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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 268, कुल 508 में से

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पृष्ठ 268

२३८ रंगनाथ रामायण
खडा रहा । ब्रह्मास्त्र उसके प्राण नही ले सकता था, इसलिए उसने हनुमान् को बाँध-
कर पृथ्वी पर गिरा दिया । मारुति को गिरा हुआ देखकर समस्त राक्षसो ने, 'मारो,
मारो, पकडो, बाँधो,' कहकर चिल्लाते हुए उसे घेर लिया और उमडते हुए क्रोध से हनुमान्
को मजबूत रस्सियो से बाँध दिया । अवश होकर गिरे हुए हनुमान् के पास पहुँचकर
इन्द्रजीत ने सोचा कि यह महाबली ब्रह्मास्त्र के लगने पर भी प्राण खोये बिना, बँधा हुआ
पड़ा है । न जाने यह वानर कौन है ? इसका वध नही करना चाहिए ।
इस प्रकार निश्चय करके वह शक्तिशाली शीघ्र ही हनुमान् को अपने पिता के
समक्ष उपस्थित किया । रावण तथा उसके मंत्री इंद्रजीत की शक्ति तथा निपुणता को देख-
कर अत्यधिक हर्षित हुए । हनुमान् को देखकर रावण अपनी आँखो से अग्निवर्षा करते
हुए बोला—'हे वानर, तुम मेरे नगर में अकेले कैसे प्रविष्ट हो सके ? तुम कौन हो ?
तुम्हारा नाम क्या है ? तुम किस उपाय से समुद्र पार करके यहाँ आये ? तुम्हें किसने
भेजा ? शिव ने ? हरि ने या ब्रह्मा ने ? सुर, गरुड, उरग, सिद्ध, साध्य, नर तथा खेचर
मेरा नाम सुनते ही भय से काँप उठते है । ऐसी दशा में तुम निर्भय होकर मेरे ऐसे नगर
में कैसे आये, जिसमें आने से इन्द्र भी डरता है ? तुमने धोखे से इस नगर में प्रवेश किया
और मेरे उपवन का सर्वनाश करके अपने पराक्रम का परिचय दिया । बडी वीरता दिखाकर
कुछ बूढे तथा दुर्बल राक्षसो का वध किया । तुम्हारे दीप्तिमान् तेज को देखने से अनुमान
होता है कि तुम साधारण कपि नही हो । यदि तुम अपने आगमन का सही-सही कारण
बताओ, तो मै तुम्हारे सभी अपराध क्षमा कर दूँ ।'
१९. हनुमान् का रावण को अपने आगमन का कारण बताना
तब हनुमान् ने उस दशकंठ को देखकर बड़े क्रोध से कहा—"हे राक्षस, हे नीचात्मा,
हे पापकमीं, हे दुष्ट, मै उस राक्षसकुलांतक, जगदीश्वर राम का दूत हूँ, जिनकी कीर्त्ति
समस्त संसार में व्याप्त है, और जिन्होंने दशरथ के पुत्र के रूप में जन्म लेकर विश्वामित्र
के यज्ञ की रक्षा की, शिव-धनुष को तोडा, अपनी महान् शक्ति से परशुराम का गर्वभंग
किया, खर-दूषण आदि राक्षसो का नाश किया, तुम्हें अपनी पूँछ से बाँधकर समुद्रो
में डुबोनेवाले बालि का एक ही बाण से संहार किया, सुग्रीव का राजतिलक किया, और
जो अपनी अक्षय शक्ति के कारण कोदण्ड-दीक्षा-गुरु के नाम से विख्यात हैं । मेरा नाम
हनुमान् है, मैं सुग्रीव का मंत्री हूँ । सूर्यकुल-निधि राम के भेजने पर मैं बड़े हर्ष से उनकी
अंगूठी लेकर, सीताजी का अन्वेषण करते हुए समुद्र पार करके तुम्हारे नगर में आया ।
सब स्थानो में ढूँढने पर भी सीताजी का पता नही पा सका । इससे मैं अत्यंत दुःखी हुआ,
आखिर उन्हें उस उपवन में देखा और अपने प्रभु की अँगूठी देकर उन्हें राम का कुशल-
समाचार सुना दिया । फिर, उनकी दशा का वृत्तांत राम को सुनाने के लिए मै लौटने लगा ।
जाने से पहले मैं अपने आगमन का समाचार तुम्हें बता देना चाहता था, इसलिए
मैने तुम्हारे वन को उजाडा, उसके रक्षको का वध किया, अस्सी सहस्र राक्षसो का नाश किया,
तुम्हारे मंत्रिकुमारो तथा अक्षयकुमार का सहार किया और तुम्हारा रूप-रंग देखकर
यहाँ से लौटने के विचार से बंदी बना । राम के अनुयायी सुग्रीव की सेना में मुझसे भी