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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 508 में से

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पृष्ठ 204

१७४ रंगनाथ रामायण
माणिक्य के आभूषण पहने हुए ये पेड़ों की फैली हुई शाखाएँ इस स्निग्ध सरोवर रूपी
दर्पण में उझक-उझककर (अपना मुंह) देख रही है । उनकी शिखाएँ मद पवन में इस
तरह हिल रही है, मानो वे अपने सौंदर्य को देखकर प्रसन्नता से अपना सिर हिला रही है ।
यहाँ की शुक-सारिकाएँ इस प्रकार बोल रही है, मानो एक दूसरे की प्रशंसा कर रही है ।
इस सरोवर के तीर की वन-स्थली को देखकर मेरा संताप, मन्मथ के प्रताप के समान,
उद्दीप्त हो उठा है । मेरी धृति भी नष्ट हो गई है ।
"हे सौमित्र, विचार करने पर ऐसा लगता है कि यह वन-भूमि नहीं है, बल्कि
कामदेव का शस्त्रागार है, वे आम्र-पल्लव नहीं हैं, बल्कि मन्मथ के तेज खड्ग है, यह
भ्रमरों का गुजार नहीं है, बल्कि निकट पहुँचनेवाले मन्मथ के धनुष्टंकार है, वे फूलों के
गुच्छ नहीं है, बल्कि मन्मथ के तीक्ष्ण बाण हैं, यह कोयल की मीठी बोली नहीं है, बल्कि
उसके (कामदेव के) कर्णकटु हुकार है । मेरे जैसे स्त्री-विरही इस कानन में कैसे रात्रि
बितायेंगे ? इस वन में सुनाई पड़नेवाला कोयल का कल-कूजन वर्षा ऋतु के बादलों के
घोर गर्जन के समान लगता है, वृक्षों से गिरनेवाले पुष्प-रज का प्रकाश, नये बादलों की
बिजली के समान लगता है, पल्लव-युक्त शाखाएँ इन्द्र-धनुष के समान लगती है, पृथ्वी
पर गिरनेवाले फूल ओले के समान लगते हैं, सतत झरनेवाला मकरद वर्षा के समान
दीखता है । (इन कारणों से) यह वसंत ऋतु भी वर्षा ऋतु के समान दिखाई पड़ती है ।
इस पर भी पल्लव-रूपी अग्नि-ज्वालाओं से, भ्रमर रूपी धुएँ से, वकुल के पुष्परज-रूपी
राख से, सेमर के फूल-रूपी अंगारों से प्रकट होकर, यह ऋतु विरहियों के लिए अग्नि के
समान दीखती है और मन्मथ के प्रताप की अग्नि का भी तिरस्कार करती हुई, मेरे मन
को जला रही है । हाय ! अब मैं क्या करूँ ? कैसे मैं इसे सहन करूँ ? कामिनी-कुल-
भूषणा सीता को मैं कब देखूँगा ? क्या कभी मैं सीता के साथ उस प्रकार मिलकर रह
सकूँगा, जैसे पपा सरोवर के तटवर्त्ती वन की शोभा के साथ वसंत रहता है । इस पपा के
कमलों के समान दीखनेवाले सीता के मुख का मैं कब अवलोकन कर सकूँगा ? यहाँ की
मछलियो की आंखो के समान उस इंदुवदनी की आँखें मैं कब देख सकूँगा ? भ्रमर यहाँ
के पद्मो का मकरद जैसे पान करते है, वैसे ही मैं कब उस सुदरी का अधर-पान करूँगा ?
यहाँ के जलपक्षी जैसे जोड़ों में रहते हैं, वैसे ही उस कमलाक्षी के संग मैं कब रह सकूँगा ?
हाय, यह कैसा विचार है ! अब वह सीता कहाँ ? कहाँ यह विरह ? इन दोनों का मेल
कैसे संभव है ? हे अनुज, अब तुम अयोध्या लौट जाओ । मैं अब अपने प्राणों को रख
नहीं सकूँगा ।",
इस प्रकार अनाथ की तरह शोक करनेवाले राम को देखकर लक्ष्मण बोले—'हे
रघुराम, आप समस्त लोकों का सामना करने की क्षमता रखनेवाले पुरुषोत्तम हैं । ऐसे
मोहजन्य शोक में आप क्यों पीड़ित हो रहे हैं ? सीता को छल से ले जानेवाले रावण
के संहार का उपक्रम कीजिए ।' तभी भासंत नामक पक्षी (शकुन-पक्षी) बोल उठा ।
इतने में उस ऋष्यमूक पर्वत की तराइयों में विचरण करते हुए सुग्रीव ने निकट
ही राम तथा लक्ष्मण को देखा । वह अत्यधिक भयभीत होकर, चीत्कार करते हुए, अपने