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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 508 में से

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पृष्ठ 195

पड़े हुए देखकर राम अत्यधिक शोक से अभिभूत हुए । उन्होंने विचार करके निश्चय कर
लिया—हाय, निश्चय ही कोई क्रूर दानव उस कुटिल-कुंतला सीता को उठाकर ले गया है ।
यो चिंतित होते हुए वे मार्ग में अन्वेषण करते हुए थोड़ी दूर आगे बढ़े । मार्ग में
जहाँ-तहाँ राक्षस के चरण-चिह्नों को देखते तथा उनका अनुसरण करते हुए वे कुछ दूर
गये । वहाँ उन सूर्यवंशजो ने एक स्थान पर कटे हुए पख, रक्त के कीचड में मृत पड़े
हुए सारथी, उसपर टूटकर गिरे हुए रथ, रथ के पास कटकर गिरे हुए अश्व, पृथ्वी पर
बिखरे हुए पताका के खंड, उनके सामने ही गिरे हुए धनुष के खंड, छितराये हुए अस्त्र-
शस्त्र देखे । (इन सब वस्तुओ को) लक्ष्मण के दिखाने पर राम विस्मित हुए और सोचने
लगे कि किन्ही ने यहाँ पर युद्ध के आनन्द का उपभोग किया है ।
२५. जटायु का अग्नि-संस्कार करना
उक्त योद्धा का पता लगाने के उद्देश्य से रघुराम उस मार्ग में जहाँ-तहाँ ध्यान से देखते
हुए आगे बढे । उस स्थान के निकट ही पख और पैर कटे हुए, रक्त में डूबे, वज्र के
आघात से गिरेहुए मैनाक पर्वत की भाँति विवश पड़े हुए विहगेन्द्र (पक्षिराज) को देखकर
राम ने कहा—'हे लक्ष्मण, देखा तुमने ? चपलराक्षस सीता को निगलकर, अपना निज
रूप दिखाने से डरकर पक्षी के रूप में यहाँ पडा हुआ है । भय से तडपनेवाले इसका वध
मैं कर डालूँगा ।' यो कहते हुए वे धनुष हाथ में लिये उस पक्षी पर आक्रमण करने को
उद्यत हुए । उन्हें देखकर पक्षिराज ने रक्त का वमन करते हुए, लबी साँस भरते हुए,
गद्गद कठ से कहा—'हे राजन्, मैं आपके पिता का मित्र हूँ, कश्यप ब्रह्म का पौत्र हूँ,
अरुण का पुत्र हूँ तथा जटायु नामधारी हूँ । मै इन घने वन तथा शैल-शृंगो पर निवास
करता हूँ । मैंने अपना सारा वृत्तान्त आपको इसके पहले स्पष्ट रूप से निवेदन कर ही
दिया था । हे पुण्यात्मा, ऐसे मुझे यह विपत्ति क्यो कर आई, उसका भी विवरण सुन
लीजिए । आज रावण आपकी देवी को चुराकर लिये जा रहा था, तो मैने उसको रोका
और अपनी अमित शक्ति के साथ उससे युद्ध करके बुरी तरह घायल होकर पृथ्वी पर पड़ा हूँ ।
यह उसका केतु, सूत तथा अश्वो से युक्त रथ है । युद्ध में मेरे द्वारा ये नष्ट
हुए है । तब क्रोध से वह क्रूर राक्षस सीता को उठाकर आकाश-मार्ग से चला गया ।
आप तो आये नही । (अब) मै आपको यह समाचार सुना सका, आपकी शुभ मूर्ति के
दर्शन कर सका । मै पुण्यवान् हुआ ।'
तब राघव का शोक द्विगुण हो उठा । उन्होंने धनुष को फेंक दिया और मूच्छित
होकर धरती पर गिर पड़े । सौमित्र की परिचर्या के उपरान्त उनकी चेतना लौटी, तो वे
बोले—'हाय, महात्मा जटायु ! मेरे कारण आप पर यह विपत्ति आई है ।' उन्होंने
जटायु के शरीर पर हाथ फेरा, और सारा रक्त स्वय पोछा और अपने अनुज को देखकर
बोले—'लक्ष्मण, इन्होंने हमारे लिए रावण का सामना करके इस प्रकार युद्ध किया है ।
ऐसे पुण्यात्मा कहाँ मिल सकते है ? इनके स्वर्ग सिधारने के पहले ही तुम इनसे पूछ लो
कि रावण की राजधानी को जाने का क्या मार्ग है, उसकी शक्ति आदि कितनी है ।'
तुरन्त लक्ष्मण ने रघुराम के कार्य में सहायक जटायु से उस सुरवैरी की शक्ति आदि