रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 266, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें२३६ रंगनाथ रामायण
हनुमान् क्रोध से प्रलयकालाग्नि की भाँति भभक उठा और एक ताल-वृक्ष लेकर उससे
उसके रथ के अश्वों को मार डाला । तब वह ( राक्षसकुमार ) पृथ्वी पर खड़े होकर
हनुमान् के भाल पर दस शर ऐसे चलाये कि हनुमान् मूच्छित होकर गिर पड़ा । किंतु वह
शीघ्र ही सँभल गया और अपनी पूँछ से अक्षयकुमार पर ऐसा प्रहार किया कि वह
विचलित हो उठा । तब उसने अपनी गदा को अनिलकुमार के वक्ष पर ऐसा चलाया कि वह
मूच्छित हो गया । किन्तु, शीघ्र ही उसकी चेतना लौट आई और वह अक्षयकुमार पर
झपटकर उसकी गदा छीन ली और उसी को उस पर पूरी शक्ति से चलाया । तब अक्षय-
कुमार ने एक वाण चलाकर उस गदा को रोक लिया और अपने को वचा लिया । फिर,
वह करवाल तथा ढाल लेकर आकाश की ओर उड़ा । वायुपुत्र भी उसके साथ-साथ आकाश
में उड़ा । हनुमान् ने तब अपने शत्रु पर गदा चलाई । लेकिन, अक्षयकुमार ने अपने
खड्ग से उस गदा के दो टुकड़े कर दिये और तुरंत अपने खड्ग से हनुमान् की जाँघों
पर प्रहार किया । उस खड्ग की चोट खाकर वायुनंदन पृथ्वी पर गिर पड़ा । लेकिन,
वह तुरंत ऊपर की ओर उछला और अक्षयकुमार की दोनों टाँगें पकड़कर उसे ऐसे खींच
लिया, जैसे गरुड सर्प को अपने वश में कर लेता है । फिर, उसने अक्षयकुमार को कुम्हार
के चाक के समान बड़े वेग से चारों ओर घुमाकर पृथ्वी पर पटक दिया, तो उसका सारा
प्रताप जाता रहा । उसके सिर का मुकुट छिन्न-भिन्न हो गया और उस मुकुट के सभी
रत्न विखर गये; उसका हृदय-पिंड फट गया, आँतें निकल आईं; मांस-पेशियाँ छिन्न-
भिन्न होकर गिर पड़ीं । आँख की पुतलियाँ कुचल गईं, सारा शरीर विदीर्ण हो गया
और रक्त की धारा उगलते हुए उस राक्षस ने अपने प्राण छोड़ दिये । उसकी वैसी मृत्यु
देखकर इन्द्र आदि देवता आनंद से फूल उठे और वायुपुत्र की प्रशंसा करने लगे । ऐसी
अनुपम विजय को देखकर हनुमान् हर्षध्वनि करने लगा ।
भयभीत होकर भागे हुए राक्षस-सैनिकों ने देवताओं के शत्रु रावण की सभा में
पहुँचकर निवेदन किया—'हे दानवेन्द्र, उस वानराधिप का बाहुबल आश्चर्यजनक है । अशोक-
वन के रक्षक समाप्त हुए, अत्यंत पराक्रमी राक्षस-सैनिक मृत्यु का ग्रास बने, शतजिह्व
नष्ट हो गया, शार्दूलमुख प्राण खो बैठा, पिंगलनेत्र की मृत्यु हुई, स्तनितहास मर गया,
शार्दूलकवल युद्ध में मारा गया, जंबुमाली नष्ट हुआ, वक्रनाम समाप्त हो गया, रक्तरोग
की मृत्यु हो गई, रुधिराक्ष की जीवन-लीला समाप्त हो गई, सेना के साथ शूलदंष्ट्र
कुचल दिया गया, प्रतापी दीर्घजिह्व कट मरा, दुर्मुख का नाम ही शेष रह गया,
दुर्धर मृत्यु को प्राप्त हुआ, प्रघस गिर गया; भासकर्ण चूर-चूर हो गया, उपाक्ष का नाश
हुआ, विरूपाक्ष ने अपने प्राण गँवा दिये, अश्मवक्ष का वध हो गया और अक्षयकुमार
भी मारा गया । हमारी दुर्वार सेना भी नष्ट हो गई । निस्सन्देह उस वानर को इन्द्र
आदि देवता भी युद्ध में परास्त नहीं कर सकेंगे । ऐसा लगता है कि वह प्रलयांतक (रुद्र)
को भी परास्त करने की क्षमता रखता है । सच पूछा जाय, तो वह राक्षसों को निगल
जाने के निमित्त वानर-रूप धारण करके आया हुआ मृत्यु-देवता ही है ।' इन बातों को
सुनकर स्वर्गलोक का शत्रु रावण अक्षयकुमार की मृत्यु के लिए विलाप करने लगा—