रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० रंगनाथ रामायण
-(मन-ही-मन) वे व्याकुल होते हुए बडी तेजी के साथ निश्वास भरते हुए आ रहे थे कि
वन के मध्य में उन्होने लक्ष्मण को देखा । लक्ष्मण को देखते ही वे अत्यत भय-विह्वल
हुए और बोले—'हाय लक्ष्मण, अत्यत धीर तथा विवेकी होकर भी मेरी आज्ञा के बिना,
सीता को वन में अकेली छोडकर तुम कैसे आये ? तुम इस तरह क्यो आये ? क्या, तुम
नही जानते कि इस पृथ्वी पर रहनेवाले सभी राक्षस हमारे शत्रु है ? भाई, क्या तुम्हें
वंश-मर्यादा, धर्म तथा गुरुजनो की हानि का विचार नही करना चाहिए था ?'
इन बातो को सुनकर लक्ष्मण अत्यत भयभीत हुए । काँपते हुए उन्होने हाथ जोडकर
कहा—'हे प्रभो, त्रिलोकीनाथ, मैं जानता हूँ कि मेरा इस प्रकार चला आना उचित नही है।
जिस कुटिल राक्षस ने माया-मृग के रूप में आपको भटकाकर निदान आपके दिव्य
बाणो की अग्नि-शिखाओ से प्राणत्याग किये, उसने मरते समय 'हाय लक्ष्मण' कहकर
आर्त्तनाद किया । वह आर्त्तनाद जब सीताजी के कानो में पडा, तब वे अत्यत भयभीत हुई
और आपकी श्रेष्ठता को सर्वथा भुलाकर कहने लगी—'भाई लक्ष्मण, क्या बात है ? कुछ
पता लगाओ । हे सौमित्र, तुम्हारे भाई कभी ऐसा दीन आलाप नही करते ।' तब मैने
उनसे कहा—'माताजी, हमारे मन में भय उत्पन्न करने के निमित्त ही क्रूर राक्षस ने ऐसी
पुकार मचाई होगी । कहाँ सूर्य-वंश के अधीश्वर और कहाँ दीन वचन, माताजी आप
विचलित मत होइए ।' तब देवी मुझे अपशब्द सुनाती हुई कोसने लगी और मैं मन ही मन
दुःखी हुआ और वन-देवताओ के सरक्षण में उन्हें छोड़कर यहाँ चला आया । इसलिए प्रभो,
आप इसे मेरी त्रुटि न मानें ।'
इस प्रकार कहते हुए अश्रुपूरित नयनो से लक्ष्मण ने अपने भाई को प्रणाम किया ।
राम ने अपने अनुज को बड़े स्नेह से उठाया, आँखो से गिरनेवाले अश्रुजल को पोछा, और
अत्यत दुःखी होते हुए बोले—'हे तात, आजन्म पवित्र, सर्वज्ञ जनक महाराज की पुत्री होती
हुई, उस प्रख्यात पुण्यशीला सीता का ऐसे वचन कहना ही सभी विपत्तियो का
कारण है—ऐसा विचार करके तुम्हें तो वही ठहर जाना चाहिए था । तुम्हारे जैसे व्यक्ति को
विचलित नही होना चाहिए था ।'
इस प्रकार, सौमित्र को सात्वना देकर राम ने अपनी आश्रम-भूमि में प्रवेश किया और
(उसे सर्वथा निस्तब्ध पाकर) बोले—'हे लक्ष्मण, यह कैसी बात है कि यह आश्रम सर्वथा
शून्य दीख रहा है । वन-देवताओ के हर्ष भरे वचनो की ध्वनि सुनाई नही पड रही है ?
पक्षियो का कलरव नही सुनाई पड़ रहा है । मुनिजनो का सचार यहाँ नही दीख
रहा है ? सीता (मेरे स्वागतार्थ) आगे आती नही दीख रही है ? मेरा मन अत्यत दीन
तथा व्याकुल हो रहा है । आज मेरी बाईं आँख न जाने क्यो फड़क रही है । हाय,
इस वन में न जाने हम दोनो कैसा दुख भोगेंगे ?'
इस प्रकार कहते हुए वे पर्णशाला के पास पहुँचे और दिनकर-रहित दिन-लक्ष्मी के
समान, निशाकर-विहीन रात्रि के समान, सारिका-रहित पिंजडे के समान, कोयल-रहित
आम्र-वृक्ष के समान, देखने में विवर्ण तथा कांतिहीन दीखनेवाले उस पर्णशाला को देखकर
वे मन-ही-मन बहुत अधीर हुए । व्याकुलता के कारण उनका मुख विवर्ण हो गया,