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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 193, कुल 508 में से

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पृष्ठ 193

हे पिकवयनी, तुम्हारे सग रहने पर मै अपने को स्वर्ण-महलो में रहनेवाले के समान ही
समझता था । हे सुदरी, मै तुम्हारे सहवास में अपने को समस्त भोगो को प्राप्त करता
हुआ-सा अनुभव करता था । तुम्हारे साथ रहते हुए सब प्रकार के सुख-भोगो को भोगता
हुआ-सा मानता था । आज ही मुझे ज्ञात हो रहा है कि यह महाकानन है, यह पर्ण-
शाला है, यह तपस्या है, यह दुखमय जीवन है । हे राजकुमारी, हे मृगनयनी, हे कमलाक्षी,
हे लतागी, मै कैसे सतप्त हो रहा हूँ । फिर भी तुम सहानुभूति का एक शब्द भी नही
कहती हो ? आज दैव ने तुम्हारे मद गमन की शोभा हंसो को, ललित चरणो की कान्ति
प्रवालो को, उन्नत कुचो की शोभा चक्रवालो को, करो का अरुण राग पद्मो को,
तन की कान्ति नये जलद की बिजली को, आंखो का वैभव मछलियो को,
शीतल मुख की शोभा चद्र को, उज्ज्वल हँसी चद्रिका को, मधुर भाषण तोते को,
केशो की कान्ति भ्रमरो को, कटि की कृशता आकाश को, देकर तुम्हें निगल लिया है ।
हे वामलोचनी ! हे पद्मगंधी ! हे कमलमुखी ! हे सीते !" कहते हुए दुख-विवश हो
राम भूपाल अत्यधिक व्याकुल हुए । उसके पश्चात् अत्यत दीन होकर वे अपने अनुज को
देखकर बोले- 'हे लक्ष्मण, वह इदीवराक्षी न जाने किस ओर गई है । क्या हम उसे
खोजते हुए चलें ? वह इन लता-समूहो में न जाने कहाँ लीन हो गई है, क्या हम उसे
पुकारें ? वह पृथ्वी की कुमारी न जाने किन पेडों की आड में छिप गई है, क्या हम
चलकर देखें ? वह शुक- जुवाणी न जाने किन सरोवरों में (स्नान करने) गई है, क्या
हम उसका पता लगाने जायें ?' इस प्रकार बार-बार अत्यत दीनालाप करते हुए,
मन-ही-मन खिन्न होते हुए वे असह्य वेदना से पीडित होने लगे ।
(तत्पश्चात्) वे गौतमी के किनारे पहुँचे और उसे सबोधित करके कहने लगे-
'हे लोकपावनी, हे लोकमाता, लोकपावनी सीता का पता क्या आप जानती हैं ? हे लोक-
वधु, हे कर्मसाक्षी (सूर्य), क्या आप जानते है कि सीता कहाँ है ? हे जगत्प्राण, हे सब
स्थानो में सचार करनेवाले (पवन) क्या आप भी नही जानते कि सीता कहाँ है ? हे
लताकुमारी, क्या तुम नही जानती कि वह लतागी कहाँ है ? हे जलज, क्या तुमने उस
जलजातगधी को नही देखा ? हे सिंह, क्या, तुमने उस सिंहमध्या (क्षीण कटिवाली) को
नही देखा ? हे गजराज, क्या तुमने उस गजगामिनी को नही देखा ? हे हरिण, क्या
तुमने उस हरिणाक्षी को नही देखा ? हे पिक, क्या तुमने उस पिकवयनी को नही देखा ?
हे भ्रमर, क्या तुमने उस नीलवेणी को नही देखा ? हे तिलकवृक्ष, क्या तुमने उस तिलक
से अलकृत मुखवाली को नही देखा ?' इस प्रकार भ्रान्त हो, राघव जहाँ-तहाँ जाकर सीता
को ढूंढने लगे, पर कही भी वैदेही का पता न मिलने से, विरहाकुल तथा विवश होकर
रह गये ।
२४. लक्ष्मण का राम को सांत्वना देना
ऐसे दुःखी होनेवाले अपने भाई को देखकर लक्ष्मण ने उनसे कहा- 'हे भाई, आप
समस्त लोको के लिए आराध्य है, उदात्त चित्तवाले है, महान् बलशाली हैं, अपनी स्त्री
के लिए इस प्रकार आप शोक करें, यह उचित नही । हे सूर्यवशाधिप, इस प्रकार का मोह