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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 508 में से

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पृष्ठ 188

१५८ रंगनाथ रामायण
तेरे बंधुजनों तथा तेरी लंका को भस्मीभूत कर देंगी। जान-बूझकर क्यों विष पी रहा है ?
क्रोधी सर्प के ऊपर पैर क्यों रखता है ? साठ सहस्र वर्ष की आयुवाले मुझे जानता है
या नहीं ? मैं जटायू हूँ । इस पुण्य साध्वी को मुझे सौंपकर चला जा, अन्यथा मैं तेरा वध
कर दूँगा, अपनी चोंच से तेरे धनुष के टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा और वर्म तथा मर्म को
भेदकर तेरे प्राण ले लूँगा और साथ ही जानकी को मुक्त करूँगा।'
तब उस भयंकर राक्षसश्रेष्ठ ने अपना रथ रोका, क्रोधोन्मत्त हो धनुष की टकार की
और लक्ष्य साधकर जटायु पर घोर अस्त्र चलाये। किन्तु उस वीर विहग ने रुष्ट
होकर उसके बाणों को तोड़ दिया और अपने पक्षों से उसके वक्ष पर आघात किया, ललाट
पर चोंच मारी, कंधों पर पद-प्रहार किया और अपने तेज नखों से उसे अत्यधिक पीड़ा
पहुँचाई। तब उस राक्षसकुलेश्वर ने उस खगराज के पक्षों का लक्ष्य करके दस उग्र
बाण चलाये। जटायु ने अपनी चोंच से रावण के धनुष के टुकड़े-टुकड़े कर दिये, उसकी
ध्वजाओं को नीचे गिराकर उसके मुकुट को भी पृथ्वी पर गिरा दिया, सारथी से जूझकर उसका
पेट चीर दिया, आगे बढ़कर उस राक्षस के रथ के अश्वों को मार डाला और अत्यधिक
क्रोध से उसके रथ को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। तब राक्षसराज कंपित होकर पृथ्वी पर
गिरकर फिर उठा और धरणिजा (सीता) को उठाये हुए अपनी माया की शक्ति से आकाश
में और भी ऊँचा उड़ गया। उसे जाते हुए देखकर जटायु ने उसको रोका और
आकाश-मार्ग में महान् वेग से उस पर आक्रमण किया और कहने लगा—'हे पापी, तू
लुक-छिपकर भले ही किसी भी लोक में चला जा, मैं तुझे तिनके की तरह पकड़कर तेरा
वध कर दूंगा।'
तब अत्यंत रोष से दैत्यराज ने अति भयङ्कर मुद्गर उस पर फेंका। जटायु ने
उसे अपनी चोंच से तोड़ दिया और उसके सिर पर चलते हुए उसे कुचल-सा दिया और
उसके सर के केशों को चुनने लगा। रावण ने क्रोध से, बिना भय या संकोच के, उस पक्षीराज
को दृढ़ता से पकड़कर नीचे अपने सामने रखा, और अपनी भयंकर शक्ति को प्रकट करते हुए
अपनी मुष्टियों के प्रहार से उसे पीड़ित करने लगा। दनुजेन्द्र और विहगेन्द्र के बीच
के उस युद्ध को देख देवता आश्चर्यचकित हुए। तब रावण अपने अद्वितीय पराक्रम को
प्रकट करते हुए अपने अति भयंकर खड्ग को खींचकर जटायु के पंखों और पैरों को
काट दिया। तुरत खगपति धरती पर गिर पड़ा।
उसे इस प्रकार गिरते देख वैदेही दुःखी हो किसी वृक्ष के नीचे खड़ी होकर राम का
नाम ले-लेकर विलाप करने लगी। रावण उस परम पतिव्रता को उठाकर बड़े हर्ष से
आकाश के मार्ग से अत्यंत शीघ्र जाने लगा। ब्रह्मादि देवता तथा मुनि आपस में यह कह-
कर हर्षित होने लगे कि अब दशकंठ अवश्य ही राम के हाथों मारा जायगा और हमारे
मनोरथ सफल होंगे।
आकाश-मार्ग से जब रावण अत्यधिक वेग से जाने लगा, तब सीता के चरण का
नूपुर इस प्रकार पृथ्वी पर गिरा, मानो मुरवैरी के लिए उत्पात की सूचना देनेवाली
उल्का हो। उस रमणी के कुचों पर विहार करनेवाले हार टूटकर इस प्रकार जहाँ-तहाँ