रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ रंगनाथ रामायण
धाम, अति पुण्यप्रद नामवाले, हे रघुराम, में आज आपके दर्शन कर सकी। मेरी तपस्या
आज सफल हुई। मैंने अद्वितीय पुण्यों को प्राप्त किया। हे काकुत्स्थ, मार्ग के श्रम से
आप बहुत क्लात हुए होंगे, कही और न जाकर आज हमारे आश्रम में ठहर जाइए।
हे अनघात्म, मैंने अपने गुरु मतंग मुनि के द्वारा आपका वृत्तांत सुना है। आप आदिदेव हैं,
सर्वनिगम-वेद्य हैं, अत., आपकी स्तुति करना असंभव है। यह मतंग मुनींद्र का
आश्रम है; तपश्चर्या से परिपूर्ण तथा विश्रामदायक है।
इस प्रकार (उस आश्रम का) महत्त्व बताकर उसने बड़े प्रेम से वन के कंद, मूल,
फल ले आकर उन्हें दिये और राम ने उन फलों को खाया। राम उस रात को वही
ठहर गये और दूसरे दिन घनी जटा-जूट की कवरी धारण करनेवाली शबरी को देखकर
बोले—'सीता की वियोगाग्नि से मैं अत्यंत व्याकुल हूँ, अत, एक स्थान पर ठहर नहीं
पा रहा हूँ; अब मुझे उस उत्फुल्लकमलमुखी सीता को ढूँढने के निमित्त जाना है।
आप कृपया मुझे आज्ञा दें।'
तब शबरी अत्यंत संतुष्ट होकर बोली—'दनु नामक देवता ने आपको भविष्य में
करने योग्य सभी विषयों के सबंध में कहा ही है। फिर भी मैं कहूँगी। हे राजन्, आप
अवश्य ही रावण का वध करेंगे और सीता को प्राप्त करेंगे। इसमें संदेह करने की कोई
आवश्यकता नही है। फिर भी आप अकेले मत जाइए। हे भानुकुलाधिप, यहाँ से आप
ऋष्यमूक पर्वत के निकट जाइए। उस पर्वत पर तीक्ष्ण बुद्धिवाले, सूर्य-पुत्र सुग्रीव नामक
वानर राजा रहता है। वह अपने अग्रज के हाथों अपना राज्य तथा अपनी स्त्री को खो
चुका है। वह शोकातुर है। उसकी वानर-सेना अनंत है। इसलिए आप उसका उपकार
कीजिए जिससे कि उसके मन में आपके प्रति विश्वास उत्पन्न हो जाय। उसके पश्चात्
आप उसके साथ लंका जाइए और अति शक्तिशाली रावण को युद्ध में मारकर अपने बल-
विक्रम की ख्याति चारों ओर फैलाते हुए अपनी स्त्री सीता को प्राप्त कीजिए।
इस प्रकार शबरी ने उन्हें भविष्य में करने योग्य सभी कार्य बतलाकर अपने गुरु
के वचनों का स्मरण किया और तुरंत अग्नि प्रज्ज्वलित करके उसमें अपना शरीर भस्म कर
देने के लिए तैयार हो गई। उस समय आकाश में इन्द्रादि देवता मणियो के प्रकाश से
देदीप्यमान होनेवाले विमानों पर आरूढ होकर इस दृश्य को देखने लगे। नारद, सनक
सनंदन आदि प्रमुख मुनींद्र अत्यंत हर्षित हुए। तब शबरी ने परमधाम, परमकल्याण-
गुण-संपन्न, पूर्णस्वरूप, अव्यय, अविकार, अङ्गिल अंतरात्मा, अव्यक्त अखिलेण, आघात-रहित,
ब्रह्मा ने भी स्तुत्य, संसार के रोगों के वैद्य, और रघुकुल-रूपी समुद्र के लिए चंद्र के
समान शोभित होनेवाले, रघुराम चन्द्र को अपने मन में प्रतिष्ठित करके, बड़ी भक्ति से
उनकी स्तुति की और उस प्रभु के समक्ष ही रामार्पण के रूप में अपने शरीर को अग्नि
में भस्म कर दिया। उसके पश्चात् वह देवताओं के लिए मान्य दिव्य विमान पर आरूढ
होकर देवताओं की विविध सेवाओं को प्राप्त करती हुई बड़े हर्ष से देवलोक को चली गई।
२८. श्रीराम का ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचना
इस प्रकार शबरी अग्नि-मुख के द्वारा स्वर्ग-सुख को प्राप्त हुई। यह देखकर रमणीय