रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
किष्किन्धाकांड २०७
अब मैं बहुत वृद्ध हो चला हूँ । मेरी अवस्था नब्बे वर्ष की है । अब मैं ऐसा कार्य करने
योग्य नही रहा । तब नील ने कहा—'मै नब्बे योजन की जलधि को पार कर सकता हूँ ।
मारुति अपनी शक्ति का परिचय दिये बिना चुपचाप बैठा रहा । तब अगद ने कहा—
'मै अत्यधिक प्रयत्न से शत योजन पार कर सकता हूँ, किन्तु कदाचित् लौटकर आ नही
सकता ।'
तब जाम्बवान् ने अगद से कहा—'हे अनघ, तुम हमारे नेता हो । तुम इम समुद्र
को पार भी कर सकते हो और लौट भी सकते हो । तुम सुग्रीव के समान इम वानर-
सेना के राजा हो । अत तुम्हारे लिए उचित यही है कि तुम हम से काम लो । इतनी
दीनता क्यो व्यक्त करते हो ? राम के कार्य में सतत तत्पर रहनेवाले, रवि-पुत्र के मत्री,
इस वानर-समूह के लिए प्राण-सम, पवन-कुमार के रहते, भला तुम्हारे लिए कौन-सा कार्य
असाध्य है ? तुम निश्चित रहो ।"
२२. समुद्र लाँघने के लिए हनुमान् को प्रेरित करना
इसके पश्चात् जाम्बवान् ने हनुमान् को बुलाकर बडे स्नेह से कहा—"हे पवन-सुत,
यह क्या उचित है कि अपना काम हम पर छोडकर स्वय चुपचाप बैठे रहो ? ललित
लावण्य-विलास से परिपूर्ण अप्सरा स्त्रियो में श्रेष्ठ 'पुञ्जिक-स्थल' नाम से विख्यात तुम्हारी
माता ने अग्निदेव के शाप से अजना के नाम से वानर-युवती होकर जन्म लिया और
इस पृथ्वी पर केसरी की पत्नी होकर रही । एक दिन जब वह वन में विचरण कर रही थी,
तब वायुदेव उस युवती के मद गमन, सुडौल जघा, भारी नितब, चन्द्र-मुख, सुदर अधर,
क्षीण कटि, उन्नत कुच और विशाल आँखें देखकर उस पर मोहित हो गया । मन्मथ के
बाणो से आहत होकर उसने अजना के वस्त्रो को उडा दिया और उसके समीप पहुँचकर
उसका आलिंगन किया । तब अजना ने क्रुद्ध होकर कहा—'किस दुर्मति ने मेरा शील
बिगाडने का यह साहस किया है ?' तब वायुदेव ने कहा—'हे सुदरी, क्रुद्ध मत होओ ।
मैं पवन हूँ । हे कमलाक्षी, मैने तुम्हारे साथ केवल हृदय-सगम किया है, जिससे तुम्हारा
शील खडित न हो । इससे तुम्हें ऐसा पुत्र उत्पन्न होगा, जो बल, तेज, विक्रम, पौरुष तथा
धैर्य से सपन्न होगा ।' इतना कहकर वायुदेव चले गये । उस नारी-रत्न ने वायुदेव की
विमल कृपा से अत्यन्त हर्ष से तुम्हें जन्म दिया । तुम इस पृथ्वी पर वायु के समान शक्ति-
शाली हो । यही नही, किसी भी आयुध से तुम्हारी मृत्यु नही हो सकती । सभी लोको में
तुम्हारी समता करनेवाला कोई नही है । मै तुम्हारी शक्ति से भली भाँति परिचित हूँ ।
अत, तुम समुद्र को पार करो, सीता के दर्शन करो और यत्नपूर्वक राम का कार्य सपन्न
करके, कपियो के, दशरथ-पुत्रो के तथा वानर-राजा के प्राणो की रक्षा करो । हे जगत्प्राण-
नदन, तुम इस प्रकार उत्तम लोको की गति प्राप्त करो ।"
तब हनुमान् ने कहा—"ऐसा ही हो । मैं तुम्हारी आज्ञा का पालन करूँगा ।
हे वानरो, आज तुम मेरी शक्ति देखो । मै समस्त लोक के हितार्थ समुद्र को पार करूँगा ।
भले ही देवता भी मुझे रोकें, मैं उन्हें भी जीत लूँगा । (आवश्यकता पडे तो) समस्त
लोको का नाश भी कर दूँगा । सब को आश्चर्यचकित करनेवाली अपनी शक्ति से
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लंका में प्रविष्ट होऊँगा । अथक परिश्रम करके ढूँढूँगा और भूमि-सुता को देखकर ही वापस
आऊँगा । अथवा उस लंका को भी उखाड़कर यहाँ ले आऊँगा तथा सीता को अवश्य ही
राम के चरणों में पहुँचा दूँगा । नहीं तो सभी समुद्रों का मथन करूँगा, उद्धत गति से
अमराद्रि को नष्ट-भ्रष्ट करूँगा, पृथ्वी को चूर-चूर कर दूँगा, मृत्यु का भी संहार करूँगा,
समस्त द्वीपों को छान डालूँगा, देवेन्द्र को त्रास दूँगा, सभी दुष्ट राक्षसों का संहार करूँगा,
और समस्त संसार में अंधकार फैला दूँगा, किन्तु बिना कार्य सम्पन्न किये तुम्हारे निकट
नहीं आऊँगा ।'
२३. समुद्र पार करना—मैनाक से भेंट
इतना कहकर हनुमान् महेन्द्रगिरि पर चढ़ गया और त्रिविक्रम विष्णु के समान ऐसा
अद्वितीय शरीर धारण किया, मानो प्रलयकालीन काल सभी समुद्रों के साथ सारी सृष्टि
को निगलने के लिए प्रस्तुत हुआ हो । उसके पश्चात् उसने अंगद आदि वानरों की अनुमति ली ।
मन-ही-मन अपने पिता वायुदेव का स्मरण किया, श्रीराम के चरण-कमलों को अपने
हृदय में प्रतिष्ठित किया । दृढ़ता के साथ अपने पैरों को पहाड़ पर जमाया, कंठ ऊपर को
उठाया, देह को झुकाया और भौंहें उठाकर विशाल जल-राशि को चारों ओर से देखा ।
उसके उपरान्त उसने रावण की नगरी पर दृष्टि डाली, अपना लांगूल जोर से घुमाया,
दोनों कान खड़े किये, शिलाओं पर अपने हाथ टेके और आकाश की ओर बड़े वेग से
ऐसे उछला, जैसे पूर्वकाल में अमृत को छीनने के उद्देश्य से गरुड़ पृथ्वी से आकाश की ओर
उड़ा था । उस वेग के प्रभाव से पर्वत-शृंग चूर-चूर हो गये, मानो रावण ने अबतक
जो अत्यधिक महत्त्व और यश प्राप्त किया था, वे सब चूर-चूर हो गये हों । (उस पर्वत
पर के) वृक्ष उसके वेग के कारण उसके साथ ही आकाश की ओर उड़ चले और खंड-
खंड होकर उस सागर में ऐसे गिरे, मानो पवन-पुत्र ने स्वयं ही भावी सेतु का शकुनस्थापन
किया हो ।
उस समय उत्पन्न प्रचंड वायु के कारण बादल चारों ओर ऐसे भागे, मानो वे पवन-
पुत्र के लंका में आगमन की सूचना इंद्र आदि देवताओं को देने के लिए जा रहे हों !
समुद्र का सारा जल एक ओर हट गया और जल के भीतर पाताल-लोक ऐसा दीखने
लगा, मानो समुद्र हनुमान् को यह दिखा रहा हो कि रावण ने मेरे जल में जानकी को
नहीं छिपाया है । हनुमान् की स्वामिभक्ति, धैर्य, साहस, तेज, चातुर्य, और उदात्त शक्ति
को देखकर इन्द्रादि देवता उनकी प्रशंसा करने लगे ।
इस प्रकार जानेवाले हनुमान् को देखकर समुद्र मन-ही-मन सोचने लगा—'यह
पुण्यात्मा, जगत् के कल्याण के लिए बहुत दूर जा रहा है । उसका श्रम दूर करने के
निमित्त, मैं मैनाक को भेजूँगा ।' यों सोचकर उसने मैनाक को बुलाकर कहा—'अभी हनु-
मान् यहाँ आया है । उचित रीति से उसके अतिथि-सत्कार की व्यवस्था करो ।'
शोभा-समन्वित, स्वर्ण-शिखरों से विलसित, स्वर्ग-सम सुंदर वह मैनाक पर्वत तुरन्त
अपने विशाल पंखों को फैलाते हुए उड़ा और समुद्र के मध्य भाग से ऊपर आया और
हनुमान् के सामने आ पहुँचा । हनुमान् ने अपने सामने उस विशाल पर्वत को देखकर
सोचा—'यह दैत्यो की माया है । यह कदाचित् मेरे कार्य में विघ्न डालना चाहता है ।
पर कोई चिंता की बात नही है । मै अपनी शक्ति से इसका नाश करूँगा । यो सोचकर
हनुमान् ने वज्र के समान कठोर-अपने वक्ष.स्थल से उस पर्वत को धक्का दिया । तुरन्त
वह पर्वत, बवंडर में फँसे हुए सूखे पत्ते की तरह शक्तिहीन होकर चक्कर खाने लगा ।
फिर वह मनुष्य का रूप धारण करके हनुमान् से बोला--'हे अनिलकुमार, मै तुम्हारा
शत्रु नही हूँ । समुद्र की आज्ञा से मैं तुम्हारे पास आया हूँ । उस महानुभाव ने तुम्हें
आतिथ्य देने के निमित्त, मुझे तुम्हारे पास भेजा है । इसलिए मै तुम्हारे पास आया हूँ ।
प्राचीन काल में सभी पर्वतो के पख थे । अपने इन पखो के कारण जब वे गर्व करने लगे,
तब इन्द्र क्रोध में आकर वज्रायुध से सभी पर्वतो के पख एक-एक करके काटने लगा ।
तब यह देखकर तुम्हारे पिता पवन सहज ही मुझे इस लवण-समुद्र में ले आये ओर मेरे
पखो की तथा मेरी रक्षा की । इसलिए मैं तुम्हारा अपना ही व्यक्ति हूँ, पराया नही हूँ ।
मैं पर्वतश्रेष्ठ शीताचल का पुत्र हूँ । मेरा नाम मैनाक है । मेरे पेडो पर जो फल लगे है,
उनको ग्रहण करके, अपनी क्षुधा तथा क्लान्ति दूर करो । हे पवन-पुत्र, उसके पश्चात्
तुम लंकापुर को जा सकते हो ।' तब उस महाबली हनुमान् ने कहा--'अब विश्राम
करना उचित नही है । मैने प्रतिज्ञा की है कि मैं समुद्र के मध्य में कही नही ठहरूँगा ।
अत, हे पर्वतराज, मुझे यहाँ कही ठहरना नही चाहिए।' इस प्रकार कहकर उसने अपने
करतल से उस पर्वत की मूर्धा का स्पर्श किया और कहा—'हे अनघ, तुम्हारी पूजा फलवती
हुई । अब तुम जाओ ।'
इस प्रकार कहकर शीघ्र गति से जानेवाले अनिलकुमार की शक्ति को देखकर देवता
आश्चर्य तथा हर्ष से भर गये । देवेन्द्र ने भी मैनाक पर्वत को देखकर बड़े प्रेम से कहा--
'श्रीराम के कार्य के लिए जानेवाले हनुमान् के प्रति तुमने उचित व्यवहार किया । अत,
में तुम्हें अभय-दान देता हूँ । तुम सुख से यही रहो ।'
तब गंधर्व, अमर तथा मुनियो ने हनुमान् की शक्ति की परीक्षा लेने का विचार
करके सुरसा नामक नाग-माता को हनुमान् का मार्ग रोकने के लिए भेजा । तब वह एक
राक्षसी का रूप धारण करके हनुमान् के मार्ग में आ खडी हुई ओर बोली—'इस समुद्र
के ऊपर से होकर जानेवाले तुम्हें मैंने देखा, दैवयोग से अब मेरे प्राण बच गये, मैं बहुत
भूखी हूँ । अत, तुम अब मुझसे बचने की चेष्टा न करके, मेरे मुँह में प्रवेश करो।
तब हनुमान् ने कहा--हे नारी, तुम मेरा मार्ग मत रोको । मै राम का कार्य पूरा करके
लौटते समय तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा । अब मै जाता हूँ । मै असत्य वचन नही कहता।'
तब वह स्त्री क्रुद्ध होकर हनुमान् का मार्ग रोककर खड़ी हो गई और बोली, -
'में तुम्हें जाने नही दूँगी, मै अवश्य तुम्हारा वध करुँगी ।' यो कहती हुई उसने अपना
मुँह खोल दिया । तब अनिलकुमार ने अपना शरीर दस योजन तक बढ़ा लिया । तब
उस स्त्री ने अपना मुँह उसके दुगुना चौडा कर लिया । हनुमान् ने अपना शरीर तीस
योजन तक बढाया, तो उस स्त्री ने अपना मुँह चालीस योजन विशाल बना लिया। इस
प्रकार एक-दूसरे से स्पर्धा करते हुए क्रमशः अपने शरीर तथा मुँह को शत योजन तक
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२६० रंगनाथ रामायण
वढा दिया । तव हनुमान् ने वडी चतुरता से एक अगुष्ठ प्रमाण-मात्र का अपना शरीर
वनाकर, सूक्ष्म रूप से उस स्त्री के मुँह में प्रवेश करके सहज हीं इस प्रकार वाहर निकल
आया जैसे कोई ज्ञानी ससार के जटिल वधनो से अपने-आपको मुक्त करकें निकल आता है ।
उसके पश्चात् उसने उस स्त्री को देखकर कहा—'हे नारी, मैने तुम्हारी इच्छा पूरी
कर दी, अव मे समुद्र पार जाऊँगा ।' उस स्त्री ने भी उस कपिकुलोत्तम हनुमान् की
वुद्धि की प्रशसा करती हुई दिव्य रूप धारण करके वड़े स्नेह से आशीर्वाद दिया और कहा-
'शीघ्र ही तुम्हारा कार्य सिद्ध हो ।'
तव हनुमान् समझ गया कि यह छायांग्राहिणी है और बिना भय के तुरत सूक्ष्म
रूप धारण करके उसके उदर में प्रवेश किया । फिर उसने उसका उदर चीरकर उस दुष्ट
राक्षसी को समुद्र में फेंक दिया । इन्द्रादि देवता इसे देखकर अत्यत हर्षित हुए और पुष्प-
वृष्टि करने लगे । इस प्रकार हनुमान् सहज ही समुद्र पार करके सुवेल (त्रिकूट) पर्वत
पर पहुँच गया ।
इस प्रकार, आन्ध
श्रीरंगनाथ रामायण
(सुन्दरकांड)
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१. हनुमान् का लंका में प्रवेश
श्रीराम का कार्य सपन्न करने का निश्चय करके हनुमान् ने विशाल सागर को
ऐसा पार किया, मानो वह एक छोटी-सी नहर हो और उस सुवेल पर्वत पर चढ गया,
जो लकापुरी के 'निकट था । वह लकापुरी सुदर शृंगोसे, पहाडी तराइयो से, प्रचुर वृक्षो
तथा लता-समूहो से, कैरव, बधूक, कल्हार एव कुमुद आदि पुप्पो से, सारस आदि 'जलचर
पक्षियो से, विलास गति से विहरण करनेवाले हसो के कलरव से, क्रौंच पक्षियो के निनादो
सै तथा कमल का मकरद पान करने से मत्त होकर झकार करनेवाले भ्रमरो की पक्तियो
सं युक्त तडागो से परिपूर्ण था ।
उस पर्वत पर चढकर हनुमान् ने दक्षिण दिशा में दृष्टि दौडाई और लका नगरी
को देखा । वह नगरी त्रिकूटाद्रि पर सुशोभित थी, और धर्म, अर्थ तथा काम इन तीनो
को एकत्र किये बैठी लक्ष्मी के समान सुशोभित थी । अपनी उज्ज्वल कान्ति के कारण
वह ताराद्रि की समता करती थी और आकाश-मार्ग से स्पर्धा करती हुई दिखाई पडती थी ।
वह अपने रत्नो की कान्ति से सुशोभित होकर ऐसी दीखती थी, मानो देवताओ से
युक्त अमरावती ही समुद्र के मध्य में सुदर ढग से शोभायमान हो रही हो । अथवा सुदर
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मकर, कच्छप तथा पद्मिनिधियो से युक्त अलकापुरी ही मानो कुबेर से रूठकर वहाँ आ
गई हो, या चिरकाल से समुद्र के नीचे रहने के कारण ऊबकर भोगवती नगरी ही समुद्र-
तल से ऊपर उठकर त्रिकूट पर्वत पर आ गई हो । उस नगरी का प्रभा-समन्वित स्वर्ण-
दुर्ग, समुद्र को ही अपनी परिखा बनाकर, ब्रह्माण्ड के समान सुशोभित था और ब्रह्मादि
देवताओ को भी अभेद्य दीखता था । वह लकापुरी दुर्वार गज, रथ, तुरग तथा भयकर
एव श्रेष्ठ वीरो से युक्त थी और अलौकिक ऐश्वर्य से सपन्न हो बहुत सुदर दीखती थी ।
ऐसी लका नगरी को देखकर हनुमान् आश्चर्य-चकित हो गया और निनिमेष नेत्रो से जहाँ-
तहाँ देखता ही रह गया । वह सोचने लगा--'अकेले समस्त लोको को जीतकर, अपने
पराक्रम से सभी लोको में अपनी श्रेष्ठता स्थापित करनेवाला दशकंधर ऐसे ऐश्वर्य से
सपन्न लका का राजा बना हुआ है । फिर भी, उसके भाग्य में जीवित रहना नही लिखा है ।
सर्वेश्वर रामचंद्र की पत्नी को ले आकर इस मूर्ख ने क्यो मृत्यु को आमंत्रित किया है ?'
इस प्रकार रावण की निंदा करते हुए वह शक्तिशाली हनुमान् लका में प्रवेश करने
का उपाय सोचने लगा । वह नगर के उत्तर द्वार पर पहुँचा और सारी परिस्थिति तथा
अपने कर्त्तव्य का विचार किया । उसके पश्चात् वह सोचने लगा--'भला, इस विशाल
सागर को वानर कैसे पार कर सकेंगे ? यदि पार भी करेंगे, तो इन्द्रादि देवताओ के लिए
भी दुर्भेद्य इस लका को जीतना क्या किसी भी रीति से उनके लिए सभव होगा ? युद्ध-
भूमि में भयकर साहसी रावण को राम कैसे जीत सकेंगे ?'
एक मुहूर्त्त काल तक इस प्रकार सोचने के पश्चात् हनुमान् ने मन-ही-मन विचार
किया--यदि मै अपने इस विशालकाय के साथ, दिन को ही इस नगर में प्रवेश करूँगा,
तो राक्षस भटो से मेरा सामना हो जायगा । उस प्रकार मै सीताजी का पता नही लगा
सकूँगा । अत मै सूक्ष्म रूप धारण करके इस नगर में प्रवेश करूँगा और दैत्यो की आँखो
में धूल झोंककर अवश्य ही सीताजी के दर्शन करूँगा । इस प्रकार मन में विचार करके
वह सूर्यास्त की प्रतीक्षा में वैठा रहा । निदान सूर्य-विव इस तरह तिरोहित होने लगा,
मानो सूर्य यह सोच रहा हो कि विशाल शक्तिशाली राम की पत्नी सीता देवी का पता
लगाने के लिए जो यह (हनुमान्) आया है, मेरे आकाश में रहते समय उसके लिए लका
में प्रवेश करना कठिन होगा । दिशाओ में घोर अधकार ऐसा व्याप्त हो गया, मानो अनिल-
पुत्र के आगमन से भयभीत हो राक्षस (रावण) के घोर पाप चारो ओर भाग रहे हो ।
क्रमश दैत्यो की कलकल ध्वनि मद पडने लगी । यह देखकर पवन-पुत्र ने सारी बातें
मन-ही-मन विचार करके एक बिल्ली के समान छोटा रूप धारण किया और फिर राघवो
का स्मरण करके लका में प्रवेश करने का उपक्रम करने लगे ।
२. लंकिणी का हनुमान् को रोकना
उस समय भयकर आकारवाली लकिणी हनुमान् के मार्ग को रोककर ऐसे खडी हो गई,
जैसे किमी निधि को बाहर लाते समय उस प्रयत्न में बाधा डालने के लिए कोई भूत उत्पन्न
होकर खड़ा हो जाता है । उसने अट्टहास करके पवनकुमार को डाँटते हुए कहा--'तुम कौन हो ?
तुम्हारा नाम क्या है ? इस नगरमें तुम क्यो प्रवेश कर रहे हो ? किसने तुम्हें यहाँ भेजा है ?'
तब हनुमान् अविचल खडा होकर बोला—'तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम क्या है ?
तुम क्यो मेरे मार्ग को रोककर खडी हो ? पहले तुम अपना परिचय दो, तो फिर मै अपने
वारे में कहूँगा ।' तब वह बोली—'मै दशकठ की आज्ञा से, बडे यत्न से इस नगर की
रक्षा करती रहती हूँ । मेरा नाम लकिणी है । जब मैं पराये व्यक्तियो को देखती हूँ, तब
उन्हें नगर के भीतर प्रवेश करने नही देती और उन्हें तुरत मार डालती हूँ । तब हनुमान् ने
उस स्त्री से कहा—'हे नारी, मैं इस नगर को देखने के उद्देश्य से आया हूँ; मुझे जाने
दो ।' तब वह राक्षसी आँखो से क्रोध प्रकट करती हुई बोली—'अब तुम कहाँ जाओगे ?
अब तो तुम मेरे हाथ में पड गये हो । तुम्हें पकडकर तुम्हारे शरीर के टुकडे-टुकडे कर
दूँगी और तुम्हारा रक्त पी जाऊँगी ।' यो कहती हुई उसने बडे क्रोध से उस श्रेष्ठ
वानर के वक्ष पर एक घूँसा मारा । हनुमान् ने सोचा कि स्त्री का वध करना पाप है।
इसलिए उसने लकिणी के वक्ष पर ऐसा घूँसा जमाया कि वह अपनी सारी शक्ति खोकर
पृथ्वी पर गिर पड़ी और हनुमान् को देखकर क्षीण स्वर में प्रार्थना करने लगी—'हे कपि-
कुलोत्तम, मुझपर कृपा करो । जिस दिन इस नगर का निर्माण हुआ, उस दिन निपुण
ब्रह्मा ने कहा था कि जिस दिन एक वानर यहाँ आकर तुम्हें दुख पहुँचावेगा, उसी दिन
से राक्षसो का नाश प्रारभ हो जायगा । इसलिए मुझे विश्वास है कि तुम्हारी मनष्कामना
सफल होगी ।' इस प्रकार कहती हुई वह स्त्री चली गई । उस स्त्री की बातो से हनुमान्
अत्यत हर्षित हुआ और मन-ही-मन यह निश्चय करके कि अब राक्षसो का नाश निश्चित है,
पहली बार लका की धरती पर अपना वाम चरण प्रतिष्ठित किया ।
३ हनुमान् का लंका में सीता का अन्वेषण
फिर हनुमान् ने सूक्ष्म रूप धारण किया और किले की भित्तियो पर चढकर इस
प्रकार लका में प्रवेश किया कि किले के द्वार-रक्षक तथा सैनिक उनको देख न सके ।
फिर गुप्त रूप से मार्गों, बाजारो तथा चौपालो को देखते हुए वह आगे बढा । उसके
पश्चात् बडे-बडे गोपुरो पर चढा और गज-शालाओ से लेकर श्रेष्ठ सौधो के सभी स्थान देखे।
फिर उसने मदिरो में देखा, घर-घर में ढूँढा, तथा अत पुरो में ढूँढा, मडपो और मौघो में
देखा । फिर अश्वशालाओ, रथशालाओ तथा शस्त्रागारो में देखा और मणिमय भवनो में
सीता का अन्वेषण किया । तत्पश्चात् विभीषण, अतिकाय, देवातक और त्रिशिर के घरो
में, कुभकर्ण के विशाल भवन में, कुभ के घर में, निकुभ के निवास में, शोभा-समन्वित
इन्द्रजीत के अत पुर में, महोदर के भवन में और सभी दनुज-नायको के घरो में क्रमश
सीता की खोज की । दैत्यो के इन निवासो को देखकर हनुमान् आश्चर्य-चकित हो गया ।
फिर उसने सभी अत पुरो में सीता को ढूँढा, सभी स्त्री-जनो में देखा, और एक-एक करके
राक्षसो के सभी घर देख डाले । किसी-किसी स्थान पर एक आँख, एक कान, एक हाथ-
वाले विकृत रूपो को देखकर वह चकित रह गया । कही-कही उसने बहुत-से चरण,
अनेक भुजाओ तथा कई शिरोवाले राक्षसो को देखा । फिर वह जप-तप तथा
स्वाध्याय में तत्पर, सत्कर्मी तथा निष्ठावान् तपस्वीश्रेष्ठ दानवो को देखते हुए आगे
बढ़ गया ।
उसके पश्चात् हनुमान् रावण के अत पुर के निकट पहुँचा । वह (अत पुर) मकर-तोरणो
(मकर के आकार में बँधा हुआ वदनवार) पुष्प-मालिकाओ, विविध धूपो की सुगधि, रत्न
तथा मोतियों से पूरे गये चौको, चंद्रकांत-शिलाओ से निर्मित चबूतरों, स्वर्ण तथा-मणियो
से बनाये गये कपाटो, प्रशंसा के योग्य मडपो, प्रवाल के बने ऊँचे स्तभो, अनेक अट्टालिकाओ
तथा सौधो की पक्तियो से अलकृत था तथा सशस्त्र राक्षसो के द्वारा सतत रक्षित था।
उस अत पुर के पास पहुँचकर हनुमान् ने अत पुर के पहरेदारो के निकट जाकर देखा,
फिर कई द्वारो को निर्भय गति से पार करता हुआ आगे बढा और सभा-मडपो में सीता
को ढूँढा । वह रनिवास के निकट पहुँचा ही था कि इतने में, समुद्र में ज्वार उत्पन्न करते
हुए, कमल-समूह की काति को मलिन करके उन्हें मुकुलित करते हुए, मदमत्त चक्रवाल
पक्षियो को विरहाग्नि से पीडित करते हुए, मन्मथ के प्रताप को बढाते हुए, मुरझाई हुई
कमलिनियो के समूह को विकसित करते हुए, मुग्धा-जारिणियो के चित्तो में चंचलता उत्पन्न
करते हुए, घने अधकार के प्रताप को नष्ट करते हुए, चंद्रकांत-शिलाओ को गलाते हुए,
चकोर पक्षियो को प्रेम से अघाते हुए, प्रेमी-प्रेमिकाओ का मिलन सपन्न करते हुए, अपनी
संपूर्ण राका से दिशाओ को भी उज्ज्वल बनाते हुए, मन्मथ का ससुर, उत्तम शोभा की
सीमा, कुमुदिनियो का प्रेमी, नक्षत्रो के अधिपति चद्र का उदय आकाश में ऐसे हुआ, मानो
लकापुरी में सीताजी का अन्वेषण करनेवाले हनुमान की सहायता करने के हेतु देवताओ ने
मशाल जला दी हो ।
४ हनुमान् का रावण के अंतःपुर में प्रवेश करना
ऐसे चन्द्र को देखकर हनुमान् मन-ही-मन हर्षित हुआ और-सारे अत पुर में देखते
हुए जाने लगा । एक स्थान पर उसने कातिमान्, विश्वकर्मा से-रचित, अपनी इच्छा से
चलने की शक्ति रखनेवाला, विचित्र कला-कौशल से सपन्न सूर्य-चंद्र के समान प्रकाशमान
मणि-पुष्पक नामक विमान को देखा, जिसे देवलोक के शत्रु (रावण) ने युद्ध में, कुबेर को
पराजित करके छीन लिया था ।
उस विमान में पवन-पुत्र ने उन सुदरियो को देखा, जिन्होने रावण को सुख-के
समुद्र में उतराकर, मद्यपान तथा भोग-विलास के मधुर रसास्वादन के कारण शिथिल हो
सोई पडी थी । उनकी शरीर-रूपी लताएँ अलग हो पढी हुई थी; उनकी स्निग्ध जांघो
का सौंदर्य प्रकट दीख रहा था; उनकी नीवियो की गाँठे ढीली हो गई थी, उनके मुख
मुरझाये हुए थे, उनकी सुगधित साँसें चल रही थी, अधर एक विचित्र सुदरता के साथ
एक ओर झुके हुए थे और उनपर मद हास नृत्य कर रहा था, उनके अर्द्ध-निमीलित
नयन उनकी रति-क्रीड़ा की मुग्ध परवशता प्रकट कर रहे थे, उनके नूपुर निःशब्द होकर
उनके चरणो में लिपटे हुए थे, उनका चंदन-तिलक श्रम-जल से गल रहा था, उनकी
वेणियां खुली हुई थी, पुष्प-मालाएँ टूटी पडी थी, भ्रष्ठ मुक्ताओ की मालाएँ उनके दोनो
कठोर कुच-पर्वतो के बीच दबी हुई थी और उनके चित्त मदिरा-पान से मत्त थे । अपने
कटि-रूपी सैकत, केश-रूपी शैवाल, नाभि-रूपी सरोवर, भ्रू-रूपी तरगो, कुच-रूपी भँवर तथा
नयन-रूपी मीनो से युक्त वे सुंदरियाँ सुख-निद्रा में सोनेवाली नदियो के समान दीख रही थी ।
सुन्दरकाण्ड २९७
परस्त्रियो के शरीर के विविध अगो को देखने से पुण्यात्मा हनुमान् मन-ही-मन
अत्यत दुखी था । वह सोचने लगा कि स्वामी के कार्य में निरत रहने के कारण मुझे इस
प्रकार परस्त्रियो के शरीर के अगो को देखना पडा है। पाप-बुद्धि से मैने ऐसा नही किया हैं।
इन स्त्रियो के झुड में ही सीताजी को ढूँढना है, अन्य स्त्रियो में नही ।
इस प्रकार मन में सोचते हुए दबे पाँव वह आगे बढ़ा । वहाँ उसने एक विशाल
रत्न-वेदी पर पुष्प-शय्या पर सोनेवाले इन्द्र के भोग-विलास को भी मात करनेवाले, साध्य-
राग से युक्त जलद की भाँति चदन तथा अगराग से दीप्त शरीरवाले सुदर झरनो से युक्त
नीलाद्रि के समान मोतियो की मालाओ से सुशोभित देहवाले, पचशिरवाले भयकर सर्पो की भाँति
सुपोषित उँगलियो से युक्त भुजाओवाले, स्वच्छ चाँदनी के साथ रहनेवाले अधकार के समान
अपने शरीर को स्वच्छ चादर से ढककर सोनेवाले, अपने विशाल वक्ष पर ऐरावत के दाँतो के
आघातो को बडे साहस के साथ वहन करनेवाले, अपने दोनो पार्श्वों में रखे मणिमय दीपो
की शिखाओ को अपनी उसाँसो से हिलानेवाले, मुकुट तथा कुडलो की दीप्ति से सुशोभित रूपवाले
तथा सभी शत्रुओ का गर्व निचोडनेवाले रावण को देखा और अनुमान कर लिया कि यही
राक्षस राजा है । उसके पार्श्वों में गधर्व, देव तथा दैत्य कामिनियो को देखा । उनमें से
कुछ पानदान, कुछ पीकदान और कुछ अपने हाथो में पखे लिये हुई थी । कुछ कामिनियाँ
अपने कर-ककणो से शब्द करती हुई चामर डुलाने, कुछ मधुर-मधुर गीत गाने, कुछ
नृत्य करने, कुछ वीणा बजाने और कुछ मृदग बजाने के पश्चात् अब थककर अपने-अपने
उपकरणो से लिपटी हुई सोई पडी थी ।
उसके पश्चात् परम पावन हनुमान् ने रावण की शय्या पर सोई हुई, नव यौवनवती
देव-स्त्रियो के सदृश दीखनेवाली और गगन-मडल के मध्य रहनेवाली चन्द्रकला के समान
प्रकाशित होनेवाली, मदोदरी को देखा । हनुमान् ने मन-ही-मन निश्चय कर लिया कि
मैंने सीताजी को देख लिया और वह आनदविभोर हो उठा । उस आनद में कभी
उछलता, कभी कूदता, कभी वहाँ के स्तभो पर चढता और कभी अपने लांगूल का चुम्बन करता ।
इस प्रकार वह थोडी देर तक अपनी जाति-सहज विकृत चेष्टाएँ करता रहा । फिर वह
मन-ही-मन अपने विवेक को जाग्रत करके सोचने लगा, -'मनुकुलेश्वर की पत्नी, पति-
व्रताओ में शिरोमणि, परमपावनी, तथा महाराज जनक की पुत्री, भला, देवाधिदेव राम को
छोडकर, रावण के साथ रहने की इच्छा करेंगी ? कही आसवत हो मधुपान करेंगी ? हाय,
मेरी बुद्धि को ऐसा भ्रम क्यो हुआ ? कैसे भी विचार करूँ, यह चचलाक्षी अवश्य ही कोई
दानवी है, सीता नही हैं ।'
इस प्रकार निश्चय करके वह उस स्थान को छोडकर आगे बढा और आसव, रक्त,
मधु एव मास-युक्त मधुशालाओ को देखकर उन भवनो में सीता को ढूँढ़ा, जिनमें गरुड,
उरग, अमर, गधर्व तथा सिद्धो की स्त्रियाँ बदी थी । फिर उसने जहाँ-तहाँ छाया में खडे
होकर, एकात में वार्तालाप करनेवालो का सभाषण ध्यान से सुना । बिना इस बात का
विचार किये ही कि में अमुक स्थान में प्रवेश कर सकता हूँ, अमुक स्थान में नही, अमुक
स्थान में जाना मेरे लिए उचित है, अमुक स्थान में नही, हनुमान् ने सारी लङ्कापुरी में
२८
२९८ रंगनाथ रामायणं
ढूंढ डाला, किन्तु मानव-रूप में रहनेवाली सीता को कही भी और किसी भी प्रकार से
देख न पाने के कारण अत्यत दुःखी हुआ ।
५: हनुमान् का रावण के उद्यान में जाना
इसके पश्चात् हनुमान् ने नगर के समीप रहनेवाले और सोने की चहारदीवारी से
घिरे हुए एक उद्यान को देखा । धीरे-धीरे वह उस उद्यान के निकट पहुँचा । चारो ओर
भली भांति देखकर वह उसकी दीवार पर चढ़ गया और उस सुंदर उद्यान के भीतर देखने
लगा । वह उद्यान चंदन, पुन्नाग, सहकार, मदार, खर्जूर, कटहल, पीपल, नीबू, विजौरा,
पाटली, बकुल, घनसार, सौवीर, कर्णिकार, कुरवक, जवीर, ताल, तमाल, हिंताल, साल, नारिकेल,
अशोक, सप्तपर्णी, दाड़िम, नारंगी, केतकी और पूगीफल, आदि के वृक्षो से, मल्लिका,
मालती, माधवी, नागवल्ली, एला, लवग आदि लताओ से, पके हुए द्राक्षाफल के गुच्छो से
और पके हुए फलो तथा पुष्पो की सुगंधि से युक्त वायु से परिपूर्ण था । वह (उपवन)
पिक, शुक, नीलकंठ एवं सारिकाओ तथा भ्रमरो मे शोभायमान था । वह सुंदर सरोबरो
से, कुमुद-समूहो से, चंद्रकात-मणियो की वेदिकाओ से, स्वच्छ चाँदनी से तथा सैकत स्थलो
से अत्यत मनोहर था । वह सभी ऋतुओ में विहार करने योग्य था और उसकी शोभा
चैत्ररथ (कुवेर का उपवन) को भी मात करती थी । अमरेन्द्र के नंदन-वन की समता
करनेवाली रावण की उस उद्यान-वाटिका को देखकर हनुमान् आश्चर्यचकित हो गया और
उस उपवन में प्रवेश करके दवे पाँव सरोवरों में, खड्डो में, उनके तटो पर, निकुंजो में,
पेड़ो के नीचे तथा सुरक्षित स्थानो में बडी सावधानी से सीताजी की खोज
करने लगा । उसके पश्चात् उस उपवन के मध्य भाग में स्थित, रात-दिन पहरा देनेवाले
राक्षस-वीरो से रक्षित, गगनचुंबी अट्टालिकाओ से सुशोभित मेरु पर्वत के शिखरो के समान
स्वर्ण-कलशो से शोभायमान, स्वर्ण-स्तंभो तथा श्रेष्ठ रत्नो के वंदनवारो से भासमान एक
विशाल भवन को हनुमान् ने देखा । हनुमान् ने उस भवन में भी सीता को ढूँढा, किन्तु
वहाँ भी उनका पता नही चला ।
तब हनुमान् मन-ही-मन अत्यत दुःखी हुआ और सोचने लगा—'हाय, सूर्यकुल-तिलक
राम ने मुझे एकांत में बुलाकर, बड़े प्रेम से कहा था कि तुम अवश्य सीता का पता लगा
सकोगे और मेरे हाथ में अपनी मुद्रिका दी थी । उनका आदेश स्वीकार करके मैं यहाँ
आया हूँ । किन्तु उस कमल लोचनी का पता कही नही मिल रहा है । उस दुरात्मा
रावण के ले आते समय कदाचित् उस साध्वी ने अपने प्राण त्याग दिये हो या आकाश-
मार्ग से अत्यधिक वेग से आते समय भयभीत हो सीताजी, राक्षस के हाथो से मुक्त होकर
समुद्र में गिर गई हो, अथवा यहाँ के राक्षसो को देखकर भय से प्राण छोड़ दिये हो,
अथवा विरहाग्नि में जलकर भस्म हो गई हो, या राक्षस ने किसी ऐसी माया की रचना
की हो, जिससे सीता किसी को दीख नही पडती हो, या रावण ने उन्हें विदेशो में रख
दिया हो, या उस राक्षस ने उस चंचलाक्षी को दण्ड देकर उसके प्राण ले लिये हो । हाय,
में किस मुँह से लौट जाऊँगा और राम से क्या कहूँगा ? अब में क्या करूँ ? ज्यो ही में
यह कहूँगा कि मैने सीता को नही देखा, त्यो ही राम अपने प्राण त्याग देंगे । अपने भाई
के लिए लक्ष्मण भी शरीर छोड़ देंगे । यह समाचार सुनकर भरत भी अपने प्राण-त्याग
करेंगे, उनके लिए शत्रुघ्न तथा अन्य सगे-सबंधी अपने-अपने प्राण तज देंगे । इस प्रकार
समस्त सूर्य-वंश का नाश हो जायगा । यह देख सुग्रीव, अगद आदि सभी वानरो के वंश
भी नष्ट हो जायेंगे । इसलिए मैं एक वानप्रस्थ की भांति वनो में ही निवास करूँगा, या
चिता रचकर अग्नि में प्रवेश करूँगा, या प्राणो का मोह छोड़कर समुद्र में डूब मरूँगा।
हाय, सपाति के वचनो को सत्य मानकर, अकेले मेरा यहाँ आना व्यर्थ हुआ । ठीक है,
चिंता की कोई वात नही है । मै साहस करके देवताओ से भिड जाऊँगा और देवेन्द्र को
पकड़कर उसे त्रास दूँगा, अथवा ज्वालाओ से युक्त अग्नि को पानी में डुबोकर उसे पृथ्वी
पर रगड़ दूँगा और उसकी प्रभा को नष्ट कर दूँगा, अथवा यम को उसके भटो के साथ
ऐसा दण्ड दूँगा कि उसका हृदय फट जाय, अथवा नैऋत को सभी राक्षसो के साथ भय
से तडपाकर उसे अत्यधिक दुख दूँगा, अथवा जल-राशियो के साथ वरुण को परास्त करके
उसे जीत लूँगा या वायु के सप्त पवनो को घेरकर उन्हें दण्ड दूँगा, या कुवेर को
किन्नरियो के साथ कैद करके उन्हें इस तरह तडपाऊँगा कि उनकी सारी सुदरता नष्ट हो
जायगी या अपने अतुल पराक्रम से ईशान को उसके सेनापति के साथ पकड़कर उनके
साथ युद्ध करके उन्हें जीत लूँगा, पृथ्वी को सभी पहाड़ो के साथ, कुम्हार के चक्र के
समान घुमाकर उसके गर्भ की सभी चीजो को उगलवा दूँगा या इस लका के राक्षसो
को समुद्र में डुबोकर सबका नाश करके सारी लका को छान डालूँगा । जब मै इतना
सब करूँगा, तभी सभी देवता (मेरे सामने) झुककर, सीताजी को दिखायेंगे, या राघव
स्वयं दया करके ससार का नाश करने से मुझे रोकेंगे ।
६. हनुमान् की सीता से भेंट
इस प्रकार निश्चय करके हनुमान् उस भवन के शिखर पर चढ़ गया । उसने
निकट ही स्थित वायु तथा सूर्य-किरणो के लिए भी अभेद्य अशोकवन के एक प्रातर भाग
में अत्यंत समृद्ध हेम-वर्ण के अशोक-वृक्ष के नीचे एक स्त्री को देखा । वह व्रतो के अनु-
ष्ठान के कारण क्लान्त हो गई थी, शोक से कृश हो गई थी, अत्यधिक दुख से दबी
हुई थी, वेदना से दग्ध थी, अनवरत झरनेवाले अश्रुजल में डूबी हुई थी, विरहाग्नि में
तप्त थी, कपट आचरण का शिकार बनने से मर्माहत होकर सूख-सी गई थी, जीवन के
प्रति विरक्त-सी हो गई थी और उसके चीर मैले हो गये थे । वह भगवान् को मन-ही-
मन कोसती हुई, दुखो का सहन करती हुई, अपने को असहाय समझकर धैर्य त्यागी हुई,
सूर्य की प्रचंड रश्मि से सूखी नव-लता के समान, धुएँ से घिरी हुई दीप-शिखा के समान,
बादलो की पंक्ति के मध्य दीखनेवाली चंद्र-रेखा के समान, पाले से आहत पद्मिनी के समान,
मार्जारी के मध्य रहनेवाले तोता पक्षी के समान और व्याघ्रो के मध्य फँसी हुई गाय के
समान, दुर्वार घोर राक्षसो के मध्य बड़े उदास भाव से एक हथेली पर कपोल रखे बैठी हुई थी ।
ऐसी मुद्रा में बैठी हुई आभूषणो से युक्त वेणी से आच्छादित जंघावाली, मलिन अंगोवाली, गद्गद
कंठवाली, उष्ण निःश्वास छोड़ती रहनेवाली, सतत उपवास करनेवाली विशालाक्षी, जनक की पुत्री
तथा जगन्माता सीता को हनुमान् ने देखा । उसने तुरंत सोचा कि ये कदाचित् सीता ही हों ।
२२० रंगनाथ रामायण
इस प्रकार सोचकर उसने मन-ही-मन राम तथा लक्ष्मण को वड़ी भक्ति के साथ
प्रणाम किया, वडे उत्साह मे देवताओ की प्रार्थना की और वडे हर्ष से उस भवन से नीचे
उतर आया । उसके पश्चात् उसने एक अगुष्ठ-मात्र का आकार ग्रहण किया और उस अशोक-
वृक्ष के पास पहुँचकर उसपर चढ़ गया । वालक के रूप में वट-वृक्ष के पत्नों में शयन करने-
वाले विष्णु के समान, वह श्रेष्ठ वानर उस वृक्ष की घनी शाखाओ में वड़ी कुशलता के
साथ छिपकर बैठ गया और (उस पुण्यात्मा ने) वडे ध्यान से उस विशालाक्षी को वार-
वार देखने और सोचने लगा- 'ऋष्यमूक पर्वत पर जिन आभूषणो को मैंने देखा था, उनमें
और इनके शरीर पर दीखनेवाले आभूषणो में समानता दीखती है । अत, यह पद्मगंधी,
काकुत्स्थवंशी राम की पत्नी ही होगी ।' इस प्रकार सोचकर वायु-नंदन ने और एक वार
सीता को ध्यानपूर्वक देखा और पाया कि उस रमणी के अग, कर्ण-भूषण, मणिमय कंकण
तथा सुनहले वस्त्र, ठीक उसी प्रकार के थे, जैसे कि राम ने बताया था । उसके अतिरिक्त
उसने उस नारी-रत्न में विरह-व्यथा से पीड़ित होनेवाली स्त्रियो के लक्षण, पतिव्रता
नारियो के शुभ चिह्न और निपुण मानव-स्त्रियो के सभी चिह्न देखे । साथ-ही-साथ उसने
यह भी देखा कि वह साध्वी राम का नाम लेकर कुछ प्रलाप कर रही है । इन सब बातो
पर कुछ समय तक विचार करने के पश्चात् उसने निश्चय किया कि ये सीता ही हैं ।
फिर उनका विवर्ण मुख, कृश गात्र, बिखरे हुए केश, उनकी दुर्दशा, उनका विलाप तथा
उनकी दीनता देखकर वह मन-ही-मन बहुत दु खी हुआ और विचार करने लगा- 'चंद्र से
बिछुड़ी हुई चंद्रिका की भाँति यह चंद्रमुखी रामचंद्र से विलग होकर क्या रह सकती है ?
क्या इस रमणी से बिछुड़कर राम रह सकते हैं ? यह बड़े ही आश्चर्य की बात है कि
इन दोनो के कुल, शील, दाक्षिण्य, गुण, वय, धर्म, तथा सुंदर रूप एक समान हैं । अत
राम के लिए यह रमणी तथा इस युवती के लिए राजा राम सर्वथा उपयुक्त है । इस
कांता के लिए ही तो सूर्यकुलाधिप ने शिव का धनुष ईख की तरह तोड़ा था । जब ये
पीड़ित हुईं, तब वड़ी कठोरता के साथ उन्होने उस कपटी कौए को दण्ड दिया था । जिस
विराध ने पहले इनपर आक्रमण किया था, उसका वध किया था । इन्हीं के लिए उन्होंने
शूर्पणखा के नाक और कान कटवाये, खर और दूषण आदि राक्षसो का संहार किया,
मारीच को मृत्यु के मुँह में भेजा, वालि को एक ही शर से मार डाला और कपियो को
चारो दिशाओ में भिजवा दिया । मैं उन कपियो में अपने को बड़ा बलवान् समझकर,
उस पुण्यात्मा काकुत्स्थवंशी राम के सामने यह कार्य-भार अपने ऊपर लेकर, अंगद आदि
वानरो के साथ मैं यहाँ आया । अपने पुण्य-फल के प्रताप से और अपनी इच्छा के अनुसार
ही इस पुण्य सती को मैं यहाँ आकर देख सका । भयंकर असुर-स्त्रियो के मध्य, यातनाओ
में पड़ी हुई इस स्त्री-रत्न को में अपना रूप किस प्रकार दिखाऊँ ? किस प्रकार मैं इससे
वार्तालाप करूँ ? इस पुण्य साध्वी को कैसे सांत्वना दूँ ? किस प्रकार प्रभु को यहाँ की
दशा सुनाऊँ ?'
७ सीता से रावण का प्रलाप
हनुमान् मन-ही-मन इस प्रकार की चिंताओ से व्याकुल होता रहा । वहाँ रावण जानकी
के संबंध में सोचते-सोचते संतप्त हो उठा। वह बड़े तड़के ही उठा, तो उसका चित्त काम-
देव के प्रभाव से उद्विग्न होने लगा। उसने सुन्दर ढंग से दिव्य मालाएँ धारण कीं, शरीर
पर दिव्य गंध का लेप किया। दिव्य आभूषणों से अपने शरीर को सजाया। चारों दिशाओं
में अपनी शोभा को विकीर्ण करनेवाला मुकुट मस्तक पर रखा और चन्द्रहास (खड्ग) को
भी साथ लेकर वह अशोक-वन की ओर चल पड़ा। उसके पार्श्व-भाग में अप्सराएँ, अपने
मणिमय कंकणों को क्वणित करती हुई चामर डुला रही थीं, गंधर्व-युवतियाँ अपने घन-
कुचों पर के हारों को चंचल करती हुई पंखे झल रही थीं, किन्नर-रमणियाँ छत्र पकड़े
हुए अपने कुच-मूलों की शोभा प्रकट कर रही थीं, यक्ष-युवतियाँ अपनी बाहुओं तथा
पार्श्व-भागों को प्रकट करती हुई हस्त-वाहिकाओं के रूप में जा रही थीं। दोनों ओर
गरुड की स्त्रियाँ परिमल जल तथा मद्य के पात्र लिये हुए चल रही थीं। भीड़ में कुचल
न जायें, इस भय से नाग-कन्याएँ आगे-आगे जा रही थीं। विद्याधरों की स्त्रियाँ वीणा
आदि वाद्यों के साथ कर्णमधुर स्वर में गान कर रही थीं। रावण के गुण तथा औन्नत्य
के अनुसार सिद्धों तथा साध्यों की रमणियाँ एकत्र होकर उसका गुणगान कर रही थीं, खड्गपाणि
राक्षस-स्त्रियाँ बड़े उत्साह से उसके पीछे-पीछे चल रही थीं। इस प्रकार परिजनों को साथ
लेकर सहस्रों मशालों के प्रकाश में बादलों के पीछे चलनेवाली विद्युल्लता के समान मंदो-
दरी को साथ लिये हुए रावण चला। उसकी अन्य स्त्रियाँ भी उसकी सेवा में लगी हुईं,
उसके पीछे-पीछे जाने लगीं। उसके बलिष्ठ पदाघात से पृथ्वी काँपने लगी। भीड़ के परि-
हास की ध्वनि से आकाश गूँजने लगा। स्त्रियों की मेखलाओं, नूपुरों तथा मणिमय
आभूषणों का कलनाद कर्णपुटों को मधुर लग रहा था। इस प्रकार, उनींदी दृष्टि
से, कनक-केयूरों से अलंकृत बाहुओं से, पृथ्वी पर लोटनेवाले वस्त्रों से, अत्यधिक मुरझाये
हुए वदन से तथा अत्यंत भीषण आकार में रावण सीता के सामने आकर खड़ा हुआ।
उसे देखते ही सीता दिग्भ्रान्त-सी हो गईं। अपने मन में उन्होंने रघुराम का स्मरण
किया और अपनी जाँघें, उदर, कुच-द्वय, और सुंदर हाथों को अपने वस्त्रों से अच्छी तरह
ढक लिया और बाघ द्वारा देखी हुई हिरणी की भाँति सिकुड़कर बैठ गईं। ऐसी साध्वी
को देखकर अपने मद के प्रभाव में आकर रावण बोला—'हे सुंदरी, तुम अपनी क्षीण
कटि को क्यों छिपा रही हो ? अपना सुंदर मुख क्यों नीचे झुका रही हो ? हे अबले,
मन्मथ की पीड़ा से त्रस्त हुए मुझे तुम अपने कृपा-कटाक्ष से बचाओ। परस्त्रियों को बलात्
अपने वश में कर लेना हमारी जाति के धर्म के अनुकूल ही है। फिर भी मैं केवल तुम्हारी
कृपा-दृष्टि का आकांक्षी हूँ। मेरी बातें ध्यान से सुनो। इस हीन दशा में तुम क्यों रहती हो ?
कदाचित् तुम सोचती हो कि राम अपने भाई के साथ भयंकर वन को पार करके
यहाँ आयगा और समुद्र पर पुल बाँधकर अपने अतुल पराक्रम से मुझे जीतकर, तुम्हें छुड़ा-
कर ले जायगा। यह असंभव है। इन्द्र, यम, वरुण आदि देवताओं के लिए भी युद्ध में
मुझपर विजय पाना असंभव है। हे कमललोचनी, अब तुम इस पागलपन को छोड़ो।
मेरी भुज-शक्ति के सामने मनुष्य की शक्ति ही क्या है ? अनाथों की भाँति पर्वतों तथा
जंगलों में भटकते हुए, कष्ट सहनेवाले एक शक्तिहीन मानव का सहवास क्यों चाहती हो ?
२२२ रंगनाथ रामायण
हे सुंदरी, तुम मुझे अपनाकर राज्य-सुख क्यों नहीं भोगती ? चाहे इन्द्र हो, यम हो,
वरुण हो या कुबेर हो; अग्नि, नैऋत, वायु या ईशान ही क्यों न हो, कोई भी मेरी लंका
को जीत नहीं सकता । क्या किसी मानव के लिए लंका की ओर दृष्टि डालना भी संभव है ?
अब राम कहाँ है ? वह यहाँ कैसे आयेगा ? आकर लंका में प्रवेश करेगा किस ढंग से ?
प्रवेश करके भी बिना भयकंपित हुए मेरा सामना करेगा कैसे ? सामना करके भी मेरे
साथ लड़ेगा कैसे ? लड़ेगा भी, तो मेरी शक्ति को किस प्रकार सहन कर सकेगा ?
सहन करेगा भी, तो कबतक कर सकेगा ? इसलिए, ये सब बातें असंभव हैं । उन
बातों को छोड़ दो ।' रावण इस प्रकार राम की निंदा करते हुए कर्णकटु शब्द
कहता रहा ।
८ सीता का रावण की निंदा करना
तब सीता ने अत्यंत क्रुद्ध होकर एक तिनका ऐसा तोड़ा, मानो वे इसकी घोषणा
कर रही हों कि तुम अवश्य राम के हाथो से नाश को प्राप्त होगे । फिर वे उस तृण
को हाथ में लेकर उसे संबोधित करके कहने लगीं—'हे पापी, मेरे पति को धोखा देकर
तुम मुझे अपनी लंका नगरी में ले आये हो । इसे बहुत बड़ा पराक्रम मानकर तुम क्यों गर्व
कर रहे हो ? इसे महान् कार्य समझकर क्यों प्रलाप कर रहे हो ? पराई स्त्रियों के साथ
समागम चाहनेवालों का ऐश्वर्य नष्ट हो जाता है और उनकी आयु भी क्षीण होती है ।
यदि तुम जीवित रहना चाहते हो, तो औचित्य तथा धर्म का विचार करके मुझे राम के
पास पहुँचा दो । इसके विपरीत यदि दुर्बुद्धि के वश में पड़कर तुम मुझे ग्रहण करना चाहोगे,
तो कोदण्ड-दीक्षा-गुरु राजा राम के हाथो से मारे जाओगे । यह निश्चित है । तुम अपने
मन में यह मत समझो कि वे वनवास के कारण कृश-गात्र, दुर्बल, अनाथ, राज्यहीन, असहाय
हो गये हैं और वे मनुज-मात्र हैं । क्या उन्होंने दंडकवन में चौदह सहस्र भयंकर राक्षसों
को नहीं मारा ? दण्डधर के उद्दण्ड दण्ड के प्रताप को मात करनेवाले तथा सूर्य-किरणों
के भयंकर गर्व को भी परास्त करनेवाले राम के असंख्य रण-भीषण-बाण जिस दिन तुम्हारी
लंका में व्याप्त होंगे, जिस दिन वे बाण तुम्हारे वक्ष स्थल में गड़ेंगे, उसी दिन तुम अपनी
तथा राम की शक्ति का अनुभव कर सकोगे । मैं अब उसके संबंध में क्यों कहूँ ? जैसे
कुहरा सूर्य का सामना करने पर नष्ट हो जाता है, जैसे भेंड़ा पहाड़ से टक्कर लेने से
नष्ट हो जाता है, जैसे मच्छर मत्त गज का सामना करने से पिस जाता है, जैसे नाला
समुद्र का सामना करके अपना अस्तित्व खो देता है, वैसे ही तुम भी यदि अपनी और
उनकी शक्ति की तुलना किये बिना ही राजा राम के साथ भिड़ जाओगे तो तुम भस्म
हो जाओगे । भला, तुम क्या देखकर इठला रहे हो ? सूर्यवंश के तिलक (राम)
इस प्रकार तुम्हें इस पृथ्वी पर थोडे ही रहने देंगे ?'
इन बातों को सुनकर रावण अत्यंत रोष से जानकी को देखकर बोला—'मैंने
तपस्या से ब्रह्मा को प्रसन्न करके उनसे श्रेष्ठ शक्ति का वर प्राप्त किया है, इन्द्र से लेकर
सभी देवताओं को परास्त किया है, शिवजी के साथ समस्त कैलास पर्वत को उठाया है,
बड़े साहस के साथ सभी ऊर्ध्व लोकों को जीता है, पाताल के निवासियों को परास्त किया है
करनेवाली, क्रूर स्वभाववाली और विकृत शरीरवाली भयकर हयास्या, हरिजटा, त्रिजटा तथा
Wait, in L31: "भयकर" (wait, is there a dot? "भयकर").
"हयास्या, हरिजटा, त्रिजटा तथा"
Line 32:
महोदरी नामक राक्षस्यो को बुलाया और उनसे निर्लज्ज होकर कहा—'दो महीनो के भीतर
"राक्षस्यो" (not राक्षसों), "महीनो".
Line 33:
तुम इसे प्रिय वचनो से, या धमकियो से, या भयभीत करके अथवा दाम देकर ऐसा बनाओ कि
"वचनो", "धमकियो", "दाम देकर" or "साम देकर"? Wait, let's re-verify "दाम देकर".
Wait, look at line 33: could it be "साम देकर"?
Let's compare the first letter of this word with 'द' and 'स':
Look at 'द' in 'दो' (line 32): round top, goes down-right, tail down-left.
Now look at the letter in line 33:
Does it have a round top? It starts with a vertical stem from the bar, then a round belly... wait, look at 'द' in 'दाम': yes, it is 'द'!
Wait, could it be 'दान देकर'?
Look at the letter after 'दा':
२२४ रंगनाथ रामायण
१० राक्षसियों का सीता को दुःख देना
इसके पश्चात् दानव-स्त्रियाँ अपनी चिकनी-चुपड़ी बातो से जानकी को समझाने
लगीं—'हे सीते, तुम रावण को अपना लो।' एक राक्षसी हाथ में शूल लिये उन्हें धमकी
देने लगी—'राम इस लंका की ओर ताक भी नही सकेगा, इसलिए तुम उसकी आशा
छोड़ दो।' एक नीचबुद्धिवाली कहने लगी - 'इस प्रकार क्यो कष्ट भोग रही हो ?
दानवेश्वर को वर लो, अन्यथा मैं तुम्हारा वध कर डालूँगी।' एक राक्षसी बीच ही में
रोककर बोली—'खड्ग लाओ, हम अभी इसका सिर काट डालें और इसका मास मद्य में
डुवोकर चखें।' उसका समर्थन करती हुई एक दूसरी राक्षसी ने कहा—'ठीक है, यही करो।'
इस प्रकार धमकी देनेवाली राक्षसियो को देखकर भूमिसुता, कुमुदनयनी सीता
मन-ही-मन क्रोधित एवं दुःखी हुई और आँसू वहाती हुई गद्गद कठ से धमकानेवाली उन
स्त्रियो को देखकर बोली—'क्या दानव और मानव में कही दापत्य निभ सकता है, तुम
सब मिलकर ऐसे अपशब्द कह रही हो, क्या यह तुम्हारे लिए उचित है ? जैसे चंद्रिका,
चंद्र से बिछुड़कर नही रह सकती, जैसे प्रभा सूर्य से बिछुड़कर नही रह सकती, वैसे ही
मैं राम से बिछुड़कर नही रह सकती । मेरे प्रभु भले ही दीन रहें, राज्यहीन रहें तो भी
वे मेरे इष्ट देवता हैं । मैं भी जलधि (लक्ष्मी) के समान, पार्वती के समान, वाणी के
के समान, पौलोमी के समान, सावित्री के समान तथा रति के समान पतिव्रता की निष्ठा
से अपने पति राम की ही आराधना करूँगी । तुम चाहो, तो मेरा वध कर डालो, तेज
खड्ग से मेरा सिर काटना चाहो, तो काट दो । मैं केवल राम के सिवा और किसी को
स्वीकार नही कर सकती । मैं भ्रम में डालनेवाली तुम्हारी बातो में कभी नही आऊँगी ।
अब तुम इन बातो को छोड़ दो ।'
सीता की बातें सुनकर सभी राक्षसियाँ क्रोध से भभक उठीं और मदमत्त हो सीता
को विविध प्रकार से पीड़ा देने लगीं । तब सीता धूलि-धूसरित हो पृथ्वी पर लोट गई
और उनकी काली नागिन की-सी वेणी बिखर गई । वह उत्तम स्त्री पृथ्वी पर पड़ी हुई,
उसाँसें भरने लगी । वे ऊँचे स्वर में बार-बार, 'हाय लक्ष्मण', 'हाय राम', 'हाय माता
कौसल्या', कहकर रोने लगी ।
११. त्रिजटा का स्वप्न
त्रिजटा सीता का संताप न देख सकने के कारण वहाँ से उठकर चली गई और
किसी एकांत स्थान में जाकर सो गई । सोते-सोते एक स्वप्न देखकर वह जाग पड़ी ।
उसने सभी राक्षस-स्त्रियो को देखकर कहा—'हे नारियो, मैंने एक स्वप्न देखा है, उसे
मैं तुम लोगो को सुनाऊँगी; ध्यान से सुनो । मैंने स्वप्न में देखा कि राम एक हाथी पर
चढ़कर आ रहे हैं, उनके पीछे-पीछे लक्ष्मण, उनके सेवक के रूप में आ रहे हैं । फिर मैंने
देखा कि वह पृथ्वीपति इस कोमलांगी को उस गज पर बैठाकर ले जा रहे हैं । फिर
मैंने देखा कि रामचंद्र का राजतिलक हो रहा है और ब्रह्मा आदि देवता उनकी सेवा
कर रहे हैं । इतना ही नहीं, मैंने यह भी देखा कि रावण सुंदर पुष्पक विमान से चकराकर
पृथ्वी पर गिर गये हैं । तब नीलांबर धारण किये हुई एक युवती एक भयंकर खड्ग लेकर
सुन्दरकाण्ड २२५
गिरे हुए रावण के निकट पहुँची और उसने उनके सिर काट डाले है । फिर उसने वडे
वडे गधे जुते हुए रथ में उन्हें रख दिया और उस रथ को दक्षिण दिशा की ओर ले गई ।
उसके पश्चात् मैने देखा कि कुभकर्ण एक ऊँट पर चढकर दक्षिण की ओर जा रहा है ।
सुंदर ढंग से विलसित होनेवाले अपने तोरणो के साथ, लका समुद्र में डूव गई है । सभी
राक्षस तैल-धाराओ में डूवे हुए पडे है । विभीषण धवल छत्र धारण करके एक हाथी पर
विनय से बैठा हुआ है । इसलिए हे दानवियो, अब रावण का मरण, और रघुराम की विजय
निश्चित ही समझो । अत, तुम इस भूमिसुता को न अपशब्द कहो, न उन्हें सताओ ही ।
तुम सव अब यहाँ से हट जाओ ।” उसकी वातें सुनकर सभी दानवियाँ वहाँ से हट गईं
और थकी रहने कारण जाकर सो गईं ।
उस समय सीता भय तथा दुख से काँपती हुई, दो मास में उन्हें मार डालने की जो
आज्ञा रावण ने दी थी, उसके बार-बार स्मरण से ही भयभीत हो उठी । वे अशोक-वृक्ष की
शाखा के सहारे उठकर खडी हुई, और अपनी चंचलता के कारण वन में मार्ग खोई हुई
वालिका के समान विलाप करने लगी । वे कहने लगी—‘हाय भगवान्, क्रूरता के साथ
यहाँ वदी वनाकर मुझे इस प्रकार दुखी वनाना, क्या तुम्हारे लिए उचित है ? क्या ब्रह्मा ने
मेरे भाग्य में यही लिखा है कि मै इस पापी दैत्य के हाथो मरूँ ? ऐसा न होता, तो
राम दण्डक वन में क्यो आते ? स्वर्ण-मृग मुझे भ्रम में क्यो डालता ? यह रावण मुझे वदी
वनाकर दुख ही क्यो देता ? किन्तु में अपने वारे में क्यो सोचूँ ? चन्द्र के समान मुख-
वाले, लोक-रक्षण-कार्य में तत्पर रहनेवाले, मेरे प्रभु रामचन्द्र न जाने घोर वन में सौमित्र
के साथ किस प्रकार दुख से पीडित होते होगे और कैसी दुरवस्था भोग रहे होगे ? पता
नही, उनकी क्या दशा होगी ? न जाने, वे शूर यहाँ कव आयेंगे, कब इम नीच राक्षस
का गर्व चूर करेंगे, और कब मुझे अपने साथ ले जायेंगे । ये सव कार्य कब सिद्ध होंगे ?
और कैसे सिद्ध होगे ? इस दुरात्मा के हाथो मरने से स्वय मर जाना मे अच्छा समझती हूँ ,
किन्तु मुझ पर दया करके विष लाकर देनेवाला भी यहाँ कोई नही है । हे राम,
हे धर्म-निरत, मेरा पातिव्रत्य आज खिन्न हो गया है । मै अब आत्मघात कर लूँगी ।’
इस प्रकार कहती हुई वे अपने केशों को कठ में वाँधकर अपने प्राण देने का उपक्रम करने
लगी । इतने में उनका वाम-नेत्र मछलियो के स्पर्श से हिलनेवाले कमलो के समान फडकने
लगा । मलयानल से चचल होनेवाली वन-लता के समान उनकी वाम भुजा फडक उठी ।
मत्त गज की सूँड की भाँति उस रमणी की वाईं जाँघ भी फडक गई । भयंकर राहु
से मुक्त कुमुद-वधु (चंद्र) के समान उनका मुखचंद्र दीप्त हो उठा । जब इम प्रकार
शुभ शकुन दीखने लगे, तब गजगामिनी सीता ने अपने दुसाहसपूर्ण निश्चय का त्याग कर
दिया । वे रामचन्द्र का, उनके भाइयो का, तथा अपनी सासो का स्मरण करने लगी ।
राक्षसो के द्वारा दिये गये कष्टो से बहुत ही क्लान्त होकर वे अपनी दयनीय स्थिति का
विचार करके दुखी होने लगी ।
१२. हनुमान् का सीता को राघवों का वृत्तांत सुनाना
हनुमान् ने सोचा कि इस साध्वी का दुख शात करने का यही अच्छा अवसर है ।
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२२६ रंगनाथ रामायण
यों सोचकर वह वृक्ष पर बैठे-बैठे ही रविकुल की रीति तथा राम के पौरुष की भूरि-भूरि
प्रशंसा करने लगा । उसके पश्चात्, यह सोचकर कि यह साध्वी वानरों की भाषा तथा
गीर्वाण (संस्कृत)-भाषा कदाचित् जानती न हो, उसने मानवों की भाषा में उनको संबोधित
करके कहा—'हे भूमिसुते, हे पुण्यसाध्वी, इस प्रकार आप दुःख क्यों कर रही हैं ? आपके
प्रभु सकुशल हैं । जगदीश्वर, राजा राम समुद्र पार करेंगे और रावण का संहार करके अपने
साथ आपको ले जायँगे । यह सत्य है । अपने अनुज लक्ष्मण के साथ अपनी महान् महिमा
प्रकट करते हुए रामचंद्र माल्यवंत में रहते हैं और अनेक वानर-सेनाएँ उनकी सेवा
में लगी हैं ।'
इन वचनों को सुनकर सीता ने सोचा कि यह कोई आकाशवाणी है । उन्होंने
तुरन्त अशोक-वृक्ष की ओर सिर उठाकर देखा । तब उन्होंने सुन्दर नील मेघों के भीतर
दीखनेवाले बालचंद्र के समान तथा विद्युत् के समान, उस वृक्ष की शाखाओं के मध्य,
लघुरूप धारण किये बैठे एक वानर को देखा । तुरंत वे दुःखी होकर कहने लगीं—'हाय
मैंने स्वप्न में एक बंदर को देखा है । भगवान् करे कि इस स्वप्न का अशुभ फल काकुत्स्थ-
वंशजों को न मिले ।' फिर, उन्होंने इन्द्र आदि सभी देवताओं, बृहस्पति, अग्नि तथा सभी
लोक-पालकों की बड़ी भक्ति से प्रार्थना की ।
इसके बाद वे सोचने लगीं—'हम जिसके संबंध में बार-बार सोचते रहते हैं, या
जिसके विषय में प्रायः सुनते रहते हैं, वे ही स्वप्न में हमें दिखाई देते हैं । मैं अपने मन
में राघव के सिवा और किसी विषय के संबंध में सोचती ही नहीं हूँ । पुण्यात्मा मेरे
प्रिय प्रभु, सूर्यवंशज, विमल चरित्रवान् राम से बिछुड़कर विरहाग्नि में तप्त रहने तथा
भयंकर राक्षसियों के द्वारा प्राप्त दुःखों से पीड़ित होने के कारण मैं दिन-रात निद्रा से
वंचित रहती हूँ । किन्तु बिना निद्रा के यह स्वप्न कैसे हुआ ? मैं और एक बार ध्यान से
अशोक-वृक्ष की ओर देखूँ ।'
इस प्रकार, विचार करके उन्होंने अपने मुख-कमल को धीरे से ऊपर उठाया और
बार-बार हनुमान् को देखा । फिर सोचने लगीं—'यह कैसे आश्चर्य की बात है कि कोई
बंदर इस वृक्ष पर कहीं से आकर बैठा है । मानव के समान सुंदर ढंग से इसने मेरे
पतिदेव का कुशल-समाचार सुनाया है और बार-बार प्रिय वचन बोल रहा है । भला,
कहीं वानरों में ऐसी बातें संभव हैं । कई प्रकार से विचार करने पर ऐसा लगता है कि
यह कदाचित् राक्षस की माया ही है । ऐसा सोचकर वे प्रत्युत्तर दिये बिना चुप रहीं।
१३ हनुमान् का सीता को राम की अँगूठी देना
तब पवनकुमार समझ गया कि सीता मेरा विश्वास नहीं कर रही हैं । इसलिए
वह पेड़ से उतर आया और बड़ी भक्ति के साथ सीता को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर
कहने लगा—'हे कल्याणी, आप मेरा विश्वास कीजिए । मैं आपको आपके पति से मिलाने
के लिए आया हुआ सेवक हूँ । आपको मुझ पर विश्वास हो जाय, इसी उद्देश्य से राम ने
यह अंगूठी देकर मुझे भेजा है ।' इतना कहकर हनुमान् ने राम की अंगूठी उन्हें दिखाकर
प्रणाम किया । तब सीता हनुमान् को देखकर बोलीं—'हे अनघ, निशाचरों की मायाओं से