रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 258, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें२२८ रंगनाथ रामायण
इतना कहने के पश्चात् हनुमान् ने राम का कद, उनकी अवस्था, उनकी आँखों का
सौंदर्य, कंठ का माधुर्य, मंद हँसी से युक्त मुख की शोभा, नखों की आकृति, उन्नत स्कंधों
की सुंदरता, कसी हुई कमर की मनोज्ञता, विशाल वक्ष की शोभा, कानों का रंग, चलने का
ढंग, नाभि की सुघड़ता, जाँघों की विशालता, करों की लालिमा आदि शरीरके सभी लक्षणों
का वर्णन किया । तत्पश्चात् उसने उनके शौर्य, धैर्य, ब्रह्मचर्य, उनकी शक्ति दाति, संयम
और क्षांति (क्षमा) उनकी भक्ति, युक्ति, और पितृ-भक्ति तथा उनके शील और वर्त्ताव
आदि का वर्णन किया । फिर उस पुण्यात्मा ने लक्ष्मण के रूप का भी वर्णन किया और
तब राम की अंगूठी सीता को दी ।
सीता ने अँगूठी ली और उसे देखकर ऐसी आश्वस्त हुईं, मानो उनके खोये हुए
प्राण लौट आये हों । राम के दर्शनों से भी अधिक उस अँगूठी को देखकर वह रमणी
आनंदित हुई । उन्होंने उसे अपने वक्ष से ऐसे लगाया, मानो उसे अपने हृदय-रूपी सिंहासन
पर बिठा रही हों; उनकी आँखों से आनंद के अश्रु ऐसे बहने लगे, मानो वे उस अँगूठी
को अर्घ्य-पाद्य आदि दे रही हों । वे पुलकित गात्र से उसे देखकर ऐसी मूच्छित हो गईं, मानो
धूप-दीप आदि दिखाने के पश्चात् वे उसके (उस अँगूठी के) सामने साष्टांग प्रणाम कर रही हों ।
कुछ समय के पश्चात् वे सँभल गईं और हनुमान् को देखकर कहने लगीं—
'हे कपिकुलोत्तम, हे राम-कार्य-तत्पर, हे उपकार-निरत, हे लोकोन्नत-चरित्रवान्, हे पवनकुमार,
तुमने मुझे प्राण-दान दिया है । मैं तुम्हारा प्रत्युपकार कर नहीं सकती । काकुत्स्यतिलक
की कृपा से तुम कल्पांत तक जीवित रहो ।' इस प्रकार आशीर्वाद देनेवाली जानकी को
देखकर, महान् पराक्रमी वायुपुत्र ने हाथ जोड़कर कहा—'हे देवी, मैंने आपकी वह कृपा
प्राप्त की है, जो ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र आदि देवताओं के लिए भी दुर्लभ है । मैंने आपके
दर्शन भी कर लिये । मेरे लिए यही क्या कम है ?'
तब सीता अपने प्राणनाथ तथा देवर का कुशल-समाचार पूछती हुई बोलीं—
'हे अनघ, अनुपम बलशाली रघुराम मुझसे विछुड़कर क्या धैर्यके साथ रह रहे हैं? वे तथा
उनके अनुज क्या कभी मेरा स्मरण करते हैं ? क्या वे युद्ध करने के लिए शीघ्र यहाँ
आनेवाले हैं ? तब हनुमान् ने कहा—'हे माता, अपने प्राणनाथ का वृत्तांत सुनिए । जिस
दिन से वे आपसे जुदा हुए हं वे सतत वेदना से पीड़ित रहते हैं, धरती पर सोते हैं,
निद्रा को तो वे जानते ही नहीं । मांसाहार भी उन्होंने छोड़ दिया है । वे सदा दण्डक-
वन में आपके खो जाने की बात सोचते रहते हैं । सिर किंचित् झुका लेते हैं, लंबी सांस
खींचते हैं, आँखों में आँसू भर लेते हैं, मूच्छित हो जाते हैं, धरती पर गिर पड़ते हैं और
चेतना लौटते ही उठकर चारो ओर शून्य दृष्टियों से देखने लगते हैं और व्यथा से पीड़ित
तथा व्याकुल होते हैं । कभी-कभी हाय सीता ! हाय सीता ! कहकर पुकारते हैं । सुमित्रा-
नंदन जब उनकी यह दशा देखते हैं, तब वे भी दुःखी हो जाते हैं । जब वे दोनों आपके
यहाँ रहने का समाचार सुनेंगे, तब तुरंत वहाँ से चल पड़ेंगे । वे मुझसे भी श्रेष्ठ, भयंकर
आकारवाले; अमेय पराक्रमवाले; नग, शृंग, तरु, नख तथा दाँतों को आयुधों के रूप में
प्रयोग करनेवाले; सुग्रीव, नल, अंगद आदि भयंकर वीरों को साथ लेकर, समुद्र को लाँघकर