रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 189, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृथ्वी पर गिरने लगे, मानो जाह्नवी की जल-धारा हो । सीता हाहाकार करती हुई मन-
ही-मन कुढती जाती थी । ऋष्यमूक पर्वत पर सीता ने पाँच बलिष्ठ वानरो को देखा, तो
तुरत अपने वस्त्र का थोडा सा भाग फाडा, उसमें अपने आभूषणो को बाँधा और सोचने
लगी कि कम-से-कम ये मेरे आभूषण राम भूपाल को मेरे हरण का समाचार देंगे, तो
राम के द्वारा दशकंठ का वध शीघ्र होगा । इस प्रकार सोचकर उन्होंने उस पोटली को
उनके बीच गिरा दिया । उन (वानरो) ने उस पोटली को तुरत छिपा दिया ।
दनुजाधिपति (यह सोचकर) भय से व्याकुल हो रहा था कि दशरथात्मज उसका
पीछा करेंगे । इसलिए वह पीछे की ओर देखते हुए, भय-विह्वल होते हुए, शीघ्र ही समुद्र
पार कर गया और लका में जा पहुँचा । उस समय कितने ही मृत्युसूचक अपशकुन दिखाई
पडने लगे । वह लका पहुँचकर अनुपम तथा विविध भोगो का आगार अपने महल में गया
और बडे गर्व के साथ जानकी को अपनी सारी संपत्ति दिखाई ।
२२. जानकी को अशोक-वन में रखना
तत्पश्चात् रावण ने बडे हर्ष से सीता से कहा—'हे कमलोचनी, ये मेरे भवन हैं,
यह मेरा धन है, ये मेरे तुरग हैं, ये मेरे गज हैं । यह वे मेरे दिव्य आभूषण हैं,
जिन्हें मैंने सभी देवताओ को परास्त करके प्राप्त किया था, यह पुष्पक-विमान है, जिसे
मैंने कुबेर को जीतकर प्राप्त किया था, ये चारण, अमर, सिद्ध तथा साधको की पत्नियाँ हैं,
जो अलग-अलग मेरी सेवा करती रहती हैं । ये स्त्रियाँ वे हैं, जो घमंडी होकर मेरी
बात स्वीकार नहीं करने के कारण कारागार में तडप रही हैं । वह देखो, नाट्यशाला है,
वह क्रीडा-वन है, ये चन्द्रशालाएँ हैं । तुम इन सब की स्वामिनी होकर अनुपम गति
से समस्त वैभवो का उपभोग करो ।'
तब सीता एक तृण-खंड को हाथ में लेकर, रावण की उपेक्षा करती हुई कहने
लगी—'अरे मूर्ख, तुम्हारा यह पाप तुम्हें यो ही नहीं छोडेगा । वह भयंकर अग्नि बनकर
तुम्हें दग्ध कर देगा । तुम और तुम्हारे बंधु-बांधव अब बहुत दिनों तक जीवित नहीं
रह सकेंगे । अवश्य ही नष्ट हो जायँगे । यह सत्य है । जबतक राम की बाणाग्नि की राशि
में गिरकर तुम्हारा शरीर जल नहीं जायगा, तबतक तुम्हारे ये पाप कैसे कटेंगे ?' फिर
सीता बार-बार परिताप करती हुई बोली—'तुमने आज मुझे ऐसे कलुषित वाक्य सुनाये,
जिनसे मेरा सारा महत्त्व जाता रहा । मेरे गर्व ने मुझे ऐसा कर दिया, मैं अपने भाग्य
को कैसे रोऊँ ?' यो कहती हुई वह उच्च स्वर में रुदन करने लगी । (यह देखकर)
राक्षस-वल्लभ मन-ही-मन बहुत क्रुद्ध हुआ और त्रिजटा आदि स्त्रियो को बुलाकर उन्हें
सीता को दिखाते हुए कहा—'तुम लोग बडी सावधानी से इसकी रक्षा करती रहो और
मुझसे विवाह कर लेने का उपदेश देती रहो । उचित यत्न के साथ इस रमणी को अशोक-
वन में रखो ।' यो कहकर उसने उन्हें भेज दिया और काम-पीडित मन से व्याकुल रहने लगा ।
२३. श्रीराम का दुःख
माया-मृग का वध करने के पश्चात् राम ने और एक हिरन का वध किया और
उसके मांस तथा चर्म को लेकर बड़े हर्ष से लौट रहे थे । सियारो का चिल्लाना सुनकर,