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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 508 में से

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पृष्ठ 205

मार्ग में पडनेवाले भाड-झखाड की परवाह किये बिना अधाधुध पर्वत पर चढने लगा ।
उसने वानरो को एकांत में बुलाकर उन्हें राम और लक्ष्मण को दिखाते हुए कहा—
'वह देखो, पपा के पास दो व्यक्ति धनुष धारण किये हुए, विविध शस्त्रास्त्रो से सज्जित
होकर ठहरे हुए है । ये प्रच्छन्न वेशधारी, वालि के भेजने पर, हमारा सहार करने आये है ।
अन्यथा, मुनियो को खड्ग, तूणीर, धनुप-बाण आदि की क्या आवश्यकता है ? इनके
पवित्र मुनिवेश देखकर मेरा चित्त व्याकुल हो रहा है । अव हमें यहाँ से कही चला जाना
चाहिए; यहाँ रहना उचित नही है ।'
जब सुग्रीव ने मंत्रियो से इस प्रकार के वचन कहे, तब उन्हे सुनकर विमल विचारो
से भरे हनुमान् बोले—'इन्हें देखने पर ऐसा लगता है कि ये कोई पुण्यात्मा है, ये कपट-
वेशधारी नही है । रवि-चन्द्र के समान दीखनेवाले, ये दयालु व्यकित ही हैं । पता नही कि
इस रूप में वे यहाँ क्यो आकर रहते हैं ? उनका महत्त्व जाने बिना हमें भयभीत होने
की क्या आवश्यकता है ?' तब सुग्रीव ने हनुमान् से कहा--'हमें शका होती है कि ये
वालि के भेजने पर यहाँ आये है, पता नही कि क्रोध से भरा हुआ वालि हमें कब कैसी
हानि पहुँचायेगा । हमें कभी अपने शत्रु का विश्वास नही करना चाहिए । अत हे पवन-पुत्र,
तुम किसी कौशल से उनसे जाकर मिलो और इस बात का पता लगाओ कि ये क्यो
आये हैं । उनके मन की बात जानकर मेरे मन के भय का निवारण करो । शीघ्र जाओ ।'
२. हनुमान् की राम से भेंट
इस प्रकार हनुमान् को विदा करके सुग्रीव अपने मंत्रियो के साथ वहाँ रहने से
डरकर मलयाद्रि पर चला गया । तब अत्यंत शूर, उत्तम गुणवान्, शीलवान्, बाहुबली,
तेजस्वी, कमनीय रूपवाले, वानरों के रक्षक, धर्मार्थमोक्ष के इच्छुक, अतुल गुरु-भक्त, अत्यंत
कुशल, तथा कीर्तिवान्, अजन-सुत हनुमान् उस पर्वत से धीरे-धीरे ऐसे उतरा, मानो वालि को
अमरलोक भेजकर सुग्रीव को राज्य पर प्रतिष्ठित करने, सुरो की रक्षा करने, रावण की
विजय-लक्ष्मी राम को देने, सीता के दुख को दूर करने तथा रवि-पुत्र (सुग्रीव) के
चित्त को मोद-मग्न करने के लिए जा रहा हो । इस प्रकार वह वानरेश्वर पर्वत से
उतरकर आया और वटु का वेश धारण करके पंपा सरोवर के निकट पहुँचा । महात्माओ के
दर्शनार्थ जाते हुए रिक्त हस्तो से जाना उचित नही है, इसलिए राम के देने योग्य एक फल
हाथ में लिये हुए, वह उनके निकट जाने लगा । इस प्रकार आते हुए अनिल-कुमार को
देखकर राम अपने अनुज से बोले—'हे लक्ष्मण, सुनहला रग, मुज की सुंदर करधनी, रत्न-
कुंडलो से विलसित कर्ण, श्रेष्ठ हार, यज्ञोपवीत, कौपीन, तथा हस्त-कंकण धारण किये हुए
किसी मनुष्य ने क्या अनुपम कपि का रूप धारण किया है ? इस रूप को धारण करने
की इच्छा से स्वयं रुद्र ने इस रूप में जन्म तो नही लिया है ? अन्यथा इस पृथ्वी पर
कपिमात्र को ऐसी प्रभा कैसे प्राप्त हो सकती है ?'
इस प्रकार प्रशसा करनेवाले राजकुमार को देखकर पुलकित गात्र से हनुमान् उनके
निकट पहुँचा और बडी प्रीति के साथ फल उनको भेंट किया, मानो कह रहा हो कि में साध्वी
सीता का शिरोरत्न आप को शीघ्र ही ला दूंगा । इसके पश्चात् वह बोला—'हे प्रभो,