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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 424, कुल 508 में से

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पृष्ठ 424

३९४ रंगनाथ रामायण

मृत्यु मैने देखी । अब मेरा जन्म किस प्रयोजन का ? इस विपत्ति-रूपी समुद्र को पारं
करने का साधन ही क्या है ? मै अबतक यही विश्वास किये रहा कि तुम्हारी सहायता
से मै राम को जीत लूँगा । वह विश्वास अब नष्ट हो गया है । मेरी सभी आशाएँ समाप्त
हो गईं । अब मै इस शोक-दावानल में जल नहीं सकता ।" इस प्रकार, आर्त्तनाद करते
तथा बार-बार शोक करते हुए, अस्थिरमति हो, रावण कितनी ही बार मूच्छित होता रहा ।
दशकंठ के विवेकी मंत्री उसे सांत्वना देने तथा समझाने लगे । रावण बार-बार सँभलकर
रोष तथा शोक से, भौंहें तानता, और चारो दिशाओ में क्रमशः अपनी क्रुद्ध दृष्टि केन्द्रित
करता । जिस दिशा में उसकी क्रुद्ध दृष्टि पड जाती, उस दिशा में स्थित राक्षस भय से
सिकुड जाते । निदान, राक्षसेश्वर ने अपने उग्र दाँतो को पीसते हुए, अपने दसो मुखो के
नेत्रो से अग्नि-कणो की वर्षा करते हुए अपने मंत्रियो को देखकर कहा--'मैने अविरत
तप से ब्रह्मा को संतुष्ट किया और असंख्य शस्त्रास्त्रो को प्राप्त किया । मैने युद्ध में न
कभी अपजय प्राप्त की, न कभी अपने मन में शोक का ही अनुभव किया । शिवजी को
संतुष्ट करके नील मेघ के सदृश जो कवच मैने प्राप्त किया है, उसे धारण करके यदि मै
अपने रथ पर युद्ध के लिए जाऊँ, तो क्या, स्वर्ग के अधिपति भी मुझे जीत सकते हैं ?
उस दिन मै ब्रह्मा से जो धनुष-बाण प्राप्त किये थे, उन्हें शीघ्र ले आओ । आज मै अपने
पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए शीघ्र शत्रुओ पर आक्रमण करूँगा और राम और लक्ष्मण
तथा वानरो को जीतूँगा ।' इतना कहकर वह मन-ही-मन प्रलय-काल की अग्नि की भाँति
जलते हुए ताल ठोककर सभी दिशाओ को प्रतिध्वनित करते हुए विविध वाद्यो के निनाद
के बीच युद्ध के लिए चल पडा । अत्यंत क्रोध से वह गरजकर कहने लगा--'राम ने
सीता को प्राप्त करने के लिए मेरे भाइयो, पुत्रो, वधुओ तथा सैनिको का नाश किया है ।
इंद्रजीत ने माया सीता का भी वध किया । मेरे सभी उपाय निरर्थक हो गये । मै अभी
जाऊँगा और असली सीता का ही वध करके अपना प्रतिशोध लूँगा ।'

११० रावण का सीता का वध करने के लिए जाना

इस प्रकार कहने के पश्चात् वह चंद्रहास को अपने हाथ में लेकर अपने पादाघात से
पृथ्वी को कँपाते हुए अशोक-वन की ओर चल पडा । तब वृद्ध राक्षस-मंत्री आपस में
परामर्श करने लगे--'क्या दशकंठ उन दाशरथियो को अपने पैने बाणो से जीत नहीं सकता ।
इसने लोक-पालको की परवाह न करके युद्ध में उन्हें जीत लिया था, मरुतो को भयंकर
युद्ध में परास्त किया, नौ ब्रह्माओ को जीत लिया, आठ वसुओ का दर्प चूर कर दिया,
अपने प्रताप से नवग्रहो को दबा दिया, बारह आदित्यो को झुका दिया, ग्यारह रुद्रो को
जीत लिया, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, उरग, गरुड तथा भयंकर दानवो को भयभीत करके अपने
वश में कर लिया । ऐसी दशा में इसके सामने मनुष्यो की शक्ति ही कितनी है ? क्रोध
में आकर पतिव्रता स्त्री को मारना उचित नहीं है ।'
उसी समय रावण यम की भाँति लोक-भयंकर रूप धारण किये हुए जानकी का वध
करने के उद्देश्य से अशोक-वन में पहुँच गया । उस पापात्मा की क्रुद्ध दृष्टि को देखते
ही वह साध्वी भय से सिकुड-सी गई । भयंकर ग्रह के समक्ष भयाक्रांत हो पडी हुई रोहिणी