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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 508 में से

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पृष्ठ 272

२४२ रंगनाथ रामायण
लगा-‘मै भी कैसा मूर्ख हूँ ? इसी माता के आशीर्वाद का फल था कि यह भयङ्कर अग्नि
मेरी पूँछ को जलाने का साहस नहीं कर सकी । भला, अग्नि साध्वी का क्या बिगाड़
सकती है ?’ यों सोचकर उसने अपनी पूँछ समुद्र में ऐसे बुझा दी, मानो वह सीताजी की
दुःखाग्नि को ही बुझा रहा हो । फिर, वह सीता के दर्शनार्थ अशोक-वन में गया । सीता
पहले ही राक्षस-स्त्रियों के मुँह से हनुमान् के कुशल का समाचार सुनकर आनन्द से
गद्गद होकर बैठी थी । हनुमान् ने उन्हें प्रणाम किया, अपने साहसपूर्ण कृत्यों का सारा
वृत्तांत उन्हें कह सुनाया और फिर कहा—‘हे माता, मैं अभी जाकर रामचंद्रजी को साथ
लेकर आता हूँ, जिससे आपके मन का दुःख दूर हो जाय ।’ इतना कहकर उसने सीता को
भक्ति से प्रणाम किया और उनकी आज्ञा लेकर वहाँ से चल पड़ा । वहाँ से चलकर वह
नगर के पश्चिम द्वार के पास आया और उसके किवाड़ों पर इस जोर से पदाघात किया
कि वे टूटकर पृथ्वी पर गिर गये । यह देखकर सभी राक्षस भय-विह्वल हो गये ।

२१. अंगद आदि वानरों से हनुमान् की भेंट

वहाँ से चलकर, फिर एक बार अपना पराक्रम दिखाते हुए, हनुमान् ने साहस के
साथ परकोटे के ऊपर के महलों को अपने पदाघात से गिरा दिया और सहज ही सुवेलाद्रि
पर चढ़ गया । वह आकाश की ओर ऐसा उछला कि लंकापुरी में रहनेवाले समस्त
दैत्य झोका खाकर भयभीत हो उठे, पहाड़ के शिखर भग्न होकर समुद्र में गिरने लगे;
बड़ी-बड़ी चट्टानें लुढ़कने लगीं, दक्षिण दिशा को वहन करनेवाली अगद नामक हथिनी का
शरीर दब गया, पहाड़ों के शृङ्ग गिर गये और पृथ्वी नीचे को धँस गई । फिर, उसने
अपने अनुपम भुजबल की सहायता से आकाश-मार्ग से जाते हुए समुद्र के मध्य भाग में स्थित
मैनाक पर्वत पर उतरकर अपनी थकावट दूर की । फिर, उस पर्वत की आज्ञा लेकर
अपने असमान वेग तथा प्रताप का प्रदर्शन करते हुए समुद्र के उत्तरी किनारे पर
उतर पड़ा ।
हनुमान् के मुख पर स्पष्ट रूप से दीखनेवाले हर्ष के चिह्नों को देखकर अंगद आदि
श्रेष्ठ वानर उसकी अगवानी करने गये और उसे गले से लगा लिया । फिर, वे सब एक
स्थान पर बैठ गये और हनुमान् से उसके कार्य के परिणाम के संबंध में प्रश्न किये ।
तब हनुमान् ने कहा—‘हे वानरो, आपकी कृपा से मैंने अनुपम समुद्र को पार किया,
अगणित वैभवों से संपन्न लंका में प्रवेश किया, और बहुत समय तक अन्वेषण करने के बाद
सीताजी के दर्शन भी कर लिये । फिर, मैंने राम की आज्ञा के अनुसार जानकी से उनका
सारा वृत्तांत कह सुनाया और उनकी दी हुई अंगूठी भी सीताजी को दे दी । फिर, उनकी
चूड़ामणि लेकर यहाँ लौट आया हूँ ।’
हनुमान् की बातें सुनकर सभी वानर अत्यंत हर्षित हुए और हनुमान् की भूरि-भूरि
प्रशंसा करने लगे । तब अत्यधिक उत्साह से भरे हुए श्रेष्ठ वीर अंगद कहने लगा—‘अब
यही उचित होगा कि किसी भी प्रकार हम जानकी को लंका से जीतकर ले आवें और
उन्हें रघुराम के पास पहुँचा दें । चलो, हम अभी समुद्र पार करें और पुत्र, मित्र तथा
परिवार-सहित दशकंठ का वध करके सीताजी को छुड़ा लायें ।’