सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 199

आकारवाले महाबलशाली राम-लक्ष्मण उस स्थान को छोड़कर आगे बढे और उस ऋष्यमूक
पर्वत के निकट पहुँच गये, जो सतत आलोकमय, तया श्रेष्ठमपन्न मुनियो का निवास था ।
उस पर्वत के झरने ऐसे दीख रहे थे, मानो त्रिलोकीनाथ के आगमन के कारण
आनद से उमड़कर, वह पर्वत आनदाश्रु बहा रहा हो । उस पर्वत की तराइयों में अत्यधिक
सख्या में देदीप्यमान चद्रकात मणियो की काति ऐसी दीख रही थी, मानो मेरु, मदर तथा
हिमाचलो का उपहास करनेवाली उस पर्वत की हँसी हो । उस पर्वत की ऊँची चोटियो
पर चमकनेवाले नक्षत्र इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे, मानो ब्रह्मा ने इस पृथ्वी के पर्वत-
राज्य का अभिषेक करके उसके सिर पर मन्त्राक्षत छीट दिये हो ।
उस पर्वत पर उज्ज्वल रूप से दीप्त होनेवाली सूर्यकात मणियो की दीप्ति ऐसी
दीख रही थी, मानो उस पर्वत की शरण में आये हुए सुग्रीव पर अत्याचार करनेवाले वालि
पर क्रुद्ध होकर वह अपने प्रताप की अग्नि दिखा रही हो । उस पर्वत पर विचरण करनेवाले
दतो से युक्त मत्त गज ऐसी शोभा दे रहे थे, मानो नील मेघ उस पर्वत पर विचरण
करते हुए अपनी विजलियो को चमका रहे हो । उस पर्वत के शिखर के निकट ही बहने-
वाली आकाश-गगा, (मन्मथवैरी) शिव के जटा-जूटो पर शोभायमान गगा के समान थी,
उसके आस-पास क्रीडा करनेवाले हसो की पवित शिव का शिरोभूषण चद्र के समान थी ।
उस पर्वत पर रहनेवाले अत्यधिक शृग, वृक्ष तथा पल्लव-समूह शिव के बिखरे जटा-जूट के
समान सुशोभित थे और वह पर्वत सिद्धो की सेवाएँ प्राप्त करते रहनेवाले शिव के सदृश
ही दीख रहा था । उस पर्वत पर रहनेवाले कल्प-वृक्ष, कामधेनुएँ, देव-कन्याएँ, विविध
औषधियाँ, चितामणि जैसी श्रेष्ठ मणियो का समूह, कभी नष्ट न होनेवाली निधियाँ और
सतान-वृक्ष (एक प्रकार का कल्प-वृक्ष) आदि ऐसे दीख रहे थे, मानो इद्रादि देवता, समुद्र-
मथन-से प्राप्त वस्तुओ को (उनके वितरण के समय इद्रादि देवताओ के बीच झगडा
उत्पन्न होने के कारण लाकर यहाँ पर रख दिया हो), या अमृत-पान से बेसुध होकर
भूल से यहीं छोड़ दिया हो, या योग्य स्थान होने के कारण उन्हें यहाँ छिपा रखा हो ।
इस पर्वत को देखकर राघव अत्यत विस्मित हुए और उसकी प्रशसा करने लगे ।
अपने अनुज की अकलक भक्ति-युक्त सेवा प्राप्त करते हुए वे उस शैल के निकटवर्ती
पपा सरोवर के पास पहुँचे और उस सरोवर में नियमानुसार स्नान किया । उसके पश्चात्
वे उस सरोवर के चारो ओर की शोभा का अवलोकन करके अत्यत मुग्ध-से हो गये ।
अपनी क्लान्ति मिटाने के निमित्त वे एक आम के वृक्ष की छाया में बैठे, तो लक्ष्मण उनका
शीतलोपचार करने में प्रवृत्त हुए ।
कुछ समय के पश्चात् राघव ने उस आम के वृक्ष को ध्यान से देवा और लक्ष्मण
से बोले—'हे अनुज, जबसे हमने वन के लिए प्रस्थान किया, तबसे कितने ही ऊँचे पर्वत
और पुण्य नदियाँ देखीं, किन्तु हमने इस वृक्ष के जोड का वृक्ष कही नहीं देखा । कदाचित्
सुरपति आदि देवताओ ने मिलकर इस वृक्ष का निर्माण किया हो, ब्रह्मा ने स्वय प्राण
देकर इसे यहाँ पर प्रतिष्ठित किया हो, या रविमुत (सुग्रीव) की तपस्या से संतुष्ट होकर
ब्रह्मा ने इस वृक्ष को यहाँ उत्पन्न किया हो, या अमृत को प्राप्त करने के बाद सुरो ने सूर्य-
२२