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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 197

मुनि का अपकार करके मैंने यह भयकर रूप प्राप्त किया । फिर मेरे प्रार्थना करने पर
उस मुनि ने कहा कि आपके द्वारा मेरी शाप-मुक्ति होगी । मैने उस वचन को स्मरण
रखा और इस रूप को धारण करके इन्द्र को युद्ध के लिए न्योता दिया । उसने अपने
वज्र के प्रहार से कठ-सहित मेरे सिर को मेरे पेट में दवा दिया ।”
तब रामचंद्र ने उससे पूछा, 'हे अनघ ! क्या तुम रावण की शक्ति के बारे में
जानते हो ?' तब उसने कहा—'मै तो जानता हूँ, लेकिन मुनींद्र के शाप के कारण मेरा
ज्ञान कुंठित हो गया । आप मेरे शरीर को अग्नि में जलाइए, तो उसके पश्चात् मै सब
कुछ आपको सुना सकता हूँ ।'
उन्होंने अपने धनुष की सहायता से ही उसके शरीर का अग्नि-सस्कार किया ।
तब वह देवता का रूप धारण करके आकाश-मार्ग में एक सुन्दर विमान पर बैठे हुए इस
प्रकार कहने लगा—"हे रघुराम, हे युद्धप्रवीण, हे करुणानिलय, हे गंभीर, हे काकुत्स्थ-
श्रेष्ठ, आपकी करुणा-पूरित दृष्टि के प्रताप से मैने अपनी पूर्व दशा प्राप्त की है। मै अब
आपसे रावण के सबंध में स्पष्ट रूप से कहूँगा, सुनिए—'रावण कुबेर का भाई है ।
पुलस्त्य ब्रह्मा का प्रिय पोता है । उसने अपनी तपस्या की महिमा से ब्रह्मा को प्रसन्न
करके श्रेष्ठ वरदान तथा औन्नत्य प्राप्त किया है । उसने दिग्विजय किया है । वह दानवो
का स्वामी, देवो का शत्रु, दस बड़े शिरोवाला, बीस भुजाओवाला, लवण-सागर से परि-
वृत, लकापुर का राजा है । उसने गर्व से रजत-पर्वत को भी उखाड दिया था ।” इतना
कहकर उसने वह मार्ग भी बताया जिससे होकर रावण सीता को ले गया था, उस मार्ग
के चिह्न बताये और रास्ते में पड़नेवाली सभी वस्तुओ के नाम बताये । उसने यह भी
कहा कि पपा के आस-पास श्रेष्ठ ज्ञानी मतंग मुनि का आश्रम है, उनकी शिष्या शबरी
आपका आदर-सत्कार करेगी । उस स्त्री के निवास के पास यदि आप जायें, तो सूर्यपुत्र से
आपकी मित्रता होगी, जिसकी सहायता से आप जानकी को प्राप्त कर सकेंगे और निदान
साम्राज्य का लाभ भी करेंगे । इस प्रकार कहकर वह स्वर्ग चला गया ।
२७. राम-लक्ष्मण की शबरी से भेंट
दूसरे दिन मनुवश-तिलक वहाँ से निकले और पपा सरोवर के पश्चिंम भाग में
स्थित तरु-लता-समूह से विलसित, प्रबल पुण्यो का आवास, शबरी के आश्रम-स्थल में पहुँचे ।
शबरी उनके स्वागतार्थ सामने आई और बड़ी भक्ति के साथ रामचंद्र के चरणो
पर गिरकर साष्टांग प्रणाम किया । उसके पश्चात् वह श्रीरामचंद्र की स्तुति यो करने
लगी—'हे दशरथ के वरपुत्र, ताडकाविजयी, कौशिक के यज्ञ के रक्षक, मुनियो के ध्येय,
ताडका के पुत्रो को दड देनेवाले, परम पवित्र गगानदी के तट पर पैदल चलनेवाले, निर्मल
पद-रजवाले, अहल्या के उद्धारक, हर के प्रचंड तथा विशाल कोदंड को भग करनेवाले,
भयंकर भार्गव राम का गर्व तोडनेवाले, अभिराम नामवाले, पितृ-वचन का पालन करने-
वाले, सत्कीर्त्तिवाले, विराध के कुकर्मों को रोकनेवाले, सफल मुनित्राता, सत्यसपन्न, खर-
दूषणादि राक्षसो का शिरच्छेदून करनेवाले, मरणार्थी मारीच का वध करनेवाले, सीता-वियोग-
जनित मोह से अभिभूत होनेवाले, खगेन्द्र को मोक्ष प्रदान करनेवाले, महान् विक्रम के