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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 508 में से

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पृष्ठ 273

तब जाम्बवान् ने वालिपुत्र को देखकर कहा—‘सुग्रीव ने हमें जानकी के अन्वेषणार्थ
भेजा है; उस परम पवित्र सीता की कृपा से हमारा प्रयत्न सफल हुआ । अब हमारे
लिए उचित यही है कि हम जाकर रामचन्द्रजी से यह समाचार कह दें।, तब सबने
परस्पर परामर्श कर, वैसा ही करने का निश्चय किया । उस दिन वायुपुत्र तथा दूसरे
वानर समुद्र के किनारे ही कद-मूल-फलो से अपनी क्षुधा शांत करके रहे । वे परम शक्ति-
शाली वानर दूसरे दिन वहाँ से रवाना हुए और मेरु, मदर-पर्वतो से भी विशाल दर्दुर
नामक पर्वत के निकट पहुँच गये । उस पर्वत की तराइयो में विचरण करते हुए उन्होंने
फल, मूल, आदि खाकर वही रात्रि बिताई ।

२२. वानरों का मधुवन में विचरण करना

प्रातःकाल होते ही उन बाहुबली वानरवीरो ने सोचा—'हमें जब सुग्रीव के मधुवन
में जाकर, वहाँ जी भरकर मधु (शहद) का पान करना चाहिए, अन्यथा हमारी प्यास
शांत नहीं होगी । हमने रामचन्द्र का कार्य सम्पन्न किया है । अत, सुग्रीव क्रुद्ध होकर हमें
दंड नहीं देंगे ।' यो निश्चय करके सभी वानरों ने अगद तथा हनुमान् से प्रार्थना करके
उनकी भी सम्मति प्राप्त कर ली और मधुवन के लिए रवाना हो गये । मध्याह्न होते-
होते वे मधुवन में पहुँच गये । चारो दिशाओ में झरनेवाली मधु-धाराओ को देखकर उनके
मुँह में पानी भर आया । विभिन्न प्रकार के हाव-भाव करते हुए, वे अपने कान खड़े
करके, एक दूसरे को अपने दांत दिखाते हुए, एक दूसरे से तर्क-वितर्क करते हुए, बड़े
कौतुक के साथ अपने इष्टानुसार उस वन के विभिन्न दिशाओं में विचरण करने और
पुष्पो से झरनेवाला मकरद, छत्तो में एकत्रित मधु आदि का पान करने लगे । फिर, उन्होंने
कई प्रकार के फल खाये । कच्चे फलो तथा फूलो को तोड़कर नीचे गिरा दिया । अत्यधिक
उल्लास के आवेश में आकर उन्होंने पेड़ की शाखाओ को तोड़ दिया और पेड़ो को झुका-
कर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग मारकर जाने लगे । फिर, वे पुष्प-लताओ को
झूला बनाकर झूलने लगे तथा सरोवरों में स्नान करते हुए नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ
करने लगे ।
जब मधुवन की रक्षा करनेवाले वानर (दधिमुख) ने इन वानरो की करतूत देखी,
तब क्रोध में आकर उसने सभी वानरो को डांटकर उन्हें तुरत वहाँ से निकल जाने का
आदेश दिया । जब उसके अनुचर सभी वानरो को धक्का देकर बाहर निकालने लगे, तब
अंगद तथा हनुमान् ने भागनेवाले अपने साथी वानरो को रोका और वन-रक्षक दधिमुख
को मुँह के बल नीचे गिराकर, उसे पृथ्वी पर घसीटकर, मुष्टियो का प्रहार करके भगा
दिया । बेचारा दधिमुख क्रोध तथा दुख से व्याकुल होकर भगवान् की दुहाई देते हुए
भागा और राजा राम तथा लक्ष्मण के श्रीचरणों में बड़ी भक्ति के साथ प्रणाम करके,
फिर सूर्य-पुत्र के चरणों में सिर झुकाकर कहने लगा—'हे देव, आपका मधुवन देव-दानवों
के लिए भी अभेद्य है । आज वायु-पुत्र तथा वालि-पुत्र, दोनों ने अपने बहुत-से साथियों
को लेकर ऐसे मधुवन में प्रवेश किया है और वृक्षों पर चढ़कर शाखाओं पर विचरण
करते हुए अपने इच्छानुसार फल खाये हैं और जी भरकर मधु पिया है । एवम् किञ्चित्