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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 508 में से

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पृष्ठ 260

२३० रंगनाथ रामायण
"हे हनुमान्, तुम सौमित्र से मेरी ओर से ये वातें कहना—'तुम मुझे अपनी माता
के समान मानते थे । अव मुझको इस प्रकार भूल जाना और मेरी दशा का विचार नहीं
करना क्या तुम्हारे लिए उचित है ? मैंने तुम्हारे जैसे पुण्यात्मा को दण्डक वन में अपशव्द
कहे थे, उसका फल मैं अव भुगत रही हूँ । अव विलव मत करो; दया दिखाओ ।' हे
पवनकुमार, तुम अंगद, रविपुत्र तथा अन्य वानरनायकों से अवसर के अनुकूल मेरे
विनीत वचन कहना, और किसी भी प्रकार उन्हें रामचंद्र तथा लक्ष्मण के साथ यहाँ ले
आना । मै वड़े साहस के साथ एक मास तक तुम्हारे, आगमन की प्रतीक्षा करूँगी । उसके
पश्चात् मै जीवित नहीं रह सकूँगी । इस अवधि के भीतर तुम अवश्य रघुराम को किसी
भी प्रकार से यहाँ ले आना । अव तुम शीघ्र यहाँ से जाओ ।"
सीता के इन वचनों को सुनकर हनुमान् विनम्र होकर वोले—'हे माता, ऐसा ही
होगा । मैं आपकी सभी वातें उनसे कह दूँगा । अव आप आश्वस्त हो जाँय । हे देवी,
मैंने आपको रघुराम की अँगूठी ला दी थी । अव मै रिक्त हाथो यहाँ से जाऊँ, यह दूत
के लिए उचित नही है । अत, आप अपने चिह्न के स्वरूप में कोई रत्न दीजिए ।' तव
सीता वोलीं—'तुम देखने में इतने छोटे हो, तव इस विशाल समुद्र को किस प्रकार
पार कर सकोगे ? महान् वल तथा पराक्रम से पूर्ण अपना सच्चा रूप तुम मुझे दिखाओ।
तुम्हारा निज रूप देखे विना मै तुम्हें अपनी चूडामणि नही दूँगी ।'
तव हनुमान् ने अपना रूप इतना ऊँचा वनाया कि सारा आकाश उनके शरीर पर
व्याप्त हो गया । चमकनेवाले नक्षत्रों का समूह पहले उनके कंठ का मालती-मल्लिका का
हार वना, फिर वक्षस्थल पर शोभित होनेवाले रजत का हार वना और उसके पश्चात्
उसके कटि-प्रदेश को अलंकृत करनेवाली चाँदी की क्षुद्र घटिकाओं की मेखला वन गया ।
ऐसा अत्यंत भयंकर रूप धारण करके जव हनुमान् सीताजी के समक्ष खड़ा हुआ, तव वे मन
ही मन भयभीत हो गईं और कहने लगीं—'हे अनुपम गात्रवाले, हे अंजनासुत, तुम्हारा
यह रूप आश्चर्यजनक है । शीघ्र ही इस रूप का उपसंहार करो ।' यो कहकर उन्होंने
हनुमान् की प्रशंसा की और उसे आशीर्वाद दिया । उसका विश्व-रूप देखकर देवता भी
उसकी प्रशंसा करने लगे । फिर पवनपुत्र ने विष्णु के समान, उस विशाल आकार को
छोड़कर लघु रूप धारण कर लिया । तव सीता ने वड़े स्नेह से हनुमान् को अपने निकट
वुलाया, अपनी साड़ी के छोर में वँधी हुई चूडामणि निकाली और वड़ी प्रीति से उसे
हनुमान् के हाथों में रखा । हनुमान् ने वड़ी भक्ति के साथ उसे ग्रहण किया और
प्रणाम करके, उनकी आज्ञा लेकर वहाँ से विदा हुआ ।
१५. अशोक-वन का ध्वंस
हनुमान् ने सोचा—मै अव रावण को अपने आगमन का समाचार वताता हूँ । फिर,
थोड़ी देर तक सोचने के पश्चात् वन का नाश करने के उद्देश्य से उसने शरीर बढ़ाया
और अपने उर से उत्पन्न ववंडर (प्रचंड वायु) के धक्कों से उस वन के वृक्षों को तोड़कर
इस प्रकार गिरा दिया, मानो वे (कपड़े के) नाने-वाने हों । फिर, नित्य अलंकृत उस अशोक-
वन में रहनेवाली रमणीय अट्टालिकाओं को पृथ्वी पर गिरा दिया; क्रीड़ा-गृहों को चूर-चूर