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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 191, कुल 508 में से

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पृष्ठ 191

अरण्यकाण्ड १६१
आँखो से अश्रु ऐसे बहने लगे, मानो शोक-रस ही प्रवाहित हो रहा है। वे अपने सूखे
ओठो को आर्द्र करते हुए भग्न हृदय से अपने अनुज को देखकर बोले--'हे लक्ष्मण मैने
अच्छी तरह देख लिया, पर्णशाला में कही भी भूमिसुता का पता नही है। कदाचित्
पुष्प-चयन के लिए गई हो अथवा हमें ढूँढ़ती हुई किसी दूसरे मार्ग से चली गई हो।
पता नही, सरोवर में जल-क्रीडा करने गई हो या अत्यत भयभीत हो कही सतप्त हो रही हो,
निकट पहुँचनेवाले वाघो के भय से कही छिप गई हो अथवा क्रोध से कही अकेली
चली गई हो। मुझे तो कुछ भी मालूम नही हो रहा है कि वह कहाँ गई, जो भी
हो यहाँ तो नही है।'
इस प्रकार तर्क-वितर्क करते हुए उन्होने पर्णशाला के भीतर प्रवेश करके सब स्थानो
में ढूँढ़ा। किन्तु कही भी जानकी को न पाकर उनका मन अत्यधिक सतप्त होने लगा,
शरीर निश्चेष्ट हो गया, ज्ञान-रूपी रवि-शोक-समुद्र में अस्त होने से भ्रान्ति-रूपी अधकार ने
व्याप्त होकर उनके अंतरग तथा नेत्रो को ढक लिया, धैर्य को आवृत कर लिया और
अभिमान को घेर लिया। वे व्याकुल होकर भूमि पर लोट गये। उन्होने यह भी नही
सोचा कि मै पहले ही सीता के (वनवास) दुख से चिंतित हूँ, अब मुझे यह दुख भी
सहना पडा। यह दुख मुझे कैसे प्राप्त हुआ ? कैसे मै इस दुख को पार करूँगा ? हम
क्यो इस वन में आये ? अब मै इससे (लक्ष्मण से) क्या वात कर सकता हूँ ? मै इसका
अग्रज हूँ, यह मेरा अनुज है, हम दोनो इस दुख का भार कैसे वहन करेंगे ?'
इन बातो का विचार किये बिना वे मन-ही-मन क्षुब्ध होकर मदन-पीडित उन्मत्त की
तरह चारो ओर निरुद्देश्य दृष्टि से देखते हुए, अपने महत्त्व को भी भूलकर प्रलाप करने लगे।
वे कभी चिल्लाते—'हे तनुमध्ये (पतली कमरवाली) । इतनी देर तक तुम कहाँ हो ?
शीघ्र आओ।' फिर ऐसी चेष्टाएँ करते, मानो वे आ गई हो और उनका आलिंगन
कर रहे हो। तुरन्त दुखी होते, फिर धीरे-धीरे उनको साल्वना देते। थोडी देर में जब
किंचित् चेतना लौट आती तो कहते--'हाय सौमित्र, अवनिसुता न जाने कहाँ चली गई ?
क्या हो गया उसे, उसके पद-चिह्नो के अनुसार चलकर ढूँढ़ने पर भी वह दिखाई नही
देती, वह पर्णशाला में भी नही है। वह कमललोचनी न जाने किस दिशा में गई है ?
क्या यह दण्डकवन नही है ? क्या यह (हमारा) निवास-स्थान नही है ? क्या यह (हमारी)
पर्णशाला नही है ? क्या मै राम नही हूँ ? तब तो उस चचलाक्षी से विछुडकर मेरे प्राण
अभी क्यो टिके हुए हैं ? उसके वियोग-दुख से यदि मै प्राणो का मोह त्यागकर मर जाऊँ,
तो महाराज दशरथ तो यही सोचेंगे कि यह कैसा पुत्र है, जो व्रत को पूर्ण किये बिना ही
चला आया है ? ऐसी दशा में क्या वे मेरा आदर करेंगे ? ऐसा नही करके यदि मै
व्रत को पूर्ण करके, राज्य करने के लिए राजधानी को लौट जाऊँ और मिथिलेश्वर वहाँ
आयें तो, उन्हें देखकर क्या मै लज्जित नही होऊँगा ? इसलिए तुम मुझे इस कानन में
ही छोडकर राजधानी को लौट जाओ और भरत से कहो कि वह अपनी इच्छा से समस्त
पृथ्वी का शासन करे और माता कैकेयी, सुमित्रा तथा कौशल्या को जानकी के खो जाने
का तथा मेरा समाचार कहो। मेरी बात मानो।'
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