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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 422, कुल 508 में से

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पृष्ठ 422

३९२ रंगनाथ रामायण
सपन्न हो, अत्यत हर्ष से दिगाओ को कँपाते हुए शख बजाया, धनुष का भीषण टंकार
और सिंहनाद किया । उस समय अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और गधवों ने अपने मधुर
मगीत से लोगो को आनद पहुँचाया ।
तब विभीषण ने अत्यधिक हर्ष से लक्ष्मण को हृदय से लगा लिया और सभी वानर
हर्ष मानने लगे । हतशेष निशाचर त्रस्त हो, वानरो के आक्रमण के समक्ष खडे रहने का
साहस न कर सके और अपने चरणो के आघातो से पृथ्वी को कँपाते हुए, अपने आयुधो
को जहाँ-तहाँ फेंककर, प्राण लेकर भागने लगे । कुछ राक्षस लका की ओर भागे, कुछ
पर्वत-शृंगो पर चढ गये, कुछ समुद्र में कूद गये और कुछ गुफाओ में जाकर छिप गये ।
तब अग्निदेव अपनी स्वाभाविक दीप्ति से जलने लगे, सूर्य प्रखर तेज से भासमान होने
लगा, मानो समुद्र अत्यन्त स्वच्छ हो गये, दिगाओ में आच्छादित कुहरा हट गया, गगन
प्रसन्न दीखने लगा, और पृथ्वी निष्कप दिखाई पडने लगी । तब हनुमान्, शतवली, नल,
पनस, गभ, ऋषभ, अतुल पराक्रमी अगद अतिबली सुग्रीव, दधिमुख, गज, गवय, गधमादन,
द्विविद, मैन्द आदि वानर-नेताओ ने आकर लक्ष्मण को प्रणाम किया और बडे हर्ष से उनकी
प्रशंसा करने लगे । समस्त देवताओ ने भी लक्ष्मण की प्रशंसा करते हुए पुष्प-वृष्टि की ।
वानरो ने विजय-गर्व से सिंहनाद किया । परिमल से युक्त मंद पवन धीरे-धीरे चलने लगा।
चूंकि, लक्ष्मण विष्णु के अग से सभूत थे, उनके हाथो युद्ध में मरे कपटी राक्षस, शरीर तजकर,
पश्चिम सागर में डूबनेवाले सूर्य की भाँति विष्णु-सायुज्य को प्राप्त हो गये । सूर्यवंश की कीर्त्ति को
सब दिगाओ में व्याप्त करते हुए लक्ष्मण ने वहाँ एक विजय-स्तभ प्रतिष्ठित किया और वानरो,
विभीषण तथा हनुमान् के साथ शीघ्र रामचन्द्र की मेवा में पहुँच गये । वहाँ पहुँचकर उन्होने राम
के चरण-कमलो में झुककर प्रणाम किया । तब, राम ने उन्हें अपने हृदय से लगा लिया
और आनन्दाश्रुओ से अभिषिक्त करते हुए, उन्हें अपनी गोद में बिठा लिया । लक्ष्मण के
शरीर पर वीर-पुलक के सदृश लगे हुए वाणो को देखकर उमडनेवाले अपार दुख तथा
मेघनाद की मृत्यु के अत्यधिक हर्ष से राम मूर्च्छित-से हो गये । किन्तु, वे शीघ्र ही सँभल गये
और सूर्य-पुत्र को तथा विभीषण को अपने भाई लक्ष्मण को दिखाकर यो कहने लगे—
'युद्ध में अजेय होकर आज इसने कैसी अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया है । असख्य दिव्य
शस्त्रास्त्रो से सम्पन्न इन्द्रजीत का इसने वध किया है । अत, अब यह निश्चित ही है कि महान्
शक्ति-सम्पन्न रावण मेरे हाथो मरेगा । उसका वैभव और उमका बल, आज उसके पुत्र की
मृत्यु के साथ ही समाप्त हो गये । असंख्य शस्त्रो से सम्पन्न तथा समस्त राक्षसो का आधार
अपने पुत्र की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से रावण मेरे साथ युद्ध करने के लिए
समस्त आयुधो से सुसज्जित होकर, दुर्वार गति से आवे, तो भी मै अपने पैने वाणो से,
चतुरगिणी सेना के साथ दशकठ का खड-खड करके भूतो को बलि चढा दूँगा ।'
इसके पश्चात् राम ने सुषेण को देखकर कहा- 'हे वानरोत्तम, तुम ओषधी-शैल स
श्रेष्ठ प्रभा-विलसित विशल्यकरणी ले आओ और लक्ष्मण, विभीषण तथा अन्य वानरो के
शरीर पर लगे वाणो के घावो की पीडा को दूर कर दो । सुषेण ने राम के आदेश का
पालन किया और वे सब स्वस्थ-गात्र हो गये । सूर्य-पुत्र की आज्ञा से, सभी वानरो ने