सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 264

२३४ रङ्गनाथ रामायण
यम के समान आँखो से अग्निवर्षा करते हुए (हनुमान् के प्रत्याघात की प्रतीक्षा में) खडा
रहा । इतने में हनुमान् ने उस दैत्य के रथ को अपने पदाघात से पृथ्वी पर गिरा दिया,
अपने दाँतो से उसे पकडकर उसके खंड-खंड कर दिये । फिर एक विशाल सालवृक्ष के
प्रहार से उसके रथ के अश्वो तथा सारथी को चूर-चूर कर दिया और सिंहसम गर्जन
किया । तब जम्बुमाली रथ-हीन हो ढाल तथा खड्ग हाथ में लिये, अपनी प्रचण्ड शक्ति
प्रदर्शित करते हुए, पवनसुत के भाल पर प्रहार किया, तो वह मूच्छित हो गया, किन्तु शीघ्र
ही वह सँभलकर उठा और अपनी वज्रसम मुष्टि के आघात से उसके ढाल के टुकडे-
टुकडे कर दिये । फिर, उस दैत्य को पकडकर हनुमान् ने वलात् उसका खड्ग छीन लिया
और भयंकर गति से उस राक्षस के सिर पर ऐसा प्रहार किया कि वह राक्षस पृथ्वी पर
गिर पडा । उसके पश्चात् हनुमान् ने वची हुई सेना पर आक्रमण करके उसे छिन्न-भिन्न
कर दिया । इस प्रकार, हनुमान् वडी चतुरता तथा पराक्रम से विजय प्राप्त करके तोरण
पर जा बैठा । अपने प्राण वचाकर जो लोग भाग गये थे, उन्होने हनुमान् के पराक्रम का
सारा वृत्तांत रावण को जाकर सुनाया ।
उनकी वार्तें सुनकर रावण को महान् आश्चर्य हुआ । उसने अपने मन्त्रियो को बुला
भेजा और कुछ समय तक उनके साथ परामर्श करने के पश्चात् इन्द्र को भी युद्ध में परास्त
करनेवाले, घोर पराक्रमी तथा क्रूर, विरूपाक्ष, उपाक्ष, कलहदुर्दुर, भासकर्ण तथा प्रघस
नामक पांच प्रचंड योद्धा तथा अग्र-सेनापतियो को देखकर कहा—'किसी भी लोक में वानरो
की ऐसी शक्ति हमने न देखी, न सुनी है । हमें पता नही कि यह कौन है । तुम पाँचो
वीर, अगणित सेना को साथ लेकर जाओ और अपना भीषण वल तथा युद्ध-कौशल प्रकट
करते हुए, सावधान होकर उस वानर को वंदी वनाकर मेरे सामने उपस्थित करो ।'
रावण की आज्ञा को सिर पर धारण करके, अग्नि तथा सूर्य की-सी प्रभा से दीप्त
होते हुए, वे पाँचो राक्षसवीर, असंख्य रथ, गज, तुरंग, तथा पदचर सेना को साथ लेकर
शीघ्र चल पडे और उदयाद्रि पर प्रकाशमान होनेवाले सूर्य के समान, तोरण पर विराजमान
होकर दिगंतो तक अपने तेज को व्याप्त करनेवाले तथा दैत्य-वीरो के साथ रण करने के
लिए उद्यत पवनसुत को घेर लिया । फिर, उन्होने पृथ्वी तथा आकाश को अपने भयंकर
सिंहनादो से विदीर्ण करते हुए हनुमान् पर दिव्य शस्त्रो की घोर वृष्टि आरंभ की । उन
राक्षसवीरो में दुर्धर नामक राक्षस हनुमान् का शिरच्छेदन करने के उद्देश्य से उस पर
एक साथ पाँच वाण चलाये । तब हनुमान् भयंकर क्रोध के साथ गर्जन करके आकाश की
ओर उडा । दुर्धर भी उसके साथ उडा और धनुष पर तीर चढाकर प्रलयकाल के भयंकर
मेघ की भाँति शरवृष्टि करने लगा । पवनकुमार ने उस भयंकर शर-वृष्टि को असफल
करते हुए, आकाश में और भी ऊँचा उडकर वडे वेग के साथ दुर्धर के ऊपर कूदा, जिससे
वह राक्षस चूर-चूर होकर पृथ्वी पर गिर पडा ।
इसे देखकर, विरूपाक्ष तथा उपाक्ष नामक राक्षस अति भयंकर ढंग से मुद्गरो से
सज्जित होकर आकाश में उडकर खड़े हुए और सिंहनाद करने लगे । तब हनुमान् भी
उनकी ओर लपका और उनसे भिड गया । उन्होने हनुमान् पर अपने घोर मुद्गरो का