रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
१५० रंगनाथ रामायण
मानो रोहणाचल का समस्त सौंदर्य मृग का रूप धारण किये हुए पृथ्वी पर विचर रहा हो,
अथवा अकेले राहु से भीत होकर चंद्रमंडल पृथ्वी पर घूम रहा हो, अथवा
राक्षस-क्षय करने के हेतु ब्रह्मा ने समस्त सौंदर्य को एकत्रित करके मृग का निर्माण किया हो
और उसे कपट (मन) से भेजने पर यहाँ वह आ गया हो, अथवा जानकी ने
अपनी कुटिल वेणी से इन्द्रनील मणियो का, ‘ दाँतो से मोतियो का, अरुण ओष्ठो से
प्रवालो का, कपोलो से वज्रो का, शरीर की कांति से वैडूर्य का, उदर के ऊपर की रोम-
राजि से मरकत-मणियो का, पाणि-द्युति से पद्मरागो का, और नख-द्युति से गोमेदको का
परिहास किया था । इसलिए सभी रत्न, रत्नगर्भा की पुत्री-रूपी रत्न को सताने के लिए
मृग का रूप धारण करके आये हो, अथवा रघुराम ने सीता के लिए मेरा धनुष तोडा था।
अब में उन्हें व्याकुल करूँगा—यो सोचकर हर के भेजने पर उनके हाथ का हिरन
इस प्रकार आया हो, अथवा सीता के मुख की कांति से पराजित होकर, चंद्र के भेजने
पर आया हुआ माया-मृग हो । इस प्रकार का वह हिरण चित्र-विचित्र वर्णों की कांति
से समन्वित हो, कपट-रूप धारण किये हुए, अनुपम सौंदर्य को प्रकट करते हुए, ढूँढ़-ढूँढ़-
कर तृण चरने लगा । कभी वह अपनी पूंछ की रमणीय कांति से वन के मयूरो को
नचाता, कभी अपने शरीर की कान्ति को विकीर्ण करके सारे वन को सुनहला बना देता था,
तो कभी चौकड़ी भरकर इन्द्रधनुष का-सा दृश्य प्रस्तुत करता था, कभी तो आकाश
की ओर उछलकर विद्युल्लता की-सी ज्योति उत्पन्न कर देता, तो कभी अपने पार्श्वभाग
की कांति से चंद्रकांत मणि को लज्जित कर देता; कभी मृगो के झुंडो के साथ मिलकर
चरने लगता, तो कभी उन्हें डराता, कभी छिप जाता, तो कभी प्रकट हो जाता, कभी
अति निकट पहुँच जाता, फिर इतने में डरकर चौकड़ी भरकर दूर निकल जाता, कभी
पेड़ो की छाया में चला जाता, कभी पर्णशालाओ में घुस जाता, कभी सिकुड़ता, फिर
तुरत ही छलाँग मारकर निकल जाता, कभी वह पृथ्वी को सूँघने लगता, पूंछ हिलाता,
कान खड़े करके कुछ सुनता और तुरत अत्यंत वेग से दौड़ने लगता । कभी निकट पहुँचता,
सिकुड़े हुए अपने शरीर को हिलाता, घास पर लेट जाता, और बड़े स्नेह से मुनियो के
निकट चला जाता, कभी अपने खुरो से अपने कानो को खुजलाता और सींगो से पुष्प-
लताओ को हिलाकर उनके सभी फूलो को गिरा देता । इस प्रकार वह हिरण उस सुन्दर
पर्णशाला के आगे बड़े आनंद से विविध कौतुक करने लगा ।
उसी समय सीता फूल चुनने के लिए आई और उस पर्णशाला की सुंदर भूमि
को अपने मंजुल नूपुरो की मृदु ध्वनि मे भरती हुई, सौरभ मे महकनेवाली पुष्प-लताओ की
झाड़ियो के निकट पहुँचकर फूल चुनने लगीं । तब वह मन को आश्चर्यचकित कर
देनेवाले उस हिरन को देखकर विस्मित हुई और सूर्यवंशाधिप राम को देखकर बोली—
‘हे नाथ, यह देखिए निकट ही एक अद्भुत मृग दीख रहा है । हमने इतने वर्णों का,
ऐसा सुंदर मृग अबतक किसी भी वन में नहीं देखा । इसके चर्म पर सुख से शयन
करने की बड़ी इच्छा हो रही है । इसलिए हे प्राणेश, इसका पीछा कीजिए और इसे मारकर
मुझे इसका चर्म ला दीजिए । नहीं, नहीं, किसी भी उपाय से इसे जीवित ही पकड़कर
अरण्यकांड १५१
लौ सकें, तो और भी अच्छा होगा । हमारा वनवास तो समाप्त होनेवाला है । हम इस स्वर्ण-
मृग को अपने नगर में ले जायँगे और सासो तथा भरत आदि को इसे दिखाकर उन्हें
आनंद दे सकते हैं ।'
सीता के इन वचनो को सुनकर लक्ष्मण रामचंद्र को देखकर बोले—'हे प्रभु, जब
पृथ्वी पर मृगराज का भी ऐसा (सुन्दर) शरीर नही है, तो भला मृग का ऐसा शरीर
कहाँ हो सकता है ? यह माया-मृग है, इसका विश्वास मत कीजिए । राक्षस मायावी
होते हैं और कदाचित् यह उनकी माया ही है । यही नही, क्या आपने मुनियो के वे
वचन नही सुने कि क्रूर मायावी मारीच इस प्रांत में घूमता रहता है । प्राय वही हमें
भ्रम में डालने के लिए इस प्रकार आ गया है । इस पर आसक्त होकर, उतावले हो आप
इसे पकडने का विचार मत कीजिए । वैदेही तो भोली-भाली है । हे प्रभु, आप भी वैसे
थोडे ही हैं ?'
यह सुनकर रामने सीता का मुख-कमल देखा और हँसते हुए लक्ष्मण को देखकर
बोले—'हे लक्ष्मण, ऐसे विचलित क्यो होते हो ? क्या पृथ्वी पर राक्षसो की माया मेरा
सामना कर सकेगी ? मैं या तो इस मृग को पकडकर ले आऊँगा या इम प्रचड राक्षस
का वध करूँगा ? इन दो बातो को अच्छी तरह जानकर ही मैं इसका पीछा करूँगा और
इसे मारकर, इसका चर्म लाकर जनकजा को दूँगा । इतने दिनो के बाद सीता ने यह
छोटी-सी इच्छा प्रकट की है, तो क्या में इसे भी पूरा न करूँ ? तुम सावधान होकर इस
पर्णशाला का तथा सीता की रक्षा करते रहो ।'
१५ राम का माया-मृग का पीछा करना
इस प्रकार उन्हें यह भार सौंपकर, रघुराम ने उनके हाथ में स्थित धनुप को
लिया और उस पर डोरी चढाकर, ऐसे चल पडे, जैसे पूर्वकाल में यज्ञ-मृग का पीछा करने-
वाला गजासुर-वैरी गया था । वे कही धीरे-धीरे किसी झाडी के पीछे छिपते, कही झुकते,
कही दौडते, फिर खडे होकर देखते, किसी आड में छिपते (मृग का) पीछा करते, उसे
पकडने के लिए आतुर होते और धनुप-बाण को पीछे छिपाकर दवे पाँव चलने लगते ।
वे उस मृग को पकडने के लिए, अवसर देखकर, उसके निकट पहुँचते, 'अव
पकडा, लो, यह आया, अव हाथ में आ गया'—ऐसा सोचते हुए उसका पीछा करते
जाते । वह हिरन भी कभी निकट ही दिखाई पडता, उनके पास पहुँच भी जाता, किन्तु
पकडने का यत्न करते ही भाग निकलता । कभी राम को क्रोध में आया जान (वह)
खडा हो जाता, फिर चारो दिशाओ में मनोहर ढंग से चौकडियाँ भरने लगता । लार के
साथ घास के टुकडो को (वह अपने मुंह से) गिराता, एक छलांग में निकट पहुँच जाता,
तो दूसरी छलाँग में दूर निकल जाता, (जहाँ-तहाँ) सूंघ-सूंघकर चौकडी भरता और
विजली की तरह अपनी जीभ को (एक क्षण के लिए) वाहर निकालकर घुमाता, मानो
कोई मशाल घुमा रहा हो । (वह) कभी कुम्हार के चाक के समान चक्कर काटता, कभी
थके हुए की भाँति, घुटनो के बल खडा रहता, किन्तु निकट पहुँचते ही वाज की तरह
आकाश की ओर छलांग मारकर निकल जाता । थके-मांदे जब राम आश्चर्यचकित होकर
१५२ रंगनाथ रामायण
खड़े हो जाते, तब उनके पार्श्वभाग में ही दिखाई पड़ता और तुरंत छल करके दूर
हो जाता । जब राम तंग आकर उसपर बाण चलाने के लिए सन्नद्ध हो जाते, तब वह अदृश्य
हो जाता । इस प्रकार वह माया-मृग राम को थकाते हुए, वहाँ से दूर घने वन में जा
पहुँचा और उनकी आँखों से ओझल होने का यत्न करने लगा । अब राम समझ गये कि
वह माया-मृग है और मन-ही-मन कहने लगे—'दिखाई देकर अब कैसे बचोगे ?' उन्होंने
ब्रह्मास्त्र का संधान किया, और पर्वतों को कँपाते हुए, समुद्र को आंदोलित करते हुए, सभी
लोकों को भयभीत करते हुए और दिशाओं को थर्राते हुए, उस अस्त्र को मृग पर चलाया ।
वह माया-मृग अपना कपटरूप छोड़कर, असुर का दीर्घ आकार धारण किये हुए 'हाय
लक्ष्मण' का आर्तनाद से दिशाओं को गुँजाते हुए, प्राण छोड़कर पृथ्वी पर ऐसे गिरा, मानो
राक्षसों की लक्ष्मी ही नष्ट हो गई हो, रावण का ही सर्वनाश हुआ हो, अथवा लंकापुरी ही
विध्वस्त हो गई हो । उस माया-मृग को पृथ्वी पर गिरते देख,
तव धरणिजा (जानकी) ने रोषाग्नि से जलते हुए सौमित्र की निंदा करते हुए
कहा—"हे लक्ष्मण, तुम तो रामचन्द्र के परम भक्त हो, आज तुम इतने नीच कैसे हो
गये ? श्रीराम के पुकारते रहने पर भी भयंकर शत्रु के समान तुम चुप क्यों हो ?
क्या यह तुम्हारे लिए उचित है ? 'मेरा अनुज बुद्धिमान् है, उत्तम हैं', यो सोचकर, तुम्हारा
विश्वास करके, जब तुम्हारे भाई यहाँ से गये हैं, तुम ऐसा पापमय व्यवहार क्यो करते हो ?
हाँ, मैं जानती हूँ, असुरो की माया से राम का वध होगा, इसे अच्छी तरह जानकर
अनुचित बुद्धि से, नि शक हो, अपने भाई को दिये हुए वचन की अवहेलना करते हुए मुझे
प्राप्त करने का विचार कर रहे हो, या कदाचित् यह सोचते हो कि मै इसको कैकेयी-
सुत को सौप दूंगा । अपने इस शरीर में मुझे अब प्राणो को रखना उचित नही प्रतीत होता ।
मै तुरत गोदावरी में डूबकर अपना प्राण-त्याग करूँगी । अब अन्य वातो से कोई
प्रयोजन नही है ।"
सीता के ऐसे कठोर वचन कहने पर लक्ष्मण अत्यत क्षुब्ध हो गये । उन्होने राम
का नाम लेते हुए अपने कर्णपुटो पर हाथ रखे तथा चारो ओर देखते हुए बोले—'हे वन-
देवताओ, क्या तुम लोग सुन रहे हो ? सीता कठोर होकर मुझे कैसे पापपूर्ण कटु वचन
सुना रही है ।' इस प्रकार कहकर उन्होने आंखो में आंसू भरे हुए, अब यहाँ रहना
अनुचित समझकर, सीता से कहा—'माता, मै अभी जा रहा हूँ । मैं आपके पति को शीघ्र
ही लिवा लाऊँगा । आप दुखी मत होइए ।'
इसके पश्चात् उन्होने पर्णशाला के चारो ओर सात रेखाएँ खींच दी और कहा—
'माता, इन रेखाओ को पार करके वाहर मत जाइए । यदि कोई इन रेखाओ को पार
करेगा, तो उसका सिर उसी क्षण चूर-चूर हो जायगा ।' तव उन्होने अनल से प्रार्थना की
और उन्हें सीता की रक्षा का भार सौपकर, जानकी को वडी भक्ति से प्रणाम करके वहाँ
से राम की खोज में चल पडे ।
१९. भिक्षुक के वेश में रावण का सीता के पास आना
उसी अवसर की प्रतीक्षा में, अत्यत उद्विग्न होकर रहनेवाला रावण कपट सन्यासी
का वेश धारण करके वहाँ आया । उसके हाथ में दंड और कमडल थे । विशाल ललाट
पर तिलक था, उंगलियो में कुश की पवित्री थी, विशाल उर पर जनेऊ था, दायें हाथ
में रुद्राक्ष की माला थी, और वह गेरुए रंग के वस्त्र पहने हुए था । कई प्रकार की
जपमालाएँ धारण करने से उसकी गरदन एक ओर झुकी हुई थी । उसका गात्र कृश था
और उसके हाथ में एक जीर्ण छत्र था । उसकी वँधी हुई शिखा पीछे की ओर लटक
रही थी । सन्यासी का ऐसा छद्म-वेश धरकर वह उगलियो को गिनता हुआ, कुछ मत्रो को गुन-
गुनाता हुआ, कही मुनि उसे पहचान न जायें, ऐसा मन-ही-मन भयभीत होता हुआ, जरा-
पीडित वृद्ध के समान सिर को किंचित् हिलाता हुआ, थके हुए के समान जहाँ-तहाँ ठहरता
हुआ 'हरि-हरि' शब्द का उच्चारण करके मानो शांति प्राप्त करता हुआ-सा, धीरे-धीरे
पर्णशाला के निकट पहुँचा । वनदेवताओ ने जब देखा कि जगद्रोही वहाँ पहुँच गया है,
तव वे अत्यत भयभीत होकर एक ओर सटककर रह गई ।
२०
१९४ रंगनाथ रामायण
पर्णशाला के सम्मुख खड़े हुए उस कपटवेशधारी को देखकर सीता ने उसे एक
संयमी मुनि समझा । तुरंत अत्यंत भक्ति-युक्त हो, कर-कमलों को जोड़कर उसे प्रणाम किया
और सौमित्र की खींची हुई रेखाओं को पारकर बड़ी भक्ति के साथ उस अभ्यागत का
पूजन-सत्कार किया । तब उस कल्याणी सीता को देखकर उसने कहा—'हे सुंदरी, तुम
ऐसे दुर्गम कानन में किस प्रकार अकेली रहती हो ? पता नहीं, तुम रति हो, या लक्ष्मी
हो, या भारती हो ? नहीं तो पृथ्वी तथा स्वर्गलोक की स्त्रियों में ऐसा सौंदर्य कहाँ ?
तुम्हारा मुख पूर्ण चंद्र की राका का उपहास कर रहा है, तुम्हारे अधर पद्मराग मणियों
को परास्त कर रहे हैं; तुम्हारा शरीर विद्युल्लता को लज्जित कर रहा है, तुम्हारी वाणी
सुधा से भी अधिक पवित्र है, तुम्हारी वेणी जलद की वेणी को परास्त कर रही है,
तुम्हारे सौंदर्य का वर्णन करना मेरे लिए असंभव है । हे तरुणी, तुम्हारे आलिंगन-पाश में
बंधकर सुख-भोग करनेवाला व्यक्ति ही पुरुषों में श्रेष्ठ है । तुम्हारा साहचर्य
प्राप्त करनेवाला व्यक्ति ही पूर्णकामी तथा नित्यकल्याणसंपन्न है । हे कमलाक्षी, तुमको
यहाँ रहते देखकर, हमें आश्चर्य तथा दुःख हो रहा है । हे सुंदरी, तुम कौन हो ? इस
कानन में किस लिए तुम रहती हो ? हमें सारा समाचार कहो ।'
तब सीता ने बड़ी भक्ति से कहा—"हे अनघ, मैं रघुराम की पत्नी हूँ । मेरे
पिता महाराज जनक हैं । महाराज दशरथ मेरे ससुर हैं । मेरा नाम सीता है । उन्नत
कीर्तिवान् रामचंद्रजी अपने पिता की आज्ञा के अनुसार गृह त्यागकर वनवास के लिए
आये, तो मैं और लक्ष्मण उनके साथ चले आये हैं । इस आश्रम में हम तीनों तपस्वियों का-सा जीवन
व्यतीत करते हैं । आज हमने अपने आश्रम के सामने एक स्वर्ण-मृग को चौकड़ी भरते देखा, तो मैंने
अपने पति से उसे किसी तरह ला देने के लिए कहा । इसी हेतु वे गये हैं । उसके पश्चात्,
'हाय लक्ष्मण' का आर्तनाद शूल की तरह मेरे कानों को चुभाते हुए सुनाई पड़ा । भयभीत हो
मैंने लक्ष्मण को भेजा । वह गया हुआ है, किन्तु न जाने अब तक वह क्यों नहीं लौटा ।”
इतना कहकर, उन्होंने उस कपट मुनि को संबोधित करके कहा—'हे अनघ, आपका
शुभ नाम क्या है ? और आप यहाँ क्यों आये हैं ?' तब लंकाधिपति ने अपना कपट
तजकर उनसे कहा—'हे वनजाक्षी, मैं समुद्र के मध्य में स्थित लंका का राजा हूँ । राक्षसों
में श्रेष्ठ हूँ, विश्रवसु का पुत्र हूँ, यक्षेश का अनुज हूँ, दिग्विजयी हूँ । मेरा नाम रावण हैं,
युद्ध में देवता तथा राक्षसों में किसी को भी मारने की क्षमता रखता हूँ । हे सुन्दरी,
मैंने तुम्हारे रूप-सौंदर्य की प्रशंसा सुनी थी, इसलिए बड़े हर्ष से तुम्हें देखने आया हूँ ।
इस अकिंचन मानव के साथ तुम इन घोर वनों में क्यों रहती हो ? हे विशालाक्षी, तुम
अपनी इच्छा से शासन करती हुई अपनी मनोज्ञता को प्रकट करती हुई, अत्यधिक आदर
के साथ, पुष्पक आदि विमानों तथा ऊँची अट्टालिकाओं में सुर, गरुड़, उरग, असुर तथा
सिद्धों की श्रेष्ठ कन्याओं की सेवाएँ प्राप्त करती हुई निवास करो । तुम्हारे चरणों की
कांति मेरे महलों का मणिमय कुट्टिम (फर्श) बन जाय । हे सुंदरी, तुम्हारे कटाक्ष की शोभा
मेरे अंतःपुर की कुमुदिनियों के साथ होड़ लगावे । तुम्हारा मंद हास प्रतिदिन मेरे प्रेम-सागर
के लिए चंद्रिका बन जाय । तुम मेरी लंकापुरी को चलो ।'
अरण्यकांड १५५
इन बातो को सुनकर सीता अत्यत भयभीत हुई । किन्तु वे धीरमना थी, इसलिए
एक तृण हाथ में लिये हुए वे उसे सवोधित करके उसकी बातो का उत्तर देने लगी, मानो
वे उस रावण को तृणवत् मानती हो । वे कहने लगी—'क्यो रे, मुझे श्रेष्ठ पतिव्रता
न मानकर, इस प्रकार कहना, क्या तुम्हें उचित है ? तुम्हारी इच्छा ऐसी दुर्लभ है, जैसे
देवताओ को प्राप्त करने योग्य पूर्णाहुति किसी कुत्ते के लिए दुर्लभ है । तुम श्रीरामचन्द्र
को प्राप्त मुझ पर आसक्त होने का साहस करते हो ? चुपचाप तुम अपने नगर को लौट
जाओ । यदि ऐसा न करके तुम कोई दुराचरण करने का विचार करोगे, तो मेरे पति
राघव, जो विविध शस्त्रास्त्रो के प्रयोग में निपुण हैं, जो अनायास ही, देखते-देखते शिव-
धनुष को भग करने में सफल हुए, और खर-दूषण आदि राक्षसो के शिरच्छेदन करनेवाले है,
तुम्हें तथा तुम्हारे वश को नष्ट-भ्रष्ट कर देंगे । तुम्हारे और उन सूर्यवंशी में उतना
ही अतर है, जितना सियार और सिंह में, मशक तथा दिग्गज में, नाले और समुद्र में,
कौआ और गरुड में अतर होता है । इसलिए अब तुम सुबुद्धि के साथ लका लौट जाओ ।'
इन बातो को सुनकर रावण ने अत्यत क्रोधावेश से अभिभूत हो, भयकर दृष्टि से
जानकी को देखा—और कपट रूप तजकर निज रूप धारण किया । उसके मन में मन्मथ
दीप्त हो रहा था और उसकी दस अवस्थाएँ मानो रावण के दस मणिमय जटा-जूटो से
युक्त सिरो के रूप में दिखाई देने लगी । उसकी बीस भुजाएँ ऐसी दीखने लगी, मानो
मन्मथ की दस अवस्थाओ की इच्छाएँ दुगुनी होकर प्रकट हो रही हो । उसके कमल के-से
बीस हाथ ऐसे दीख रहे थे, मानो उसकी (मदन-प्रेरित) इच्छाएँ पल्लवित हो गई हो !
इच्छा के उन पल्लवो में फूलो के समान शस्त्रास्त्र दिखाई देने लगे । उसके शरीर के विविध
आभूषणो की काति मदनाग्नि की ज्वालाओ के समान दीखने लगी । इस प्रकार भयकर आकार
धारण करके खडे हुए रावण को देख सीता का धैर्य छूट गया और वे भयभीत हो मूर्च्छित
हो गईं । तेज आधी के प्रहार से (पेड से अलग हो) नीचे पडी हुई वनलता के समान
पृथ्वी पर पडी हुई चारुलोचनी सीता को, निर्दयी हो दशकंठ ने, अपने रथ पर
ला रखा । सीता की आंखो से अश्रु-धारा बह रही थी, बाहु-लताएँ भय से काँप रही थी,
उनकी वेणी खुल गई थी, कुच हिल रहे थे, रत्न-हार जहाँ-तहाँ टूटकर उसके रत्न
विखर रहे थे, और भय तथा शोक से उनका सारा शरीर काँप रहा था । ऐसी स्थिति में वह
राक्षस सीता को अपने रथ पर बिठाकर आकाश-मार्ग से यो जाने लगा, मानो दैव-प्रेरित
हो मृत्यु-देवता को साथ लिये जा रहा हो । रास्ते में सीता की चेतना लौट आई, तो
उन्होंने आँखें खोलकर देखा और (सूखे हुए) होठो को आर्द्र करती हुई, अपने विखरे
हुए आँचल को ठीक कर लिया और ऊँचे स्वर में शिशु-कोयल की-सी वाणी में विधि को
कोसती हुई, अपने प्राणेश्वर को पुकारती हुई क्रोध तथा विषाद से सतप्त होकर विलाप
करने लगी ।
२०. जानकी का शोक
सीता कहने लगी—'हे राघवेश्वर, हे रामचन्द्र, हे सूर्यवंशी, हाय ! आपकी पत्नी—
मुझे एक अनाथा बनाकर यह कुटिल राक्षस उठाकर ले जा रहा है । आप शीघ्र आकर
१५६ रंगनाथ रामायण
इसका नाश कीजिए और मेरी लाज बचाइए और मेरी रक्षा कीजिए । अरे राक्षस, यह
निंदा तुम अपने ऊपर क्यो लेते हो ? तुम स्वयं अपनी लका को क्यो भस्म कर देना
चाहते हो ? तुम्हारे लिए यह भयकर अन्याय उचित नही है । क्रोध में राघव तुम्हारा
वध कर डालेंगे । हाय, मैने स्वर्ण-मृग देखा ही क्यो ? मैने अपने प्राणेश को क्यो जाने के
लिए कहा ? (लक्ष्मण के) मना करने पर मैने उसकी वात क्यो नही मानी ? प्रभु मृग
लाने के लिए क्यो गये ? मैने उनकी शक्ति का विचार क्यो नही किया ? लक्ष्मण को
कोसकर जाने के लिए मैने उससे क्यो कहा ? हाय ! होनहार मुझे क्यो चुप रहने देगा ?
इन बातो से क्या प्रयोजन है ? हे भाई लक्ष्मण, तुम अभिमान-धनी हो, मुझे माता के
समान माननेवाले उन्नत गुणवान् हो । सौजन्य की मूर्त्ति हो । ऐसे तुम्हें जो अपशब्द मैने कहे,
उनका फल में अब भोग रही हूँ । क्रोध तज दो और शीघ्र आकर मेरी रक्षा करो ।
हाय कैकेयी ! आपने जो वर माँगे, वे आगे चलकर सफल होगे । आप अपने पुत्र के
हाथ एकछत्राधिकार का अनुभव करते हुए राजभोग कीजिए ।'
इस प्रकार सीता उस राक्षसराज की निंदा करती हुई, रामचंद्र को पुकारती हुई,
भगवान् को कोसने लगी । वह काकुत्स्थवंशी लक्ष्मण की प्रशंसा करती और कैकेयी की
निंदा करती हुई अत्यधिक शोक से कहने लगी—'में मिथलेश्वर की पुत्री, दशरथ की
पुत्र-वधू और राम की पत्नी हूँ, ऐसी मुझे रक्षा करनेवाले जहाँ अनुपस्थित हैं—उस
स्थान से एक राक्षस मुझे उठाकर ले जा रहा है । हे वृक्षो, हे मेरे सहोदरो, आप धरणी-
श्वर (राम) से सारा वृत्तांत कह सुनाइए । हे सुरो, आप सुरवैरी का सामना करके
किसी उपाय से मुझे कैद से छुड़ाइए । हे गोदावरी, बडी भक्ति के साथ में आपके आश्रय
में रहती थी, अब आपको मेरी रक्षा करना उचित है । कम-से-कम आप जाकर भूपति
से यह वृत्तांत सुनाइए । में दुष्ट के हाथो में फँसकर विपत्ति में पड़ी हूँ । हे माता, क्या
आपको मेरी रक्षा नही करनी चाहिए ? हे भूमाता, आप रघुराम भूपालमणि से मेरी
इस दुरवस्था का समाचार बतलाइए । सब प्रकार के लोगो को पुकारते हुए मेरा कठ
सूख रहा है; धैर्य छूट रहा है, प्राण दुःखी हो रहे है । हे किन्नरो, हे पुण्यात्माओ, हे
महात्माओ, हे तपस्वियो, हे खेचरो, हे व्रतियो, हे यतियो, हे वन-पक्षियो, हे सिंहो, हे गधर्वो,
हे नरो, हे सुरो, हे नागेंद्रो, आप (सब) मेरी रक्षा कीजिए ।'
भूसुता विविध प्रकार से व्यर्थ ही शोक करने लगी । पृथ्वी भी काँप उठी, गौतमी
(गोदावरी) ने अपनी गति रोक दी । समस्त प्राणी शोकाकुल हुए । मुनि लोग 'यह अन्याय है,
अन्याय है,' कहते हुए, कपट सन्यासी रावण का स्वभाव जानकर, परिताप करने लगे
और शोकाश्रु बहाने लगे । मृग उनका (आर्त्तनाद) सुनते हुए चरना भूल गये, पक्षी क्रन्दन
करन लगे, पवन की गति मद पड गई; वृक्ष सूखने लगे, सारा आकाश क्षुब्ध हो उठा,
धर्म-देवता यह सोचकर कि अब मेरी रक्षा कौन करेगा, दु खी हुए, वन-देवता शोक-सतप्त हुए,
साधुजन जानकी को देख रोने लगे ।
२१. जटायु और रावण का युद्ध
उस समय अरुण का पुत्र, पक्षिराज तथा महान् साहसी जटायु ने एक पहाड़ पर से
अरण्यकांड १५७
'हाय रघुराम' का आर्त्तनाद स्पष्ट रूप से सुना । यह आर्त्तध्वनि सुनकर उसने भय तथा
आश्चर्यचकित हो, सिर उठाकर सारे आकाश तथा सभी दिशाओ में अपनी दृष्टि दौड़ाई
और मन-ही-मन कहने लगा—'दया-रहित हो रावण उस राम की पत्नी को अपने यहाँ
ले जा रहा है । उस दिन जब से मुझे राम ने देखा, तब से वे मेरे साथ घनिष्ठ मित्रता
का व्यवहार कर रहे हैं । अब इस राक्षस के दुष्कर्मों को सहना ठीक नही है । अपना
शौर्य दिखाकर मै अकेले ही इस राक्षस का वध करूँगा और वैदेही को छुड़ा लाऊँगा या
सूर्यवंशाधिप राघव के लिए युद्ध में अपने प्राण छोड़ दूंगा ।'
ऐसा निश्चय करके, उसने अपने सुदृढ शरीर को बढाकर आकाश की तरफ ऐसे
उछल पडा, जैसे वज्र के वार का सहन न कर सकने के कारण महापर्वत आकाश में उड़
रहा हो । (उसके उड़ते समय) पर्वत-श्रृंग (उसके पैरो का टक्कर खाने से) चूर-चूर
हो गये । उसने अपने मुंह में रखे हुए मास-खंडो को पृथ्वी पर थूक दिया । भयंकर रूप
से उसके नखो में फँसे हुए करि, सिंह, शरभ आदि मृगो के सिर (उसके पैरो से छूटकर
पृथ्वी पर) लुढ़कने लगे । उसकी बलिष्ठ चोंच की दीप्ति तथा पंखो की आभा (चारो
ओर) विकीर्ण होने लगी । अत्यधिक क्रोध से उसकी आँखें प्रचंड दीखने लगी, पंखो के
द्वारा उत्पन्न पवन से पर्वत-शिखरो पर रहनेवाले वृक्ष टूटकर दिशाओ को भरने लगे ।
वह रावण की ओर इस प्रकार आने लगा, मानो रावण के (मन के) तम को दूर करने
के लिए आनेवाला मध्याह्न का सूर्य हो, या बली रावण-रूपी सूर्य को निगलने के लिए
बडे भयंकर रूप से आनेवाला राहु हो, या रावण-रूपी राहु को निगलने के लिए अत्यधिक
वेग से आनेवाला तार्क्ष्य (एक मुनि) हो । जटायु कहने लगा—'हे कुटिल राक्षस, ठहर,
ठहर, आगे मत बढ । तू रघुराम नृपचन्द्र की देवी को कहाँ लिये जा रहा है ? अब कहाँ
ले जा सकेगा ? कहाँ जायगा ? किम ओर जायगा ? यदि तू जाना भी चाहे, तो जाने
न दूंगा, तुझे मै मारूँगा, काटूँगा, खंड-खंड कर दूंगा, दंड दूंगा और पोली लकडी के समान
(तेरे) सिरो को काट दूंगा ।' इसके पश्चात् वह सीता को देखकर कहने लगा—'हे देवी,
दुःखी मत होइए । इस भयंकर राक्षस का वध करके मै आपको इसके हाथो से छुड़ाऊँगा ।'
भयंकर निदाघ के मध्य बादलो का गर्जन जैसे मयूरो को प्रसन्नता पहुँचाता है,
वैसे ही इन वचनो से सीता को कुछ सांत्वना मिली । कुम्हलाये हुए मुंह से, अत्यत दुख
से कुढती हुई सीता बोली—'हे जटायु ! हे भाई ! देखो यह सुरवैरी राम-लक्ष्मण को वंचित
करके घमंड से मुझे उठाकर ले जा रहा है ।' इन बातो को सुनकर अरुणनंदन (गरुड)
क्रोधोन्मत्त होकर रथ के आगे आकर खडा हो गया और प्रलय-काल के बादलो के निर्घोष
की भाँति कठोर वचनो से बार-बार दशकंठ को डाँटते हुए अत्यधिक साहस के साथ कहने
लगा—'हे रावण, तू परम पवित्र ब्रह्मा का पोता है, पुण्यात्मा विश्रवसु का पुत्र है,
कुबेर का भाई है और दानवश्रेष्ठ है, क्या तेरे लिये ऐसा काम उचित है ? तू जगदेकपति
नृप राम की पत्नी को बलात् लिये जा रहा है, यह उचित नहीं है । तुझे तो राम
से लडकर उसके पश्चात् उनकी स्त्री को लाना चाहिए था । उनको धोखा देकर, उनकी
स्त्री को इस प्रकार लाया है । क्या यह कोई शूरता है ? अरे, राम की क्रोधाग्नि तुझे
१५८ रंगनाथ रामायण
तेरे बंधुजनों तथा तेरी लंका को भस्मीभूत कर देंगी। जान-बूझकर क्यों विष पी रहा है ?
क्रोधी सर्प के ऊपर पैर क्यों रखता है ? साठ सहस्र वर्ष की आयुवाले मुझे जानता है
या नहीं ? मैं जटायू हूँ । इस पुण्य साध्वी को मुझे सौंपकर चला जा, अन्यथा मैं तेरा वध
कर दूँगा, अपनी चोंच से तेरे धनुष के टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा और वर्म तथा मर्म को
भेदकर तेरे प्राण ले लूँगा और साथ ही जानकी को मुक्त करूँगा।'
तब उस भयंकर राक्षसश्रेष्ठ ने अपना रथ रोका, क्रोधोन्मत्त हो धनुष की टकार की
और लक्ष्य साधकर जटायु पर घोर अस्त्र चलाये। किन्तु उस वीर विहग ने रुष्ट
होकर उसके बाणों को तोड़ दिया और अपने पक्षों से उसके वक्ष पर आघात किया, ललाट
पर चोंच मारी, कंधों पर पद-प्रहार किया और अपने तेज नखों से उसे अत्यधिक पीड़ा
पहुँचाई। तब उस राक्षसकुलेश्वर ने उस खगराज के पक्षों का लक्ष्य करके दस उग्र
बाण चलाये। जटायु ने अपनी चोंच से रावण के धनुष के टुकड़े-टुकड़े कर दिये, उसकी
ध्वजाओं को नीचे गिराकर उसके मुकुट को भी पृथ्वी पर गिरा दिया, सारथी से जूझकर उसका
पेट चीर दिया, आगे बढ़कर उस राक्षस के रथ के अश्वों को मार डाला और अत्यधिक
क्रोध से उसके रथ को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। तब राक्षसराज कंपित होकर पृथ्वी पर
गिरकर फिर उठा और धरणिजा (सीता) को उठाये हुए अपनी माया की शक्ति से आकाश
में और भी ऊँचा उड़ गया। उसे जाते हुए देखकर जटायु ने उसको रोका और
आकाश-मार्ग में महान् वेग से उस पर आक्रमण किया और कहने लगा—'हे पापी, तू
लुक-छिपकर भले ही किसी भी लोक में चला जा, मैं तुझे तिनके की तरह पकड़कर तेरा
वध कर दूंगा।'
तब अत्यंत रोष से दैत्यराज ने अति भयङ्कर मुद्गर उस पर फेंका। जटायु ने
उसे अपनी चोंच से तोड़ दिया और उसके सिर पर चलते हुए उसे कुचल-सा दिया और
उसके सर के केशों को चुनने लगा। रावण ने क्रोध से, बिना भय या संकोच के, उस पक्षीराज
को दृढ़ता से पकड़कर नीचे अपने सामने रखा, और अपनी भयंकर शक्ति को प्रकट करते हुए
अपनी मुष्टियों के प्रहार से उसे पीड़ित करने लगा। दनुजेन्द्र और विहगेन्द्र के बीच
के उस युद्ध को देख देवता आश्चर्यचकित हुए। तब रावण अपने अद्वितीय पराक्रम को
प्रकट करते हुए अपने अति भयंकर खड्ग को खींचकर जटायु के पंखों और पैरों को
काट दिया। तुरत खगपति धरती पर गिर पड़ा।
उसे इस प्रकार गिरते देख वैदेही दुःखी हो किसी वृक्ष के नीचे खड़ी होकर राम का
नाम ले-लेकर विलाप करने लगी। रावण उस परम पतिव्रता को उठाकर बड़े हर्ष से
आकाश के मार्ग से अत्यंत शीघ्र जाने लगा। ब्रह्मादि देवता तथा मुनि आपस में यह कह-
कर हर्षित होने लगे कि अब दशकंठ अवश्य ही राम के हाथों मारा जायगा और हमारे
मनोरथ सफल होंगे।
आकाश-मार्ग से जब रावण अत्यधिक वेग से जाने लगा, तब सीता के चरण का
नूपुर इस प्रकार पृथ्वी पर गिरा, मानो मुरवैरी के लिए उत्पात की सूचना देनेवाली
उल्का हो। उस रमणी के कुचों पर विहार करनेवाले हार टूटकर इस प्रकार जहाँ-तहाँ
पृथ्वी पर गिरने लगे, मानो जाह्नवी की जल-धारा हो । सीता हाहाकार करती हुई मन-
ही-मन कुढती जाती थी । ऋष्यमूक पर्वत पर सीता ने पाँच बलिष्ठ वानरो को देखा, तो
तुरत अपने वस्त्र का थोडा सा भाग फाडा, उसमें अपने आभूषणो को बाँधा और सोचने
लगी कि कम-से-कम ये मेरे आभूषण राम भूपाल को मेरे हरण का समाचार देंगे, तो
राम के द्वारा दशकंठ का वध शीघ्र होगा । इस प्रकार सोचकर उन्होंने उस पोटली को
उनके बीच गिरा दिया । उन (वानरो) ने उस पोटली को तुरत छिपा दिया ।
दनुजाधिपति (यह सोचकर) भय से व्याकुल हो रहा था कि दशरथात्मज उसका
पीछा करेंगे । इसलिए वह पीछे की ओर देखते हुए, भय-विह्वल होते हुए, शीघ्र ही समुद्र
पार कर गया और लका में जा पहुँचा । उस समय कितने ही मृत्युसूचक अपशकुन दिखाई
पडने लगे । वह लका पहुँचकर अनुपम तथा विविध भोगो का आगार अपने महल में गया
और बडे गर्व के साथ जानकी को अपनी सारी संपत्ति दिखाई ।
२२. जानकी को अशोक-वन में रखना
तत्पश्चात् रावण ने बडे हर्ष से सीता से कहा—'हे कमलोचनी, ये मेरे भवन हैं,
यह मेरा धन है, ये मेरे तुरग हैं, ये मेरे गज हैं । यह वे मेरे दिव्य आभूषण हैं,
जिन्हें मैंने सभी देवताओ को परास्त करके प्राप्त किया था, यह पुष्पक-विमान है, जिसे
मैंने कुबेर को जीतकर प्राप्त किया था, ये चारण, अमर, सिद्ध तथा साधको की पत्नियाँ हैं,
जो अलग-अलग मेरी सेवा करती रहती हैं । ये स्त्रियाँ वे हैं, जो घमंडी होकर मेरी
बात स्वीकार नहीं करने के कारण कारागार में तडप रही हैं । वह देखो, नाट्यशाला है,
वह क्रीडा-वन है, ये चन्द्रशालाएँ हैं । तुम इन सब की स्वामिनी होकर अनुपम गति
से समस्त वैभवो का उपभोग करो ।'
तब सीता एक तृण-खंड को हाथ में लेकर, रावण की उपेक्षा करती हुई कहने
लगी—'अरे मूर्ख, तुम्हारा यह पाप तुम्हें यो ही नहीं छोडेगा । वह भयंकर अग्नि बनकर
तुम्हें दग्ध कर देगा । तुम और तुम्हारे बंधु-बांधव अब बहुत दिनों तक जीवित नहीं
रह सकेंगे । अवश्य ही नष्ट हो जायँगे । यह सत्य है । जबतक राम की बाणाग्नि की राशि
में गिरकर तुम्हारा शरीर जल नहीं जायगा, तबतक तुम्हारे ये पाप कैसे कटेंगे ?' फिर
सीता बार-बार परिताप करती हुई बोली—'तुमने आज मुझे ऐसे कलुषित वाक्य सुनाये,
जिनसे मेरा सारा महत्त्व जाता रहा । मेरे गर्व ने मुझे ऐसा कर दिया, मैं अपने भाग्य
को कैसे रोऊँ ?' यो कहती हुई वह उच्च स्वर में रुदन करने लगी । (यह देखकर)
राक्षस-वल्लभ मन-ही-मन बहुत क्रुद्ध हुआ और त्रिजटा आदि स्त्रियो को बुलाकर उन्हें
सीता को दिखाते हुए कहा—'तुम लोग बडी सावधानी से इसकी रक्षा करती रहो और
मुझसे विवाह कर लेने का उपदेश देती रहो । उचित यत्न के साथ इस रमणी को अशोक-
वन में रखो ।' यो कहकर उसने उन्हें भेज दिया और काम-पीडित मन से व्याकुल रहने लगा ।
२३. श्रीराम का दुःख
माया-मृग का वध करने के पश्चात् राम ने और एक हिरन का वध किया और
उसके मांस तथा चर्म को लेकर बड़े हर्ष से लौट रहे थे । सियारो का चिल्लाना सुनकर,
१६० रंगनाथ रामायण
-(मन-ही-मन) वे व्याकुल होते हुए बडी तेजी के साथ निश्वास भरते हुए आ रहे थे कि
वन के मध्य में उन्होने लक्ष्मण को देखा । लक्ष्मण को देखते ही वे अत्यत भय-विह्वल
हुए और बोले—'हाय लक्ष्मण, अत्यत धीर तथा विवेकी होकर भी मेरी आज्ञा के बिना,
सीता को वन में अकेली छोडकर तुम कैसे आये ? तुम इस तरह क्यो आये ? क्या, तुम
नही जानते कि इस पृथ्वी पर रहनेवाले सभी राक्षस हमारे शत्रु है ? भाई, क्या तुम्हें
वंश-मर्यादा, धर्म तथा गुरुजनो की हानि का विचार नही करना चाहिए था ?'
इन बातो को सुनकर लक्ष्मण अत्यत भयभीत हुए । काँपते हुए उन्होने हाथ जोडकर
कहा—'हे प्रभो, त्रिलोकीनाथ, मैं जानता हूँ कि मेरा इस प्रकार चला आना उचित नही है।
जिस कुटिल राक्षस ने माया-मृग के रूप में आपको भटकाकर निदान आपके दिव्य
बाणो की अग्नि-शिखाओ से प्राणत्याग किये, उसने मरते समय 'हाय लक्ष्मण' कहकर
आर्त्तनाद किया । वह आर्त्तनाद जब सीताजी के कानो में पडा, तब वे अत्यत भयभीत हुई
और आपकी श्रेष्ठता को सर्वथा भुलाकर कहने लगी—'भाई लक्ष्मण, क्या बात है ? कुछ
पता लगाओ । हे सौमित्र, तुम्हारे भाई कभी ऐसा दीन आलाप नही करते ।' तब मैने
उनसे कहा—'माताजी, हमारे मन में भय उत्पन्न करने के निमित्त ही क्रूर राक्षस ने ऐसी
पुकार मचाई होगी । कहाँ सूर्य-वंश के अधीश्वर और कहाँ दीन वचन, माताजी आप
विचलित मत होइए ।' तब देवी मुझे अपशब्द सुनाती हुई कोसने लगी और मैं मन ही मन
दुःखी हुआ और वन-देवताओ के सरक्षण में उन्हें छोड़कर यहाँ चला आया । इसलिए प्रभो,
आप इसे मेरी त्रुटि न मानें ।'
इस प्रकार कहते हुए अश्रुपूरित नयनो से लक्ष्मण ने अपने भाई को प्रणाम किया ।
राम ने अपने अनुज को बड़े स्नेह से उठाया, आँखो से गिरनेवाले अश्रुजल को पोछा, और
अत्यत दुःखी होते हुए बोले—'हे तात, आजन्म पवित्र, सर्वज्ञ जनक महाराज की पुत्री होती
हुई, उस प्रख्यात पुण्यशीला सीता का ऐसे वचन कहना ही सभी विपत्तियो का
कारण है—ऐसा विचार करके तुम्हें तो वही ठहर जाना चाहिए था । तुम्हारे जैसे व्यक्ति को
विचलित नही होना चाहिए था ।'
इस प्रकार, सौमित्र को सात्वना देकर राम ने अपनी आश्रम-भूमि में प्रवेश किया और
(उसे सर्वथा निस्तब्ध पाकर) बोले—'हे लक्ष्मण, यह कैसी बात है कि यह आश्रम सर्वथा
शून्य दीख रहा है । वन-देवताओ के हर्ष भरे वचनो की ध्वनि सुनाई नही पड रही है ?
पक्षियो का कलरव नही सुनाई पड़ रहा है । मुनिजनो का सचार यहाँ नही दीख
रहा है ? सीता (मेरे स्वागतार्थ) आगे आती नही दीख रही है ? मेरा मन अत्यत दीन
तथा व्याकुल हो रहा है । आज मेरी बाईं आँख न जाने क्यो फड़क रही है । हाय,
इस वन में न जाने हम दोनो कैसा दुख भोगेंगे ?'
इस प्रकार कहते हुए वे पर्णशाला के पास पहुँचे और दिनकर-रहित दिन-लक्ष्मी के
समान, निशाकर-विहीन रात्रि के समान, सारिका-रहित पिंजडे के समान, कोयल-रहित
आम्र-वृक्ष के समान, देखने में विवर्ण तथा कांतिहीन दीखनेवाले उस पर्णशाला को देखकर
वे मन-ही-मन बहुत अधीर हुए । व्याकुलता के कारण उनका मुख विवर्ण हो गया,
अरण्यकाण्ड १६१
आँखो से अश्रु ऐसे बहने लगे, मानो शोक-रस ही प्रवाहित हो रहा है। वे अपने सूखे
ओठो को आर्द्र करते हुए भग्न हृदय से अपने अनुज को देखकर बोले--'हे लक्ष्मण मैने
अच्छी तरह देख लिया, पर्णशाला में कही भी भूमिसुता का पता नही है। कदाचित्
पुष्प-चयन के लिए गई हो अथवा हमें ढूँढ़ती हुई किसी दूसरे मार्ग से चली गई हो।
पता नही, सरोवर में जल-क्रीडा करने गई हो या अत्यत भयभीत हो कही सतप्त हो रही हो,
निकट पहुँचनेवाले वाघो के भय से कही छिप गई हो अथवा क्रोध से कही अकेली
चली गई हो। मुझे तो कुछ भी मालूम नही हो रहा है कि वह कहाँ गई, जो भी
हो यहाँ तो नही है।'
इस प्रकार तर्क-वितर्क करते हुए उन्होने पर्णशाला के भीतर प्रवेश करके सब स्थानो
में ढूँढ़ा। किन्तु कही भी जानकी को न पाकर उनका मन अत्यधिक सतप्त होने लगा,
शरीर निश्चेष्ट हो गया, ज्ञान-रूपी रवि-शोक-समुद्र में अस्त होने से भ्रान्ति-रूपी अधकार ने
व्याप्त होकर उनके अंतरग तथा नेत्रो को ढक लिया, धैर्य को आवृत कर लिया और
अभिमान को घेर लिया। वे व्याकुल होकर भूमि पर लोट गये। उन्होने यह भी नही
सोचा कि मै पहले ही सीता के (वनवास) दुख से चिंतित हूँ, अब मुझे यह दुख भी
सहना पडा। यह दुख मुझे कैसे प्राप्त हुआ ? कैसे मै इस दुख को पार करूँगा ? हम
क्यो इस वन में आये ? अब मै इससे (लक्ष्मण से) क्या वात कर सकता हूँ ? मै इसका
अग्रज हूँ, यह मेरा अनुज है, हम दोनो इस दुख का भार कैसे वहन करेंगे ?'
इन बातो का विचार किये बिना वे मन-ही-मन क्षुब्ध होकर मदन-पीडित उन्मत्त की
तरह चारो ओर निरुद्देश्य दृष्टि से देखते हुए, अपने महत्त्व को भी भूलकर प्रलाप करने लगे।
वे कभी चिल्लाते—'हे तनुमध्ये (पतली कमरवाली) । इतनी देर तक तुम कहाँ हो ?
शीघ्र आओ।' फिर ऐसी चेष्टाएँ करते, मानो वे आ गई हो और उनका आलिंगन
कर रहे हो। तुरन्त दुखी होते, फिर धीरे-धीरे उनको साल्वना देते। थोडी देर में जब
किंचित् चेतना लौट आती तो कहते--'हाय सौमित्र, अवनिसुता न जाने कहाँ चली गई ?
क्या हो गया उसे, उसके पद-चिह्नो के अनुसार चलकर ढूँढ़ने पर भी वह दिखाई नही
देती, वह पर्णशाला में भी नही है। वह कमललोचनी न जाने किस दिशा में गई है ?
क्या यह दण्डकवन नही है ? क्या यह (हमारा) निवास-स्थान नही है ? क्या यह (हमारी)
पर्णशाला नही है ? क्या मै राम नही हूँ ? तब तो उस चचलाक्षी से विछुडकर मेरे प्राण
अभी क्यो टिके हुए हैं ? उसके वियोग-दुख से यदि मै प्राणो का मोह त्यागकर मर जाऊँ,
तो महाराज दशरथ तो यही सोचेंगे कि यह कैसा पुत्र है, जो व्रत को पूर्ण किये बिना ही
चला आया है ? ऐसी दशा में क्या वे मेरा आदर करेंगे ? ऐसा नही करके यदि मै
व्रत को पूर्ण करके, राज्य करने के लिए राजधानी को लौट जाऊँ और मिथिलेश्वर वहाँ
आयें तो, उन्हें देखकर क्या मै लज्जित नही होऊँगा ? इसलिए तुम मुझे इस कानन में
ही छोडकर राजधानी को लौट जाओ और भरत से कहो कि वह अपनी इच्छा से समस्त
पृथ्वी का शासन करे और माता कैकेयी, सुमित्रा तथा कौशल्या को जानकी के खो जाने
का तथा मेरा समाचार कहो। मेरी बात मानो।'
२१
१६२ रंगनाथ रामायण
इस प्रकार कहते हुए राघव ने अपनी आँखें ऐसे वद कर ली, मानो वे इस समाचार
को मन से वाहर जाने नही देना चाहते थे कि सीता पर्णशाला से अदृश्य हो गई हैं ।
तब लक्ष्मण सारी स्थिति देखकर अत्यधिक शोक से विलाप करने लगे—'मैं अब
किस माता की सेवा करूँगा ? किस माता की आज्ञा का पालन करूँगा ? किसे मैं अपनी
माता के समान मानूँगा ? सूर्यवंश-तिलक के शोक को कैसे शान्त करूँगा ? सभी माताओ
तथा भाइयो के लिए, इनके साथ का जीवन ही जीवन है (ये यदि न रहें, तो दूसरे कैसे
रह सकेंगे) । हाय ! अब तो मनुवंश का ही अंत हो गया ।'
इतने में राम की चेतना लौट आई । उन्होंने उमड़ते हुए शोक से दण्डकवन के
चारो ओर एक वार दृष्टि दौड़ाई, और आँखो में आँसू भर लिये । सीता का स्मरण
करते ही उनका दुःख दुगुना हो गया, धैर्य के छूट जाने से मन और भी शोकाकुल हुआ।
वे बोले—"हाय सीता, तुम चली गईं । तुम अपने शरीर को मेरे इस शरीर से अलग
करके इसे यहीं छोड़कर चली गईं ? सुर तथा असुरो के लिए पूजनीय है, इसका भी
विचार नहीं करके मैंने तुम्हारे लिए शिव-धनुष को भंग कर दिया था । परशुराम ब्राह्मण हैं
इसका भी विचार नहीं करके मैंने उन्हें शत्रु समझकर उनका गर्व भग किया था ।
हे कमलाक्षी, तुम्हारे लिए मैंने इन दोनो निंदाओ को अपने ऊपर ले लिया है । अत मैं
क्रूर दैव ने तुम्हें मुझसे अलग किया है । मैं तो केवल निंदा प्राप्त करने के लिए
रह गया । तुम्हारे मन की अभिलापा देखकर, उसे पूर्ण करके तुम्हें आनन्दित करने के लिए
मैं गया, उस माया-मृग का वध करके उसका चर्म लाया हूँ । अब मैं प्रेम से वह (चर्म)
किसको दूँ ? सब सुखो को भुलाकर, मेरा विश्वास करके मेरे साथ वन में आई हुई
तुम्हारी रक्षा मैं नही कर सका । तुम्हारे जाने का मार्ग जानकर, तुमसे शीघ्र आकर मिल
न सका । समस्त जगत् का गासन करने की महान् शक्ति रखनेवाले के समान शर-चाप
धारण करके इस घोर वन में रहने आया और मूर्ख मति से अपने पूर्वजो की महत्ता को
भी भुलाकर, आज तुम्हें खो बैठा हूँ । हे मृगलोचनी, तुमसे बिछुड़कर मैं इस शरीर में
अपने प्राण कैसे रोक सकूँगा ? हे भूमिसुते ! इस भूमि को छोड़कर मैं और किस स्थान
पर इस शरीर को धारण कर सकूँगा ? हे सुंदरी, तुम्हारी विरहाग्नि तुम्हारे सौंदर्य-सागर
में डूबे विना बुझेगी नही । तुम्हारे शरीर-रूपी नौका के बिना, इस शोक-समुद्र को कैसे
तर सकूँगा ? तुम्हारे कुचो की आड के विना मैं कामदेव की शर-वृष्टि को कैसे सह सकूँगा ?
भगवान् मुझे उस तरफ ले गया और तुम्हें इस तरफ । हम दोनों को अलग करनेवाले
भगवान् के लिए क्या असंभव है ? हे कोमलागी, तुम्हें उठाकर ले जाते समय; तुमने
क्या कहकर विलाप किया था ? तुमने मुझे क्या कहा था ? तुम किस देश में चली गई हो ?
कहाँ रहती हो ? कैसा दुःख भोग रही हो ? क्या कर रही हो ? कौन तुम्हें ले
गया है ? किस मार्ग से गई हो ? हाय, हमारी कैसी दशा हो गई है । तुम्हारी जैसी
निपुणा, तुम्हारी जैसी मुग्धा, तुम्हारी जैसी सौंदर्य-निधि कहाँ है ? तुम्हारे साथ रहते
एक दिन जी भरकर सुख भोगने का सौभाग्य (अब) मिलेगा क्या ? हे जलजनयनी,
तुम्हारे साथ रहने पर मैं यही अनुभव करता था कि साकेतपुरी में ही रह रहा हूँ ।
हे पिकवयनी, तुम्हारे सग रहने पर मै अपने को स्वर्ण-महलो में रहनेवाले के समान ही
समझता था । हे सुदरी, मै तुम्हारे सहवास में अपने को समस्त भोगो को प्राप्त करता
हुआ-सा अनुभव करता था । तुम्हारे साथ रहते हुए सब प्रकार के सुख-भोगो को भोगता
हुआ-सा मानता था । आज ही मुझे ज्ञात हो रहा है कि यह महाकानन है, यह पर्ण-
शाला है, यह तपस्या है, यह दुखमय जीवन है । हे राजकुमारी, हे मृगनयनी, हे कमलाक्षी,
हे लतागी, मै कैसे सतप्त हो रहा हूँ । फिर भी तुम सहानुभूति का एक शब्द भी नही
कहती हो ? आज दैव ने तुम्हारे मद गमन की शोभा हंसो को, ललित चरणो की कान्ति
प्रवालो को, उन्नत कुचो की शोभा चक्रवालो को, करो का अरुण राग पद्मो को,
तन की कान्ति नये जलद की बिजली को, आंखो का वैभव मछलियो को,
शीतल मुख की शोभा चद्र को, उज्ज्वल हँसी चद्रिका को, मधुर भाषण तोते को,
केशो की कान्ति भ्रमरो को, कटि की कृशता आकाश को, देकर तुम्हें निगल लिया है ।
हे वामलोचनी ! हे पद्मगंधी ! हे कमलमुखी ! हे सीते !" कहते हुए दुख-विवश हो
राम भूपाल अत्यधिक व्याकुल हुए । उसके पश्चात् अत्यत दीन होकर वे अपने अनुज को
देखकर बोले- 'हे लक्ष्मण, वह इदीवराक्षी न जाने किस ओर गई है । क्या हम उसे
खोजते हुए चलें ? वह इन लता-समूहो में न जाने कहाँ लीन हो गई है, क्या हम उसे
पुकारें ? वह पृथ्वी की कुमारी न जाने किन पेडों की आड में छिप गई है, क्या हम
चलकर देखें ? वह शुक- जुवाणी न जाने किन सरोवरों में (स्नान करने) गई है, क्या
हम उसका पता लगाने जायें ?' इस प्रकार बार-बार अत्यत दीनालाप करते हुए,
मन-ही-मन खिन्न होते हुए वे असह्य वेदना से पीडित होने लगे ।
(तत्पश्चात्) वे गौतमी के किनारे पहुँचे और उसे सबोधित करके कहने लगे-
'हे लोकपावनी, हे लोकमाता, लोकपावनी सीता का पता क्या आप जानती हैं ? हे लोक-
वधु, हे कर्मसाक्षी (सूर्य), क्या आप जानते है कि सीता कहाँ है ? हे जगत्प्राण, हे सब
स्थानो में सचार करनेवाले (पवन) क्या आप भी नही जानते कि सीता कहाँ है ? हे
लताकुमारी, क्या तुम नही जानती कि वह लतागी कहाँ है ? हे जलज, क्या तुमने उस
जलजातगधी को नही देखा ? हे सिंह, क्या, तुमने उस सिंहमध्या (क्षीण कटिवाली) को
नही देखा ? हे गजराज, क्या तुमने उस गजगामिनी को नही देखा ? हे हरिण, क्या
तुमने उस हरिणाक्षी को नही देखा ? हे पिक, क्या तुमने उस पिकवयनी को नही देखा ?
हे भ्रमर, क्या तुमने उस नीलवेणी को नही देखा ? हे तिलकवृक्ष, क्या तुमने उस तिलक
से अलकृत मुखवाली को नही देखा ?' इस प्रकार भ्रान्त हो, राघव जहाँ-तहाँ जाकर सीता
को ढूंढने लगे, पर कही भी वैदेही का पता न मिलने से, विरहाकुल तथा विवश होकर
रह गये ।
२४. लक्ष्मण का राम को सांत्वना देना
ऐसे दुःखी होनेवाले अपने भाई को देखकर लक्ष्मण ने उनसे कहा- 'हे भाई, आप
समस्त लोको के लिए आराध्य है, उदात्त चित्तवाले है, महान् बलशाली हैं, अपनी स्त्री
के लिए इस प्रकार आप शोक करें, यह उचित नही । हे सूर्यवशाधिप, इस प्रकार का मोह
१६४ रंगनाथ रामायण
तथा शोक आपको क्यो ? यह संसार तो तमोगुण से आवृत है । आप यदि धनुष अपने
हाथ में लें, तो देवता भी आपको देखकर दूर जायेंगे । हे अखिलेग, आप अद्वितीय शक्ति-
शाली हैं । मेरे जैसा व्यक्ति आपका सेवक है । आपके लिए असाध्य क्या हो सकता है ?
आप अपने महत्त्व का विचार क्यो नही करते ?'
तब राम ने अपने आपको सँभाल, शोक तज दिया और अपने भाई को देखकर
बोले—'अब मै जानकी का वियोग किसी भी प्रकार सहन नही कर सकता । मैं अपने
दुर्वार बाणो के सतत प्रयोग से सारी पृथ्वी को चीरकर, पातालवासियो को पीडित करके,
चंद्रमुखी सीता को प्राप्त करूँगा या सप्त समुद्रो को आलोडित करके भूधरो को चूर-
चूर करके, दिग्गजो के कुंभ-स्थलों को फाडकर भूमिसुता को प्राप्त करूँगा । या सभी दिक्-
पालों के हृदयो को चीरकर, सूर्यविम्ब को तोडकर, नक्षत्रो को चूर-चूर करके सारी
पृथ्वी को अधकार में डुबोकर अपनी स्त्री को प्राप्त करूँगा-या अपने दिव्यास्त्रो का
प्रयोग करके सभी राक्षसो को भस्म कर दूँगा, पृथ्वी को राक्षस-रहित कर दूँगा और
वैदेही को साध लूँगा (प्राप्त कर लूँगा) । या समस्त ब्रह्मलोक को छानकर, आदि ब्रह्मा
का सहार करके, सभी प्राणियो में भय उत्पन्न करके, अपने पराक्रम से अपनी स्त्री को
प्राप्त करूँगा । यदि मै अपने बाहुवल का प्रदर्शन नही करूँ, तो क्या, यो ही सुरगण सीता
का पता बतायेंगे ? यह देखो, सभी भुवनो को कँपाती हुई मेरे बाणो की अग्नि-ज्वाला
दीप्त हो रही है । लो, सीता को देखो, मै अभी सीता को ऐसे प्राप्त करूँगा कि सभी
देवता मेरी प्रशसा करने लगेंगे ।'
इस प्रकार कहते हुए उनकी भौंहें ऐसी तन गईं, मानो वे सभी लोको के लिए
उत्पात की सूचना दे रही हो । सभी जीवो के साथ समस्त ब्रह्माण्ड को चूर-चूर करनेवाला
मकर्षण रूप उन्होने धारण किया और प्रलयकाल के रुद्र की भाँति क्रुद्ध होकर धनुष
हाथ में ले लिया । तभी सभी जीव भयभीत हुए, सारी पृथ्वी थरथराने लगी, सभी लोक
व्याकुल हुए, आकाश हिलने लगा, ब्रह्माण्ड मानो टूटने लगा, ब्रह्मा का मत्र मिट गया,
रवि पथ-भ्रष्ट हो गया; नक्षत्र टूटने लगे, शिव भी भयभीत हुए और यक्ष, देव तथा
असुर विचलित हुए ।
तब लक्ष्मण राम के निकट पहुँचकर अत्यधिक भय से, हाथ जोडकर बोले—
'हे प्रभो, आप करुणानिधि हैं; लोक रक्षण-कला में प्रवीण हैं । जनकजा के लिए सभी लोको
का समूल नाश कर देना, क्या आपके लिए उचित है ? एक-एक वन में, सभी समुद्रो में,
जनाकीर्ण नगरों में तथा समस्त देशो में वैदेही को बिना थके ढूँढन के उपरान्त
भी यदि वे नहीं मिली, तब आप अपने क्रोध तथा पराक्रम से उनको प्राप्त कर
सकते हैं ।'
इस प्रकार लक्ष्मण के कहने पर राम ने उनकी बातें बडे स्नेह से मान ली, क्रोध
तजा और धनुष को रख दिया । उनके पश्चात् अखिलेग राम अपने अनुज के साथ दक्षिण
दिशा की ओर चल पड़े । उस समय मार्ग में जहाँ-तहां मीता की वेणी से गिरे हुए फूल,
उस तन्वी के वक्षोजों पर विलसित हारों के रत्न, उनके मणिमय चरण-नूपुर पृथ्वी पर
पड़े हुए देखकर राम अत्यधिक शोक से अभिभूत हुए । उन्होंने विचार करके निश्चय कर
लिया—हाय, निश्चय ही कोई क्रूर दानव उस कुटिल-कुंतला सीता को उठाकर ले गया है ।
यो चिंतित होते हुए वे मार्ग में अन्वेषण करते हुए थोड़ी दूर आगे बढ़े । मार्ग में
जहाँ-तहाँ राक्षस के चरण-चिह्नों को देखते तथा उनका अनुसरण करते हुए वे कुछ दूर
गये । वहाँ उन सूर्यवंशजो ने एक स्थान पर कटे हुए पख, रक्त के कीचड में मृत पड़े
हुए सारथी, उसपर टूटकर गिरे हुए रथ, रथ के पास कटकर गिरे हुए अश्व, पृथ्वी पर
बिखरे हुए पताका के खंड, उनके सामने ही गिरे हुए धनुष के खंड, छितराये हुए अस्त्र-
शस्त्र देखे । (इन सब वस्तुओ को) लक्ष्मण के दिखाने पर राम विस्मित हुए और सोचने
लगे कि किन्ही ने यहाँ पर युद्ध के आनन्द का उपभोग किया है ।
२५. जटायु का अग्नि-संस्कार करना
उक्त योद्धा का पता लगाने के उद्देश्य से रघुराम उस मार्ग में जहाँ-तहाँ ध्यान से देखते
हुए आगे बढे । उस स्थान के निकट ही पख और पैर कटे हुए, रक्त में डूबे, वज्र के
आघात से गिरेहुए मैनाक पर्वत की भाँति विवश पड़े हुए विहगेन्द्र (पक्षिराज) को देखकर
राम ने कहा—'हे लक्ष्मण, देखा तुमने ? चपलराक्षस सीता को निगलकर, अपना निज
रूप दिखाने से डरकर पक्षी के रूप में यहाँ पडा हुआ है । भय से तडपनेवाले इसका वध
मैं कर डालूँगा ।' यो कहते हुए वे धनुष हाथ में लिये उस पक्षी पर आक्रमण करने को
उद्यत हुए । उन्हें देखकर पक्षिराज ने रक्त का वमन करते हुए, लबी साँस भरते हुए,
गद्गद कठ से कहा—'हे राजन्, मैं आपके पिता का मित्र हूँ, कश्यप ब्रह्म का पौत्र हूँ,
अरुण का पुत्र हूँ तथा जटायु नामधारी हूँ । मै इन घने वन तथा शैल-शृंगो पर निवास
करता हूँ । मैंने अपना सारा वृत्तान्त आपको इसके पहले स्पष्ट रूप से निवेदन कर ही
दिया था । हे पुण्यात्मा, ऐसे मुझे यह विपत्ति क्यो कर आई, उसका भी विवरण सुन
लीजिए । आज रावण आपकी देवी को चुराकर लिये जा रहा था, तो मैने उसको रोका
और अपनी अमित शक्ति के साथ उससे युद्ध करके बुरी तरह घायल होकर पृथ्वी पर पड़ा हूँ ।
यह उसका केतु, सूत तथा अश्वो से युक्त रथ है । युद्ध में मेरे द्वारा ये नष्ट
हुए है । तब क्रोध से वह क्रूर राक्षस सीता को उठाकर आकाश-मार्ग से चला गया ।
आप तो आये नही । (अब) मै आपको यह समाचार सुना सका, आपकी शुभ मूर्ति के
दर्शन कर सका । मै पुण्यवान् हुआ ।'
तब राघव का शोक द्विगुण हो उठा । उन्होंने धनुष को फेंक दिया और मूच्छित
होकर धरती पर गिर पड़े । सौमित्र की परिचर्या के उपरान्त उनकी चेतना लौटी, तो वे
बोले—'हाय, महात्मा जटायु ! मेरे कारण आप पर यह विपत्ति आई है ।' उन्होंने
जटायु के शरीर पर हाथ फेरा, और सारा रक्त स्वय पोछा और अपने अनुज को देखकर
बोले—'लक्ष्मण, इन्होंने हमारे लिए रावण का सामना करके इस प्रकार युद्ध किया है ।
ऐसे पुण्यात्मा कहाँ मिल सकते है ? इनके स्वर्ग सिधारने के पहले ही तुम इनसे पूछ लो
कि रावण की राजधानी को जाने का क्या मार्ग है, उसकी शक्ति आदि कितनी है ।'
तुरन्त लक्ष्मण ने रघुराम के कार्य में सहायक जटायु से उस सुरवैरी की शक्ति आदि
१६६ रंगनाथ रामायण
के संबंध में कई उचित प्रश्न किये । तब जटायु ने कुछ बातें बताईं, किन्तु कंठ से फिर
से रक्त बहने के कारण आगे बोल न सके । तब उन्होंने अतुल पुण्यात्मा राम को देखा
और मन में उनका सतत स्मरण करते हुए बड़े आनन्द से मोक्ष-मार्ग को सामने देख
पुलकित होकर प्राण त्याग दिये । राजकुमार उनकी मृत्यु पर, महाराज दशरथ की मृत्यु
से भी अधिक दुःखी हुए और वेद-विधि से उस पक्षिराज का दाह-संस्कार किया ।
२६. कबंध का वध
वहाँ से वे दोनो क्रौंचवन की ओर बढ़े और वहाँ नाना लता, वृक्ष, नग तथा
मृग से भरी एक घाटी में से होकर जाने लगे । वहाँ एक स्थान पर 'अयोमुखी' नामक
एक राक्षसी को देखा । उसके केश पके हुए थे, दाढ़ें लंबी थीं, उदर विशाल था, मुँह
बहुत बड़ा था, आँखें उभरी हुई थीं और कुच घुटनों तक लटक रहे थे । उसकी चेष्टाएँ
पागलो की-सी थीं । उसने सुंदर आकार तथा शुभ लक्षणो से समन्वित लक्ष्मण को देखा,
तो उनपर आसक्त हो गई और उनका हाथ पकडकर रति-क्रीडा के लिए उनसे आग्रह
करने लगी । उन्होंने उस राक्षसी को तलवार की सहायता से वही सुख दिया, जो उन्होंने
शूर्पणखा को दिया था ।
इसके पश्चात् उन्होंने दुंदुभि, पटह तथा तूर्य आदि की ध्वनि से भी अधिक ध्वनि
अपने आगे सुनी । उसके संबंध में जानने के लिए दोनो राजकुमार आगे बढे । वहाँ उन्होंने
एक ऐसे राक्षस को देखा, जिसकी बाँहें एक योजन लंबी थी । वह अपनी बाँहो को फैला-
कर उनके बीच फँसनेवाले किसी भी जंतु को पकडकर तुरंत ही निगल जाता था और
डकार लेता था । उसका सिर बहुत छोटा था और उसका पेट ही उसका मुँह था । इस
प्रकार का आकारवाला, बहुत से जीव-जतुओ का नाश करनेवाला, देवताओ को कष्ट
पहुँचानेवाला मदांध कबध नामक राक्षस को देखकर राम-लक्ष्मण आश्चर्यचकित हुए ।
उसने भी अपने दोनो करो से उन दोनो को पकड़ लिया और अपनी ओर खींचने लगा ।
उस समय अपने अग्रज को देखकर लक्ष्मण ने कहा- 'हे भाई, आप मुझे इस राक्षस का आहार
बनाकर सीता के अन्वेषण में चले जाइए और उन्हें प्राप्त करके समस्त ससार का शासन
करने के लिए (अयोध्या) लौट जाइए ।'
लक्ष्मण की बातो पर विचार करते हुए राम उस राक्षस के हाथो के साथ थोडी
दूर गये । उसके पश्चात् राम तथा उनके भाई दोनो ने खूब सोच-विचार करके अपनी
म्यानो से खड्ग खींचे और उन तेज खड्गो से उस राक्षस के दोनो हाथ काट डाले ।
राक्षस का सारा गर्व चूर-चूर हो गया । वह धरती पर लोट गया और
थोडी देर के बाद सँभलकर उसने उन लोगो से पूछा कि आप कौन हैं ? तब लक्ष्मण ने
श्रीराम का सारा वृत्तांत कह सुनाया, तो उसे (अपने पूर्व जन्म का) ज्ञान हो आया और
वह अपना वृत्तांत सुनाने लगा । (उसने कहा) - "महाराज, मैं दनु नामक स्वर्ग का निवासी हूँ ।
एक महात्मा मुनि के शाप के कारण मै ऐसा हो गया हूँ । मैंने ब्रह्मा से कामरूपत्व
(इच्छानुसार रूप बदलने की शक्ति) तथा चिरायु प्राप्त की और उस गर्व मे ऐसा रूप
धारण करके सभी संयमी जनो को दुख देने लगा । इस सिलसिले में स्थूलशिर नामक
मुनि का अपकार करके मैंने यह भयकर रूप प्राप्त किया । फिर मेरे प्रार्थना करने पर
उस मुनि ने कहा कि आपके द्वारा मेरी शाप-मुक्ति होगी । मैने उस वचन को स्मरण
रखा और इस रूप को धारण करके इन्द्र को युद्ध के लिए न्योता दिया । उसने अपने
वज्र के प्रहार से कठ-सहित मेरे सिर को मेरे पेट में दवा दिया ।”
तब रामचंद्र ने उससे पूछा, 'हे अनघ ! क्या तुम रावण की शक्ति के बारे में
जानते हो ?' तब उसने कहा—'मै तो जानता हूँ, लेकिन मुनींद्र के शाप के कारण मेरा
ज्ञान कुंठित हो गया । आप मेरे शरीर को अग्नि में जलाइए, तो उसके पश्चात् मै सब
कुछ आपको सुना सकता हूँ ।'
उन्होंने अपने धनुष की सहायता से ही उसके शरीर का अग्नि-सस्कार किया ।
तब वह देवता का रूप धारण करके आकाश-मार्ग में एक सुन्दर विमान पर बैठे हुए इस
प्रकार कहने लगा—"हे रघुराम, हे युद्धप्रवीण, हे करुणानिलय, हे गंभीर, हे काकुत्स्थ-
श्रेष्ठ, आपकी करुणा-पूरित दृष्टि के प्रताप से मैने अपनी पूर्व दशा प्राप्त की है। मै अब
आपसे रावण के सबंध में स्पष्ट रूप से कहूँगा, सुनिए—'रावण कुबेर का भाई है ।
पुलस्त्य ब्रह्मा का प्रिय पोता है । उसने अपनी तपस्या की महिमा से ब्रह्मा को प्रसन्न
करके श्रेष्ठ वरदान तथा औन्नत्य प्राप्त किया है । उसने दिग्विजय किया है । वह दानवो
का स्वामी, देवो का शत्रु, दस बड़े शिरोवाला, बीस भुजाओवाला, लवण-सागर से परि-
वृत, लकापुर का राजा है । उसने गर्व से रजत-पर्वत को भी उखाड दिया था ।” इतना
कहकर उसने वह मार्ग भी बताया जिससे होकर रावण सीता को ले गया था, उस मार्ग
के चिह्न बताये और रास्ते में पड़नेवाली सभी वस्तुओ के नाम बताये । उसने यह भी
कहा कि पपा के आस-पास श्रेष्ठ ज्ञानी मतंग मुनि का आश्रम है, उनकी शिष्या शबरी
आपका आदर-सत्कार करेगी । उस स्त्री के निवास के पास यदि आप जायें, तो सूर्यपुत्र से
आपकी मित्रता होगी, जिसकी सहायता से आप जानकी को प्राप्त कर सकेंगे और निदान
साम्राज्य का लाभ भी करेंगे । इस प्रकार कहकर वह स्वर्ग चला गया ।
२७. राम-लक्ष्मण की शबरी से भेंट
दूसरे दिन मनुवश-तिलक वहाँ से निकले और पपा सरोवर के पश्चिंम भाग में
स्थित तरु-लता-समूह से विलसित, प्रबल पुण्यो का आवास, शबरी के आश्रम-स्थल में पहुँचे ।
शबरी उनके स्वागतार्थ सामने आई और बड़ी भक्ति के साथ रामचंद्र के चरणो
पर गिरकर साष्टांग प्रणाम किया । उसके पश्चात् वह श्रीरामचंद्र की स्तुति यो करने
लगी—'हे दशरथ के वरपुत्र, ताडकाविजयी, कौशिक के यज्ञ के रक्षक, मुनियो के ध्येय,
ताडका के पुत्रो को दड देनेवाले, परम पवित्र गगानदी के तट पर पैदल चलनेवाले, निर्मल
पद-रजवाले, अहल्या के उद्धारक, हर के प्रचंड तथा विशाल कोदंड को भग करनेवाले,
भयंकर भार्गव राम का गर्व तोडनेवाले, अभिराम नामवाले, पितृ-वचन का पालन करने-
वाले, सत्कीर्त्तिवाले, विराध के कुकर्मों को रोकनेवाले, सफल मुनित्राता, सत्यसपन्न, खर-
दूषणादि राक्षसो का शिरच्छेदून करनेवाले, मरणार्थी मारीच का वध करनेवाले, सीता-वियोग-
जनित मोह से अभिभूत होनेवाले, खगेन्द्र को मोक्ष प्रदान करनेवाले, महान् विक्रम के
१६६ रंगनाथ रामायण
धाम, अति पुण्यप्रद नामवाले, हे रघुराम, में आज आपके दर्शन कर सकी। मेरी तपस्या
आज सफल हुई। मैंने अद्वितीय पुण्यों को प्राप्त किया। हे काकुत्स्थ, मार्ग के श्रम से
आप बहुत क्लात हुए होंगे, कही और न जाकर आज हमारे आश्रम में ठहर जाइए।
हे अनघात्म, मैंने अपने गुरु मतंग मुनि के द्वारा आपका वृत्तांत सुना है। आप आदिदेव हैं,
सर्वनिगम-वेद्य हैं, अत., आपकी स्तुति करना असंभव है। यह मतंग मुनींद्र का
आश्रम है; तपश्चर्या से परिपूर्ण तथा विश्रामदायक है।
इस प्रकार (उस आश्रम का) महत्त्व बताकर उसने बड़े प्रेम से वन के कंद, मूल,
फल ले आकर उन्हें दिये और राम ने उन फलों को खाया। राम उस रात को वही
ठहर गये और दूसरे दिन घनी जटा-जूट की कवरी धारण करनेवाली शबरी को देखकर
बोले—'सीता की वियोगाग्नि से मैं अत्यंत व्याकुल हूँ, अत, एक स्थान पर ठहर नहीं
पा रहा हूँ; अब मुझे उस उत्फुल्लकमलमुखी सीता को ढूँढने के निमित्त जाना है।
आप कृपया मुझे आज्ञा दें।'
तब शबरी अत्यंत संतुष्ट होकर बोली—'दनु नामक देवता ने आपको भविष्य में
करने योग्य सभी विषयों के सबंध में कहा ही है। फिर भी मैं कहूँगी। हे राजन्, आप
अवश्य ही रावण का वध करेंगे और सीता को प्राप्त करेंगे। इसमें संदेह करने की कोई
आवश्यकता नही है। फिर भी आप अकेले मत जाइए। हे भानुकुलाधिप, यहाँ से आप
ऋष्यमूक पर्वत के निकट जाइए। उस पर्वत पर तीक्ष्ण बुद्धिवाले, सूर्य-पुत्र सुग्रीव नामक
वानर राजा रहता है। वह अपने अग्रज के हाथों अपना राज्य तथा अपनी स्त्री को खो
चुका है। वह शोकातुर है। उसकी वानर-सेना अनंत है। इसलिए आप उसका उपकार
कीजिए जिससे कि उसके मन में आपके प्रति विश्वास उत्पन्न हो जाय। उसके पश्चात्
आप उसके साथ लंका जाइए और अति शक्तिशाली रावण को युद्ध में मारकर अपने बल-
विक्रम की ख्याति चारों ओर फैलाते हुए अपनी स्त्री सीता को प्राप्त कीजिए।
इस प्रकार शबरी ने उन्हें भविष्य में करने योग्य सभी कार्य बतलाकर अपने गुरु
के वचनों का स्मरण किया और तुरंत अग्नि प्रज्ज्वलित करके उसमें अपना शरीर भस्म कर
देने के लिए तैयार हो गई। उस समय आकाश में इन्द्रादि देवता मणियो के प्रकाश से
देदीप्यमान होनेवाले विमानों पर आरूढ होकर इस दृश्य को देखने लगे। नारद, सनक
सनंदन आदि प्रमुख मुनींद्र अत्यंत हर्षित हुए। तब शबरी ने परमधाम, परमकल्याण-
गुण-संपन्न, पूर्णस्वरूप, अव्यय, अविकार, अङ्गिल अंतरात्मा, अव्यक्त अखिलेण, आघात-रहित,
ब्रह्मा ने भी स्तुत्य, संसार के रोगों के वैद्य, और रघुकुल-रूपी समुद्र के लिए चंद्र के
समान शोभित होनेवाले, रघुराम चन्द्र को अपने मन में प्रतिष्ठित करके, बड़ी भक्ति से
उनकी स्तुति की और उस प्रभु के समक्ष ही रामार्पण के रूप में अपने शरीर को अग्नि
में भस्म कर दिया। उसके पश्चात् वह देवताओं के लिए मान्य दिव्य विमान पर आरूढ
होकर देवताओं की विविध सेवाओं को प्राप्त करती हुई बड़े हर्ष से देवलोक को चली गई।
२८. श्रीराम का ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचना
इस प्रकार शबरी अग्नि-मुख के द्वारा स्वर्ग-सुख को प्राप्त हुई। यह देखकर रमणीय
आकारवाले महाबलशाली राम-लक्ष्मण उस स्थान को छोड़कर आगे बढे और उस ऋष्यमूक
पर्वत के निकट पहुँच गये, जो सतत आलोकमय, तया श्रेष्ठमपन्न मुनियो का निवास था ।
उस पर्वत के झरने ऐसे दीख रहे थे, मानो त्रिलोकीनाथ के आगमन के कारण
आनद से उमड़कर, वह पर्वत आनदाश्रु बहा रहा हो । उस पर्वत की तराइयों में अत्यधिक
सख्या में देदीप्यमान चद्रकात मणियो की काति ऐसी दीख रही थी, मानो मेरु, मदर तथा
हिमाचलो का उपहास करनेवाली उस पर्वत की हँसी हो । उस पर्वत की ऊँची चोटियो
पर चमकनेवाले नक्षत्र इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे, मानो ब्रह्मा ने इस पृथ्वी के पर्वत-
राज्य का अभिषेक करके उसके सिर पर मन्त्राक्षत छीट दिये हो ।
उस पर्वत पर उज्ज्वल रूप से दीप्त होनेवाली सूर्यकात मणियो की दीप्ति ऐसी
दीख रही थी, मानो उस पर्वत की शरण में आये हुए सुग्रीव पर अत्याचार करनेवाले वालि
पर क्रुद्ध होकर वह अपने प्रताप की अग्नि दिखा रही हो । उस पर्वत पर विचरण करनेवाले
दतो से युक्त मत्त गज ऐसी शोभा दे रहे थे, मानो नील मेघ उस पर्वत पर विचरण
करते हुए अपनी विजलियो को चमका रहे हो । उस पर्वत के शिखर के निकट ही बहने-
वाली आकाश-गगा, (मन्मथवैरी) शिव के जटा-जूटो पर शोभायमान गगा के समान थी,
उसके आस-पास क्रीडा करनेवाले हसो की पवित शिव का शिरोभूषण चद्र के समान थी ।
उस पर्वत पर रहनेवाले अत्यधिक शृग, वृक्ष तथा पल्लव-समूह शिव के बिखरे जटा-जूट के
समान सुशोभित थे और वह पर्वत सिद्धो की सेवाएँ प्राप्त करते रहनेवाले शिव के सदृश
ही दीख रहा था । उस पर्वत पर रहनेवाले कल्प-वृक्ष, कामधेनुएँ, देव-कन्याएँ, विविध
औषधियाँ, चितामणि जैसी श्रेष्ठ मणियो का समूह, कभी नष्ट न होनेवाली निधियाँ और
सतान-वृक्ष (एक प्रकार का कल्प-वृक्ष) आदि ऐसे दीख रहे थे, मानो इद्रादि देवता, समुद्र-
मथन-से प्राप्त वस्तुओ को (उनके वितरण के समय इद्रादि देवताओ के बीच झगडा
उत्पन्न होने के कारण लाकर यहाँ पर रख दिया हो), या अमृत-पान से बेसुध होकर
भूल से यहीं छोड़ दिया हो, या योग्य स्थान होने के कारण उन्हें यहाँ छिपा रखा हो ।
इस पर्वत को देखकर राघव अत्यत विस्मित हुए और उसकी प्रशसा करने लगे ।
अपने अनुज की अकलक भक्ति-युक्त सेवा प्राप्त करते हुए वे उस शैल के निकटवर्ती
पपा सरोवर के पास पहुँचे और उस सरोवर में नियमानुसार स्नान किया । उसके पश्चात्
वे उस सरोवर के चारो ओर की शोभा का अवलोकन करके अत्यत मुग्ध-से हो गये ।
अपनी क्लान्ति मिटाने के निमित्त वे एक आम के वृक्ष की छाया में बैठे, तो लक्ष्मण उनका
शीतलोपचार करने में प्रवृत्त हुए ।
कुछ समय के पश्चात् राघव ने उस आम के वृक्ष को ध्यान से देवा और लक्ष्मण
से बोले—'हे अनुज, जबसे हमने वन के लिए प्रस्थान किया, तबसे कितने ही ऊँचे पर्वत
और पुण्य नदियाँ देखीं, किन्तु हमने इस वृक्ष के जोड का वृक्ष कही नहीं देखा । कदाचित्
सुरपति आदि देवताओ ने मिलकर इस वृक्ष का निर्माण किया हो, ब्रह्मा ने स्वय प्राण
देकर इसे यहाँ पर प्रतिष्ठित किया हो, या रविमुत (सुग्रीव) की तपस्या से संतुष्ट होकर
ब्रह्मा ने इस वृक्ष को यहाँ उत्पन्न किया हो, या अमृत को प्राप्त करने के बाद सुरो ने सूर्य-
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