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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

रावण के इन वचनों को सुनकर इन्द्रजीत ने कहा--'ऐसा ही होगा', और अपने
पिता की आज्ञा लेकर वहाँ से चल पड़ा । उसने मन-ही-मन निश्चय कर लिया कि इस
भयंकर युद्ध में अतिकाय, कुंभकर्ण आदि दैत्य-वीर अपने प्राण खो बैठे हैं, इसलिए मैं किसी-
न-किसी प्रकार से राम-लक्ष्मण को अवश्य परास्त करूँगा । यो सोचकर उसने अपनी
माया से एक माया-सीता की सृष्टि की और उसे साथ लिये हुए अपनी सेना के साथ
पश्चिम दिशा की ओर रवाना हुआ । उस राक्षस के प्रताप से भयभीत हो सभी वानर
भिन्न-भिन्न दिशाओ में भागने लगे । तब हनुमान् एक महान् शैल-शृंग को उठाकर उस
राक्षस का सामना करने के लिए आया । वहाँ उसने इन्द्रजीत के रथ पर माया-सीता
को देखा । वह (माया) सीता राम की अत्यधिक विरहाग्नि से पीडित आहार तथा निद्रा
मे रहित अत्यत दुख से अभिभूत दिखाई पड रही थी । नि श्वास छोडनेवाली उस माया-
सीता का शरीर नितात दुर्बल था, मुख पीला पड गया था और उसके कमल-दल-जैसे
नेत्रो से आँसू बह रहे थे । उसके केश उलझे तथा मलिन थे । उसके सभी अग पृथ्वी पर
लोटने के कारण धूलि-धूसरित थे । वह अपना कातिहीन मुख, कर-पल्लव पर टेके हुए
इस प्रकार काँपती हुई बैठी थी, जैसे प्रचंड वायु से लता कपित होती है । उस सीता को
देखकर हनुमान् दुखी होने लगा, 'हाय भगवन्, यह राक्षस राम की पत्नी की न जाने
और क्या दुर्गति करेगा । उनकी यह दीन दशा मुझे देखना पड रहा है ।' फिर भी वायु-
पुत्र घोर वानर-सेना के साथ दारुण रूप से उस राक्षस पर आक्रमण करने का उपक्रम करने
लगा । यह देखकर दशकंठ के पुत्र ने बडी क्रूरता से हनुमान् को देखकर कहा--'रे वानर,
अब क्यो आगे बढ रहा है ? ले, सीता को यहाँ देख । इसी सीता के लिए तो तू इस
प्रकार उतावला हो रहा है ? मै अभी इसका सिर काट डालता हूँ ।'
तब वाण के सम्मुख पडी हुई हिरणी के समान दीखनेवाली सीता अपनी आँखो
से अश्रु बहाते हुए, 'हाय राम, हाय राम' कहकर आर्तनाद करने लगी । वह क्रूर राक्षस
सीता के केश पकडकर खीचने लगा । तब वायुपुत्र ने उस राक्षस से कहा--'रे दुरात्मा,
क्या, यह तुम्हारे लिए उचित है ? तुम राक्षस हो तो क्या हुआ ? तुम विश्रवसु के पोते हो,
क्या तुम्हारे लिए यह शोभा देता है कि तुम मनुकुलेश्वर राम की पत्नी को इस प्रकार
केश पकडकर खींचो ?'
हनुमान् के इतना कहते ही इन्द्रजीत ने अपने खड्ग को उठाकर उस माया-सीता का
सिर काट डाला और कहा--'अब तुम जाकर यह समाचार राम-लक्ष्मण से कहो ।' यह
देखकर अनिलकुमार अत्यत शोक-सतप्त हुआ । खड्ग से कटकर, रक्त से लथपथ माया-
सीता को दिखाकर इन्द्रजीत ने हनुमान् से कहा--'हे वानरोत्तम, राम की पत्नी इस सीता
का वध मैने अपने खड्ग से कर डाला । अब तुम्हारा रणोत्साह शिथिल पड जायगा ।'
इतना कहकर इन्द्रजीत युगात के घनघोर मेघ के गर्जन की भाँति सिंहनाद करके दिग्गजो
के कर्ण-पुटों तथा दिशाओ को विदीर्ण करते हुए, शत्रु-सैनिको के मन में भय उत्पन्न करते
हुए, युद्ध-भूमि में आगे बढा । उस राक्षस को देखते ही सभी वानर भागने लगे । तब

३८२ रंगनाथ रामायण
हनुमान् ने उन्हें देखकर कहा--'हे कपि-वीरो, अपने पराक्रम का प्रदर्शन करना छोड़कर
भाग जाने का क्या यही समय है ? क्या, तुम युद्ध-धर्म को नही जानते ? क्या, युद्ध-क्षेत्र
ने भागना, अपने वंश के लोगो को कलंकित करना नही है ? मैं आगे-आगे चलता हूँ,
तुम मेरा अनुगमन करो ।'
हनुमान् के वचन सुनकर सभी वानर पर्वत-शृंग तथा वृक्षो को उठाये हुए, गर्जन
करते हुए हनुमान् के पीछे-पीछे चले और राक्षसो पर उन पर्वतो तथा वृक्ष को फेंकने
लगे । पवन-कुमार ने भी क्रोध मे एक महान् पर्वत को उखाडकर उस राक्षस पर फेंका ।
तब इन्द्रजीत के सारथी ने रथ को तुरत दूसरी ओर फिरा लिया, तो वह पर्वत भयंकर
ध्वनि के साथ पृथ्वी पर आ गिरा । इतने में वानर फिर से पर्वतों तथा वृक्षो को ला-
लाकर राक्षस-सेना पर फेंकने लगे । वानरो के प्रहारो से अपनी सेना को नष्ट होते देख
रावण का पुत्र क्रुद्ध होकर शूल, मुद्गर तथा खड्गो के प्रहार से वानरो का संहार करने
लगा । तब मारुति ने अत्यंत क्रोधोन्मत्त हो अपने भयंकर रण-कौशल का प्रदर्शन करते
हुए राक्षसो पर शिलाओ तथा वृक्षो की वर्षा करके राक्षसो को भगा दिया । इसके पश्चात्
उसने वानरो को देखकर कहा--'हे वानरो, इस अधम राक्षस ने राम की पत्नी सीता का
वध कर दिया है । हमारा कार्य बिगड गया है । अब हमें युद्ध करने की आवश्यकता ही
क्या है ? मै यह समाचार राघव को सुनाने के लिए जा रहा हूँ । उसके पश्चात् राम जो
आज्ञा देंगे, वही हम करेंगे । अब तुम सावधान होकर रहो । यह राक्षस महान क्रूर है ।'
१०१ इन्द्रजीत का निकुंभिल-यज्ञ करना
इस प्रकार कहने के पश्चात् हनुमान् को जाते हुए देखकर रावण का पुत्र मन-ही-
मन सोचने लगा—'यह बली यहाँ से चला गया, अब मेरे यज्ञ में विघ्न डालने की शक्ति
किसी में नही है ।' यों सोचकर वह राक्षस रक्त-मांसो से अनल को तृप्त करते हुए
निकुंभिल-यज्ञ करने का प्रयत्न करने लगा । इधर राम ने पश्चिम दिशा में अत्यधिक
कोलाहल सुना, तो शीघ्र जांबवान् को बुलाकर कहा--'पश्चिम दिशा में विपुल घोष सुनाई
पड़ रहा है । न जाने, हनुमान् पर कोई विपत्ति आ पडी हो । तुम शीघ्र ही सेना के
साथ जाओ और वहाँ के विपुल घोष के संबंध में पता लगाकर आओ ।'
राम का आदेश पाकर ऋक्षेश (भालुओ का राजा) शीघ्र ही अपने एक करोड
रीछ-सैनिको के साथ पश्चिम द्वार की ओर चल पडा । मार्ग-मध्य में ही वायु-पुत्र उससे
मिला । वायु-पुत्र ने जांबवान् को देखकर इंद्रजीत के कार्य के संबंध में बताया और कहा-
'मैं यह समाचार रामचंद्रजी को सुनाकर अभी आता हूँ; मेरे आते तक तुम इसी स्थान
पर डटे रहो । शक्तिशाली शत्रु के संबंध में असावधान नहीं रहना चाहिए ।' यों समझाकर
पवन-पुत्र ने जांबवान् को भेज दिया और स्वयं राघव के पास चला । राघव हनुमान् को
दूर से ही देखकर सोचने लगे, 'क्या कारण है कि हनुमान् का मुखमण्डल अग्निवत्
(तमतमाया हुआ) दीख रहा है ? न जाने क्या बात है ?' इतने में वायु-पुत्र राम के
निकट आ पहुँचा और उन्हें प्रणाम करके कहा--'हे देव, मैं आपसे क्या विनती करूँ ?
हम सब अपने प्राण हथेली पर लिये राक्षसो से युद्ध कर रहे थे कि इन्द्रजीत भूमि-सुता

युद्धकाण्ड ३८३
सीता को युद्ध-भूमि में लेकर आया और निर्दय होकर हमारे समक्ष ही उनका सिर काट
डाला । इसलिए मै जाबवान् को द्वार पर रक्षा करने के लिए नियुक्त करके आप से यह
समाचार कहने को आया हूँ ।'
यह समाचार कानो तक पहुँचने के पूर्व ही प्रचण्ड वात से आहत वृक्ष की भाँति
अतुलित शोकाग्नि से जलते हुए, धैर्य खोकर रघुकुलेश्वर मूर्च्छित हो गये। पृथ्वी पर गिरे
हुए राम को देखकर सभी वानरनायक विलाप करने लगे ।
१०२ लक्ष्मण का शोक
तब लक्ष्मण ने अपने अग्रज के सिर को अपनी गोद में रखकर सभ्रमित चित्त से
इस प्रकार आर्त्तनाद करने लगे- "हाय राम, आप जैसे पुरुषोत्तम को आज यहाँ ऐसा कलक
लग गया । 'धर्ममेव जयते', यह कथन सत्य सिद्ध नही हुआ । यदि वह उक्ति सत्य
होती, तो आप जैसे दयावान् के लिए ऐसा सताप क्यो कर होता ? आपके हाथो मे रावण
की मृत्यु क्यो प्राप्त नही होती ? इससे तो यही सिद्ध होता हैं कि धर्म से अधर्म ही श्रेष्ठ है।
अयोध्या का राज्य त्याज्य नही है, ऐसा विचार किये विना हम उस राज्य को
छोडकर जगलो में भटकने आये । जगलो में भटकनेवाले हमें पुरुषार्थ कैसे
सिद्ध होगे ?
"क्या हमने बुद्धिमानो का यह वचन नही सुना कि निर्धनो के सभी प्रयत्न उसी
प्रकार निष्फल हो जाते हैं, जैसे निदाघ में झरने नष्ट हो जाते हैं । हे राजन्, धन का
अर्जन करने से धर्म तथा काम आदि अपने-आप सिद्ध हो जाते हैं । जिसके पास धन
होता है, सभी उसके सगे-सबधी बन जाते हैं । अर्थ-सपन्न व्यक्ति ही पुरुषोत्तम होता है,
धन ही विद्या है, धन ही कौशल है, धन ही कीर्त्ति है, वही महत्ता है, वही उच्चकुल
तथा सद्गुण है । धन ही शील और बल है, वही पुण्य है, वही राज्य है । धन ही
प्राण है, सौदर्य है, ख्याति है, नीति है, सपत्ति है, बुद्धि है, ज्ञान है, सुख है और शुचित्व है ।
अर्थ से सपन्न व्यक्ति की सभी इच्छाएँ वात-की-वात में पूरी हो जाती हैं । महान्
व्यक्ति, वेद-वेदाग-पारगत तथा विबुध-जन पुष्पाक्षतों से धनी व्यक्ति की बडी प्रीति से
पूजा करते हैं । जगलो में रहनेवाले मोक्षार्थ मुनि-पुगव भी कद, मूल तथा फल की भेंट
करते हुए धन-सपन्न व्यक्ति के दर्शन करते हैं । वदीजन तथा संगीतज्ञो का समाज धनवान्
व्यक्ति की सतत प्रशसा करते रहते हैं । उन्नतकुच, गुरु नितब, क्षीण कटि, मदगमन, विम्वा-
धर, चन्द्रमुख, कमल-नेत्र, भ्रमर के समान नीला जूड़ा, सुदर केश, नवोदित लज्जा, हाव-
भाव, मधुर कटाक्ष, मीठे वचन, नव यौवन आदि से सपन्न रमणियाँ भोग-
लालसा से प्रेरित होकर धनी-वृद्ध से भी प्रेम करेंगी, पर धन-हीन तरुण का अनादर करेंगी।
धन का अभाव ही नरक है, वही श्मशान है, वही महान् शोक है । दरिद्रता ही रोग है,
मृत्यु है, पाप है और कारावास है । धन का अभाव ही सकट है, अकाल है, दैन्य है
और दुःख है । निर्धनता ही सब प्रकार की कलुषता है । धनाभाव में सभी का अभाव
होता है । अत, जिस दिन हम राज-पाट छोडकर आये, उसी दिन विपत्तियाँ भी हमारे
साथ आई । मैं जानकी की मृत्यु का दुख सहन नही कर सकता । हे राजन्,

में अपने भयकर वाणो की अग्नि से राक्षसो के साथ सारी लका को शीघ्र ही भस्म
कर दूंगा ।”
१०३. इन्द्रजीत की माया को विभीषण का राघवों को समझाना
लक्ष्मण के इन वचनो को सुनते ही विभीषण ने राम की मूर्च्छा दूर करने का सफल
प्रयत्न किया। जब उनकी चेतना लौट आई, तब वह कहने लगा--'हे देव, यह सब इन्द्र-
जीत की माया है । सीता पर कोई विपत्ति नही आई है । मेरी बातो पर विश्वास
कीजिए । उस पापात्मा दशकठ के मन का भेद मैं भली भाँति जानता हूँ । मैने उसे
कितना समझाया कि तुम सीता को राम के चरणो में सौंप दो । किन्तु, उसने मेरे हित-
वचनो पर कान नही दिया । ऐसा रावण, भला, सीता का वध क्यो करायेगा ? हे राजन्,
सभव है कि यह उसकी माया हो । यदि सीता का वध सत्य होता, तो क्या अबतक
सभी लोक नष्ट-भ्रष्ट नही हो जाते ? यह असत्य ही है । आप चिंता क्यो करते हैं ?
मैं अभी जाता हूँ और सीता का कुशल जानकर आता हूँ ।'
उसके पश्चात् विभीषण ने राम की अनुमति पाकर, अपना विशाल रूप छोडकर
सूक्ष्म रूप ग्रहण किया और राक्षसेश्वर के वन में निर्विघ्न चला गया, वहाँ सीता को
देखकर तुरत लौटा और रामचंद्र को प्रणाम करके बडी भक्ति के साथ सारा समाचार
कह सुनाया । उसकी बातें सुनकर राम ने कहा- 'हे विभीषण, इन्द्रजीत ने युद्ध-भूमि में
ऐसा क्यो किया ?' तब विभीषण ने कहा- 'हे देव, उसने आसुर होम करने का सकल्प
किया है । हनुमान् आदि वानर-वीरो को निरुत्साह करके उन्हें आपकी सेवा में भेजने
के निमित्त ही उसने यह उपाय किया है । उसकी योजना सफल हुई और उसके यज्ञ में
विघ्न डालनेवाला वहाँ कोई नही रह गया । यह देखकर उसने निकुभिल में यज्ञ प्रारभ
कर दिया है । हे देव, यदि वह निष्ठा तथा भक्ति-युक्त मन से विधिवत् यज्ञ को पूरा
कर लेगा, तो देव तथा दानव कोई भी उस वीर को जीत नही सकेंगे । अत, हमें उस
राक्षस के यज्ञ में विघ्न डालना चाहिए । हे राजन्, हम अभी अपनी सेना के साथ उसके
यज्ञ में विघ्न डालने के निमित्त जायँगे, आप लक्ष्मण को हमारे साथ भेजिए । दशकठ
के पुत्र इन्द्रजीत आज निकुभिल वन में यज्ञ के अनुष्ठान में लगा हुआ है । लक्ष्मण आज अपने
प्रचड वाणो से उसे वध कर डालेंगे । यज्ञ का अनुष्ठान पूरा होने के पहले ही यदि उसको
हम दण्ड नही देंगे, तो यज्ञ की समाप्ति पर वह ब्रह्मा से ब्रह्माग्निर नामक शर, धनुष, कवच,
खड्ग, दो तूणीर, कई मत्र-पूत अस्त्र और देवाश्वो से तथा सुदर ध्वजा से युक्त, वायु-
वेग से चलनेवाला रथ, उस होम-कुड से निकलेंगे । यदि इन्द्रजीत उस रथ पर आरूढ
होकर अपने हाथ में वह धनुष सँभाले, तो देवासुर भी उसके समक्ष खडे नहीं
रह सकेंगे । इसके पहले, ब्रह्मा ने उसे वर-प्रदान करते समय उससे कहा था कि यदि तुम
निकुभिल-यज्ञ करोगे तो सब प्रकार से अजेय हो जाओगे । यदि यज्ञ के बीच में विघ्न
उपस्थित हो और यज्ञ अधूरा रह जाय, तो तुम युद्ध में शत्रुओं के द्वारा मारे जाओगे ।
इसलिए हे राजन्, आप युद्ध का आवश्यक प्रयत्न कीजिए और इन्द्रजीत का वध करवाइए ।
यदि यह मायावी मारा जाय, तो निश्चय समझिए कि देवताओ का शत्रु दशकंठ भी मर गया ।

युद्धकांड ३८५
१०४. लक्ष्मण का युद्ध के लिए प्रस्थान
तब रघुराम ने अपने अनुज से कहा—'हे अनघ, वीर इन्द्रजीत वादलों में तिरोहित
होनेवाले सूर्य की भाँति अपनी माया से अपनी गति को प्रकट किये बिना विचरण करने
के लिए यज्ञ कर रहा है । उस वीर को इन्द्रादि देवता भी युद्ध में जीत नही सकते ।
अपने मन्त्रियों के साथ विभीषण उस यज्ञ को तुम्हें दिखायगा । हे सौमित्र, तुम जाओ और
यज्ञ पूरा होने के पहले ही उस राक्षस का वध कर डालो । शक्तिशाली भालुओं की
सेना के साथ पराक्रमी जाम्बवान् तथा विजय और विक्रम में धुरंधर हनुमान् भी तुम्हारे
साथ जायेंगे ।' इतना कहकर रघुराम ने अपने अनुज को समुद्र के दिये हुए वज्र-कवच,
श्रेष्ठ खड्ग, दो तूणीर, धनुष तथा श्रेष्ठ आभूषण आदि देकर उन्हें आशीर्वाद देते हुए
कहा—'हरि, तुम्हें सतत विजय प्रदान करें, शंकर तुम्हें सब प्रकार के शुभ दें, ब्रह्मा
तुम्हें दीर्घायु दें, समस्त देवता सभी दिशाओ में तुम्हारी रक्षा करें, अनल तथा अनिल
आगे और पीछे तुम्हारी रक्षा करते रहें ।'
तब लक्ष्मण ने अत्यत उत्साह से धनुष सँभाला, कवच धारण किया, तूणीर कसे,
खड्ग लिया और विविध आभूषणो से विलसित हो, राम को भक्ति के साथ प्रणाम किया
और बडे साहस के साथ कहने लगे--'हे देव, कमल-सरोवर में हंसो के प्रवेश होने की
भाँति, श्वेत पखवाले मेरे बाण आज इन्द्रजीत को पार करके लका में गिरेंगे । रूई के ढेर
की भाँति मैं अपनी बाणाग्नि से उसे भस्म करूँगा ।'
इस प्रकार कहते हुए उन्होंने रामचन्द्र की आज्ञा लेकर, गरुड पर आरूढ विष्णु की
भाँति हनुमान् पर आरूढ हो, वानर-सेना तथा जाम्बवान् आदि वीरो के साथ युद्ध के लिए
प्रस्थान किया । निदान, वे वहाँ से तीस योजन दूर स्थित निकुभिला के पास पहुँचे ।
१०५ निकुंभिला-होम में विघ्न
यज्ञ-भूमि, मत्त गज, उत्तम अश्व, श्रेष्ठ रथ, तथा पदचर सेना से घिरी हुई भयकर
एव अभेद्य प्रतीत होती थी । सारी सेनाएँ बिना कल-कल ध्वनि के, तरग-हीन समुद्र की
भाँति दिखाई दे रही थी । ऐसी राक्षस-सेना को देखकर महान् शस्त्रास्त्रो से सपन्न सौमित्र
से विभीषण ने कहा--'हे अनघ, इस महान् सेना को जबतक आप अपने बाण-समूह से
काट नही डालेंगे, इन्द्रजीत हमें दिखाई नही देगा, इसलिए आप अपने श्रेष्ठ बाणो से
पहले इस सेना का सहार कीजिए । उसके पश्चात् हालाहल के सदृश भयकर अपनी बाणाग्नि
मे इस दुरात्मा का सहार कर डालिए, जिसमे इसका प्रारभ किया हुआ यज्ञ पूरा
न हो ।'
विभीषण की सलाह के अनुसार सौमित्र ने अपनी आँखो से अग्नि-कणो की वर्षा-सी
करते हुए राक्षस-सेना पर विविध बाण चलाये । तुरत ही अतीव बलशाली वानर राक्षसो
पर पर्वतो तथा वृक्षो की वर्षा करने लगे । राक्षसों ने अत्यधिक क्रुद्ध होकर, परिघ चलाते
हुए, गदाओ से प्रहार करते हुए, करवालो से मारते हुए तथा भिन्न-भिन्न महान् शस्त्रो से आधान
करते हुए विविध रीतियों से वानरो पर आक्रमण किया । ऐसी भयकर गति से भिडे हुए
वानर तथा राक्षस-सेनाओ के भीषण गर्जनो से लका डोल उठी । राक्षस-सेना नष्ट होने
४६

लगी । तब वानर-सेना भी क्रुद्ध होकर राक्षमो पर ऐसे प्रहार करने लगी कि राक्षस-
सेना अपना दर्प खोकर इंद्रजीत की आड में शरण लेने लगी ।
तबतक इन्द्रजीत यज्ञ की सफल ममाप्ति के लिए आवश्यक दो सौ दस आहुतियो
में से, एक-एक करके एक सौ नौ आहुतियाँ महावर्त्ति की ज्वालाओ में दे चुका था ।
उसी समय वानर-सेना अपने भयंकर गर्जनो से पृथ्वी को कँपाती हुई वहाँ आ पहुँची ।
यह देखकर क्रोधोन्मत्त हो इन्द्रजीत ने अपने हाथ की आहुति नीचे फेंक दी, अपनी आँखों
से चिनगारियाँ बिखेरते हुए वह युद्ध के लिए सन्नद्ध हुआ । अपने रथ पर आरूढ हो,
हाथ में अपना भयंकर धनुष लिये हुए, वह वानर-सेना पर टूट पड़ा और उन्हें अपने तीव्र
शरों के आघात से भागने के लिए विवश कर दिया । इसी बीच सौमित्र को साथ लिये
हुए विभीषण ने निकुम्भिल-वन में प्रवेश किया और घने नील मेघ की भाँति दीखनेवाले
वटवृक्ष के नीचे स्थित इंद्रजीत का हवन-कुंड दिखाकर कहने लगा—'हे सौमित्र, देखा
आपने ? युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए इस राक्षस ने यहाँ यह हवन प्रारम्भ किया है
और भूतों की बलि देकर अग्नि से अद्वितीय शक्ति को प्राप्त कर शत्रुओं को जीतने का
संकल्प किया है । इसके पहले भी इसने इसी प्रकार हवन करके दुर्वार शक्ति प्राप्त की थी
और इन्द्र को जीत लिया था । वहाँ देखिए, हवनकुंड से अरुण नेत्र, अरुण केश,
अरुण वस्त्र तथा अरुणवर्ण माला धारण किये हुए काले रग का सारथी तथा अरुण अश्वों
से युक्त रथ उभर-उभरकर निकलनेवाले हैं । इंद्रजीत शीघ्र ही लौट आयेगा और
हवन से प्राप्त शक्ति से इस रथ पर आरूढ होगा । उसके पश्चात् उसे कोई भी जीत
नहीं सकेगा । अतः, हे सौमित्र, आप अपने भयंकर बाणों के प्रहार से इन्द्रजीत का महार
कीजिए ।' तुरत लक्ष्मण धनुष का भयंकर टंकार करने लगे ।
१०६. लक्ष्मण तथा इन्द्रजीत का परस्पर तिरस्कार के वचन कहना
तब करवाल हाथ में लिये हुए, कवच धारण किये, अग्निवर्ण रथ पर सवार हो
इन्द्रजीत लक्ष्मण के समक्ष उपस्थित हुआ । उसे देखकर सौमित्र ने क्रोध से कहा—'हे
मायावी राक्षस, अब तुम्हारी माया से कोई प्रयोजन नहीं है । यदि तुम वीर हो, तो मेरा
सामना करो और अपनी सच्ची वीरता को प्रकट करते हुए मेरे साथ युद्ध करो । मैं
अवश्य तुम्हें यमपुरी को भेजूँगा । तुम भले ही कपट-रूप धारण करो या अपने निज
रूप में रहो, मैं शीघ्र तुम्हें समाप्त कर दूँगा ।'
यह मुनकर इन्द्रजीत ने रोषपूर्ण आँखों से लक्ष्मण को देखकर कहा—'हे लक्ष्मण,
बालक होकर तुम ऐसा हठ क्यों करते हो ? किंचित् काल ठहरो, मैं अपने बाणों से विजय-
लक्ष्मी से तुम्हें दूर करके, तुम्हारे शौर्य का नाश करूँगा और तुम्हारे प्राण लेकर पृथ्वी पर
गिरा दूँगा और तुम्हारे शरीर को काटकर उस मास से कौओ तथा गीधो को तृप्त
करूँगा । क्या, इतने शीघ्र तुम भूल गये कि मैंने तुम्हें नाग-पाशो में बाँधा था ।'
इसके पश्चात् उसने विभीषण को देखकर क्रोध से कहा—'हे धर्म-घातक, तुम मेरे
चाचा हो, और मैं तुम्हारा प्रिय पुत्र हूँ । क्या, तुम्हें यह उचित है कि तुम मेरा अहित
करो । दुर्मति होकर कुल-द्रोह करनेवाले तुम, भला औचित्य का विचार ही कैसे करोगे ?

युद्धकांड ३५७
क्या, कोई ऐसा नीच होगा, जो विपत्ति में पड़े हुए वधुओं को छोड़कर शत्रुओं की शरण ले ?
औचित्य की बात रहने दो । अपने लोगों को छोड़कर शत्रुओं की सेवा में जीवन
बितानेवाले व्यक्ति का जीवन भी कोई जीवन है ? राक्षसेश्वर महा तेजस्वी हैं । ऐसे
व्यक्ति तुम्हारे निष्ठुर वचनों को हित-वचन कैसे मान लेंगे ? भाई के क्रोध करने में यदि
तुम घर के किसी कोने में पड़े रहते, तो क्या होता ? वहाँ से भागकर भी तुमने कौन-सा
महान् कार्य सिद्ध कर लिया ? क्या, तुम्हारे प्रताप की सहायता से ही दशकंठ ने समस्त
देवताओं को जीत था ? हमारे अपने होते हुए तुम अपना रहस्य अपने शत्रु को बताकर
उसके हाथों में स्वयं भी नष्ट हो जाओ ।'
तब विभीषण ने कहा—'हे मेघनाद, तुम मेरे आचरण से भली भाँति परिचित हो ।
फिर भी, ऐसा प्रलाप क्यों करते हो ? तुम उस अविनीत पिता के अविनीत पुत्र ही तो हो ।
भला, तुम्हें धर्म और नीति का विचार ही क्यों होगा ? क्रूर वधु का उसी प्रकार त्याग
करना चाहिए, जैसे पाले हुए सर्प का त्याग करते हैं । यदि वह पापी दशकंठ मेरी बात
उस दिन मानता

यह सुनकर इन्द्रजीत ने वडे क्रोध में कालसर्प-सदृग वाणो को लक्ष्मण पर चलाया,
जो लक्ष्मण के गरीर को पार करके पृथ्वी में धँस गये । फिर, उसने लक्ष्मण के गरीर पर
कई गर चलाये, जो उनके गरीर को छेदकर दूसरी ओर निकल गये । लक्ष्मण के गरीर
मे, रौद्र रस की वाढ की तरह रक्त की धारा फूट निकली । यह देखकर राक्षस हर्प का
भीपण निनाद करने लगे । तब इन्द्रजीत ने अट्टहास करते हुए लक्ष्मण के निकट पहुँचकर
कहा—'हे राजकुमार, वडे गूर की भाँति तुमने मुझसे युद्ध ठाना है । पहले मैं तुम्हारा
कवच खड-खंड कर दूँँगा और उनके पश्चात् अपने दारुण अस्त्रो से तुम्हारा सिर काट
लूँगा । आज राम अवश्य ही अपने भाई को युद्ध-भूमि में पड़े हुए देखेगा ।'
तब लक्ष्मण ने उस निगाचर को देखकर कहा—'हे राक्षस, व्यर्थ ही गर्व क्यो
करते हो ? युद्ध-भूमि में प्रलाप करने से क्या प्रयोजन ? यहाँ से विना हटे, मेरे साथ
युद्ध करो । जिस प्रकार अग्नि विना कुछ कहे, जला डालती है, वैसे ही में विना बातें
किये ही अभी तुम्हारा वध कर डालता हूँ । व्यर्थ डींग मारने मे क्या

युद्धकांड ३५९
इस प्रकार सोचकर मेघनाद ने लक्ष्मण को देखकर कहा—'हे राजकुमार, अब तुम
वीर की तरह खडे होकर मेरे पराक्रम को देखो ।' यो कहते हुए उसने सात बाण लक्ष्मण
पर, दस बाण हनुमान् पर तथा एक सौ बाण विभीषण पर चलाकर उन्हें व्याकुल कर
दिया । उन बाणो की उपेक्षा करते हुए लक्ष्मण ने इन्द्रजीत को देखकर हँसते हुए कहा—
'हे राक्षस, शूर बडी-बडी बातें कहे बिना ही युद्ध जीत लेते हैं और अधम डींग हाँकते
हुए भी हार जाते हैं । सच्चा वीर युद्ध में कभी छिपता नही । युद्ध में धोखा देना भी
क्या, कोई वीरता है ? हे क्रूरात्मा, तुम कुटिल युद्ध करनेवाले हो ? तुम्हारे इह-लोक
और पर-लोक दोनो नष्ट हो जायेंगे ।'
इस प्रकार कहते हुए लक्ष्मण ने सूर्य-किरणो की भाँति प्रकाशमान होनेवाले, स्वर्ण
की अनी से युक्त बाणो को उस राक्षस पर चलाया, तो वे उसके कवच को भी छेदकर
उसके शरीर के पार निकल गये । तब उसका कवच भयकर सर्प की केंचुली की भाँति
पृथ्वी पर गिर पडा । तब इंद्रजीत दूसरा वज्र-कवच पहनकर लक्ष्मण पर पैने बाण
चलाने लगा । परस्पर के शराघातो के कारण शरीरो से निकलनेवाले शोणित के प्रवाह
से युक्त होकर, वे दोनो गेरुए रग के निर्झरो से युक्त पर्वतो की भाँति दीखने लगे । वे
अपनी-अपनी धनुर्विद्या का कौशल दिखाते हुए तीव्र गति से युद्ध करने लगे । अस्त्र के
आघातो से युक्त हो युद्ध करते समय, वे ऐसे दिखाई पड रहे थे, मानो पतझड के उपरान्त
पुष्पित किंशुक वृक्ष हो । अमर, गधर्व आदि आश्चर्य के साथ इस युद्ध को देखने लगे ।
उसी समय कलभो से घिरे हुए मत्त गज के सदृश, मत्रियो से घिरे विभीषण ने
भयकर रीति से अपने धनुष का टकार किया और क्रोधोन्मत्त हो राक्षस-सेना पर ज्वालाओ
को उगलनेवाले तीक्ष्ण बाण चलाये । उन बाणो के लगते ही राक्षस-सेना इस प्रकार
पृथ्वी पर गिरने लगी, जैसे वज्रपात से विशाल वृक्ष गिरते हैं । अनल आदि उसके मत्री
शूल, वरछे, खड्ग आदि शस्त्रो से राक्षसो पर आक्रमण करके उन्हें धराशायी करने
लगे । तब विभीषण वानर-सेना को देखकर कहने लगा —'अब तुम सब लोग एक साथ
मिलकर इस इन्द्रजीत का वध करो । लंकेश्वर की सारी शक्ति यही है । यदि यह मारा
गया, तो समझो कि दशकण्ठ अपनी सेना के साथ परास्त हो गया । इसके पहले तुम
लोगो ने अपने असमान विक्रम से, प्रहस्त, वज्रमुष्टि, प्रजघ, सुप्तघ्न, भयकर प्रतापी कुभ-
निकुंभ, कुभकर्ण, अतिकाय, महापार्श्व, धूम्राक्ष, मकराक्ष, क्रोधन, शोणिताक्ष, उपाक्ष, त्रिशिर,
महोदर, अग्निकोप, देवांतक, नरातक, जंबुमाली, अकपन आदि महान् पराक्रमी योद्धाओ
को मारकर युद्ध-सागर को सहज ही पार किया था और अपने बाहुबल को प्रदर्शित किया था ।
अब तुम्हारे तथा लक्ष्मण के लिए यह इन्द्रजीत एक गोपद के समान है । मुझे अपने
पुत्र का वध नही करना चाहिए । इसके नष्ट होने का उपाय मैं तुम्हें बताऊँगा । सुनो,
स्वय हिंसा करना या दूसरो को भेजकर हिंसा कराना, दोनो समान हैं । किंतु यह राम का
कार्य है, इसमें लोकहित निहित है । इसलिए यह पाप नही है । अब मैं सौमित्र के हाथो
इसका वध कराऊँगा । आगे इसकी एक भी माया नही चलेगी ।'
इसके पश्चात् जाम्बवान् ने अपनी रीछो की सेना लिये हुए आकाश को विदीर्ण

करनेवाला गर्जन करके राक्षसों पर टूट पड़ा और पर्वत-शृंगों, वृक्षों तथा नखों और दाँतो
से शत्रुओं के ऊपर आघात करते हुए उन्हें व्याकुल कर दिया । तब राक्षस भयंकर परशु,
मुद्गर, शूल, परिघ तथा धनुष लिये हुए भयंकर गति से उनसे भिड़ गये । वानर तथा
निशाचरों का वह संग्राम ऐसा दीख पड़ा, मानो सुरासुरों का संग्राम हो । तब हनुमान् ने
क्रुद्ध होकर लक्ष्मण को नीचे उतार दिया और यम के समान एक-एक प्रहार से अनेक
राक्षसों को पृथ्वी पर गिरा दिया । उसने शैल-शृंगों तथा शाल-वृक्षों का प्रचुर प्रयोग
किया और असंख्य राक्षसों का संहार करके भयंकर सिंहनाद किया । तब विभीषण ने क्रोध
में अपने धनुष का टंकार और अपने मंत्रियों के साथ राक्षस-सेना पर टूटकर अनेक
राक्षसों का संहार किया । फिर, उसने स्वर्ण अनी से युक्त तीव्र शर इंद्रजीत के शरीर पर
चलाया । तब उसने भी क्रुद्ध होकर अद्वितीय शर यों चलाये कि वे विभीषण के वक्ष को
पार करके पृथ्वी में ऐसे गड़ गये कि पृथ्वी भी डोल गई ।
इस प्रकार, विभीषण से भयंकर युद्ध करनेवाले इंद्रजीत को देखकर लक्ष्मण क्रुद्ध
हुए और हनुमान् के कंधे पर बैठकर असंख्य तीव्र शर उस राक्षस पर चलाये । इंद्रजीत ने
भी भयंकर बाण-समूह चलाकर लक्ष्मण के बाणों को काट दिया । इस प्रकार, जब वे दोनों
एक दूसरे पर क्रूर बाण चलाने लगे, तब उन अस्त्रों से ढके हुए शरीर से युक्त वे, वर्षा
की धारा से युक्त बादलों के समान और बादलों से युक्त सूर्य-चंद्र के समान दिखाई पड़ने
लगे । उनके बाणों की तीव्र गति का वर्णन कैसे किया जाय ? ऐसा लगता था, मानो
धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ाये हुए बाण जैसे-के-तैसे रहते हों और वे उन्हें छोड़ते ही न हों ।
दोनों ओर के बाण समस्त आकाश में ऐसे व्याप्त हो गये कि अंधकार छा गया ।
वीर रस के आवेश में अभिभूत वे दोनों उस युद्ध-क्षेत्र में अपने-आपको भूल-से गये ।
आश्चर्य था कि उस समय उस युद्ध-भूमि में वायु का संचलन भी नहीं होता था और
अग्नि दीप्त नहीं होती थी । यह देखकर दिक्पाल, देवता, गंधर्व, यक्ष, किन्नर आदि
चकित-से होकर लक्ष्मण की प्रशंसा करते हुए उनकी शरण में आये । उन्होंने लक्ष्मण की
विजय की कामना करते हुए उन्हें कई आशीर्वाद दिये और कहने लगे—'हे सौमित्र, इस
लोक-कंटक राक्षस का आप अवश्य वध कीजिए ।'
१०८. इन्द्रजीत का वध
देवताओं के इस प्रकार कहते ही भानु-वंशज लक्ष्मण ने भयंकर सिंहनाद करके
अपने धनुष का टंकार करते हुए इंद्रजीत पर आक्रमण किया और असंख्य बाण उस पर
चलाये । उस राक्षस ने भी उन बाणों को काटकर फिर कई भीषण शर लक्ष्मण पर चलाये।
तब, लक्ष्मण ने क्रुद्ध होकर एक अर्द्धचंद्र बाण से उसका धनुष काट डाला, सात बाणों से
उसकी ध्वजा को गिरा दिया, एक बाण ने सारथी का सिर काट डाला, दस बाणों से
उसका वक्ष विदीर्ण करके चार बाणों से रथ के अश्वों को मार गिराया । तब रावण का
पुत्र स्वयं सारथी तथा रथिक बनकर सौमित्र पर भयंकर शरवर्षा करके अट्टहास करने लगा।
तब सौमित्र ने स्वयं रथ चलाते हुए युद्ध करनेवाले इंद्रजीत को लक्ष्य करके तीक्ष्ण बाण
चलाये, जिनके लगने से रावण का पुत्र मूर्च्छित हो गया ।

कुछ ही समय के पश्चात् इन्द्रजीत की चेतना लौट आई । वह चिंतित होकर
सोचने लगा- 'यह कैसी विचित्र बात है कि एक मानव ने मुझे इतना व्याकुल कर दिया ।
इसके पहले के युद्धों में मैंने कभी ऐसी व्याकुलता का अनुभव नहीं किया था । समय की
गति प्रबल है, कोई उसके प्रतिकूल जा नहीं सकता।' इस प्रकार चिंता से पीड़ित हो वह
दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए धनुष पर बाण का संधान करने की इच्छा नहीं रहने के कारण
चुपचाप शत्रु को देखता रहा । तब सभी देवता रामानुज की प्रशंसा करने लगे ।

इंद्रजीत के कांतिहीन तथा विवर्ण मुख को देखकर वानर हर्ष-ध्वनि करने लगे ।
तब वीराग्रणी प्रमाथी, मेघ-सदृश विशालकाय एवं मेघनिस्वन शरभ तथा ऋषभ ने पर्वत-
शृंगों को, इन्द्रजीत के रथ पर फेंककर अश्वों के साथ रथ को भी नष्ट-भ्रष्ट कर दिया ।
इस पर विपुल क्रोध से इन्द्रजीत ने सिंहनाद करके विभीषण के ललाट को तथा लक्ष्मण के
वक्ष को लक्ष्य करके तीन-तीन पैने बाण चलाये और धनुष का टंकार करते हुए सिंह-गर्जन
किया । तब विभीषण ने क्रोधोन्मत्त हो, आँखों से अग्नि-कणों की वर्षा करते हुए पाँच
बाण ऐसे चलाये कि वे उस राक्षस के वक्ष को पार कर निकल गये । तब इन्द्रजीत ने
क्रोध से अपने पिता (विभीषण) पर आग्नेय बाण चलाया । उसको आते देखकर लक्ष्मण ने वारुणास्त्र
का प्रयोग किया । दोनों शर आपस में टकराकर पृथ्वी पर गिर पड़े । उसके पश्चात् उस
राक्षस-कुमार ने उरगास्त्र चलाया, तो लक्ष्मण ने गरुडास्त्र के प्रयोग से उसको विफल कर
दिया । फिर, उसने कुबेरास्त्र चलाया, तो लक्ष्मण ने ऐन्द्रास्त्र से उसे खंडित कर डाला ।
तब दानव ने गंधर्वास्त्र चलाया, तो लक्ष्मण ने उसे रौद्रास्त्र से काट डाला । उन दोनों का
युद्ध प्रलय-काल में पृथ्वी की दशा का स्मरण दिला रहा था। उस समय सौमित्र की रण-
क्लान्ति को मिटाने के लिए मानो, मंद-मंद पवन चलने लगा ।

तब लक्ष्मण ने यम की भाँति क्रूर हो इन्द्रजीत को देखकर अपने धनुष की ऐसी
ध्वनि की कि दिशाएँ विदीर्ण-सी हो गईं । और, उसके पश्चात् उन्होंने भयंकर सिंहनाद
करके, देवेन्द्र से प्राप्त ऐन्द्रास्त्र को अपने धनुष पर चढ़ाया और कहा-- 'यदि रामचन्द्र
धर्मात्मा हैं, यदि देवी सीता पतिव्रता हैं, यदि देवताओं की कृपा मुझ पर है, यदि इन्द्र
आदि देवताओं का हित (इन्द्रजीत के अंत से) होनेवाला है, तो यह महान् शर इन्द्रजीत
का सिर काट देगा।' इस प्रकार कहते हुए उन्होंने लक्ष्य साधकर इन्द्रजीत पर वह बाण
चलाया । रत्न की नोक से सुशोभित वह बाण, समस्त आकाश में व्याप्त हो, घोर वज्र के
समान भीषण रूप धारण किये हुए, क्रूर गति से चल पड़ा । उस शर ने विहगेन्द्र के सदृश
वेग के साथ, सर्प के मुख से निकलनेवाले अग्नि-कणों की चंचलता लिये हुए, सूर्य-बिंव की-सी
भयंकर दीप्ति से प्रज्वलित होते हुए, अपनी कांति से पृथ्वी तथा आकाश को भरते
हुए उग्र दंड देने के उद्देश्य से भयंकर बनकर उस राक्षसेन्द्र के पुत्र पर आक्रमण किया ।
उस महान् उद्दण्ड अस्त्र ने अनुपम मणिकुंडलों तथा ललित अरुण अक्षतों से अलंकृत इन्द्रजीत
के सिर को मुकुट के साथ पृथ्वी पर गिरा दिया, मानो (लक्ष्मण ने) लंका की निधि सिद्ध
करने की इच्छा से प्रेरित हो, उसके पहले बलि देने के लिए, एक जंगली भैंसे का सिर
काट लिया हो । युद्ध-क्षेत्र में गिरे हुए इन्द्रजीत को देखकर, लक्ष्मण विजय-लक्ष्मी से

३९२ रंगनाथ रामायण
सपन्न हो, अत्यत हर्ष से दिगाओ को कँपाते हुए शख बजाया, धनुष का भीषण टंकार
और सिंहनाद किया । उस समय अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और गधवों ने अपने मधुर
मगीत से लोगो को आनद पहुँचाया ।
तब विभीषण ने अत्यधिक हर्ष से लक्ष्मण को हृदय से लगा लिया और सभी वानर
हर्ष मानने लगे । हतशेष निशाचर त्रस्त हो, वानरो के आक्रमण के समक्ष खडे रहने का
साहस न कर सके और अपने चरणो के आघातो से पृथ्वी को कँपाते हुए, अपने आयुधो
को जहाँ-तहाँ फेंककर, प्राण लेकर भागने लगे । कुछ राक्षस लका की ओर भागे, कुछ
पर्वत-शृंगो पर चढ गये, कुछ समुद्र में कूद गये और कुछ गुफाओ में जाकर छिप गये ।
तब अग्निदेव अपनी स्वाभाविक दीप्ति से जलने लगे, सूर्य प्रखर तेज से भासमान होने
लगा, मानो समुद्र अत्यन्त स्वच्छ हो गये, दिगाओ में आच्छादित कुहरा हट गया, गगन
प्रसन्न दीखने लगा, और पृथ्वी निष्कप दिखाई पडने लगी । तब हनुमान्, शतवली, नल,
पनस, गभ, ऋषभ, अतुल पराक्रमी अगद अतिबली सुग्रीव, दधिमुख, गज, गवय, गधमादन,
द्विविद, मैन्द आदि वानर-नेताओ ने आकर लक्ष्मण को प्रणाम किया और बडे हर्ष से उनकी
प्रशंसा करने लगे । समस्त देवताओ ने भी लक्ष्मण की प्रशंसा करते हुए पुष्प-वृष्टि की ।
वानरो ने विजय-गर्व से सिंहनाद किया । परिमल से युक्त मंद पवन धीरे-धीरे चलने लगा।
चूंकि, लक्ष्मण विष्णु के अग से सभूत थे, उनके हाथो युद्ध में मरे कपटी राक्षस, शरीर तजकर,
पश्चिम सागर में डूबनेवाले सूर्य की भाँति विष्णु-सायुज्य को प्राप्त हो गये । सूर्यवंश की कीर्त्ति को
सब दिगाओ में व्याप्त करते हुए लक्ष्मण ने वहाँ एक विजय-स्तभ प्रतिष्ठित किया और वानरो,
विभीषण तथा हनुमान् के साथ शीघ्र रामचन्द्र की मेवा में पहुँच गये । वहाँ पहुँचकर उन्होने राम
के चरण-कमलो में झुककर प्रणाम किया । तब, राम ने उन्हें अपने हृदय से लगा लिया
और आनन्दाश्रुओ से अभिषिक्त करते हुए, उन्हें अपनी गोद में बिठा लिया । लक्ष्मण के
शरीर पर वीर-पुलक के सदृश लगे हुए वाणो को देखकर उमडनेवाले अपार दुख तथा
मेघनाद की मृत्यु के अत्यधिक हर्ष से राम मूर्च्छित-से हो गये । किन्तु, वे शीघ्र ही सँभल गये
और सूर्य-पुत्र को तथा विभीषण को अपने भाई लक्ष्मण को दिखाकर यो कहने लगे—
'युद्ध में अजेय होकर आज इसने कैसी अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया है । असख्य दिव्य
शस्त्रास्त्रो से सम्पन्न इन्द्रजीत का इसने वध किया है । अत, अब यह निश्चित ही है कि महान्
शक्ति-सम्पन्न रावण मेरे हाथो मरेगा । उसका वैभव और उमका बल, आज उसके पुत्र की
मृत्यु के साथ ही समाप्त हो गये । असंख्य शस्त्रो से सम्पन्न तथा समस्त राक्षसो का आधार
अपने पुत्र की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से रावण मेरे साथ युद्ध करने के लिए
समस्त आयुधो से सुसज्जित होकर, दुर्वार गति से आवे, तो भी मै अपने पैने वाणो से,
चतुरगिणी सेना के साथ दशकठ का खड-खड करके भूतो को बलि चढा दूँगा ।'
इसके पश्चात् राम ने सुषेण को देखकर कहा- 'हे वानरोत्तम, तुम ओषधी-शैल स
श्रेष्ठ प्रभा-विलसित विशल्यकरणी ले आओ और लक्ष्मण, विभीषण तथा अन्य वानरो के
शरीर पर लगे वाणो के घावो की पीडा को दूर कर दो । सुषेण ने राम के आदेश का
पालन किया और वे सब स्वस्थ-गात्र हो गये । सूर्य-पुत्र की आज्ञा से, सभी वानरो ने

चंद्र तथा सूर्य-सम विलसित राम-लक्ष्मण को अलंकृत किया । राम-लक्ष्मण, रवि-पुत्र, राक्षस-
राज विभीषण, हनुमान्, सुषेण, शतमन्यु का पोता जाम्बवान्, नील आदि वानरनायक,
पौलस्त्य-वंशजो का एकमात्र आधार उस वीरवर इन्द्रजीत की मृत्यु पर हर्ष मनाने लगे ।
१०९ इन्द्रजीत की मृत्यु पर रावण का शोक
युद्ध-भूमि से भागे हुए हतशेष राक्षस लंका में पहुँचे और लोक-कंटक रावण को
देख, शोकार्त हो यो कहने लगे- 'हे देव, इंद्र के वैरी आपके पुत्र ने अपने अनुपम भुज-
बल से असंख्य वानरो का संहार किया । उन्होंने देवताओ को आश्चर्य-चकित करते हुए
अपने दिव्य अस्त्रो के प्रयोग से लक्ष्मण को भी व्याकुल कर दिया और युद्ध करते हुए
निदान लक्ष्मण के हाथो से मृत्यु को प्राप्त हुए ।' यह समाचार सुनते ही रावण अत्यधिक
शोक से व्याकुल होकर बहुत समय तक मूर्च्छित होकर पडा रहा । फिर, वह सचेत होकर
शोक-सागर में डूबे हुए कहने लगा--"हाय, वंशवर्द्धन, हे महावीर, हाय दानशील, हे शूर-
वीर, शतमन्यु को सहज ही जीतनेवाला तुम्हारा शौर्य आज किसने दबा दिया ? इन्द्र
आदि दिक्पाल और गगनचारी जीव तुम्हारा नाम लेते ही भयभीत होकर भागते थे ।
ऐसी तुम्हारी भयंकर शक्ति के समक्ष खड़े होकर एक साधारण मानव ने तुम्हारा दर्प-दलन किया !
प्रचंड क्रोध से तुम अपने भयंकर कोदंड को संभाले हुए युद्ध-क्षेत्र में खड़े हो जाते, तो
यम भी तुमसे परास्त हो जाता था । ऐसी तुम्हारी वह शक्ति कहाँ नष्ट हो गई ?
क्या दैव-गति वाम हो गई है ? अन्यथा, हे इन्द्रजीत, आज यम तुमसे भी अधिक प्रवल
कैसे हो गया ? तुम्हारे पैने शर आश्चर्यजनक ढंग से मंदराचल को खंड-खंड कर देने
में समर्थ थे । तुमने युद्ध-भूमि में कई वार सहज ही राम-लक्ष्मण को परास्त किया था ।
हे पुत्र, आज उस शक्ति को खोकर तुम सौमित्र के हाथो मारे गये । हे देवशत्रु, तुम्हारी
मृत्यु से देवता तथा मुनि अत्यंत हर्षित होगे । प्रलय-काल के घन-गर्जन-सदृश तुम्हारे सिंहनाद
करते ही समस्त लोक भयभीत हो जायेंगे । तुम सभी देवताओ के लिए अजेय थे । ऐसे
तुम एक क्षुद्र जीव की भाँति मारे गये । हाय, ब्रह्मा का लेख मिटाने में तुम असमर्थ ही
रहे । आज समस्त चराचर जगत् विक्रम तथा वीरो से शून्य दीख रहा है । हाय पुत्र, मैं
तुम्हारी शक्ति का भरोसा किये हुए था, आज तुमने मुझसे अलग होकर मुझे देवताओ के उपहास
का पात्र बना दिया । क्या, तुम्हारे लिए यह उचित था ? आज राक्षस-स्त्रियो का विलाप
मुझे अपने कानो से सुनना पड रहा है । तुम अपना युवराजत्व, अपनी लंका, अपने इष्ट
वधुओ, अपनी माता, स्त्रियो तथा पुत्रो को त्याग कर कैसे चले गये ? हाय पुत्र, तुम कहाँ
चले गये ? उस दिन तुमने यम को जीत लिया था, ऐसे वलशाली तुम आज उसी के
नगर को कैसे गये ? पुत्र बडी भक्ति से अपने पिता के क्रिया-कर्म करता है । आज वह
कर्म नही रहा, आज मुझे ही तुम्हारा क्रिया-कर्म करना पड रहा है । अब में क्या कहूँ और
क्या करूँ ? राम-लक्ष्मण, रवि-पुत्र, राक्षस-पालक विभीषण तथा भयंकर पराक्रमी वानर,
शूलो के समान मेरे हृदय में गडे हुए है । हे पुत्र, उन हृदय-शूलो को निकाले बिना ही
तुम कहाँ चले गये ? तुम मेरी विजय थे, मेरे तेज थे, मेरे पुण्य-फल थे, मेरे भाग्य थे,
मेरे शौर्य थे, मेरी गति थे, मेरी कीर्त्ति थे और मेरा सर्वस्व तुम ही थे, तुम्हारे जैसे पुत्र की
५०

३९४ रंगनाथ रामायण

मृत्यु मैने देखी । अब मेरा जन्म किस प्रयोजन का ? इस विपत्ति-रूपी समुद्र को पारं
करने का साधन ही क्या है ? मै अबतक यही विश्वास किये रहा कि तुम्हारी सहायता
से मै राम को जीत लूँगा । वह विश्वास अब नष्ट हो गया है । मेरी सभी आशाएँ समाप्त
हो गईं । अब मै इस शोक-दावानल में जल नहीं सकता ।" इस प्रकार, आर्त्तनाद करते
तथा बार-बार शोक करते हुए, अस्थिरमति हो, रावण कितनी ही बार मूच्छित होता रहा ।
दशकंठ के विवेकी मंत्री उसे सांत्वना देने तथा समझाने लगे । रावण बार-बार सँभलकर
रोष तथा शोक से, भौंहें तानता, और चारो दिशाओ में क्रमशः अपनी क्रुद्ध दृष्टि केन्द्रित
करता । जिस दिशा में उसकी क्रुद्ध दृष्टि पड जाती, उस दिशा में स्थित राक्षस भय से
सिकुड जाते । निदान, राक्षसेश्वर ने अपने उग्र दाँतो को पीसते हुए, अपने दसो मुखो के
नेत्रो से अग्नि-कणो की वर्षा करते हुए अपने मंत्रियो को देखकर कहा--'मैने अविरत
तप से ब्रह्मा को संतुष्ट किया और असंख्य शस्त्रास्त्रो को प्राप्त किया । मैने युद्ध में न
कभी अपजय प्राप्त की, न कभी अपने मन में शोक का ही अनुभव किया । शिवजी को
संतुष्ट करके नील मेघ के सदृश जो कवच मैने प्राप्त किया है, उसे धारण करके यदि मै
अपने रथ पर युद्ध के लिए जाऊँ, तो क्या, स्वर्ग के अधिपति भी मुझे जीत सकते हैं ?
उस दिन मै ब्रह्मा से जो धनुष-बाण प्राप्त किये थे, उन्हें शीघ्र ले आओ । आज मै अपने
पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए शीघ्र शत्रुओ पर आक्रमण करूँगा और राम और लक्ष्मण
तथा वानरो को जीतूँगा ।' इतना कहकर वह मन-ही-मन प्रलय-काल की अग्नि की भाँति
जलते हुए ताल ठोककर सभी दिशाओ को प्रतिध्वनित करते हुए विविध वाद्यो के निनाद
के बीच युद्ध के लिए चल पडा । अत्यंत क्रोध से वह गरजकर कहने लगा--'राम ने
सीता को प्राप्त करने के लिए मेरे भाइयो, पुत्रो, वधुओ तथा सैनिको का नाश किया है ।
इंद्रजीत ने माया सीता का भी वध किया । मेरे सभी उपाय निरर्थक हो गये । मै अभी
जाऊँगा और असली सीता का ही वध करके अपना प्रतिशोध लूँगा ।'

११० रावण का सीता का वध करने के लिए जाना

इस प्रकार कहने के पश्चात् वह चंद्रहास को अपने हाथ में लेकर अपने पादाघात से
पृथ्वी को कँपाते हुए अशोक-वन की ओर चल पडा । तब वृद्ध राक्षस-मंत्री आपस में
परामर्श करने लगे--'क्या दशकंठ उन दाशरथियो को अपने पैने बाणो से जीत नहीं सकता ।
इसने लोक-पालको की परवाह न करके युद्ध में उन्हें जीत लिया था, मरुतो को भयंकर
युद्ध में परास्त किया, नौ ब्रह्माओ को जीत लिया, आठ वसुओ का दर्प चूर कर दिया,
अपने प्रताप से नवग्रहो को दबा दिया, बारह आदित्यो को झुका दिया, ग्यारह रुद्रो को
जीत लिया, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, उरग, गरुड तथा भयंकर दानवो को भयभीत करके अपने
वश में कर लिया । ऐसी दशा में इसके सामने मनुष्यो की शक्ति ही कितनी है ? क्रोध
में आकर पतिव्रता स्त्री को मारना उचित नहीं है ।'
उसी समय रावण यम की भाँति लोक-भयंकर रूप धारण किये हुए जानकी का वध
करने के उद्देश्य से अशोक-वन में पहुँच गया । उस पापात्मा की क्रुद्ध दृष्टि को देखते
ही वह साध्वी भय से सिकुड-सी गई । भयंकर ग्रह के समक्ष भयाक्रांत हो पडी हुई रोहिणी

युद्धकांड ३९५
की भाँति वह सीता रावण को देख सोचने लगी—'हाय भगवन्, इस दुरात्मा के हाथो से
मुझे इस प्रकार मरना पड रहा है । कदाचित् इन्द्रजीत की मृत्यु का समाचार जानकर
मुझे मारने के लिए यह आ रहा है अथवा उन राम-लक्ष्मण को जीतकर मुझे मारने के
उद्देश्य से यहाँ आ रहा है, मुझे जान नही पडता । क्या, इसी के हाथ मरना विधि ने
मेरे भाग्य में लिखा है ? हाय, अब मैं क्या करूँ ? हाय भगवन्, तुमने अत्यत पुण्यात्मा
राम-लक्ष्मण को अनेक सकटो में डाल दिया है ।' इस प्रकार, वह कमललोचनी विलाप
करती हुई, अपने मन में रघुराम की मूर्त्ति प्रतिष्ठित करके दुख-विवश होकर मूर्च्छित हो गई ।
पृथ्वी पर पडी हुई सीता को देख दशकंठ उनकी तरफ आगे बढा । तब सभी
राक्षस हाहाकार करते हुए चिल्लाने लगे—'यह भयकर कृत्य अनुचित है ?' उसी समय
महान् मतिमान् तथा नीतिवान् सुपार्श्व नामक राक्षस रावण के निकट पहुँचकर निर्भय
हो रावण को उपदेश देने लगा कि हे दानवेंद्र, तुम्हारे पितामह पुलस्त्य हैं, तुम्हारे पिता
धर्मात्मा, नीतिज्ञ तथा यशस्वी विश्रवस् हैं, तुम स्वय वेद तथा आगमो के ज्ञाता हो, अपने
महत्त्व का विचार किये बिना तुम ऐसे दुष्कर्म करने पर क्यो उतारू हुए हो ? उत्तम
स्त्रियो का स्पर्श करके उनका वध करना महापाप हैं । इसलिए, तुम यह विचार छोड दो ।
तुम अपना सारा क्रोध कल युद्ध में राम-लक्ष्मण पर दिखाना । इस प्रकार कहकर
सुपार्श्व ने रावण के हाथ से चन्द्रहास छीन लिया और रावण को अपने साथ वहाँ से
ले आया । वहाँ से लौटकर दशकंठ मन-ही-मन शोक से पीडित होते हुए अपने मन्त्रियो
तथा बंधुमित्रो को सभा-मडप में बुलाया और अपने पुत्र के गुणो की बार-बार प्रशसा
करते हुए शोक प्रकट करने लगा ।
१११ इन्द्रजीत की स्त्री सुलोचना का शोक
अत पुर की स्त्रियाँ इन्द्रजीत की मृत्यु का समाचार सुनकर शोक प्रकट करने लगीं,
तो उसे सुनकर आदिशेष की पुत्री सुलोचना को अपने प्राणनाथ की मृत्यु का समाचार
ज्ञात हो गया । वह तुरत शोक से अभिभूत होकर, मूच्छित गिर पडी । बडी देर तक
सहेलियो की परिचर्या के उपरान्त, वह किंचित् सचेत हुई और अपने प्राणेश्वर का स्मरण
करती हुई विविध रीतियो से यो प्रलाप करने लगी—“हाय प्राणेश्वर, हे प्राणनाथ, क्या,
एक साधारण मनुष्य ने तुम्हें परास्त किया है ? हाय, वह पापी ब्रह्मा हमारे प्रेम को नही
देख सका । इसीलिए उसने हम दोनो को अलग कर दिया है । जब कभी तुम बाहर
जाते थे, तब मुझसे कहकर जाते थे । इस बार भी तुम मुझसे कहकर जाते, तो
शत्रु के हाथो तुम्हारी ऐसी मृत्यु नही होती । मेरे पिता ने जब तुम्हारे साथ बडी प्रीति
से मेरा विवाह किया था, तब उन्होने तुमसे कहा था, 'यदि तुम विजय की आकाक्षा करने हो,
तो जाने से पहले सभी कार्यों की सूचना अपनी स्त्री को देकर जाना । तब तुम ब्रह्मा
तथा शिव के लिए भी अजेय बनोगे । नरो की तो बात ही क्या ?' उमके पश्चात् उन्होने
मुझे एक शिरोरत्न देकर कहा था, 'हे पुत्री, जब तुम्हारे पति शत्रुओ पर आक्रमण करने
जायें, तब तुम इस मणि से उनकी आरती उतारकर उन्हें भेजना । ऐसा करो, तो वे
शत्रुओ पर विजय प्राप्त करके अवश्य लौट आयेंगे ।' उनके इन प्रिय वचनो को भूलकर

३९६ रंगनाथ रामायण
तुम शत्रुओं के दिव्य शरों से युद्ध-भूमि में निहत हुए ।" इस प्रकार, प्रलाप करती हुई
उसने मन-ही-मन अपने प्राण, अपने प्राणेश्वर के चरणों पर समर्पित कर लिये । उसके
पश्चात् अपने पुत्रों को देखकर उस सुंदरी ने कहा--'हे पुत्रो, शोक-रूपी गम्भीर समुद्र में डूबने
के पश्चात् भी किस बात का भय हो सकता है ? विभीषण तो हैं ही । वे अवश्य तुम्हारी
रक्षा करेंगे । अत, तुम श्रेष्ठ गुणों से संपन्न होते हुए उन्नति करो । अब मेरा जीना उचित
नहीं है । मैं अवश्य अपने प्राणेश्वर की सेवा में जाऊँगी ।'
इस विचार से मन-ही-मन हर्षित होती हुई, वह अपने मन की इच्छा को दृढ़
बनाती हुई, अत्यधिक क्लान्ति से चीत्कार करती हुई अपने पैरों को घसीटती हुई किसी
प्रकार रावण के सभा-मंडप में पहुँची । वहाँ पहुँचकर वह सुंदरी आँखों से अश्रुधारा बहाती
हुई बड़ी नम्रता से अपने ससुर से कहने लगी--'हे दानवेन्द्र, पति से वंचित हुई पत्नी का
यही धर्म है कि वह पति के साथ ही इस संसार को त्याग दे । अत, मुझे अभी पति के
साथ जाना चाहिए । आप अपने सैनिकों तथा मित्रों के द्वारा मेरे पति का शव मँगवा
दीजिए ।'
उस साध्वी के वचन सुनकर राक्षसराज बड़ी देर तक चिंता में घुलते हुए चुप
रहा, फिर कहने लगा--'हे साध्वी, तुम्हारे पति का शरीर युद्ध-क्षेत्र में शत्रुओं के बीच में
पड़ा हुआ है । यदि मैं जाकर माँगूँ भी, तो क्या, वे मुझे वह शरीर देंगे ? अत, यह कार्य
मुझसे नहीं हो सकेगा । अब आगे जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसे करो । मैं क्या कहूँ ?
हे पुत्री, कोई ऐसा कार्य नहीं है, जिसका ज्ञान तुम्हें न हो । अपनी बुद्धि के अनुरूप मैने
तुम्हें यह परामर्श दिया है ।'
तब उस पद्मलोचनी ने उससे कहा--'हे दानवेन्द्र, आपने अपने हाथ से कैलास
पर्वत को उठाकर शिवजी को भी भयभीत किया था । आप तीनों लोकों को जीते हुए
महान् वीर हैं । देवेन्द्र को भी परास्त किये हुए महावीर के सम्मुख नर और वानरों की
शक्ति कितनी है ? नरों तथा वानरों के मध्य पड़े हुए आपके वीर-पुत्र का शरीर लाने
में आप अपनी असमर्थता प्रकट कर रहे हैं । कदाचित् यह कुसमय का ही प्रभाव है कि
आप इस प्रकार कह रहे हैं । पति-हीना तरुणियों को यदि घर के बाहर कार्यवश जाना
पड़े, तो धर्म यही बताता है कि वे अग्नि को साथ लेकर जायें । आप मेरे निवेदन को
बुरा मत मानिए और मुझे जाने की आज्ञा दीजिए । मैं स्वयं जाकर अपने पति का शरीर
ले आऊँगी ।'
दशकंठ ने उस रमणी को जाने की अनुमति दी, तो उसने अपने श्वशुर को प्रणाम
किया और आषाढ़ मास की बिजली के सदृश दीखनेवाली अपनी देह की कांति की किरणें
भूमि तथा आकाश में व्याप्त करती हुई, निश्चल बुद्धि से वह सुंदरी आकाश-मार्ग से चल
पड़ी । सभी वानर-वीर आश्चर्य-चकित हो उस कमललोचनी को देखकर सोचने लगे--
'कदाचित्, देवताओं ने स्वर्ग-लोक से इस श्रेष्ठ सुंदरी को राम देव के पास भेजा होगा,
अथवा अपने पुत्र की मृत्यु के दुःख से पीड़ित हो रावण ने अपना दर्प त्यागकर सीता को
रथ पर बिठाकर भेज दिया होगा, अन्यथा किसी देवकांता को इतने वेग से यहाँ आने

की आवश्यकता ही क्या थी ?' अंगद, सुग्रीव, हनुमान् तथा युद्ध-भूमि में रहनेवाले सभी
वानर-नेता राम-लक्ष्मण के निकट पहुँचकर आश्चर्य प्रकट करने लगे । उस समय परम
पावन, पवन-पुत्र ने आकाश-मार्ग से आनेवाली उस रमणी को देखकर रामचन्द्र से कहा--
'हे देव, यह मानिनी, देवकांता नहीं है और राम की पत्नी भी नहीं है । यह कोई पति-
हीना स्त्री है, उसका प्रत्यक्ष प्रमाण भी है । वहाँ उस रमणी के रथ पर देखिए, भस्म से
आवृत अग्नि दिखाई दे रही है ।'

११२. सुलोचना का राम की स्तुति करना

इतने में वह रमणी शीघ्रगति से उस स्थान पर पहुँचकर रथ से उतर आई ।
क्षीण कटि से विलसित वह रमणी ऐसी दीखती थी, मानो स्वर्ण-प्रतिमा हो या नवजात
मोती हो, अथवा नव-यौवना राजहंसिनी हो । वह अपनी आँखो से अश्रु बहाती हुई,
चकराती हुई, चीत्कार करती हुई, मद-गति से राघव के सम्मुख पहुँच गई और उन्हें साष्टांग
दण्ड-प्रणाम करके, हाथ जोड़कर कहने लगी--'हे रवि-कुलावुधि सोम, हे रामाभिराम, हे
विमल गुणधाम, हे शत्रुविनाशी, हे मेघश्याम, हे कमलनेत्र, हे विमल चरित्रवान्, हे हिमगिरि-
सम धीर, हे ललित-मधुर-वचन-कुशल, हे लावण्य-निधि, हे जन-नायक, आपके चरणो की सेवा
से मेरे सभी पाप दूर हो गये ।'
इस प्रकार, राम के समक्ष स्तुति करती हुई, विनय के साथ वह खड़ी हुई । तब
राम की आज्ञा से सूर्यपुत्र ने कहा--'हे सुंदरी, तुम कौन हो ? तुम्हारे यहाँ आने का क्या
कारण है ? तुम्हारा नाम क्या है ? तुम्हारे पति कौन हैं ? तुम किसकी पुत्री हो ? तुम
अपना वृत्तांत सुनाओ ।' तब वह आँसू बहाती हुई कहने लगी--'हे भानु-पुत्र, मेरे पिता
आदिशेष हैं, मेरा नाम सुलोचना है, मेरे पति वह पुण्यवान्, बहुभोग-भाग्य-सपन्न, बाहुबली,
महा तेजस्वी, युद्ध में भयंकर, इन्द्र-विजयी, महान् शूर, दशकंठ तथा मदोदरी के पुत्र
मेघनाद हैं ।'
इतना कहने के पश्चात् उस रमणी ने राम को देखकर शोकाभिभूत होकर कहा--
'हे राघवेन्द्र, आपने युद्ध-भूमि में ऐसे महान् शूर का वध किया है । कृपालु होते हुए भी
आपने कैसे उनका संहार किया ? हे सूर्यकुलतिलक, ऐसा महान् विक्रमी अब आगे कहीं
जन्म लेगा ? आप जानते ही हैं कि पति की वियोगाग्नि से सती स्त्री अत्यधिक परितप्त
होती है । मैं अपने पति को खोकर वैधव्य-दुख का कैसे सहन कर सकूँगी ? हे शरणार्थी-
त्राण, हे दयामय, हे परिपूर्णहृदय, हे शुभ-गुण-संपन्न, मैं आपकी शरण में आई हूँ ।
शरणागत की रक्षा करने की आपकी टेक है । मेरे पति को प्राण-दान देकर आप अपने
प्रण की रक्षा कीजिए । पति-भिक्षा देकर मुझे जीवन प्रदान कीजिए ।'
सुलोचना की कातर प्रार्थना सुनकर, दया-मूर्ति राम का हृदय पिघल गया और
वे उस रमणी के पति को पुनर्जीवित करने की वात सोचने लगे । यह समझकर हनुमान् ने
राम से निवेदन किया-'हे राघव, आप तो सर्वज्ञ हैं । उस ब्रह्मा का वचन टाल देना
आपको उचित नहीं है । हे राजन्, आपको ब्रह्मा की मर्यादा रखनी चाहिए।' तब राघव ने
पवन-पुत्र की बातो पर विचार करके कहा--'हे कमलाक्षी, तुम अगले जन्म में अपने

३९८ रंगनाथ रामायण
पति के साथ इस पृथ्वी पर जन्म लेकर अगणित संपत्ति के साथ चिर काल तक
सुख-भोग करोगी और उसके पश्चात् तुम दोनो वैकुण्ठ में अपना इच्छित सुख
प्राप्त करोगे ।'
राम के वचन सुनकर वह स्त्री हर्षित हुई और विनयपूर्वक उस दयामय राम की
स्तुति यो करने लगी—'हे दया-समुद्र, हे अमल-गुण-वीर, हे साधुजन-आश्रित, हे सेतु-बन्धक,
आप कृपा करके मेरे पति का शव मँगा दीजिए । मुझे अब शीघ्र नगर को लौट
जाना चाहिए ।' तब सुग्रीव ने उस स्त्री से कहा—'हे कमलनयनी, यदि तुम पतिव्रता हो,
तो बिना विलंब जाकर अपने प्रिय पति से अपना सारा वृत्तान्त कहो ।' यह सुनकर वह
साध्वी शीघ्र युद्ध-क्षेत्र में पहुँच गई । वहाँ उस चंचलाक्षी ने अपने पति के कटे हुए
सिर को देखकर कई प्रकार से रुदन करने लगी । फिर, अपने पति के शरीर के पास
पहुँचते ही उमड़ते हुए दुःख से वह मूच्छित होकर गिर पड़ी । कुछ समय के उपरान्त वह
सचेत हुई और अपने प्राणेश्वर के शरीर पर गिरकर ऊँचे स्वर में हाहाकार करती हुई
विलाप करने लगी । फिर वह धैर्य धारण किये हुए स्थिर हो खड़ी हुई और सत्य की
प्रभा से दीप्त होती हुई यो बोली—'यदि मैंने मन-वचन-कर्म से पति की भक्ति की हो,
यदि मैंने धर्माचरण में पति को ही दैव मानकर पातिव्रत्य धर्म का पालन किया हो, तो
मेरे पति पुनर्जीवित होकर मुझसे संभाषण करें ।'
सुलोचना ने आत्मविश्वास के साथ जब ऐसे वचन कहे, तो दशकंठ के पुत्र ने
आँखें खोलकर कहा—'हे रमणी, मेरा वध करानेवाले तुम्हारे पिता ही तो हैं ? मुझे
जीतने की शक्ति दूसरो में कहाँ है ? तुम को दुखी होने की कोई आवश्यकता नहीं है ।
अपने ऋणानुबंध के अनुसार ही पति अपने पत्नी के साथ रहता है । संयोग तथा वियोग,
दोनों, जीवों के लिए ब्रह्मा के द्वारा विधान किये जाते हैं । समय की गति प्रबल है,
इसलिए मेरी मृत्यु हुई है । अब तुम जाओ ।' इतना कहकर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं ।
सुलोचना मन-ही-मन अत्यंत दुखी हो, वहाँ से चलकर राम के पास आई और
उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और बड़ी प्रसन्नता से उनकी प्रशंसा करने लगी ।
तब रघुराम ने अंगद को बुलाकर कहा—'इस रमणी को उसके पति का शरीर
दिला दो ।'
अंगद ने राम की आज्ञा मानकर सुलोचना को उसके पति का शरीर दिला दिया ।
सुलोचना उस शव को लिये हुए बड़ी भक्ति से राम की आज्ञा प्राप्त कर वहाँ से शीघ्र लंका-
नगर को रवाना हुई । वह सीधे अपने अंतःपुर में नहीं गई, किन्तु अपने पति के शरीर
को एक योग्य स्थान में रखकर, उसकी रक्षा के लिए सैनिकों को नियुक्त करके, उसके पश्चात्
अंतःपुर में गई । वह बहुत समय तक अत्यधिक चिंता में निमग्न रही और उसके पश्चात्
अपने प्रिय पुत्रों को पास बुलाकर आँखों से अश्रुधारा बहाती हुई, उनके सिरों को सूंघा,
गालों का बड़े स्नेह से स्पर्श किया और फिर उन्हें हृदय से लगाकर कहा—'हे पुत्रो,
तुम्हारे मुँह देखते रहने का सौभाग्य मुझे भगवान् ने नहीं दिया है। अब इस पृथ्वी पर
जीना मेरा धर्म नहीं है, इसलिए अवश्य मैं सहगमन करूँगी । अब तुम्हारा यहाँ रहना भी

", "शख", "सुदर", "अलकरण", "स्वय", "प्रशसा", "देव-मडली"?
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दशकंठ -> दशकठ
कंठ -> कठ
वृत्तांत -> वृत्तात
अंत -> अत
कांतिहीन -> कातिहीन
संबंध -> सबंध
असंभव -> असभव
चंचलाक्षी -> चचलाक्षी
अंतःपुर -> अत पुर
पीतांबर -> पीताबर
चंदन -> चदन
सुंदरी -> सुदरी
मृदंग -> मृदग
शंख -> शख
सुंदर -> सुदर
अलंकरण -> अलकरण
स्वयं -> स्वय
प्रशंसा -> प्रशसा
देव-मंडली -> देव-मडली
संग -> सग
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४०० रंगनाथ रामायण
११४. रावण का अपनी प्रधान सेना को युद्ध के लिए भेजनी
रावण अत्यधिक क्रोध तथा शोक से जलते हुए, बार-बार उमडनेवाले पुत्र-शोक
में घुलते हुए अपने सभा-मडप में पहुँचा। क्रोधोद्दीप्त सिंह की भाँति उष्ण नि श्वासो को
छोडते हुए, बल, साहस तथा युद्ध-कुशलता से सपन्न अपने सैनिको को देखकर उसने आदेश
दिया कि तुम शीघ्र जाकर वानरो तथा राम-लक्ष्मण को जीतकर आओ ।
रावण का आदेश शिरोधार्य करके राक्षस-सैनिको ने बडे उत्साह के साथ, रथ, गज,
तुरग, पदाति आदि चतुरगिणी सेना के साथ युद्ध के लिए आवश्यक शस्त्रास्त्रो का सगठन
किया । फिर, वे वज्र-कवच तथा वज्र-सम आयुधो से सज्जित हो भीषण गति से चल पडे ।
उस समय उनके गज-समूह के चिघाडो तथा घटिकाओ एव अश्वो की हिनहिनाहटो का भीषण
रव, दुदुभि, शख, पटह, डमरू, पणव आदि वाद्यो का तुमुल नाद, सेना का कलकल,
ध्वजाओ की फडफडाहट, रथ के पहियो की गडगडाहट तथा धनुष का टकार आदि विविध
ध्वनियो से मथित समुद्र की भाँति दिशाएँ गूँजने लगी । सेना के चलने से अत्यधिक धूलि
ऐसे उडने लगी, मानो वह समुद्र से युद्ध करने जा रही हो। सभी राक्षस ऐसे गर्जन करने
लगे कि उनके गर्जनो की ध्वनि आकाश का स्पर्श करने लगी और सारी पृथ्वी काँपने लगी । वे अपनी
गर्वोक्तियो, धमकियो, हुकारो तथा चिल्लाहटो की ध्वनियो के साथ, अपने मणिमय कुडलो,
हारो, ककणो तथा किरीटो की दीप्ति को विकीर्ण करते हुए लका से बाहर निकले, मानो
महान् शक्ति-सपन्न कपि-समुद्र को देखकर, बडे उत्साह से लका-समुद्र से निकलनेवाला
वडवाग्नि का समूह हो ।
तब कपि-वीरो ने बडे उत्साह से गर्जन करते हुए, अपने पदाघातो से दिग्गजो को
बैठ जाने के लिए विवश करते हुए, आकाश की ओर उछलते हुए तथा ताल ठोककर
ब्रह्माण्ड को भी विदीर्ण करते हुए, काजल के पर्वतो के समान दीखनेवाले राक्षसो को
देखकर करोडो वृक्षो, पर्वतो तथा वडी-बडी शिलाओ को लिये हुए, उन पर आक्रमण
किया । इतने में उदयाद्रि पर सूर्य भगवान् चढ आये, मानो वे रघुराम की धनुर्विद्या की
निपुणता देखने की उत्कट अभिलाषा लिये हुए आये हो । राक्षस तथा वानर-सेनाएँ ऐसी
भयकर रीति से परस्पर भिड गई, मानो एक समुद्र दूसरे समुद्र से भिड गया हो । कपियो
की विशाल सेना को देखकर राक्षस अपने रथ, गज तथा अश्वो को उनकी ओर बढाते
हुए वानरो पर टूट पडे और उन्हें अनेक रीतियो से दुख पहुँचाने लगे । किन्तु, वानरो ने
अत्यत साहस के साथ पर्वतो को उठाकर उन पर फेंका । उनके प्रहार से कई राक्षस-
सैनिक गिर पडे । राक्षस, करवालो से वानरो की पूँछो को काट डालते थे, तो वानर
अपने बाहु-दण्डो से राक्षसो के गदा-दण्डो को तोड देते थे । राक्षस, वानरो पर परशुओ,
परिघो तथा खड्गो को फेंकते थे, तो वानर पर्वतो, वृक्षो तथा पर्वत-शृगो को फेंककर उन्हें
नष्ट कर देते थे । युद्ध-भूमि में रक्त की धाराएँ बहने लगी । वानर अपनी पूँछो से
पर्वतो को उठाकर फेंकते थे, तो राक्षस उनके नीचे चूर-चूर हो जाते थे और फिर चक्रो
तथा गदाओ से वानरो पर प्रहार करते थे । इस प्रकार, वे समान पराक्रम दिखाते हुए
परस्पर युद्ध करते थे । राक्षस जब गजो, अश्वो तथा रथो को कपियो पर चलाकर उन्हें