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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 508 में से

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पृष्ठ 269

अधिक पराक्रमी तथा बाहु-बल में श्रेष्ठ करोड़ो वीर है । ऐसे बलवान् भी हैं, जो ब्रह्मादि
देवताओ को भी जीत सकते हैं और जो तुम्हारे नाम से ही जलते हैं । ऐसे करोड़ो वीरों
के साथ राम समुद्र को पार करके लका पर आक्रमण करेंगे, हठ तथा क्रोध से राक्षसों
का सहार करने के पश्चात् तुम्हारे सिर काटकर तुम्हारा अंत कर देंगे और सीता को
साथ लेकर वापस जायँगे । यह सत्य हैं । यदि तुम बुद्धिमान् हो और नीति के पथ पर
चलना चाहते हो, तो सुनो । तुम शीघ्र सीताजी को उन्हें सौप दो और उस आश्रित लांक-
रक्षक रघुराम की शरण में जाओ । शत्रुता करने से कोई लाभ नही, इसलिए तुम उसे
(शत्रुता को) तज दो । मृत्यु का शिकार न बनकर अपने प्राणो की रक्षा करो ।”
ऐसे हित वचन कहनेवाले हनुमान् को देखकर क्रोध, गर्व और मात्सर्य से अभिभूत
होकर घनघोर बादलो के समान गरजते हुए दशकंठ ने प्रहस्त को आज्ञा दी—
'यह नीच निर्भय होकर मेरे सामने ऐसे अपशब्द कह रहा है । इस नीच कपि को ले
जाकर, तुरन्त इसका वध कर दो ।' तब विनय-भाषण तथा विवेक-भूषण से संपन्न अनघों
का पोषण करनेवाले, शत्रुओं के लिए भीषण दीखनेवाले विभीषण ने, रावण की आज्ञा
के परिणाम के सबंध में सोच-विचार करके बड़ी नम्रता के साथ रावण से निवेदन किया— 'अपने प्रभु
के द्वारा भेजे गये दूत, सदा कोई-न-कोई ऐसी बात कहते ही है । यह उनका सहज गुण होता है,
इसलिए आप अपना क्रोध शांत कीजिए । इतना ही नही, दूत अवध्य होता है । अत , इस कपिको
मारना उचित नही है । आप अपने हठ और क्रोध राम तथा लक्ष्मण पर दिखाइए । इसे मुक्त कर
दीजिए । यदि आपका क्रोध शांत नही होता हो, तो इसे कोई छोटा दंड देकर भेज दीजिए ।'
२०. लंका-दहन
उसके नीति-वचन सुनकर रावण ने दैत्य-वीरो को देखकर कहा--'कपियो को अपनी
पूँछ बहुत प्रिय होती है, और वह उसका चिह्न भी होता है । इसलिए सब लोगो के
समक्ष तुम इसकी पूँछ जला दो और नगर-मार्ग में घुमाकर इसे छोड़ दो । तब राक्षसो ने
मोटे-मोटे रस्सो से पवनपुत्र के हाथ और पैर बाँध दिये और कहने लगे--'अच्छा हुआ
कि हमारे कितने ही बंधुओ को मारनेवाला यह दुष्ट कीड़ा हमारे हाथो में फँस गया है ।
फिर वे तूर्य-घोष के साथ उसे नगर के मार्ग में घुमाने लगे । तब वायुपुत्र ऐसा बहाना
किये बैठा रहा, मानो वह इन राक्षसो के अत्याचारो से पीड़ित तथा निर्बल बन गया हो
और उन दुष्ट राक्षसो को तथा लका नगर को अपनी कनखियो से देखने लगा । सभी
दानव-वृन्द आबाल-वृद्ध उसके पीछे हँसते हुए और उसका उपहास करते हुए चलने लगे ।
उन दुश्चर्याओ को देखकर सज्जन पुरुष मन-ही-मन दुःखी होते थे । कुछ दानव जिद करके
असंख्य वस्त्र ले आये, उन्हें कालरूपों के आकार में बँटा और तेल में डुबोकर कहने लगे—
'इसने सारा अशोक-वन नष्ट किया है, कितने ही दानव-वीरों का सहार किया है, दानवेश्वर ने
इसको उचित दंड दिया है । चलो, हम इसे 'जला डालें ।' यों कहते हुए उन्होने तेल
में भीगे हुए कपड़े उसकी पूँछ में लपेट दिये और उसमें आग लगा दी । कपड़े आश्चर्य-
जनक ढंग से जलने लगे । ऐसा लगता था, मानो लका में कोई उत्पात-सूचक चिह्न दिखाई
पड़ रहा हो । राक्षस सिंहनाद करते हुए हनुमान् के पीछे-पीछे जाने लगे ।