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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 508 में से

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पृष्ठ 206

१७६ रंगनाथ रामायण
आप ही शरण हैं । आपकी दृष्टि ने मेरा स्पर्श किया । मे विभूषित हुआ । मे कृतार्थ
हुआ । धन्य हुआ । मे आपका प्रिय सेवक हूँ । मेरा नाम हनुमान् है; मे वायु-पुत्र हूँ,
और सूर्य-पुत्र का मंत्री हूँ । अञ्जना-सुत हूँ । मैं भय तजकर भिक्षुक के रूप में आपके विषय
में जानने के लिए आपके पास आया हूँ । आप सुनिए । यशस्वी सुग्रीव वानरों के राजा हैं ।
और परम बलवान् है । वे सूर्य-पुत्र है और सूर्य-सम तेजस्वी है, वे अभिमानी तथा असमान
पराक्रमी है । अपने भाई वालि के द्वारा अपना सारा राज्य खोकर, अत्यंत व्याकुल हो,
वे इस पर्वत पर रहते हैं । वे दुखी है और आपके सखा बनकर रहने योग्य है ।'
इस प्रकार कहकर उसने हाथ जोड़कर राम-लक्ष्मण को प्रणाम किया और बड़ी
भक्ति के साथ आगे कहा—'हे महात्माओ ! इस पृथ्वी के इन्द्र तथा उपेन्द्र के समान,
अश्विनीकुमारों के समान, रवि-चन्द्रों के समान मनोहर रूप, उन्नत स्कंध, चंद्र के समान मंद
हास से युक्त मुख, कमल-दलों को भी परास्त करनेवाले नेत्र, स्वर्ग के निवासियों की भी
प्रशंसा प्राप्त करने योग्य वाहुवलवाले, दुर्लभ राजचिह्नो से सुशोभित, धनुप धारण करनेवाले, आपने
यह मुनिवेश क्यों धारण किया है ? आप कौन हैं ? यहाँ क्यों आये हैं ?'
इस प्रकार के सुधा-मधुर वाक्यों से अत्यंत नम्र होकर जब हनुमान् ने उनसे प्रश्न
किया, तब राम उसकी वाक्-पटुता, बुद्धि-चातुरी, आकृति, मन की प्रीति तथा नीति से प्रसन्न
होकर अपने भाई से बोले—'हे लक्ष्मण, ऐसे वचन कहना ब्रह्मा के लिए या उनकी पत्नी
के लिए ही संभव है, अन्यों के लिए नहीं । कदाचित् यह (वानर) व्याकरण, निगम,
शास्त्रादि का ज्ञाता है । इसके संभाषण तथा रूप अतुल शुभ लक्षणों से समन्वित हैं ।
ऐसा दूत यदि हमें मिल जाय, तो हमारे सभी कार्य सफल होने में कोई संदेह नहीं रहेगा ।
इसलिए तुम इसे मेरे सभी कार्यों का विवरण क्रमशः सुना दो ।'
तब रामानुज ने अत्यंत प्रसन्न होकर हनुमान् को संबोधित करके कहा—'हे अनघ,
हम इक्ष्वाकु-वंश में उत्पन्न दोनों भाई हैं । ये मेरे भाई राम हैं और मैं लक्ष्मण हूँ ।
हम दोनों महाराज दशरथ के पुत्र हैं । राजा दशरथ की आज्ञा से तपस्वियों का-सा जीवन
व्यतीत कर रहे हैं । दुर्मति रावण हमें धोखा देकर राम की स्त्री, भूमिसुता को ले गया है ।
उसके मार्ग का अन्वेषण करते हुए हम वन में फिर रहे थे तो एक स्थान पर शबरी ने
हमें सुग्रीव का समाचार सुनाया था । वह महाबली हमारा मित्र बन जाय, ऐसी कामना
करके हम यहाँ आये हैं । अब तुम हमें स्पष्ट रूप से बताओ कि तुम कौन हो और
तुम्हारा क्या परिचय है ?'
३. हनुमान् का अपने जन्म का वृत्तांत सुनाना
तब हनुमान् ने उन रघुवंशियों को प्रणाम करके निवेदन किया—"हे महात्माओ,
अपनी प्रिय माता के गर्भ से जन्म लेने के कुछ वर्षों के पश्चात् मैंने किसी उद्देश्य से ब्रह्मा
की तपस्या की थी । तब मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर सरसिजभव ने मुझे दर्शन दिये और
बोले—'कोई इच्छा हो तो कहो ।' तब मैंने उनकी परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम किया,
सहस्रों प्रकार से उनकी स्तुति की और फिर कहा—'हे विमलात्मा, इस पृथ्वी पर मेरे
मोक्ष तथा इच्छित कार्यों की सिद्धि का आधार तथा मेरा आराध्य कौन है ? मैं किसकी