रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 275, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुन्दरकाण्ड २४५
तथा दीन दशा का विचार करती हुई अविरल गति से अश्रुधारा बहाने तथा आहें भरने
लगी । मलिन वस्त्र तथा धूलि-धूसरित शरीर से युक्त वे, उमडते हुए शोक से बार-बार
विलाप करने लगी । आपने अपनी पत्नी की जो रूप-रेखा मुझे बताई थी, वह उनकी
रूप-रेखा से सर्वथा मिलती थी, इसलिए मैंने निश्चय किया कि वे ही सीता हैं । फिर,
मैने उनके समीप जाकर प्रणाम किया, उनसे उचित वार्त्तालाप करके आपकी अगूठी उन्हें दी ।
फिर, उनकी चूडामणि लेकर मैं समुद्र लाँघकर यहाँ पहुँच गया हूँ ।" इतना कहकर
हनुमान् ने राम को सीता की चूडामणि दी, जो उनके वियोग की अग्निशिखाओ के प्रतीक
के समान दीप्तिमान् थी ।
राम ने उस शिरोरत्न को बडे अनुराग से लिया और उसे अपने हृदय से लगाकर
थोडी देर तक मूर्च्छित-से हो रहे । फिर, अपने धैर्य को सचित करके वे सँभल गये और
बाष्पपूरित नयनो से वानर-राजा को देखकर बोले—'हे सूर्यनदन, मेरे प्राण-समान देवी
की शिरोमणि को देखकर मेरा हृदय लाख के समान पिघल रहा है । इन्द्र ने यज्ञ से सतुष्ट
होकर यह रत्न मेरे श्वशुर को दिया था । उस गुणनिधि जनक महाराज ने इसे सीता के
सिर में पहनाकर बडे सम्मान के साथ सीता का विवाह मेरे साथ किया । यह रत्न लतागी
सीता से तथा मुझसे कभी अलग नही रहता । आज मेरी तथा सीता की भेंट कराने के हेतु यह रत्न
आया है ।' इस प्रकार कहते हुए राम उस मणि को बार-बार अपने हृदय से लगाने लगे ।
उसके पश्चात् राम हनुमान् को देखकर बोले—'हे पुण्यात्मा, तुम्हारे लौटते समय
सीता ने तुम से क्या कहा था ? सुनाओ ।' तब शक्तिसपन्न हनुमान् राम को देखकर
कहने लगा—"हे देव, उन्होने कहा, 'सूर्यवशतिलक के वियोग में गत दस महीने मैंने असह्य
दुखो को झेलते हुए बिताये हैं । दो महीने के पश्चात् रावण मुझे मार डालने का निश्चय
कर चुका है । इसलिए तुम राम भूपाल से निवेदन करो कि मेरे प्राण अब नही बचेंगे ।
उन्हें सत्यनिष्ठ मानकर ही मेरे पिता ने मेरा पाणिग्रहण उनसे कराया । विवाह-वेदी पर
उन्होने ( मेरे पति ने ) अग्निदेव के समक्ष सदा मेरी रक्षा करने की प्रतिज्ञा की और
मुझे अपने साथ अपने घर ले आये । आज उन्होने मेरी उपेक्षा कर दी और मुझे अनाथ
बना दिया । इस पर विचार करने के लिए प्रभु राम से निवेदन करो । उनसे यह भी
निवेदन करो कि अपनी धर्मपत्नी को कोई चुराकर ले जाय, तो चुपचाप बैठे रहना वीरो
का धर्म नही हैं । औचित्य का विचार करके मैने इन बातो की चर्चा की है । मेरा शरीर
चाहे जहाँ भी रहे, मेरे मन, वचन और कर्म उन्ही में रमण करते रहेंगे ।' इतना कहने के
पश्चात् उन्होने यह भी बताया कि चित्रकूट पर्वत पर, उन पर कौए ने कैसे आक्रमण किया था,
कैसे आपने गैरिक से उनके कपोलो पर सुदर मकराकृति की रचना की थी । (ये
बातें उन्होने इसलिए बताई थी कि ) मेरे वचनो पर आपका विश्वास हो जाय ।"
रामचन्द्र से इतना कहने के पश्चात् हनुमान् ने लक्ष्मण तथा सुग्रीव को भी सीताजी का संदेश सुना
दिया । सभी वानरवीर मन-ही-मन हर्षित हुए ।
यह सुदरकाड ससार में व्याप्त होकर सभी काव्यो में सुदर सिद्ध हुआ है । इसका
विचार करके आन्ध्र-भाषा का सम्राट्, काव्य-आगम आदि के ज्ञाता, आचारवान्, धीर, भूपोप-