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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 508 में से

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पृष्ठ 192

१६२ रंगनाथ रामायण
इस प्रकार कहते हुए राघव ने अपनी आँखें ऐसे वद कर ली, मानो वे इस समाचार
को मन से वाहर जाने नही देना चाहते थे कि सीता पर्णशाला से अदृश्य हो गई हैं ।
तब लक्ष्मण सारी स्थिति देखकर अत्यधिक शोक से विलाप करने लगे—'मैं अब
किस माता की सेवा करूँगा ? किस माता की आज्ञा का पालन करूँगा ? किसे मैं अपनी
माता के समान मानूँगा ? सूर्यवंश-तिलक के शोक को कैसे शान्त करूँगा ? सभी माताओ
तथा भाइयो के लिए, इनके साथ का जीवन ही जीवन है (ये यदि न रहें, तो दूसरे कैसे
रह सकेंगे) । हाय ! अब तो मनुवंश का ही अंत हो गया ।'
इतने में राम की चेतना लौट आई । उन्होंने उमड़ते हुए शोक से दण्डकवन के
चारो ओर एक वार दृष्टि दौड़ाई, और आँखो में आँसू भर लिये । सीता का स्मरण
करते ही उनका दुःख दुगुना हो गया, धैर्य के छूट जाने से मन और भी शोकाकुल हुआ।
वे बोले—"हाय सीता, तुम चली गईं । तुम अपने शरीर को मेरे इस शरीर से अलग
करके इसे यहीं छोड़कर चली गईं ? सुर तथा असुरो के लिए पूजनीय है, इसका भी
विचार नहीं करके मैंने तुम्हारे लिए शिव-धनुष को भंग कर दिया था । परशुराम ब्राह्मण हैं
इसका भी विचार नहीं करके मैंने उन्हें शत्रु समझकर उनका गर्व भग किया था ।
हे कमलाक्षी, तुम्हारे लिए मैंने इन दोनो निंदाओ को अपने ऊपर ले लिया है । अत मैं
क्रूर दैव ने तुम्हें मुझसे अलग किया है । मैं तो केवल निंदा प्राप्त करने के लिए
रह गया । तुम्हारे मन की अभिलापा देखकर, उसे पूर्ण करके तुम्हें आनन्दित करने के लिए
मैं गया, उस माया-मृग का वध करके उसका चर्म लाया हूँ । अब मैं प्रेम से वह (चर्म)
किसको दूँ ? सब सुखो को भुलाकर, मेरा विश्वास करके मेरे साथ वन में आई हुई
तुम्हारी रक्षा मैं नही कर सका । तुम्हारे जाने का मार्ग जानकर, तुमसे शीघ्र आकर मिल
न सका । समस्त जगत् का गासन करने की महान् शक्ति रखनेवाले के समान शर-चाप
धारण करके इस घोर वन में रहने आया और मूर्ख मति से अपने पूर्वजो की महत्ता को
भी भुलाकर, आज तुम्हें खो बैठा हूँ । हे मृगलोचनी, तुमसे बिछुड़कर मैं इस शरीर में
अपने प्राण कैसे रोक सकूँगा ? हे भूमिसुते ! इस भूमि को छोड़कर मैं और किस स्थान
पर इस शरीर को धारण कर सकूँगा ? हे सुंदरी, तुम्हारी विरहाग्नि तुम्हारे सौंदर्य-सागर
में डूबे विना बुझेगी नही । तुम्हारे शरीर-रूपी नौका के बिना, इस शोक-समुद्र को कैसे
तर सकूँगा ? तुम्हारे कुचो की आड के विना मैं कामदेव की शर-वृष्टि को कैसे सह सकूँगा ?
भगवान् मुझे उस तरफ ले गया और तुम्हें इस तरफ । हम दोनों को अलग करनेवाले
भगवान् के लिए क्या असंभव है ? हे कोमलागी, तुम्हें उठाकर ले जाते समय; तुमने
क्या कहकर विलाप किया था ? तुमने मुझे क्या कहा था ? तुम किस देश में चली गई हो ?
कहाँ रहती हो ? कैसा दुःख भोग रही हो ? क्या कर रही हो ? कौन तुम्हें ले
गया है ? किस मार्ग से गई हो ? हाय, हमारी कैसी दशा हो गई है । तुम्हारी जैसी
निपुणा, तुम्हारी जैसी मुग्धा, तुम्हारी जैसी सौंदर्य-निधि कहाँ है ? तुम्हारे साथ रहते
एक दिन जी भरकर सुख भोगने का सौभाग्य (अब) मिलेगा क्या ? हे जलजनयनी,
तुम्हारे साथ रहने पर मैं यही अनुभव करता था कि साकेतपुरी में ही रह रहा हूँ ।