रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुन्दरकाण्ड २३१
कर दिया, वृक्ष की शाखाओ को तोड दिया, फूलो को झाड दिया और उनके सुगंधित
मकरद को बिखेर दिया, नालो को नष्ट कर दिया, पुष्प-लताओ को तोड दिया, निकुंजो
को छिन्न-भिन्न कर दिया और तालाबो के जल को आलोडित करते हुए उसमें अच्छी तरह
तैरने लगा । हनुमान् के इस भयंकर कृत्य के कारण पिक, बक, सारस, क्रौंच, कलहंस, शुक,
शारिका, मयूर आदि सभी पक्षी आर्तध्वनि करते हुए उडने लगे । तब वन के माली जाग
पडे और हनुमान् से युद्ध करने के लिए तैयार हुए । आकाश तथा दिगंतो को अपने गर्जनो
से गुजायमान करते हुए वे हाथ में अनुपम करवाक लेकर हनुमान् पर झपटे । हनुमान्
अपने नाम, अपने आगमन-कारण तथा अपनी शक्ति का परिचय देकर बडी भयंकर गति
से एक-एक राक्षस का सहार करने लगा । इस प्रकार, अनिलकुमार ने प्रथम युद्ध का प्रारम्भ
किया और अत्यधिक शक्ति से सपन्न आठ सहस्र घोर राक्षसो का सहज ही वध कर दिया
तथा पृथ्वी पर शवो का ढेर लगा दिया । उसके पश्चात् जब हनुमान् ने गर्जन किया, तब
सीताँ की रखवाली में नियुक्त राक्षसियाँ भी भयभीत हो गई । उनका धैर्य जाता रहा ।
वे भागती हुई लोक-कंटक रावण के पास गई और कहने लगी—'हे देव, आज एक वानर
बडे साहस के साथ अशोक-वन में आया है । उसने कुछ समय तक वैदेही से बातचीत की
और उसके पश्चात् वह सारे वन को उजाडने लगा । उसने उद्यान की रक्षा करनेवाले आठ
सहस्र राक्षसो का वध कर दिया है । वह राघव का भेजा हुआ लगता है । अन्यथा, जिस
वृक्ष के नीचे सीता बैठी हुई हैं, केवल उस वृक्ष को छोडकर सारे वन को उसाड फेंकने
का दूसरा कारण क्या हो सकता है ? उसके सबध में वैदेही से हमने पूछा भी, किन्तु उन्होने
अपनी अनभिज्ञता प्रकट करके सत्य को छिपा रखा । इसमें कोई सदेह नही है कि वह वानर
राघव का दूत ही है। अब आप अवश्य अपनी शक्ति तथा पराक्रम से उसे पकडकर दण्ड दीजिए।'
१६. हनुमान् का राक्षसों का वध करना
इन बातो को सुनकर दानव-लोक-प्रभु रावण आग-बबूला हो गया । उसकी दृष्टि
भयंकर हो गई । उसकी आँखो से दीपशिखा-सी, दीप्त लौ की भाँति अग्नि-
ज्वाला निकलने लगी । उसने तुरन्त अपने अस्सी हजार अत्यंत पराक्रमी राक्षस-वीरो को
भेजा । वे बड़े उत्साह से, अपना प्रताप दिखाते हुए धनुष, अस्त्र, शूल, मुद्गर, गदा, तलवार
आदि आयुधो से युक्त हो, युद्ध के लिए सन्नद्ध हो, गर्जन करते हुए निकले ।
इतने में सूर्योदय हुआ । पर्वताकार हनुमान् का उत्साह और भी बढ गया । वह
मकर-तोरण पर चढ गया और चारो ओर से घेरकर आनेवाले तथा शस्त्रो के प्रहार से
कष्ट पहुँचानेवाले राक्षस-वीरो को देखकर बडे दर्प के साथ बोला—'हे राक्षसो, मै महान्
शूर सुग्रीव का अनुचर हूँ । राम का दूत हूँ । रामचन्द्र का कुशल-समाचार, सीताजी से
कहकर वापस जा रहा हूँ । मेरा नाम हनुमान् है । मै अत्यधिक बलवान् हूँ । प्रशसनीय
पराक्रम तथा चातुर्य के वैभव से सपन्न वीर हूँ । लकापुरी में रहनेवाले पुरुषो के लिए
में काल बनकर आया हूँ । अब तुम लोग मुझे छेडकर क्यो मरना चाहते हो ?'
इतना कहकर वह अपने रण-कौशल तथा शौर्य को प्रकट करते हुए सहस्रो राक्षस-
सैनिको को अपने भयंकर लागूल में बाँधकर उन्हें तोरण के स्तंभों से मारने लगा ।