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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 508 में से

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पृष्ठ 200

पुत्र का पक्ष लेकर अमृत से सींचकर इस वृक्ष को वर्द्धित किया हो । सूर्य के साथ प्रेम
बढाने के निमित्त इस वृक्ष ने आठो दिशाओ में अपनी उन्नत शाखाओ को फैलाया है ।
इच्छित फल प्रदान करने के निमित्त मानो इसने अपनी शाखाओ की कांति चारो ओर फैला
रखी है । यह अपने पत्तो को फैलाकर, उसकी कान्ति को विकीर्ण करते हुए, सूर्य की रश्मि
भी नीचे आने नही देता; रात्रि के समय यह शशि के प्रेम से अनुरक्त हो उनकी चाँदनी
को पृथ्वी पर पडने नही देता । इसके फल अमृत-फलो की अपेक्षा सौगुने अधिक स्वादिष्ट हैं ।
ऐसा लगता है कि देवताओ ने इस पृथ्वी के वृक्षो के राजा के रूप में इसका अभिषेक
कर दिया है ।
लक्ष्मण ने अपने अग्रज के चित्त का भाव जानकर उनके कथन का अनुमोदन किया
और उनके लिए पत्रो की मृदु शय्या का प्रबंध किया । तब राम ने उस शय्या पर शयन
किया, तो लक्ष्मण रघुराम के चरण दबाने लगे । इस प्रकार अत्यंत शोभा-समन्वित हो उनके वहाँ
रहते हुए कुछ समय व्यतीत हुआ । तब अनघ रघुराम को सबोधित करके लक्ष्मण ऊँचे
स्वर में बोले- 'हे देव, अभी-अभी छिपकली की बोली मुझे सुनाई पडी है कि आप युद्ध में
शत्रु-सेना को जीतकर अवश्य अपनी देवी को प्राप्त करेंगे । सर्वत्र आपकी विजय ही होगी ।'
तब राम ने कहा- 'अब वानरेश्वर बडी श्रद्धा के साथ यहाँ आकर हम से मिलेगा
और हम शीघ्र ही लका जायेंगे । युद्ध में रावण मरेगा और सीता हमें मिल जायगी और
उसके पश्चात् मै राज्य-भार ग्रहण करूँगा ।' इस प्रकार राम के कहने के पश्चात् राम तथा
लक्ष्मण बडी प्रसन्नता से वहाँ रहने लगे ।
आन्ध्र-भाषा के सम्राट्, श्रेष्ठ काव्य तथा आगम आदि के ज्ञाता, आचारवान्, अपार
धैर्य-सागर, भूलोक-निधि गोन बुद्ध राजा ने अपने पिता महनीय गुणसपन्न, मेरु पर्वत के
समान धीर, विट्ठल राजा के नाम पर, आचद्रार्क पृथ्वी पर स्थायी रहनेवाली, असमान
तथा ललित शब्द तथा अर्थों से विलसित रामायण के, अलकार तथा भावो से भरे अरण्य-
काण्ड की रचना इस प्रकार की कि वह इस पृथ्वी पर आचद्रार्क लोगो की प्रशसा प्राप्त
करती रहे । रसिकजनो को सतत आनद देनेवाले, श्रेष्ठ, आर्ष, आदि काव्य-रूपी इस पुण्य
चरित को जो पढेंगे, या सुनेंगे, उन्हें सामादि वेद-समूहो का आधार, रामनाम-रूपी चिंता-
मणि, नव-भोग, परहित-वृद्धि, उन्नत विचार, परिपूर्ण शक्ति, राज्य-सुख, निर्मल कीर्त्ति,
नित्य सुख, धर्म में निष्ठा, दान में आसक्ति, चिरायु, आरोग्य तथा ऐश्वर्य सतत संप्राप्त
होंगे । इसे सुनते रहने से पाप-क्षय, पुत्र-प्राप्ति, शत्रुओ का नाश, धन-धान्य की समृद्धि,
विघ्न-बाधारहित सुन्दर स्त्रियो के साथ जीवन और पुत्रो के साथ सहजीवन सिद्ध होगे ।
सब विपत्तियाँ दूर होंगी, बंधु-बांधवों का सहवास रहेगा, अभिलषित वस्तुओ का वियोग
न होगा, (घरो में) देवता-तर्पण तथा पितरो की तृप्ति होती रहेगी । इस पुण्य चरित
के लिखनेवालों को श्रेष्ठ तथा शुभ उन्नति तथा इद्रलोक का निवास प्राप्त होगा । जब-
तक कुलपर्वत, नक्षत्र, रवि तथा चद्र, दिशाएँ, वेद, पृथ्वी तथा समस्त लोक स्थित रहेंगे,
तबतक यह कथा अक्षय आनंद-समूह का आधार रहेगी ।
ः अरण्यकांड समाप्त ः