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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 508 में से

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पृष्ठ 207

किष्किन्धाकांड १७७
प्रार्थना तथा सेवा करूँ ?' तब कमलसभव ने अपने मन में विचार करक कहा—'जो
तुम्हारे शरीर के आभूषणो को देख सकेगा, वही तुम्हारा स्वामी और प्रभु होगा । (भाव
यह है कि हनुमान् के आभूषण दूसरो के लिए अदृश्य थे ।) वही हम सब के इष्टदेव,
समस्त प्राणियो तथा इस ससार के कर्त्ता हैं, वे ही विष्णु हैं । जान लो, वे ही तुम्हारे
त्राता तथा प्रभु हैं ।'
'इस प्रकार आदेश देकर ब्रह्मा चले गये । तब से मैं समस्त लोक में विचरण
करता रहता हूँ । हे राजन् ! मेरे आभूषणो की दीप्ति स्वर्ग के निवासी भी नही देख सकते ।'
'तब सौमित्र ने मारुति को देखकर कहा—'हे अनघ, सुनो, राघव की शक्ति लोक-
विख्यात है । वे अनुपम दिव्यास्त्र के ज्ञाता तथा अतुल साहसी हैं, वे करुणा के समुद्र हैं
और गंभीर प्रकृति के हैं, वे शरणागत-त्राता तथा सद्धर्म में तत्पर हैं । वे जगन्नाथ हैं,
अशरणशरण हैं, अगणित गुणों से विभूषित हैं, तेजस्वी, दिव्य पराक्रमी तथा सत्यवादी हैं ।
ऐसे महान् व्यक्ति का सेवक तथा हितेच्छु होकर मे रहता हूँ । राघव के लिए कोई कार्य
असाध्य नही हैं । कुटिल राक्षस का पता लगाकर हम स्वय सीता को ला सकते हैं ; किन्तु
परिश्रम उठाकर अकेले जाना उचित नहीं है और वह राजनीति भी नही है । इसलिए
मेरे प्रभु का विचार है कि तुम्हारे सुग्रीव को अपना मित्र बनाया जाय । अब तुम इस
कार्य को किसी तरह सम्पन्न करो ।'
तब पवन-पुत्र ने अत्यत प्रसन्न होकर अपना निज रूप दिखाया । राम-लक्ष्मण न
उसे अपनाया, इससे उसने अपने को कृतार्थ समझा । तब उसने अपनी आँखो में आनंदाश्रु
भरकर उनकी अत्यधिक स्तुति की । तत्पश्चात् राम और लक्ष्मण ने अत्यत हर्ष से अनिल-
कुमार को विदा किया । हनुमान् अत्यधिक आनद तथा उत्साह से सुग्रीव के पास पहुँचे
और उसे रघुवश के राजकुमारो का वृतात इस प्रकार कहने लगा—'हे सुग्रीव, रमणीय
रूपवाले राम-लक्ष्मण, महनीय गुणो से अलकृत होते हुए इस जगत् में विद्यमान हैं । शोक-
सागर में निमग्न होनेवाले तुम्हें, रघुराम एक नौका के रूप में मिल गये हैं । हे सुग्रीव,
अब तुम सुरक्षित हो गये । तुम्हारा प्रतिशोध पूर्ण होगा । तुम्हें पूर्ण सतोष होगा । मैं
तुम्हारे पुण्य की प्रशसा कैसे करूँ ? सच्चरित्रवान्, दयामूर्ति, सत्यवादी, आजानुबाहु, महा-
विष्णु, श्रीनिवास और पुण्यनिधि, दशरथात्मज राम ही तुम्हारे प्रभु हैं । वे महात्मा जब
अपने पिता की आज्ञा से दडकवन में रहते थे, तब दशानन उनकी पत्नी को चुराकर ले गया ।
उससे युद्ध करके उसका सहार करने के उद्देश्य से वे तुमसे मित्रता करने यहाँ आये हैं ।
इन वातो को सुनकर सुग्रीव हर्षित हुआ । उसने अनिलकुमार को देखकर कहा—
'हे पवनसुत, मेरा सारा भय दूर हो गया । मेरी तपस्या सफल हुई । तुम्हारे जैसे अजन
के प्राप्त होने से मैं राघव-रूपी निधि को देख सका । तुम्हारे जैसे कर्णधार के रहने से
मैं इस शोक-सागर को पार करने में समर्थ हुआ । तुम उन्हें ऋष्यमूक पर्वत पर लिवा
लाओ और मेरे मन का सताप दूर करो । अब तुम जाओ ।'
वायु-पुत्र तुरत रघुराम के पास गया और प्रणाम करके उनसे निवेदन किया—'हे
देव, श्रीमान् का मित्र सुग्रीव, आपके दर्शनो का अभिलाषी है, अत आप पधारें ।' राम
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