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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 262

इस प्रकार, उसने एक भी राक्षस को जीवित लौटने नहीं दिया और युद्ध में आये हुए वीरों को
निःशेष कर दिया । उद्यान के रक्षक भयभीत होकर भागे-भागे रावण के निकट पहुँचे
और कहने लगे—'हे दनुजेंद्र, अपना भीषण रण-कौशल प्रदर्शित करते हुए उस वानर ने
अपनी पूँछ से अस्सी सहस्र राक्षस वीरों का नाश कर दिया और अब मकर-तोरण पर
इठलाता हुआ बैठा है।
रावण कालांतक (शिव) की भाँति क्रोध से अभिभूत हुआ और पिंगलाक्ष, दीर्घ-
जिह्व, वक्रनास, अश्मवक्ष, तथा शत्रुओं के लिए भयंकर रूपवाले शार्दूलमुख को बुलाकर
कहा—'तुम शीघ्र जाकर उस वानर का वध करके आओ ।' रावण की आज्ञा सिर पर
रखकर वे प्रबल सेना के साथ रथों पर बैठकर चल पड़े और भयंकर गर्जन करते हुए
पवनपुत्र के निकट पहुँचकर उस पर आक्रमण करने लगे । उनकी बाण-वृष्टि से विचलित
न होकर अपनी सारी शक्ति एकत्रित करके हनुमान् ने अपनी पूँछ घुमाकर उन राक्षसों
के रथों को तोड़ डाला, सारथियों को मार डाला, रथ के घोड़ों को मार डाला हाथियों
को मार गिराया और तुरंगों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया । इस प्रकार, सारी राक्षस-सेना को
धूल में मिलाकर हनुमान् तोरण से नीचे पृथ्वी पर कूद पड़ा और अपनी पूँछ को फंदे
के समान बनाकर वक्रनास के कंठ में लपेट दिया और उसका गला घोंटकर उसे मार
डाला । इससे संतुष्ट न होकर हनुमान् ने बढ़ते हुए क्रोध, साहस तथा शौर्य से दीप्त होते
हुए, भयंकर गर्जन करते हुए, वज्र से भी कठोर दीखनेवाली अपनी मुट्ठी से अश्मवक्ष पर
ऐसा प्रहार किया कि वह रक्त उगलते हुए पृथ्वी पर लुढ़क गया । तब अनुपम भुज-बल
से झूमनेवाले उस हनुमान् को घेरकर अन्य राक्षस-वीर युद्ध करने लगे, तो हनुमान् ने
उन सब का भी संहार कर दिया । फिर, शार्दूलमुख को वेग से घुमाकर पृथ्वी पर ऐसा पटका
कि उसका सिर चूर-चूर हो गया । उसके पश्चात् उमड़ते हुए क्रोध से समस्त राक्षसों को
व्याकुल करते हुए हनुमान् ने अत्यंत क्रूरता के साथ अपनी पूँछ से बाँधकर पिंगलाक्ष को
ऐसा घुमाया, जैसे बवंडर सूखे पत्ते को घुमाता है, और फिर उसको तोरण के स्तंभ से
दे मारा ।
इस प्रकार, अपने अद्वितीय पराक्रम से उसका वध करके, हनुमान् ने दानव-सेना में
प्रवेश किया । उसने बड़े वेग से दीर्घजिह्व पर आक्रमण किया और अपनी कठोर मुष्टि
के आघात से उसे पृथ्वी पर गिरा दिया । फिर हनुमान् ने उसकी जीभ खींचकर उसका
संहार कर डाला और फिर तोरण पर जा बैठा । हनुमान् के इस घोर कृत्य को देखकर
बचे हुए दैत्य भयभीत होकर भाग गये और सारा वृत्तांत दनुजेंद्र को जा सुनाया । तब
दशकंठ ने क्रोधावेश में आकर अपने मंत्री के पुत्र रक्तरोम, शतजिह्व, रुधिरलोचन, स्तनित-
हास, शूलदंष्ट्र, दुर्मुख तथा महान् शक्तिशाली व्याघ्रकवल नामक राक्षसों को बुलाया और
कहा—'एक वानर उद्दंड होकर राक्षसों का संहार कर रहा है । तुम जाकर उसका वध
कर डालो ।'
तब वे महाबली राक्षस गर्जन करते हुए, अनुपम रथों पर बैठकर, चतुरंगिणी सेना
को साथ लेकर चल पड़े । मकर-तोरण पर अप्रतिहत शौर्य के साथ उपस्थित हनुमान् को