रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 194, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें१६४ रंगनाथ रामायण
तथा शोक आपको क्यो ? यह संसार तो तमोगुण से आवृत है । आप यदि धनुष अपने
हाथ में लें, तो देवता भी आपको देखकर दूर जायेंगे । हे अखिलेग, आप अद्वितीय शक्ति-
शाली हैं । मेरे जैसा व्यक्ति आपका सेवक है । आपके लिए असाध्य क्या हो सकता है ?
आप अपने महत्त्व का विचार क्यो नही करते ?'
तब राम ने अपने आपको सँभाल, शोक तज दिया और अपने भाई को देखकर
बोले—'अब मै जानकी का वियोग किसी भी प्रकार सहन नही कर सकता । मैं अपने
दुर्वार बाणो के सतत प्रयोग से सारी पृथ्वी को चीरकर, पातालवासियो को पीडित करके,
चंद्रमुखी सीता को प्राप्त करूँगा या सप्त समुद्रो को आलोडित करके भूधरो को चूर-
चूर करके, दिग्गजो के कुंभ-स्थलों को फाडकर भूमिसुता को प्राप्त करूँगा । या सभी दिक्-
पालों के हृदयो को चीरकर, सूर्यविम्ब को तोडकर, नक्षत्रो को चूर-चूर करके सारी
पृथ्वी को अधकार में डुबोकर अपनी स्त्री को प्राप्त करूँगा-या अपने दिव्यास्त्रो का
प्रयोग करके सभी राक्षसो को भस्म कर दूँगा, पृथ्वी को राक्षस-रहित कर दूँगा और
वैदेही को साध लूँगा (प्राप्त कर लूँगा) । या समस्त ब्रह्मलोक को छानकर, आदि ब्रह्मा
का सहार करके, सभी प्राणियो में भय उत्पन्न करके, अपने पराक्रम से अपनी स्त्री को
प्राप्त करूँगा । यदि मै अपने बाहुवल का प्रदर्शन नही करूँ, तो क्या, यो ही सुरगण सीता
का पता बतायेंगे ? यह देखो, सभी भुवनो को कँपाती हुई मेरे बाणो की अग्नि-ज्वाला
दीप्त हो रही है । लो, सीता को देखो, मै अभी सीता को ऐसे प्राप्त करूँगा कि सभी
देवता मेरी प्रशसा करने लगेंगे ।'
इस प्रकार कहते हुए उनकी भौंहें ऐसी तन गईं, मानो वे सभी लोको के लिए
उत्पात की सूचना दे रही हो । सभी जीवो के साथ समस्त ब्रह्माण्ड को चूर-चूर करनेवाला
मकर्षण रूप उन्होने धारण किया और प्रलयकाल के रुद्र की भाँति क्रुद्ध होकर धनुष
हाथ में ले लिया । तभी सभी जीव भयभीत हुए, सारी पृथ्वी थरथराने लगी, सभी लोक
व्याकुल हुए, आकाश हिलने लगा, ब्रह्माण्ड मानो टूटने लगा, ब्रह्मा का मत्र मिट गया,
रवि पथ-भ्रष्ट हो गया; नक्षत्र टूटने लगे, शिव भी भयभीत हुए और यक्ष, देव तथा
असुर विचलित हुए ।
तब लक्ष्मण राम के निकट पहुँचकर अत्यधिक भय से, हाथ जोडकर बोले—
'हे प्रभो, आप करुणानिधि हैं; लोक रक्षण-कला में प्रवीण हैं । जनकजा के लिए सभी लोको
का समूल नाश कर देना, क्या आपके लिए उचित है ? एक-एक वन में, सभी समुद्रो में,
जनाकीर्ण नगरों में तथा समस्त देशो में वैदेही को बिना थके ढूँढन के उपरान्त
भी यदि वे नहीं मिली, तब आप अपने क्रोध तथा पराक्रम से उनको प्राप्त कर
सकते हैं ।'
इस प्रकार लक्ष्मण के कहने पर राम ने उनकी बातें बडे स्नेह से मान ली, क्रोध
तजा और धनुष को रख दिया । उनके पश्चात् अखिलेग राम अपने अनुज के साथ दक्षिण
दिशा की ओर चल पड़े । उस समय मार्ग में जहाँ-तहां मीता की वेणी से गिरे हुए फूल,
उस तन्वी के वक्षोजों पर विलसित हारों के रत्न, उनके मणिमय चरण-नूपुर पृथ्वी पर