रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 271, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुन्दरकांड २४१
रावणासुर के नाश की सूचना देने के निमित्त उल्कापात होने लगा हो । अग्नि अपनी
प्रचण्ड गति से समस्त ब्रह्माण्ड में ऐसे व्याप्त होने लगी, मानो राजाओं में श्रेष्ठ रामचन्द्र
के लंका पर आक्रमण करने का उपक्रम करते ही उनका प्रताप-रूपी अग्नि पहले ही सर्वत्र
व्याप्त हो गई हो । रावण ने इसके पूर्व अपना भयंकर रण-कौशल दिखाकर समस्त दिक्-
पालों को युद्ध में परास्त कर दिया था । उस पराजय को भूले बिना आज अग्नि ने, अपनी
समस्त शक्ति को दिखाते हुए, एक ही क्षण में एक मात्र विभीषण के भवन को छोड़कर,
सारे नगर को जलाकर भस्म कर दिया । उस समय राक्षसों की ऐसी दुर्गति हुई कि कुछ
राक्षस भय से काँपने लगे, वस्त्र तथा केशों में आग लग जाने से कुछ राक्षस हाहाकार
करते हुए चारों ओर भागने लगे, कुछ अपने सगे-सम्बन्धियों को नष्ट होते देख कुछ राक्षस
शोक करने लगे, कुछ हाहाकार करने लगे, कुछ हनुमान् पर क्रोध दिखाने लगे । ऐसे भी
राक्षस थे, जो कह रहे थे कि इस पापी रावण ने उस महाविष्णु के अवतार राम का
अहित किया है, ऐसा अहित करनेवाले रावण के लिए इस प्रकार ही विपत्ति का आना
कोई अनहोनी बात नहीं है ।
तब वानरवीर हनुमान् अत्यन्त भयंकर रूप धारण करके नगर का कोई भी स्थान
बिना छोड़े, समस्त लंका में आग लगा दी । उस कपिश्रेष्ठ की पूँछ के स्पर्श से उत्पन्न
भीषण अग्नि-ज्वालाएँ जहाँ-तहाँ फैलने लगीं । सुरापान से सुप्त कुछ राक्षस बिना जाने ही
जलने लगे । मृदुल शय्याओं पर सोनेवाले राक्षस तीव्र अग्नि-ज्वालाओं के मध्य फँसकर,
छटपटाते हुए मरने लगे । कुछ राक्षस अपने सगे-सम्बन्धियों, स्त्री तथा बच्चों, प्राणाधिक मित्रों
को एकत्र करके भागते समय, बीच ही में अग्नि में फँसकर जलने लगे । अपने घर की
वस्तुओं को बाहर निकालने के लिए गये हुए लोग फिर लौटकर नहीं आ सके और वहीं
जल गये । कुछ राक्षस अपनी-अपनी पत्नियों को छाती से लगाये बाहर आने लगे, तो
देहली के पास आते-आते जल गये । इस प्रकार, वायु-पुत्र की पूँछ से निकली हुई अग्नि
भयंकर गति से समस्त लंका नगर में व्याप्त होने लगी और श्रेष्ठ सिंहों की भाँति उग्र रूप
धारण करके, हाथियों के कुम्भस्थलों को विदीर्ण करने लगी । तेज से युक्त घुड़सवारों
के समान वह अश्वों पर आक्रमण करने लगी, लम्पटों की भाँति, कामिनियों के कुचों पर
हाथ रखने लगी, दूसरों की निन्दा करनेवालों की भाँति अपनी जिह्वा को चारों ओर
फैलाने लगी, अत्यधिक आनंद से फूल उठनेवाले की भाँति आकाश तक बढ़ने लगी और
भयभीत होकर भागनेवाले कायरों की भाँति वह गलियों में प्रवेश करने लगी । इस प्रकार,
वह अग्नि लंका को चारों ओर से घेरकर शीघ्रता से उसका ध्वंस करने लगी । सभी
देवता आनंद से फूल उठे और हनुमान् को अपने आप्त बंधु मानकर उनकी प्रशंसा करने लगे ।
तब हनुमान् मन-ही-मन जानकी की मृत्यु की आशंका से पीड़ित होकर सोचने
लगा-'हाय ! यह मैंने क्या कर डाला ! मदान्ध होकर मैंने लंका के साथ-साथ राम की
पत्नी को भी जला डाला । अब मैं किस मुंह से राम के पास जाऊँगा ? जानकी का कुशल-
समाचार मैं राम को कैसे सुनाऊँगा ? हाय ! मेरे सारे प्रयत्नों पर पानी फिर गया !'
इस प्रकार, थोड़ी देर तक चिंतित रहने के पश्चात् उनका विवेक जागा और वह सोचने
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