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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 508 में से

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पृष्ठ 426

३९६ रंगनाथ रामायण
तुम शत्रुओं के दिव्य शरों से युद्ध-भूमि में निहत हुए ।" इस प्रकार, प्रलाप करती हुई
उसने मन-ही-मन अपने प्राण, अपने प्राणेश्वर के चरणों पर समर्पित कर लिये । उसके
पश्चात् अपने पुत्रों को देखकर उस सुंदरी ने कहा--'हे पुत्रो, शोक-रूपी गम्भीर समुद्र में डूबने
के पश्चात् भी किस बात का भय हो सकता है ? विभीषण तो हैं ही । वे अवश्य तुम्हारी
रक्षा करेंगे । अत, तुम श्रेष्ठ गुणों से संपन्न होते हुए उन्नति करो । अब मेरा जीना उचित
नहीं है । मैं अवश्य अपने प्राणेश्वर की सेवा में जाऊँगी ।'
इस विचार से मन-ही-मन हर्षित होती हुई, वह अपने मन की इच्छा को दृढ़
बनाती हुई, अत्यधिक क्लान्ति से चीत्कार करती हुई अपने पैरों को घसीटती हुई किसी
प्रकार रावण के सभा-मंडप में पहुँची । वहाँ पहुँचकर वह सुंदरी आँखों से अश्रुधारा बहाती
हुई बड़ी नम्रता से अपने ससुर से कहने लगी--'हे दानवेन्द्र, पति से वंचित हुई पत्नी का
यही धर्म है कि वह पति के साथ ही इस संसार को त्याग दे । अत, मुझे अभी पति के
साथ जाना चाहिए । आप अपने सैनिकों तथा मित्रों के द्वारा मेरे पति का शव मँगवा
दीजिए ।'
उस साध्वी के वचन सुनकर राक्षसराज बड़ी देर तक चिंता में घुलते हुए चुप
रहा, फिर कहने लगा--'हे साध्वी, तुम्हारे पति का शरीर युद्ध-क्षेत्र में शत्रुओं के बीच में
पड़ा हुआ है । यदि मैं जाकर माँगूँ भी, तो क्या, वे मुझे वह शरीर देंगे ? अत, यह कार्य
मुझसे नहीं हो सकेगा । अब आगे जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसे करो । मैं क्या कहूँ ?
हे पुत्री, कोई ऐसा कार्य नहीं है, जिसका ज्ञान तुम्हें न हो । अपनी बुद्धि के अनुरूप मैने
तुम्हें यह परामर्श दिया है ।'
तब उस पद्मलोचनी ने उससे कहा--'हे दानवेन्द्र, आपने अपने हाथ से कैलास
पर्वत को उठाकर शिवजी को भी भयभीत किया था । आप तीनों लोकों को जीते हुए
महान् वीर हैं । देवेन्द्र को भी परास्त किये हुए महावीर के सम्मुख नर और वानरों की
शक्ति कितनी है ? नरों तथा वानरों के मध्य पड़े हुए आपके वीर-पुत्र का शरीर लाने
में आप अपनी असमर्थता प्रकट कर रहे हैं । कदाचित् यह कुसमय का ही प्रभाव है कि
आप इस प्रकार कह रहे हैं । पति-हीना तरुणियों को यदि घर के बाहर कार्यवश जाना
पड़े, तो धर्म यही बताता है कि वे अग्नि को साथ लेकर जायें । आप मेरे निवेदन को
बुरा मत मानिए और मुझे जाने की आज्ञा दीजिए । मैं स्वयं जाकर अपने पति का शरीर
ले आऊँगी ।'
दशकंठ ने उस रमणी को जाने की अनुमति दी, तो उसने अपने श्वशुर को प्रणाम
किया और आषाढ़ मास की बिजली के सदृश दीखनेवाली अपनी देह की कांति की किरणें
भूमि तथा आकाश में व्याप्त करती हुई, निश्चल बुद्धि से वह सुंदरी आकाश-मार्ग से चल
पड़ी । सभी वानर-वीर आश्चर्य-चकित हो उस कमललोचनी को देखकर सोचने लगे--
'कदाचित्, देवताओं ने स्वर्ग-लोक से इस श्रेष्ठ सुंदरी को राम देव के पास भेजा होगा,
अथवा अपने पुत्र की मृत्यु के दुःख से पीड़ित हो रावण ने अपना दर्प त्यागकर सीता को
रथ पर बिठाकर भेज दिया होगा, अन्यथा किसी देवकांता को इतने वेग से यहाँ आने