रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 423, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंचंद्र तथा सूर्य-सम विलसित राम-लक्ष्मण को अलंकृत किया । राम-लक्ष्मण, रवि-पुत्र, राक्षस-
राज विभीषण, हनुमान्, सुषेण, शतमन्यु का पोता जाम्बवान्, नील आदि वानरनायक,
पौलस्त्य-वंशजो का एकमात्र आधार उस वीरवर इन्द्रजीत की मृत्यु पर हर्ष मनाने लगे ।
१०९ इन्द्रजीत की मृत्यु पर रावण का शोक
युद्ध-भूमि से भागे हुए हतशेष राक्षस लंका में पहुँचे और लोक-कंटक रावण को
देख, शोकार्त हो यो कहने लगे- 'हे देव, इंद्र के वैरी आपके पुत्र ने अपने अनुपम भुज-
बल से असंख्य वानरो का संहार किया । उन्होंने देवताओ को आश्चर्य-चकित करते हुए
अपने दिव्य अस्त्रो के प्रयोग से लक्ष्मण को भी व्याकुल कर दिया और युद्ध करते हुए
निदान लक्ष्मण के हाथो से मृत्यु को प्राप्त हुए ।' यह समाचार सुनते ही रावण अत्यधिक
शोक से व्याकुल होकर बहुत समय तक मूर्च्छित होकर पडा रहा । फिर, वह सचेत होकर
शोक-सागर में डूबे हुए कहने लगा--"हाय, वंशवर्द्धन, हे महावीर, हाय दानशील, हे शूर-
वीर, शतमन्यु को सहज ही जीतनेवाला तुम्हारा शौर्य आज किसने दबा दिया ? इन्द्र
आदि दिक्पाल और गगनचारी जीव तुम्हारा नाम लेते ही भयभीत होकर भागते थे ।
ऐसी तुम्हारी भयंकर शक्ति के समक्ष खड़े होकर एक साधारण मानव ने तुम्हारा दर्प-दलन किया !
प्रचंड क्रोध से तुम अपने भयंकर कोदंड को संभाले हुए युद्ध-क्षेत्र में खड़े हो जाते, तो
यम भी तुमसे परास्त हो जाता था । ऐसी तुम्हारी वह शक्ति कहाँ नष्ट हो गई ?
क्या दैव-गति वाम हो गई है ? अन्यथा, हे इन्द्रजीत, आज यम तुमसे भी अधिक प्रवल
कैसे हो गया ? तुम्हारे पैने शर आश्चर्यजनक ढंग से मंदराचल को खंड-खंड कर देने
में समर्थ थे । तुमने युद्ध-भूमि में कई वार सहज ही राम-लक्ष्मण को परास्त किया था ।
हे पुत्र, आज उस शक्ति को खोकर तुम सौमित्र के हाथो मारे गये । हे देवशत्रु, तुम्हारी
मृत्यु से देवता तथा मुनि अत्यंत हर्षित होगे । प्रलय-काल के घन-गर्जन-सदृश तुम्हारे सिंहनाद
करते ही समस्त लोक भयभीत हो जायेंगे । तुम सभी देवताओ के लिए अजेय थे । ऐसे
तुम एक क्षुद्र जीव की भाँति मारे गये । हाय, ब्रह्मा का लेख मिटाने में तुम असमर्थ ही
रहे । आज समस्त चराचर जगत् विक्रम तथा वीरो से शून्य दीख रहा है । हाय पुत्र, मैं
तुम्हारी शक्ति का भरोसा किये हुए था, आज तुमने मुझसे अलग होकर मुझे देवताओ के उपहास
का पात्र बना दिया । क्या, तुम्हारे लिए यह उचित था ? आज राक्षस-स्त्रियो का विलाप
मुझे अपने कानो से सुनना पड रहा है । तुम अपना युवराजत्व, अपनी लंका, अपने इष्ट
वधुओ, अपनी माता, स्त्रियो तथा पुत्रो को त्याग कर कैसे चले गये ? हाय पुत्र, तुम कहाँ
चले गये ? उस दिन तुमने यम को जीत लिया था, ऐसे वलशाली तुम आज उसी के
नगर को कैसे गये ? पुत्र बडी भक्ति से अपने पिता के क्रिया-कर्म करता है । आज वह
कर्म नही रहा, आज मुझे ही तुम्हारा क्रिया-कर्म करना पड रहा है । अब में क्या कहूँ और
क्या करूँ ? राम-लक्ष्मण, रवि-पुत्र, राक्षस-पालक विभीषण तथा भयंकर पराक्रमी वानर,
शूलो के समान मेरे हृदय में गडे हुए है । हे पुत्र, उन हृदय-शूलो को निकाले बिना ही
तुम कहाँ चले गये ? तुम मेरी विजय थे, मेरे तेज थे, मेरे पुण्य-फल थे, मेरे भाग्य थे,
मेरे शौर्य थे, मेरी गति थे, मेरी कीर्त्ति थे और मेरा सर्वस्व तुम ही थे, तुम्हारे जैसे पुत्र की
५०