रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ रंगनाथ रामायण
के संबंध में कई उचित प्रश्न किये । तब जटायु ने कुछ बातें बताईं, किन्तु कंठ से फिर
से रक्त बहने के कारण आगे बोल न सके । तब उन्होंने अतुल पुण्यात्मा राम को देखा
और मन में उनका सतत स्मरण करते हुए बड़े आनन्द से मोक्ष-मार्ग को सामने देख
पुलकित होकर प्राण त्याग दिये । राजकुमार उनकी मृत्यु पर, महाराज दशरथ की मृत्यु
से भी अधिक दुःखी हुए और वेद-विधि से उस पक्षिराज का दाह-संस्कार किया ।
२६. कबंध का वध
वहाँ से वे दोनो क्रौंचवन की ओर बढ़े और वहाँ नाना लता, वृक्ष, नग तथा
मृग से भरी एक घाटी में से होकर जाने लगे । वहाँ एक स्थान पर 'अयोमुखी' नामक
एक राक्षसी को देखा । उसके केश पके हुए थे, दाढ़ें लंबी थीं, उदर विशाल था, मुँह
बहुत बड़ा था, आँखें उभरी हुई थीं और कुच घुटनों तक लटक रहे थे । उसकी चेष्टाएँ
पागलो की-सी थीं । उसने सुंदर आकार तथा शुभ लक्षणो से समन्वित लक्ष्मण को देखा,
तो उनपर आसक्त हो गई और उनका हाथ पकडकर रति-क्रीडा के लिए उनसे आग्रह
करने लगी । उन्होंने उस राक्षसी को तलवार की सहायता से वही सुख दिया, जो उन्होंने
शूर्पणखा को दिया था ।
इसके पश्चात् उन्होंने दुंदुभि, पटह तथा तूर्य आदि की ध्वनि से भी अधिक ध्वनि
अपने आगे सुनी । उसके संबंध में जानने के लिए दोनो राजकुमार आगे बढे । वहाँ उन्होंने
एक ऐसे राक्षस को देखा, जिसकी बाँहें एक योजन लंबी थी । वह अपनी बाँहो को फैला-
कर उनके बीच फँसनेवाले किसी भी जंतु को पकडकर तुरंत ही निगल जाता था और
डकार लेता था । उसका सिर बहुत छोटा था और उसका पेट ही उसका मुँह था । इस
प्रकार का आकारवाला, बहुत से जीव-जतुओ का नाश करनेवाला, देवताओ को कष्ट
पहुँचानेवाला मदांध कबध नामक राक्षस को देखकर राम-लक्ष्मण आश्चर्यचकित हुए ।
उसने भी अपने दोनो करो से उन दोनो को पकड़ लिया और अपनी ओर खींचने लगा ।
उस समय अपने अग्रज को देखकर लक्ष्मण ने कहा- 'हे भाई, आप मुझे इस राक्षस का आहार
बनाकर सीता के अन्वेषण में चले जाइए और उन्हें प्राप्त करके समस्त ससार का शासन
करने के लिए (अयोध्या) लौट जाइए ।'
लक्ष्मण की बातो पर विचार करते हुए राम उस राक्षस के हाथो के साथ थोडी
दूर गये । उसके पश्चात् राम तथा उनके भाई दोनो ने खूब सोच-विचार करके अपनी
म्यानो से खड्ग खींचे और उन तेज खड्गो से उस राक्षस के दोनो हाथ काट डाले ।
राक्षस का सारा गर्व चूर-चूर हो गया । वह धरती पर लोट गया और
थोडी देर के बाद सँभलकर उसने उन लोगो से पूछा कि आप कौन हैं ? तब लक्ष्मण ने
श्रीराम का सारा वृत्तांत कह सुनाया, तो उसे (अपने पूर्व जन्म का) ज्ञान हो आया और
वह अपना वृत्तांत सुनाने लगा । (उसने कहा) - "महाराज, मैं दनु नामक स्वर्ग का निवासी हूँ ।
एक महात्मा मुनि के शाप के कारण मै ऐसा हो गया हूँ । मैंने ब्रह्मा से कामरूपत्व
(इच्छानुसार रूप बदलने की शक्ति) तथा चिरायु प्राप्त की और उस गर्व मे ऐसा रूप
धारण करके सभी संयमी जनो को दुख देने लगा । इस सिलसिले में स्थूलशिर नामक