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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 425, कुल 508 में से

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पृष्ठ 425

युद्धकांड ३९५
की भाँति वह सीता रावण को देख सोचने लगी—'हाय भगवन्, इस दुरात्मा के हाथो से
मुझे इस प्रकार मरना पड रहा है । कदाचित् इन्द्रजीत की मृत्यु का समाचार जानकर
मुझे मारने के लिए यह आ रहा है अथवा उन राम-लक्ष्मण को जीतकर मुझे मारने के
उद्देश्य से यहाँ आ रहा है, मुझे जान नही पडता । क्या, इसी के हाथ मरना विधि ने
मेरे भाग्य में लिखा है ? हाय, अब मैं क्या करूँ ? हाय भगवन्, तुमने अत्यत पुण्यात्मा
राम-लक्ष्मण को अनेक सकटो में डाल दिया है ।' इस प्रकार, वह कमललोचनी विलाप
करती हुई, अपने मन में रघुराम की मूर्त्ति प्रतिष्ठित करके दुख-विवश होकर मूर्च्छित हो गई ।
पृथ्वी पर पडी हुई सीता को देख दशकंठ उनकी तरफ आगे बढा । तब सभी
राक्षस हाहाकार करते हुए चिल्लाने लगे—'यह भयकर कृत्य अनुचित है ?' उसी समय
महान् मतिमान् तथा नीतिवान् सुपार्श्व नामक राक्षस रावण के निकट पहुँचकर निर्भय
हो रावण को उपदेश देने लगा कि हे दानवेंद्र, तुम्हारे पितामह पुलस्त्य हैं, तुम्हारे पिता
धर्मात्मा, नीतिज्ञ तथा यशस्वी विश्रवस् हैं, तुम स्वय वेद तथा आगमो के ज्ञाता हो, अपने
महत्त्व का विचार किये बिना तुम ऐसे दुष्कर्म करने पर क्यो उतारू हुए हो ? उत्तम
स्त्रियो का स्पर्श करके उनका वध करना महापाप हैं । इसलिए, तुम यह विचार छोड दो ।
तुम अपना सारा क्रोध कल युद्ध में राम-लक्ष्मण पर दिखाना । इस प्रकार कहकर
सुपार्श्व ने रावण के हाथ से चन्द्रहास छीन लिया और रावण को अपने साथ वहाँ से
ले आया । वहाँ से लौटकर दशकंठ मन-ही-मन शोक से पीडित होते हुए अपने मन्त्रियो
तथा बंधुमित्रो को सभा-मडप में बुलाया और अपने पुत्र के गुणो की बार-बार प्रशसा
करते हुए शोक प्रकट करने लगा ।
१११ इन्द्रजीत की स्त्री सुलोचना का शोक
अत पुर की स्त्रियाँ इन्द्रजीत की मृत्यु का समाचार सुनकर शोक प्रकट करने लगीं,
तो उसे सुनकर आदिशेष की पुत्री सुलोचना को अपने प्राणनाथ की मृत्यु का समाचार
ज्ञात हो गया । वह तुरत शोक से अभिभूत होकर, मूच्छित गिर पडी । बडी देर तक
सहेलियो की परिचर्या के उपरान्त, वह किंचित् सचेत हुई और अपने प्राणेश्वर का स्मरण
करती हुई विविध रीतियो से यो प्रलाप करने लगी—“हाय प्राणेश्वर, हे प्राणनाथ, क्या,
एक साधारण मनुष्य ने तुम्हें परास्त किया है ? हाय, वह पापी ब्रह्मा हमारे प्रेम को नही
देख सका । इसीलिए उसने हम दोनो को अलग कर दिया है । जब कभी तुम बाहर
जाते थे, तब मुझसे कहकर जाते थे । इस बार भी तुम मुझसे कहकर जाते, तो
शत्रु के हाथो तुम्हारी ऐसी मृत्यु नही होती । मेरे पिता ने जब तुम्हारे साथ बडी प्रीति
से मेरा विवाह किया था, तब उन्होने तुमसे कहा था, 'यदि तुम विजय की आकाक्षा करने हो,
तो जाने से पहले सभी कार्यों की सूचना अपनी स्त्री को देकर जाना । तब तुम ब्रह्मा
तथा शिव के लिए भी अजेय बनोगे । नरो की तो बात ही क्या ?' उमके पश्चात् उन्होने
मुझे एक शिरोरत्न देकर कहा था, 'हे पुत्री, जब तुम्हारे पति शत्रुओ पर आक्रमण करने
जायें, तब तुम इस मणि से उनकी आरती उतारकर उन्हें भेजना । ऐसा करो, तो वे
शत्रुओ पर विजय प्राप्त करके अवश्य लौट आयेंगे ।' उनके इन प्रिय वचनो को भूलकर