिये । उसकी वैसी मृत्यु
देखकर इन्द्र आदि देवता आनंद से फूल उठे और वायुपुत्र की प्रशंसा करने लगे । ऐसी
अनुपम विजय को देखकर हनुमान् हर्षध्वनि करने लगा ।
भयभीत होकर भागे हुए राक्षस-सैनिकों ने देवताओं के शत्रु रावण की सभा में
पहुँचकर निवेदन किया—'हे दानवेन्द्र, उस वानराधिप का बाहुबल आश्चर्यजनक है । अशोक-
वन के रक्षक समाप्त हुए, अत्यंत पराक्रमी राक्षस-सैनिक मृत्यु का ग्रास बने, शतजिह्व
नष्ट हो गया, शार्दूलमुख प्राण खो बैठा, पिंगलनेत्र की मृत्यु हुई, स्तनितहास मर गया,
शार्दूलकवल युद्ध में मारा गया, जंबुमाली नष्ट हुआ, वक्रनाम समाप्त हो गया, रक्तरोग
की मृत्यु हो गई, रुधिराक्ष की जीवन-लीला समाप्त हो गई, सेना के साथ शूलदंष्ट्र
कुचल दिया गया, प्रतापी दीर्घजिह्व कट मरा, दुर्मुख का नाम ही शेष रह गया,
दुर्धर मृत्यु को प्राप्त हुआ, प्रघस गिर गया; भासकर्ण चूर-चूर हो गया, उपाक्ष का नाश
हुआ, विरूपाक्ष ने अपने प्राण गँवा दिये, अश्मवक्ष का वध हो गया और अक्षयकुमार
भी मारा गया । हमारी दुर्वार सेना भी नष्ट हो गई । निस्सन्देह उस वानर को इन्द्र
आदि देवता भी युद्ध में परास्त नहीं कर सकेंगे । ऐसा लगता है कि वह प्रलयांतक (रुद्र)
को भी परास्त करने की क्षमता रखता है । सच पूछा जाय, तो वह राक्षसों को निगल
जाने के निमित्त वानर-रूप धारण करके आया हुआ मृत्यु-देवता ही है ।' इन बातों को
सुनकर स्वर्गलोक का शत्रु रावण अक्षयकुमार की मृत्यु के लिए विलाप करने लगा—

'हे कुमार, हे प्रिय अक्ष,, हे वीर, एक कपि के हाथो तुम्हें मरना पडा ! हाय, यह कैसी
विपरीत बात हुई !'
१९. इन्द्रजीत का हनुमान् को वन्दी बनाना
इस प्रकार, शोक-सतप्त होनेवाले पिता को देखकर इन्द्रजीत ने कहा—'हे देव, आप
इस प्रकार धैर्य खोकर दु खी क्यो होते हैं । मै अभी उस नीच वानर पर आक्रमण करता हूँ ।
या तो उसे युद्ध में अवश्य मार ही डालूँगा, या बडे पराक्रम के साथ उसे वदी
बनाकर आपके समक्ष उपस्थित करूँगा । आप शोक मत कीजिए ।'
अपने ज्येष्ठ पुत्र की इन बातो को सुनकर रावण को धीरज हुआ और वह कहने
लगा—'हे पुत्र, तुमने चिरकाल तक इन्द्र को वदी बनाकर रखा था । माया तथा शक्ति
में तुम प्रौढ हो, तुम्हारा पराक्रम मुझसे भी श्रेष्ठ है । इस पृथ्वी पर तुम्हारी समता कौन
कर सकता है ? फिर भी, उस वानरश्रेष्ठ को साधारण वीर मत समझो । सतत सावधान
रहते हुए अपने दिव्य बाणो के प्रभाव से तथा अपनी सहज शक्ति के प्रताप से विजय
प्राप्त करके लौटो ।'
पिता की आज्ञा पाकर मेघनाद अग्नि तथा सूर्य के समान दीप्तिमान् रथ पर आरूढ

२३८ रंगनाथ रामायण
खडा रहा । ब्रह्मास्त्र उसके प्राण नही ले सकता था, इसलिए उसने हनुमान् को बाँध-
कर पृथ्वी पर गिरा दिया । मारुति को गिरा हुआ देखकर समस्त राक्षसो ने, 'मारो,
मारो, पकडो, बाँधो,' कहकर चिल्लाते हुए उसे घेर लिया और उमडते हुए क्रोध से हनुमान्
को मजबूत रस्सियो से बाँध दिया । अवश होकर गिरे हुए हनुमान् के पास पहुँचकर
इन्द्रजीत ने सोचा कि यह महाबली ब्रह्मास्त्र के लगने पर भी प्राण खोये बिना, बँधा हुआ
पड़ा है । न जाने यह वानर कौन है ? इसका वध नही करना चाहिए ।
इस प्रकार निश्चय करके वह शक्तिशाली शीघ्र ही हनुमान् को अपने पिता के
समक्ष उपस्थित किया । रावण तथा उसके मंत्री इंद्रजीत की शक्ति तथा निपुणता को देख-
कर अत्यधिक हर्षित हुए । हनुमान् को देखकर रावण अपनी आँखो से अग्निवर्षा करते
हुए बोला—'हे वानर, तुम मेरे नगर में अकेले कैसे प्रविष्ट हो सके ? तुम कौन हो ?
तुम्हारा नाम क्या है ? तुम किस उपाय से समुद्र पार करके यहाँ आये ? तुम्हें किसने
भेजा ? शिव ने ? हरि ने या ब्रह्मा ने ? सुर, गरुड, उरग, सिद्ध, साध्य, नर तथा खेचर
मेरा नाम सुनते ही भय से काँप उठते है । ऐसी दशा में तुम निर्भय होकर मेरे ऐसे नगर
में कैसे आये, जिसमें आने से इन्द्र भी डरता है ? तुमने धोखे से इस नगर में प्रवेश किया
और मेरे उपवन का सर्वनाश करके अपने पराक्रम का परिचय दिया । बडी वीरता दिखाकर
कुछ बूढे तथा दुर्बल राक्षसो का वध किया । तुम्हारे दीप्तिमान् तेज को देखने से अनुमान
होता है कि तुम साधारण कपि नही हो । यदि तुम अपने आगमन का सही-सही कारण
बताओ, तो मै तुम्हारे सभी अपराध क्षमा कर दूँ ।'
१९. हनुमान् का रावण को अपने आगमन का कारण बताना
तब हनुमान् ने उस दशकंठ को देखकर बड़े क्रोध से कहा—"हे राक्षस, हे नीचात्मा,
हे पापकमीं, हे दुष्ट, मै उस राक्षसकुलांतक, जगदीश्वर राम का दूत हूँ, जिनकी कीर्त्ति
समस्त संसार में व्याप्त है, और जिन्होंने दशरथ के पुत्र के रूप में जन्म लेकर विश्वामित्र
के यज्ञ की रक्षा की, शिव-धनुष को तोडा, अपनी महान् शक्ति से परशुराम का गर्वभंग
किया, खर-दूषण आदि राक्षसो का नाश किया, तुम्हें अपनी पूँछ से बाँधकर समुद्रो
में डुबोनेवाले बालि का एक ही बाण से संहार किया, सुग्रीव का राजतिलक किया, और
जो अपनी अक्षय शक्ति के कारण कोदण्ड-दीक्षा-गुरु के नाम से विख्यात हैं । मेरा नाम
हनुमान् है, मैं सुग्रीव का मंत्री हूँ । सूर्यकुल-निधि राम के भेजने पर मैं बड़े हर्ष से उनकी
अंगूठी लेकर, सीताजी का अन्वेषण करते हुए समुद्र पार करके तुम्हारे नगर में आया ।
सब स्थानो में ढूँढने पर भी सीताजी का पता नही पा सका । इससे मैं अत्यंत दुःखी हुआ,
आखिर उन्हें उस उपवन में देखा और अपने प्रभु की अँगूठी देकर उन्हें राम का कुशल-
समाचार सुना दिया । फिर, उनकी दशा का वृत्तांत राम को सुनाने के लिए मै लौटने लगा ।
जाने से पहले मैं अपने आगमन का समाचार तुम्हें बता देना चाहता था, इसलिए
मैने तुम्हारे वन को उजाडा, उसके रक्षको का वध किया, अस्सी सहस्र राक्षसो का नाश किया,
तुम्हारे मंत्रिकुमारो तथा अक्षयकुमार का सहार किया और तुम्हारा रूप-रंग देखकर
यहाँ से लौटने के विचार से बंदी बना । राम के अनुयायी सुग्रीव की सेना में मुझसे भी

अधिक पराक्रमी तथा बाहु-बल में श्रेष्ठ करोड़ो वीर है । ऐसे बलवान् भी हैं, जो ब्रह्मादि
देवताओ को भी जीत सकते हैं और जो तुम्हारे नाम से ही जलते हैं । ऐसे करोड़ो वीरों
के साथ राम समुद्र को पार करके लका पर आक्रमण करेंगे, हठ तथा क्रोध से राक्षसों
का सहार करने के पश्चात् तुम्हारे सिर काटकर तुम्हारा अंत कर देंगे और सीता को
साथ लेकर वापस जायँगे । यह सत्य हैं । यदि तुम बुद्धिमान् हो और नीति के पथ पर
चलना चाहते हो, तो सुनो । तुम शीघ्र सीताजी को उन्हें सौप दो और उस आश्रित लांक-
रक्षक रघुराम की शरण में जाओ । शत्रुता करने से कोई लाभ नही, इसलिए तुम उसे
(शत्रुता को) तज दो । मृत्यु का शिकार न बनकर अपने प्राणो की रक्षा करो ।”
ऐसे हित वचन कहनेवाले हनुमान् को देखकर क्रोध, गर्व और मात्सर्य से अभिभूत
होकर घनघोर बादलो के समान गरजते हुए दशकंठ ने प्रहस्त को आज्ञा दी—
'यह नीच निर्भय होकर मेरे सामने ऐसे अपशब्द कह रहा है । इस नीच कपि को ले
जाकर, तुरन्त इसका वध कर दो ।' तब विनय-भाषण तथा विवेक-भूषण से संपन्न अनघों
का पोषण करनेवाले, शत्रुओं के लिए भीषण दीखनेवाले विभीषण ने, रावण की आज्ञा
के परिणाम के सबंध में सोच-विचार करके बड़ी नम्रता के साथ रावण से निवेदन किया— 'अपने प्रभु
के द्वारा भेजे गये दूत, सदा कोई-न-कोई ऐसी बात कहते ही है । यह उनका सहज गुण होता है,
इसलिए आप अपना क्रोध शांत कीजिए । इतना ही नही, दूत अवध्य होता है । अत , इस कपिको
मारना उचित नही है । आप अपने हठ और क्रोध राम तथा लक्ष्मण पर दिखाइए । इसे मुक्त कर
दीजिए । यदि आपका क्रोध शांत नही होता हो, तो इसे कोई छोटा दंड देकर भेज दीजिए ।'
२०. लंका-दहन
उसके नीति-वचन सुनकर रावण ने दैत्य-वीरो को देखकर कहा--'कपियो को अपनी
पूँछ बहुत प्रिय होती है, और वह उसका चिह्न भी होता है । इसलिए सब लोगो के
समक्ष तुम इसकी पूँछ जला दो और नगर-मार्ग में घुमाकर इसे छोड़ दो । तब राक्षसो ने
मोटे-मोटे रस्सो से पवनपुत्र के हाथ और पैर बाँध दिये और कहने लगे--'अच्छा हुआ
कि हमारे कितने ही बंधुओ को मारनेवाला यह दुष्ट कीड़ा हमारे हाथो में फँस गया है ।
फिर वे तूर्य-घोष के साथ उसे नगर के मार्ग में घुमाने लगे । तब वायुपुत्र ऐसा बहाना
किये बैठा रहा, मानो वह इन राक्षसो के अत्याचारो से पीड़ित तथा निर्बल बन गया हो
और उन दुष्ट राक्षसो को तथा लका नगर को अपनी कनखियो से देखने लगा । सभी
दानव-वृन्द आबाल-वृद्ध उसके पीछे हँसते हुए और उसका उपहास करते हुए चलने लगे ।
उन दुश्चर्याओ को देखकर सज्जन पुरुष मन-ही-मन दुःखी होते थे । कुछ दानव जिद करके
असंख्य वस्त्र ले आये, उन्हें कालरूपों के आकार में बँटा और तेल में डुबोकर कहने लगे—
'इसने सारा अशोक-वन नष्ट किया है, कितने ही दानव-वीरों का सहार किया है, दानवेश्वर ने
इसको उचित दंड दिया है । चलो, हम इसे 'जला डालें ।' यों कहते हुए उन्होने तेल
में भीगे हुए कपड़े उसकी पूँछ में लपेट दिये और उसमें आग लगा दी । कपड़े आश्चर्य-
जनक ढंग से जलने लगे । ऐसा लगता था, मानो लका में कोई उत्पात-सूचक चिह्न दिखाई
पड़ रहा हो । राक्षस सिंहनाद करते हुए हनुमान् के पीछे-पीछे जाने लगे ।

": "वडे-वडे सौधो".

Line 31:
फिर क्रम से मडपो को जला डाला, मणिमय चन्द्र-शालाओ को राख कर दिया, प्रशसनीय
Wait:

  • "मडपो": no anusvara on म! "मडपो को".
  • "चन्द्र-शालाओ" or "चन्द्र-शालाओ"? Look at "चन्द्र": it is "चन्द्र" or "चन्द्र"? Wait, let's look at line 31: "मणिमय चन्द्र-शालाओ" - wait, look at "चन्द्र": no, it is "चन्द्र" with anusvara or without? It's "चन्द्र" or "चन्द्र"? It's "चन्द्र-शालाओ" - wait, there is a dot: "चन्द्र"? Actually, it looks like "चन्द्र-" with a dot: "चन्द्र-शालाओ". Wait, no, look at the dot above च: yes, "चन्द्र-शालाओ".
  • "प्रशसनीय": look at line 31: "प्रशसनीय" - wait! Is there an anusvara on 'श'? "प्रशसनीय" or "प्रशंसनीय"? There is NO dot above श! Look at "प्रशसनीय": it says "प्रशसनीय"!

Line 32:
शयनागारो की श्रेणियो का दहन कर डाला, और रमणीय गज, तुरग तथा रथ-शालाओ
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  • "

सुन्दरकाण्ड एवं युद्धकाण्ड (विस्तृत युद्ध प्रसंग)

सुन्दरकांड २४१
रावणासुर के नाश की सूचना देने के निमित्त उल्कापात होने लगा हो । अग्नि अपनी
प्रचण्ड गति से समस्त ब्रह्माण्ड में ऐसे व्याप्त होने लगी, मानो राजाओं में श्रेष्ठ रामचन्द्र
के लंका पर आक्रमण करने का उपक्रम करते ही उनका प्रताप-रूपी अग्नि पहले ही सर्वत्र
व्याप्त हो गई हो । रावण ने इसके पूर्व अपना भयंकर रण-कौशल दिखाकर समस्त दिक्-
पालों को युद्ध में परास्त कर दिया था । उस पराजय को भूले बिना आज अग्नि ने, अपनी
समस्त शक्ति को दिखाते हुए, एक ही क्षण में एक मात्र विभीषण के भवन को छोड़कर,
सारे नगर को जलाकर भस्म कर दिया । उस समय राक्षसों की ऐसी दुर्गति हुई कि कुछ
राक्षस भय से काँपने लगे, वस्त्र तथा केशों में आग लग जाने से कुछ राक्षस हाहाकार
करते हुए चारों ओर भागने लगे, कुछ अपने सगे-सम्बन्धियों को नष्ट होते देख कुछ राक्षस
शोक करने लगे, कुछ हाहाकार करने लगे, कुछ हनुमान् पर क्रोध दिखाने लगे । ऐसे भी
राक्षस थे, जो कह रहे थे कि इस पापी रावण ने उस महाविष्णु के अवतार राम का
अहित किया है, ऐसा अहित करनेवाले रावण के लिए इस प्रकार ही विपत्ति का आना
कोई अनहोनी बात नहीं है ।
तब वानरवीर हनुमान् अत्यन्त भयंकर रूप धारण करके नगर का कोई भी स्थान
बिना छोड़े, समस्त लंका में आग लगा दी । उस कपिश्रेष्ठ की पूँछ के स्पर्श से उत्पन्न
भीषण अग्नि-ज्वालाएँ जहाँ-तहाँ फैलने लगीं । सुरापान से सुप्त कुछ राक्षस बिना जाने ही
जलने लगे । मृदुल शय्याओं पर सोनेवाले राक्षस तीव्र अग्नि-ज्वालाओं के मध्य फँसकर,
छटपटाते हुए मरने लगे । कुछ राक्षस अपने सगे-सम्बन्धियों, स्त्री तथा बच्चों, प्राणाधिक मित्रों
को एकत्र करके भागते समय, बीच ही में अग्नि में फँसकर जलने लगे । अपने घर की
वस्तुओं को बाहर निकालने के लिए गये हुए लोग फिर लौटकर नहीं आ सके और वहीं
जल गये । कुछ राक्षस अपनी-अपनी पत्नियों को छाती से लगाये बाहर आने लगे, तो
देहली के पास आते-आते जल गये । इस प्रकार, वायु-पुत्र की पूँछ से निकली हुई अग्नि
भयंकर गति से समस्त लंका नगर में व्याप्त होने लगी और श्रेष्ठ सिंहों की भाँति उग्र रूप
धारण करके, हाथियों के कुम्भस्थलों को विदीर्ण करने लगी । तेज से युक्त घुड़सवारों
के समान वह अश्वों पर आक्रमण करने लगी, लम्पटों की भाँति, कामिनियों के कुचों पर
हाथ रखने लगी, दूसरों की निन्दा करनेवालों की भाँति अपनी जिह्वा को चारों ओर
फैलाने लगी, अत्यधिक आनंद से फूल उठनेवाले की भाँति आकाश तक बढ़ने लगी और
भयभीत होकर भागनेवाले कायरों की भाँति वह गलियों में प्रवेश करने लगी । इस प्रकार,
वह अग्नि लंका को चारों ओर से घेरकर शीघ्रता से उसका ध्वंस करने लगी । सभी
देवता आनंद से फूल उठे और हनुमान् को अपने आप्त बंधु मानकर उनकी प्रशंसा करने लगे ।
तब हनुमान् मन-ही-मन जानकी की मृत्यु की आशंका से पीड़ित होकर सोचने
लगा-'हाय ! यह मैंने क्या कर डाला ! मदान्ध होकर मैंने लंका के साथ-साथ राम की
पत्नी को भी जला डाला । अब मैं किस मुंह से राम के पास जाऊँगा ? जानकी का कुशल-
समाचार मैं राम को कैसे सुनाऊँगा ? हाय ! मेरे सारे प्रयत्नों पर पानी फिर गया !'
इस प्रकार, थोड़ी देर तक चिंतित रहने के पश्चात् उनका विवेक जागा और वह सोचने
३१

२४२ रंगनाथ रामायण
लगा-‘मै भी कैसा मूर्ख हूँ ? इसी माता के आशीर्वाद का फल था कि यह भयङ्कर अग्नि
मेरी पूँछ को जलाने का साहस नहीं कर सकी । भला, अग्नि साध्वी का क्या बिगाड़
सकती है ?’ यों सोचकर उसने अपनी पूँछ समुद्र में ऐसे बुझा दी, मानो वह सीताजी की
दुःखाग्नि को ही बुझा रहा हो । फिर, वह सीता के दर्शनार्थ अशोक-वन में गया । सीता
पहले ही राक्षस-स्त्रियों के मुँह से हनुमान् के कुशल का समाचार सुनकर आनन्द से
गद्गद होकर बैठी थी । हनुमान् ने उन्हें प्रणाम किया, अपने साहसपूर्ण कृत्यों का सारा
वृत्तांत उन्हें कह सुनाया और फिर कहा—‘हे माता, मैं अभी जाकर रामचंद्रजी को साथ
लेकर आता हूँ, जिससे आपके मन का दुःख दूर हो जाय ।’ इतना कहकर उसने सीता को
भक्ति से प्रणाम किया और उनकी आज्ञा लेकर वहाँ से चल पड़ा । वहाँ से चलकर वह
नगर के पश्चिम द्वार के पास आया और उसके किवाड़ों पर इस जोर से पदाघात किया
कि वे टूटकर पृथ्वी पर गिर गये । यह देखकर सभी राक्षस भय-विह्वल हो गये ।

२१. अंगद आदि वानरों से हनुमान् की भेंट

वहाँ से चलकर, फिर एक बार अपना पराक्रम दिखाते हुए, हनुमान् ने साहस के
साथ परकोटे के ऊपर के महलों को अपने पदाघात से गिरा दिया और सहज ही सुवेलाद्रि
पर चढ़ गया । वह आकाश की ओर ऐसा उछला कि लंकापुरी में रहनेवाले समस्त
दैत्य झोका खाकर भयभीत हो उठे, पहाड़ के शिखर भग्न होकर समुद्र में गिरने लगे;
बड़ी-बड़ी चट्टानें लुढ़कने लगीं, दक्षिण दिशा को वहन करनेवाली अगद नामक हथिनी का
शरीर दब गया, पहाड़ों के शृङ्ग गिर गये और पृथ्वी नीचे को धँस गई । फिर, उसने
अपने अनुपम भुजबल की सहायता से आकाश-मार्ग से जाते हुए समुद्र के मध्य भाग में स्थित
मैनाक पर्वत पर उतरकर अपनी थकावट दूर की । फिर, उस पर्वत की आज्ञा लेकर
अपने असमान वेग तथा प्रताप का प्रदर्शन करते हुए समुद्र के उत्तरी किनारे पर
उतर पड़ा ।
हनुमान् के मुख पर स्पष्ट रूप से दीखनेवाले हर्ष के चिह्नों को देखकर अंगद आदि
श्रेष्ठ वानर उसकी अगवानी करने गये और उसे गले से लगा लिया । फिर, वे सब एक
स्थान पर बैठ गये और हनुमान् से उसके कार्य के परिणाम के संबंध में प्रश्न किये ।
तब हनुमान् ने कहा—‘हे वानरो, आपकी कृपा से मैंने अनुपम समुद्र को पार किया,
अगणित वैभवों से संपन्न लंका में प्रवेश किया, और बहुत समय तक अन्वेषण करने के बाद
सीताजी के दर्शन भी कर लिये । फिर, मैंने राम की आज्ञा के अनुसार जानकी से उनका
सारा वृत्तांत कह सुनाया और उनकी दी हुई अंगूठी भी सीताजी को दे दी । फिर, उनकी
चूड़ामणि लेकर यहाँ लौट आया हूँ ।’
हनुमान् की बातें सुनकर सभी वानर अत्यंत हर्षित हुए और हनुमान् की भूरि-भूरि
प्रशंसा करने लगे । तब अत्यधिक उत्साह से भरे हुए श्रेष्ठ वीर अंगद कहने लगा—‘अब
यही उचित होगा कि किसी भी प्रकार हम जानकी को लंका से जीतकर ले आवें और
उन्हें रघुराम के पास पहुँचा दें । चलो, हम अभी समुद्र पार करें और पुत्र, मित्र तथा
परिवार-सहित दशकंठ का वध करके सीताजी को छुड़ा लायें ।’

तब जाम्बवान् ने वालिपुत्र को देखकर कहा—‘सुग्रीव ने हमें जानकी के अन्वेषणार्थ
भेजा है; उस परम पवित्र सीता की कृपा से हमारा प्रयत्न सफल हुआ । अब हमारे
लिए उचित यही है कि हम जाकर रामचन्द्रजी से यह समाचार कह दें।, तब सबने
परस्पर परामर्श कर, वैसा ही करने का निश्चय किया । उस दिन वायुपुत्र तथा दूसरे
वानर समुद्र के किनारे ही कद-मूल-फलो से अपनी क्षुधा शांत करके रहे । वे परम शक्ति-
शाली वानर दूसरे दिन वहाँ से रवाना हुए और मेरु, मदर-पर्वतो से भी विशाल दर्दुर
नामक पर्वत के निकट पहुँच गये । उस पर्वत की तराइयो में विचरण करते हुए उन्होंने
फल, मूल, आदि खाकर वही रात्रि बिताई ।

२२. वानरों का मधुवन में विचरण करना

प्रातःकाल होते ही उन बाहुबली वानरवीरो ने सोचा—'हमें जब सुग्रीव के मधुवन
में जाकर, वहाँ जी भरकर मधु (शहद) का पान करना चाहिए, अन्यथा हमारी प्यास
शांत नहीं होगी । हमने रामचन्द्र का कार्य सम्पन्न किया है । अत, सुग्रीव क्रुद्ध होकर हमें
दंड नहीं देंगे ।' यो निश्चय करके सभी वानरों ने अगद तथा हनुमान् से प्रार्थना करके
उनकी भी सम्मति प्राप्त कर ली और मधुवन के लिए रवाना हो गये । मध्याह्न होते-
होते वे मधुवन में पहुँच गये । चारो दिशाओ में झरनेवाली मधु-धाराओ को देखकर उनके
मुँह में पानी भर आया । विभिन्न प्रकार के हाव-भाव करते हुए, वे अपने कान खड़े
करके, एक दूसरे को अपने दांत दिखाते हुए, एक दूसरे से तर्क-वितर्क करते हुए, बड़े
कौतुक के साथ अपने इष्टानुसार उस वन के विभिन्न दिशाओं में विचरण करने और
पुष्पो से झरनेवाला मकरद, छत्तो में एकत्रित मधु आदि का पान करने लगे । फिर, उन्होंने
कई प्रकार के फल खाये । कच्चे फलो तथा फूलो को तोड़कर नीचे गिरा दिया । अत्यधिक
उल्लास के आवेश में आकर उन्होंने पेड़ की शाखाओ को तोड़ दिया और पेड़ो को झुका-
कर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग मारकर जाने लगे । फिर, वे पुष्प-लताओ को
झूला बनाकर झूलने लगे तथा सरोवरों में स्नान करते हुए नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ
करने लगे ।
जब मधुवन की रक्षा करनेवाले वानर (दधिमुख) ने इन वानरो की करतूत देखी,
तब क्रोध में आकर उसने सभी वानरो को डांटकर उन्हें तुरत वहाँ से निकल जाने का
आदेश दिया । जब उसके अनुचर सभी वानरो को धक्का देकर बाहर निकालने लगे, तब
अंगद तथा हनुमान् ने भागनेवाले अपने साथी वानरो को रोका और वन-रक्षक दधिमुख
को मुँह के बल नीचे गिराकर, उसे पृथ्वी पर घसीटकर, मुष्टियो का प्रहार करके भगा
दिया । बेचारा दधिमुख क्रोध तथा दुख से व्याकुल होकर भगवान् की दुहाई देते हुए
भागा और राजा राम तथा लक्ष्मण के श्रीचरणों में बड़ी भक्ति के साथ प्रणाम करके,
फिर सूर्य-पुत्र के चरणों में सिर झुकाकर कहने लगा—'हे देव, आपका मधुवन देव-दानवों
के लिए भी अभेद्य है । आज वायु-पुत्र तथा वालि-पुत्र, दोनों ने अपने बहुत-से साथियों
को लेकर ऐसे मधुवन में प्रवेश किया है और वृक्षों पर चढ़कर शाखाओं पर विचरण
करते हुए अपने इच्छानुसार फल खाये हैं और जी भरकर मधु पिया है । एवम् किञ्चित्

२४४ रंगनाथ रामायण
भी विचार न करके कि यह उपवन राजा का है, वे मनमानी कर रहे हैं । मैंने उन्हें
डाँट-डपटकर वाहर निकालने का प्रयत्न किया, तो उन्होंने मुझे मुष्टियो मे मारकर भगा
दिया है ।'
दधिमुख का विलाप सुनकर सुग्रीव अत्यत क्रुद्ध हो गया और उन वानरो को उचित
दड देने का विचार करने लगा । तब सारी परिस्थिति समझकर सतत-विजयी लक्ष्मण ने
सुग्रीव से कहा—'यदि अगद आदि महावीर तुम्हारी आज्ञा विना प्राप्त किये ही, निर्भय
होकर तुम्हारे वन में प्रवेश करके शहद पी रहे है, तो कदाचित् उन वाहुवलियो के द्वारा
रामचंद्रजी का कार्य सपन्न हुआ होगा । अन्यथा, वे इस प्रकार तुम्हारी आज्ञा की अवहेलना
करने का माहस कभी नहीं करेंगे । इसलिए तुम उन्हें शीघ्र यहाँ वुलाओ ।'
तब सूर्यपुत्र ने दधिमुख को देखकर कहा—'वे रामचंद्रजी का कार्य सपन्न
करके आये दीखते हैं, इसलिए उनके सभी अपराध क्षम्य हैं । तुम अपना दुख सहन कर
जाओ और उन्हें यहाँ वुला लाओ ।' सुग्रीव का आदेश पाकर वह उन वानरो के समीप
[L14

सुन्दरकाण्ड २४५
तथा दीन दशा का विचार करती हुई अविरल गति से अश्रुधारा बहाने तथा आहें भरने
लगी । मलिन वस्त्र तथा धूलि-धूसरित शरीर से युक्त वे, उमडते हुए शोक से बार-बार
विलाप करने लगी । आपने अपनी पत्नी की जो रूप-रेखा मुझे बताई थी, वह उनकी
रूप-रेखा से सर्वथा मिलती थी, इसलिए मैंने निश्चय किया कि वे ही सीता हैं । फिर,
मैने उनके समीप जाकर प्रणाम किया, उनसे उचित वार्त्तालाप करके आपकी अगूठी उन्हें दी ।
फिर, उनकी चूडामणि लेकर मैं समुद्र लाँघकर यहाँ पहुँच गया हूँ ।" इतना कहकर
हनुमान् ने राम को सीता की चूडामणि दी, जो उनके वियोग की अग्निशिखाओ के प्रतीक
के समान दीप्तिमान् थी ।
राम ने उस शिरोरत्न को बडे अनुराग से लिया और उसे अपने हृदय से लगाकर
थोडी देर तक मूर्च्छित-से हो रहे । फिर, अपने धैर्य को सचित करके वे सँभल गये और
बाष्पपूरित नयनो से वानर-राजा को देखकर बोले—'हे सूर्यनदन, मेरे प्राण-समान देवी
की शिरोमणि को देखकर मेरा हृदय लाख के समान पिघल रहा है । इन्द्र ने यज्ञ से सतुष्ट
होकर यह रत्न मेरे श्वशुर को दिया था । उस गुणनिधि जनक महाराज ने इसे सीता के
सिर में पहनाकर बडे सम्मान के साथ सीता का विवाह मेरे साथ किया । यह रत्न लतागी
सीता से तथा मुझसे कभी अलग नही रहता । आज मेरी तथा सीता की भेंट कराने के हेतु यह रत्न
आया है ।' इस प्रकार कहते हुए राम उस मणि को बार-बार अपने हृदय से लगाने लगे ।
उसके पश्चात् राम हनुमान् को देखकर बोले—'हे पुण्यात्मा, तुम्हारे लौटते समय
सीता ने तुम से क्या कहा था ? सुनाओ ।' तब शक्तिसपन्न हनुमान् राम को देखकर
कहने लगा—"हे देव, उन्होने कहा, 'सूर्यवशतिलक के वियोग में गत दस महीने मैंने असह्य
दुखो को झेलते हुए बिताये हैं । दो महीने के पश्चात् रावण मुझे मार डालने का निश्चय
कर चुका है । इसलिए तुम राम भूपाल से निवेदन करो कि मेरे प्राण अब नही बचेंगे ।
उन्हें सत्यनिष्ठ मानकर ही मेरे पिता ने मेरा पाणिग्रहण उनसे कराया । विवाह-वेदी पर
उन्होने ( मेरे पति ने ) अग्निदेव के समक्ष सदा मेरी रक्षा करने की प्रतिज्ञा की और
मुझे अपने साथ अपने घर ले आये । आज उन्होने मेरी उपेक्षा कर दी और मुझे अनाथ
बना दिया । इस पर विचार करने के लिए प्रभु राम से निवेदन करो । उनसे यह भी
निवेदन करो कि अपनी धर्मपत्नी को कोई चुराकर ले जाय, तो चुपचाप बैठे रहना वीरो
का धर्म नही हैं । औचित्य का विचार करके मैने इन बातो की चर्चा की है । मेरा शरीर
चाहे जहाँ भी रहे, मेरे मन, वचन और कर्म उन्ही में रमण करते रहेंगे ।' इतना कहने के
पश्चात् उन्होने यह भी बताया कि चित्रकूट पर्वत पर, उन पर कौए ने कैसे आक्रमण किया था,
कैसे आपने गैरिक से उनके कपोलो पर सुदर मकराकृति की रचना की थी । (ये
बातें उन्होने इसलिए बताई थी कि ) मेरे वचनो पर आपका विश्वास हो जाय ।"
रामचन्द्र से इतना कहने के पश्चात् हनुमान् ने लक्ष्मण तथा सुग्रीव को भी सीताजी का संदेश सुना
दिया । सभी वानरवीर मन-ही-मन हर्षित हुए ।
यह सुदरकाड ससार में व्याप्त होकर सभी काव्यो में सुदर सिद्ध हुआ है । इसका
विचार करके आन्ध्र-भाषा का सम्राट्, काव्य-आगम आदि के ज्ञाता, आचारवान्, धीर, भूपोप-

निधि, गोनवुद्ध भूपाल ने सुदर गुणो से सपन्न, धैर्यवान्, शत्रुओ के लिए भयंकर स्वरूप, महात्मा,
अपने पिता विट्ठल-नरेश के नाम पर रसिक जनो के लिए प्रिय, अनुपम तथा ललित शब्द
तथा अर्थों से सपन्न रामायण के इस सुदरकाड की, श्रेष्ठ अलंकार तथा सुंदर भावो से
परिपूर्ण वनाकर इस प्रकार रचना की कि वह आचन्द्रार्क, परमपूज्य हो शोभायमान होता रहे।
प्रसिद्धं, आर्ष, रसिको के लिए सतत आनंददायक इस आदिकाव्य का पठन जो कोई
भी करेगा, या जो इसका श्रवण करेगा, उसे सामवेद आदि विविध वेदो का आधार राम-
नाम-रूपी चिंतामणि के द्वारा नये भोग, परोपकार-वुद्धि, उदात्त विचार, परिपूर्ण शक्ति,
राज्य-सुख, निर्मलकीर्त्ति, नित्य सुख, धर्मनिष्ठा, दान-पुण्य में अनुरक्ति, चिरायु, स्वास्थ्य,
ऐश्वर्य, अक्षय शुभ, पाप-क्षय, श्रेष्ठ पुत्र की प्राप्ति, शत्रुओ का नाश, और धन-धान्य-समृद्धि, आदि
सुलभ होगे । उनका जीवन निर्विघ्न होगा, घरो में लावण्यवती स्त्रियो का अनुराग तथा
पुत्रो के साथ जीवन सिद्ध होगा । सव प्रकार के सकट दूर होगे, सगे-संवधियो से मिलन,
इच्छित कार्यों की सिद्धि, देवताओ की प्रीति, और पितरो की तृप्ति सुलभ होगी । इसके
रचयिता की श्रेष्ठ तथा शुभ उन्नति होगी तथा उसे इन्द्रभोग की प्राप्ति होगी । जवतक
कुलपर्वत, सूर्य, चंद्र, दिशाएँ, वेद, पृथ्वी, तथा सभी भुवन सुशोभित रहेंगे, तवतक यह
कथा अक्षय आनंद-समूह का आगार सिद्ध होगी ।

सुन्दरकांड समाप्त