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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

70 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
लग चुका था, वे बनावटी बातों पर क्यों विश्वास करते ? अंत में उन्होंने अपनी
यह इच्छा प्रकट की कि यदि मैं बंगाल का संबंध बताकर कुछ बोलशेविक संबंध
के विषय में अपना बयान दे दूँ, तो वे मुझे थोड़ी-सी सज़ा करा देंगे, और सज़ा
के थोड़े दिनों बाद ही जेल से निकालकर इंग्लैंड भेज देंगे और पंद्रह हज़ार रुपये
पारितोषिक (इनाम) भी सरकार से दिला देंगे। मैं मन-ही-मन में बहुत हँसता था।
अंत में एक दिन फिर मुझसे जेल में मिलने को गुप्तचर विभाग के कप्तान साहब
आए। मैंने अपनी कोठरी में से निकलने से ही इनकार कर दिया। वह कोठरी पर
आकर बहुत-सी बातें करते रहे, अंत में परेशान होकर चले गए।
शिनाख्त (पहचान) कराई गई। पुलिस को जितने आदमी मिल सके उतने
आदमी लेकर शिनाख्त कराई। भाग्यवश श्री अईनुद्दीन साहब मुकदमे के मजिस्ट्रेट
मुकर्रर हुए, उन्होंने जी भर कर पुलिस की मदद की। शिनाख्तों में अभियुक्तों को
साधारण मजिस्ट्रेटों की भाँति भी सुविधाएँ न दीं। दिखाने के लिए कागजी
कार्यवाही खूब साफ रखी। जबान के बड़े मीठे थे। प्रत्येक अभियुक्त से बड़े
तपाक से मिलते थे। बड़ी मीठी-मीठी बातें करते थे। सब समझते थे कि हमसे
सहानुभूति रखते हैं। कोई न समझ सका कि अंदर-ही-अंदर घाव कर रहे हैं।
इतना चालाक अफसर शायद ही कोई दूसरा हो। जब तक मुकदमा उनकी
अदालत में रहा, किसी को कोई शिकायत का मौका ही न दिया। यदि कभी कोई
बात भी हो जाती तो ऐसे ढंग से उसे टालने की कोशिश करते कि किसी को
बुरा ही न लगता। बहुधा ऐसा भी हुआ कि खुली अदालत में अभियुक्तों से क्षमा
तक माँगने में संकोच न किया। किंतु कागजी कार्यवाही में इतने होशियार थे कि
जो कुछ लिखा सदैव अभियुक्तों के विरुद्ध। जब मामला सैशन के सुपुर्द किया
और आज्ञापत्र में युक्तियाँ दीं, तब सब की आँखें खुलीं कि कितना गहरा घाव
मार दिया।
मुकदमा अदालत में न आया था, उसी समय रायबरेली में बनवारीलाल की
गिरफ्तारी हुई। मुझे हाल मालूम हुआ। मैंने पं. हरकरननाथ से कहा कि सब काम

वृहत् संगठन 71.

छोड़कर सीधे रायबरेली जाएँ और बनारसीलाल से मिलें, किन्तु उन्होंने मेरी बातों
पर कुछ भी ध्यान न दिया। मुझे बनारसीलाल पर पहले ही संदेह था, क्योंकि
उसका रहन-सहन इस प्रकार का था कि जो ठीक न था। जब दूसरे सदस्यों के
साथ रहता तब उनसे कहा करता कि मैं जिला संगठनकर्त्ता हूँ। मेरी गणना
अधिकारियों में है। मेरी आज्ञा का पालन किया करो। मेरे जूठे बर्तन मला करो। कुछ
विलासिता-प्रिय भी था। प्रत्येक समय शीशा, कंघा तथा साबुन साथ रखता था।
मुझे इससे भय था, किन्तु हमारे दल के एक खास आदमी का वह विश्वासपात्र
रह चुका था। उन्होंने सैकड़ों रुपये देकर उसकी सहायता की थी। इसी कारण
हम लोग भी अंत तक उसे मासिक सहायता देते रहे। मैंने बहुत कुछ हाथ-पैर
मारे पर कुछ भी न चली और जिसका मुझे भय था, वही हुआ। भाड़े का टट्टू
अधिक बोझ न सँभाल सका, उसने बयान दे दिए। जब तक यह गिरफ्तार न
हुआ था कुछ सदस्यों ने इसके पास जो अस्त्र थे वे माँगे, पर उसने न दिए।
जिला अफसर की शान में रहा। गिरफ्तार होते ही सब शान मिट्टी में मिल गई।
बनवारीलाल के बयान दे देने से पुलिस का मुकदमा मजबूती पकड़ गया। यदि
वह अपना बयान न देता तो मुकदमा बहुत कमजोर था। सब लोग चारों ओर से
एकत्रित करके लखनऊ जिला जेल में रखे गए। थोड़े समय तक अलग-अलग रहे,
किन्तु अदालत में मुकदमा आने से पहले ही एकत्रित कर दिए गए।
मुकदमे में रुपये की जरूरत थी। अभियुक्तों के पास क्या था? उनके लिए
धन-संग्रह करना कितना कठिन था। न जाने किस प्रकार निर्वाह करते थे।
अधिकतर अभियुक्तों का कोई संबंधी पैरवी भी न कर सकता था। जिस किसी
के कोई था भी, वह बाल-बच्चों तथा घर को सँभालता या इतने समय तक घर-बार
छोड़कर मुकदमा करता? यदि चार अच्छे पैरवी करने वाले होते तो पुलिस का
तीन-चौथाई मुकदमा टूट जाता। लखनऊ जैसे शहर में मुकदमा हुआ, जहाँ
अदालत में कोई भी शहर का आदमी न आता था। इतना भी तो न हुआ कि
एक अच्छा प्रेस-रिपोर्टर ही रहता, जो मुकदमे की सारी कार्यवाही को, जो कुछ

72 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
अदालत में होता था, प्रेस में भेजता रहता। इंडियन डेली टेलीग्राफ वालों ने कृपा
की। यदि कोई अच्छा रिपोर्टर आ भी गया, और जो कुछ अदालत की कार्यवाही
ठीक-ठीक प्रकाशित हुई तो पुलिस वालों ने जज साहब से मिलकर तुरंत उस
रिपोर्टर को निकलवा दिया। जनता की कोई सहानुभूति न थी। जो पुलिस के जी
में आया, करती रही। इन सारी बातों को देखकर जज का साहस बढ़ गया।
उसने जैसा जी चाहा सब कुछ किया। अभियुक्त चिल्लाए- “हाय ! हाय !” पर
कुछ भी सुनवाई न हुई। और बातें तो दूर श्री दामोदर स्वरूप सेठ को पुलिस ने
जेल में सड़ा डाला। लगभग एक वर्ष तक वे तड़पते रहे। सौ पौंड से केवल
छियासठ पौंड वजन रह गया। कई बार जेल में मरणासन्न हो गए। नित्य बेहोशी
आ जाती थी। लगभग दस मास तक कुछ भी भोजन न कर सके। जो कुछ
छटाँक-दो-छटाँक दूध किसी प्रकार पेट में पहुँच जाता था, उससे इस प्रकार की
विकट वेदना (पीड़ा) होती थी कि कोई उनके पास खड़ा होकर उस छटपटाने के दृश्य को
देख न सकता था। एक मैडिकल बोर्ड बनाया गया, जिसमें तीन डाक्टर थे उनकी कुछ
समझ में न आया, तो कह दिया कि सेठजी को बीमारी ही नहीं है।
जब से काकोरी षड्यंत्र के अभियुक्त जेल में एक साथ रहने लगे, तभी से
उनमें एक अद्भुत परिवर्तन हुआ, जिसे देखकर मेरे आश्चर्य की सीमा न रही।
जेल में सबसे बड़ी बात तो यह थी कि प्रत्येक आदमी अपनी नेतागिरी की दुहाई
देता था। कोई भी बड़े-छोटे का भेद न रहा। बड़े तथा अनुभवी पुरुषों की बातों
की अवहेलना होने लगी। अनुशासन का नाम भी न रहा। बहुधा उलटे जवाब
मिलने लगे। छोटी-छोटी बातों पर मतभेद हो जाता। इस प्रकार का मतभेद कभी-
कभी वैमनस्य तक का रूप धारण कर लेता। आपस में झगड़ा भी हो जाता। खैर !
जहाँ चार बर्तन रहते हैं, वहाँ खटकते ही हैं। ये लोग तो मनुष्य देहधारी थे।
एक बार विचार हुआ कि सरकार से समझौता कर लिया जाए। बैरिस्टर
साहब ने खुफिया पुलिस के कप्तान से परामर्श आरंभ किया। किंतु यह सोचकर
कि इससे क्रांतिकारी दल की निष्ठा न मिट जाए, यह विचार छोड़ दिया गया।

बृहत् संगठन 73
युवकों की राय हुई कि अनशन व्रत करके सरकार से हवालाती की हालत में ही
माँगें पूरी करा ली जाएँ क्योंकि लंबी-लंबी सजाएँ होंगी। संयुक्त प्रांत की जेलों में
साधारण कैदियों का भोजन खाते हुए सजा काटकर जेल से जिंदा निकलना कोई
सरल कार्य नहीं। जितने राजनैतिक कैदी षड्यंत्रों के संबंध में सजा पाकर इस
प्रांत की जेलों में रखे गए, उनमें से पाँच-छः महात्माओं ने इस प्रांत की जेलों के
व्यवहार के कारण ही जेलों में प्राण त्याग दिए।
इस विचार के अनुसार काकोरी के
लगभग सब हवालातियों ने अनशन व्रत
आरंभ कर दिया। दूसरे ही दिन सब पृथक
कर दिए गए। कुछ व्यक्ति डिस्ट्रिक्ट जेल
में रखे गए। कुछ सेंट्रल जेल भेजे गए।
अनशन करते पंद्रह दिन व्यतीत हो गए,
तब सरकार के कान पर भी जूँ रेंगी। उधर
सरकार का काफी नुकसान हो रहा था।
जज साहब तथा दूसरे कचहरी के
कार्यकर्त्ताओं को घर बैठे वेतन देना पड़ता
था। सरकार को स्वयं चिंता थी कि किसी
प्रकार अनशन छूटे। जेल अधिकारियों ने
पहले आठ आने रोज तय किए। मैंने उस [चित्र-परिचय: ठाकुर रोशनसिंह]
समझौते को अस्वीकार कर दिया और बड़ी कठिनाई से दस आने रोज पर ले
आया। उस अनशन व्रत में पंद्रह दिन तक मैंने जल पीकर निर्वाह किया था।
सोलहवें दिन नाक से दूध पिलाया गया था। श्री रोशनसिंहजी ने भी इसी प्रकार मेरा
साथ दिया था। वे पंद्रह दिन तक बराबर चलते-फिरते रहे थे। स्नानादि करके अपने
दैनिक कर्म भी कर लिया करते थे। दस दिन तक तो मेरे मुख को देखकर अनजान
पुरुष यह अनुमान भी नहीं कर सकता था कि मैं अन्न नहीं खाता।

74 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा

जिस दिन सफाई की बहस मैंने समाप्त की; सरकारी वकील ने उठकर मुक्त
कंठ से मेरी बहस की प्रशंसा की कि सैकड़ों वकीलों से अच्छी बहस की। मैंने
नमस्कार कर उत्तर दिया कि आपके चरणों की कृपा है, क्योंकि इस मुकदमे के
पहले मैंने किसी अदालत में समय न व्यतीत किया था, सरकारी तथा सफाई के
वकीलों की जिरह को सुनकर मैंने भी साहस किया था।
अभियोग
काकोरी में रेलवे ट्रेन लुट जाने के बाद ही पुलिस का विशेष विभाग उक्त
घटना का पता लगाने के लिए तैनात किया गया। एक विशेष व्यक्ति मि. हार्टन
इस विभाग के निरीक्षक थे। उन्होंने घटनास्थल तथा रेलवे पुलिस की रिपोर्टों को
देखकर अनुमान किया कि संभव है कि यह कार्य क्रांतिकारियों का हो। प्रांत के
क्रांतिकारियों की जाँच शुरू हुई। उसी समय शाहजहाँपुर में रेलवे डकैती के तीन
नोट मिले। चोरी गए नोटों की संख्या सौ से अधिक थी, जिनका मूल्य लगभग
एक हजार रुपये होगा। इनमें से लगभग सात सौ या आठ सौ रुपये के मूल्य के
नोट सीधे सरकार के खजाने में पहुँच गए। अतः सरकार नोटों के मामले को
चुपचाप पी गई। ये नोट लिस्ट प्रकाशित होने से पूर्व ही सरकारी खजाने में पहुँच
चुके थे। पुलिस का लिस्ट प्रकाशित करना व्यर्थ हुआ। सरकारी खजाने में से ही
जनता के पास कुछ नोट लिस्ट प्रकाशित होने के पूर्व ही पहुँच गए थे, इस
कारण वे जनता के पास निकल आए।
उन्हीं दिनों में ज़िला खुफिया पुलिस को मालूम हुआ कि मैं 8, 9 तथा 10
अगस्त सन् 1925 ई. को शाहजहाँपुर नहीं था। अधिक जाँच होने लगी। इसी
जाँच-पड़ताल में पुलिस को मालूम हुआ कि गवर्नमेंट स्कूल शाहजहाँपुर के इंदुभूषण
मित्र नामक एक विद्यार्थी के पास मेरे क्रांतिकारी दल से संबंधित पत्र आते हैं,
जो वह मुझे दे आता है। स्कूल के हैडमास्टर द्वारा इंदुभूषण के पास आए हुए
पत्रों की नकल करा कर हार्टन साहब के पास भेजी जाती रही। इन्हीं पत्रों से

वृहत् संगठन 75
हार्टन साहब को मालूम हुआ कि मेरठ में प्रांत की क्रांतिकारी समिति की बैठक
होने वाली है। उन्होंने एक सब इंस्पेक्टर को मेरठ अनाथालय में, जहाँ पर बैठक
होने का पता चला था, भेजा। उन्हीं दिनों हार्टन साहब को किसी विशेष सूत्र से
मालूम हुआ कि शीघ्र ही कनखल में डाका डालने का प्रबंध क्रांतिकारी समिति के
सदस्य कर रहे थे और संभव है कि किसी बड़े शहर में डाकखाने की आमदनी
लूटी जाए। हार्टन साहब को एक सूत्र से एक पत्र मिला जो मेरे हाथ का
लिखा था। इस पत्र में सितंबर में होने वाले ‘श्राद्ध’-8 का जिक्र था जिसकी 13
तारीख निश्चित की गई थी। पत्र में था कि दादा का श्राद्ध नं. 1 पर 13
सितंबर को होगा, अवश्य पधारिए। मैं अनाथालय में मिलूँगा। पत्र पर “रुद्र”
के हस्ताक्षर थे।
आगामी डकैतियों को रोकने के लिए
हार्टन साहब ने प्रांत भर में 26 सितंबर
सन् 1925 ई. को लगभग तीस व्यक्तियों
को गिरफ्तार किया। उन्हीं दिनों में इंदुभूषण
के पास आए हुए पत्र से पता लगा कि
कुछ वस्तुएँ बनारस में किसी विद्यार्थी की
कोठरी में बंद हैं। अनुमान किया गया कि
संभव है कि वे हथियार हों। अनुसंधान
करने से हिन्दू विश्वविद्यालय के एक विद्यार्थी
की कोठरी से दो राइफलें निकलीं। उस
विद्यार्थी को कानपुर में गिरफ्तार किया गया।
इंदुभूषण ने मेरी गिरफ्तारी की सूचना एक
पत्र द्वारा बनारस को भेजी। जिसके पास राजेन्द्र लाहिड़ी
पत्र भेजा था, उसे पुलिस गिरफ्तार कर चुकी थी, क्योंकि उसी, श्री रामनाथ
पाण्डेय के पते का पत्र मेरी गिरफ्तारी के समय मेरे मकान से पाया गया था।

76 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
रामनाथ पाण्डेय के पत्र पुलिस के पास
पहुँचे थे। अतः इंदुभूषण को गिरफ्तार किया
गया। इंदुभूषण ने दूसरे दिन अपना बयान
दे दिया। गिरफ्तार किए हुए व्यक्तियों में
से कुछ से मिल-मिलाकर बनारसीलाल ने
भी, जो शाहजहाँपुर की जेल में था, अपना
बयान दे दिया और वह सरकारी गवाह
बना लिया गया। वह कुछ अधिक जानता
था। इसके बयान से क्रांतिकारी पत्र के
पार्सलों का पता चला। बनारस के डाकखाने
से जिन-जिनके पास पार्सल भेजे गए थे
रामकृष्ण खत्री उनको पुलिस ने गिरफ्तार किया। कानपुर
में गोपीनाथ ने, जिसके नाम से पार्सल गया था, गिरफ्तार होते ही पुलिस को
बयान दे दिया और वह सरकारी गवाह बना लिया ,गया। इसी प्रकार रायबरेली में
स्कूल के विद्यार्थी कुँवर बहादुर के पास पार्सल आया था, उसने भी गिरफ्तार होते
ही बयान दे दिया और सरकारी गवाह बना लिया गया। इनके पास मनीआर्डर भी
आया करते थे, क्योंकि यह बनवारीलाल का पोस्ट बॉक्स (डाक पाने वाला) था।
इसने बनवारीलाल के एक रिश्तेदार का पता बता दिया, जहाँ तलाशी लेने से
बनवारीलाल का एक ट्रंक मिला। इस ट्रंक में एक कारतूसी पिस्तौल, एक कारतूसी
फौजी रिवाल्वर तथा कुछ कारतूस पुलिस के हाथ लगे। श्री बनवारीलाल की खोज
हुई। बनवारीलाल भी पकड़ लिए गए। गिरफ्तारी के थोड़े दिनों बाद ही पुलिस
''वाले मिले, उल्टा-सीधा सुझाया और बनवारीलाल ने भी अपना बयान दे दिया
तथा इकबाली मुलजिम बनाए गए। बनवारीलाल ने काकोरी डकैती में अपना
सम्मिलित होना बताया था। उधर कलकत्ते में दक्षिणेश्वर में एक मकान में
बमबनाने का सामान, एक बना हुआ बम, 7 रिवाल्वर, पिस्तौल तथा कुछ

बृहत् संगठन 77
राजद्रोहात्मक साहित्य पकड़ा गया। इसी मकान में श्री राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, जो इस
मुकदमे में फरार थे, गिरफ्तार हुए।
इंदुभूषण के गिरफ्तार हो जाने के
बाद उसके हैडमास्टर को एक पत्र मध्य
प्रांत से मिला, जिसे उसने हार्टन साहब
के पास वैसा ही भेज दिया। इस पत्र से
एक व्यक्ति मोहन लाल खत्री का चाँदा
में पता चला। वहाँ से पुलिस ने खोज
लगाकर पूना में श्री रामकृष्ण खत्री को
गिरफ्तार करके लखनऊ भेजा। बनारस में
भेजे हुए पार्सलों के संबंध से जबलपुर में
श्री प्रणवेशकुमार चटर्जी को गिरफ्तार करके
भेजा गया। कलकत्ता से श्री शचीन्द्रनाथ
सान्याल, जिन्हें बनारस षड्यंत्र से आजन्म
कालेपानी की सजा हुई थी, और जिन्हें
बांकुरा में "क्रांतिकारी" पर्चे बाँटने के कारण
दो वर्ष की सजा हुई थी, इस मुकदमे में
लखनऊ भेजे गए। श्री योगेशचन्द्र चटर्जी
बंगाल आर्डिनेंस के कैदी हजारी बाग जेल
से भेजे गए। आप अक्तूबर सन् 1924 ई.
में कलकत्ते में गिरफ्तार हुए थे। आपके
[चित्र-शीर्षक]: शचीन्द्रनाथ सान्याल
पास दो कागज पाए गए थे, जिनमें संयुक्त प्रांत के सब जिलों का नाम था, और
लिखा था कि बाईस ज़िलों में समिति का कार्य हो रहा है। ये कागज इस षड्यंत्र
के संबंध के समझे गए। श्री राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी दक्षिणेश्वर बम केस में दस वर्ष
के दीपांतर की सजा पाने के बाद इस मुकदमे में लखनऊ भेजे गए। अब लगभग

78 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
छत्तीस व्यक्ति गिरफ्तार हुए थे। अट्ठाईस
पर मजिस्ट्रेट की अदालत में मुकदमा चला।
तीन व्यक्ति- श्री शचीन्द्रनाथ बख्शी, श्री
चन्द्रशेखर आज़ाद और श्री अशफाकउल्ला
खाँ फरार रहे। बाकी सब मुकदमा अदालत
में आने से पहले छोड़ दिए गए। अट्ठाईस
में दो पर से मजिस्ट्रेट की अदालत में
मुकदमा उठा लिया गया। दो को सरकारी
गवाह बनाकर उन्हें माफी दी गई। अंत में
मजिस्ट्रेट ने इक्कीस व्यक्तियों को सेशन
के सुपुर्द किया। सेशन में मुकदमा आने
योगेशचन्द्र चटर्जी
पर श्री दामोदरस्वरूप सेठ बहुत बीमार हो
गए। अदालत न आ सकते थे, अतः अंत
में बीस व्यक्ति रह गए। बीस में से दो
व्यक्ति श्री शचीन्द्रनाथ विश्वास तथा श्री
हरगोविंद सेशन की अदालत में मुक्त हुए।
बाकी अठारह को सजाएँ हुईं।
श्री बनवारीलाल इकबाली मुलजिम हो
गए। वे रायबरेली जिला कांग्रेस कमेटी के
मंत्री भी रह चुके थे। उन्होंने असहयोग
आंदोलन में छः मास का कारावास भी
भोगा था। इस पर भी पुलिस की धमकी से
प्राण संकट में पड़ गए। आप ही हमारी
समिति के ऐसे सदस्य थे कि जिन पर
समिति का सबसे अधिक धन व्यय किया
शचीन्द्रनाथ बख्शी

[Header]
बृहत् संगठन 79

गया। प्रत्येक माह आपको पर्याप्त धन भेजा
जाता था। मर्यादा की रक्षा के लिए हम
लोग यथाशक्ति बनवारीलाल को मासिक
शुल्क दिया करते थे। अपने पेट काटकर
इनको मासिक व्यय दिया गया। फिर भी
इन्होंने अपने सहायकों की गर्दन पर छुरी
चलाई। अधिक-से-अधिक दस वर्ष की सजा
हो जाती। जिस प्रकार सबूत इनके विरुद्ध
था, वैसे ही, इसी प्रकार के दूसरे अभियुक्तों
पर था, जिन्हें दस-दस वर्ष की सजा हुई।
यही नहीं पुलिस के बहकाने से सेशन में
बयान देते समय जो नई बातें इन्होंने जोड़ीं,
उनमें मेरे संबंध में कहा कि रामप्रसाद
बिस्मिल डकैतियों के रुपये से अपने परिवार
का निर्वाह करता है। इस बात को सुनकर
मुझे हँसी भी आई, पर हृदय पर बड़ा [चित्र: चन्द्रशेखर आजाद]
आघात लगा कि जिनकी उदर-पूर्ति के लिए प्राणों को संकट में डाला, दिनों को
दिन और रात को रात न समझा, बुरी तरह से मार खाई, माता-पिता का कुछ
भी ख्याल न किया, वही इस प्रकार आक्षेप करें।
समिति के सदस्यों ने इस प्रकार का व्यवहार किया। बाहर जो साधारण
जीवन के सहयोगी थे, उन्होंने भी अद्भुत रूप धारण किया। एक ठाकुर साहब
के पास काकोरी डकैती का नोट मिल गया था। वह कहीं शहर में पा गए थे।
जब गिरफ्तारी हुई, मजिस्ट्रेट के यहाँ जमानत नामंजूर हुई, जज साहब ने चार
हज़ार रुपये की जमानत माँगी। कोई जमानती न मिलता था। आपके वृद्ध भाई
मेरे पास आए। पैरों पर सिर रखकर रोने लगे। मैंने जमानत कराने का प्रयत्न

80 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
किया। मेरे माता-पिता कचहरी जाकर खुले रूप से पैरवी करने को मना करते रहे
कि पुलिस खिलाफ है, रिपोर्ट हो जाएगी, पर मैंने एक न सुनी। कचहरी जाकर,
कोशिश करके जमानत दाखिल कराई। जेल से उन्हें स्वयं जाकर छुड़ाया। पर जब
मैंने उक्त महाशय का नाम उक्त घटना की गवाही देने के लिए सूचित किया,
तब पुलिस ने उन्हें धमकाया और उन्होंने पुलिस को तीन बार लिखकर दे दिया
कि हम रामप्रसाद को जानते भी नहीं। हिन्दू-मुस्लिम झगड़े में जिनके घरों की
रक्षा की थी, जिनके बाल-बच्चे मेरे सहारे मुहल्ले में निर्भयता से निवास करते रहे,
उन्होंने ही मेरे खिलाफ झूठी गवाहियाँ बनवाकर भेजीं। कुछ मित्रों के भरोसे पर
उनका नाम गवाही में दिया कि जरूर गवाही देंगे। संसार लौट जाए पर वे डिग
नहीं सकते। पर वचन दे चुकने पर भी जब पुलिस का दबाव पड़ा, वे ही गवाही
देने से इनकार कर गए। जिनको अपना हृदय, सहोदर तथा मित्र समझ कर हर
तरह की सेवा करने को तैयार रहता था, जिस प्रकार की आवश्यकता होती
यथाशक्ति उनको पूर्ण करने की कोशिश करता था, उनसे इतना भी न हुआ कि
कभी जेल पर आकर दर्शन दे जाते, फाँसी की कोठरी में ही आकर संतोषदायक दो
बातें कर जाते। एक-दो सज्जनों ने इतनी कृपा तथा साहस किया कि दस मिनट के
लिए अदालत में दूर खड़े होकर दर्शन दे गए। यह सब इसलिए कि पुलिस का
आतंक छाया हुआ था कि गिरफ्तार न कर लिए जाएँ। इस पर भी जिसने भी जो
कुछ किया मैं उसी को अपना सौभाग्य समझता हूँ और उनका आभारी हूँ-
वह फूल चढ़ाते हैं, तुर्बत-9 भी दबी जाती।
माशूक-10 के थोड़े से भी अहसान-11 बहुत हैं।।
परमात्मा से यही प्रार्थना है कि सब प्रसन्न तथा सुखी रहें। मैंने तो सब
बातों को जानकर ही इस मार्ग पर पैर रखा था। मुकदमे के पहले संसार का कोई
अनुभव ही न था। न कभी जेल देखी, न किसी अदालत का कोई तजुर्बा
(अनुभव) था। जेल में जाकर मालूम हुआ कि किसी नई दुनिया में पहुँच गया।
मुकदमे से पहले मैं यह भी नहीं जानता था कि कोई लेखन-कला-विज्ञान भी है,

Uploaded By Rajesh Tanti.

बृहत् संगठन 81
इसका कोई विशेषज्ञ भी होता है, जो लेखन शैली को देखकर लेखकों का निर्णय
कर सकता है। यह भी पता नहीं था कि लेख किस प्रकार मिलाए जाते हैं, एक
मनुष्य के लेख में क्या भेद होता है, क्यों भेद होता है, लेखन-कला विशेषज्ञ
हस्ताक्षर को प्रमाणित कर सकता है, तथा लेखक के वास्तविक लेख में तथा
बनावटी लेख में भेद कर सकता है, इस प्रकार का कोई भी अनुभव तथा ज्ञान
न रखते हुए भी एक प्रांत की क्रांतिकारी समिति का संपूर्ण भार लेकर उसका
संचालन कर रहा था। बात यह है कि क्रांतिकारी कार्य की शिक्षा देने के लिए
कोई पाठशाला तो है ही नहीं। यही हो सकता था कि पुराने अनुभवी क्रांतिकारियों
से कुछ सीखा जाए। न जाने कितने व्यक्ति बंगाल तथा पंजाब के षड्यंत्रों में
गिरफ्तार हुए, पर किसी ने भी यह प्रयास न किया कि एक इस प्रकार की
पुस्तक लिखी जाए, जिससे नवागंतुकों को कुछ अनुभव की बातें मालूम होतीं।
लोगों को इस बात की बड़ी उत्कण्ठा होगी कि क्या यह पुलिस का भाग्य
ही था, जो सब बना बनाया मामला हाथ आ गया। क्या पुलिस वाले परोक्ष ज्ञानी
होते हैं? कैसे गुप्त बातों का पता चला लेते हैं? कहना पड़ता है कि यह देश
का दुर्भाग्य ! सरकार का सौभाग्य ! ! बंगाल पुलिस के संबंध में तो अधिक कहा
नहीं जा सकता, क्योंकि मेरा कुछ विशेषानुभव नहीं। इस प्रांत की खुफिया पुलिस
वाले तो महान भोंदू होते हैं। जिन्हें साधारण ज्ञान भी नहीं होता। साधारण पुलिस
से खुफिया में आते हैं। साधारण पुलिस की दरोगाई करते हैं, मजे में लंबी-लंबी
घूस खाकर बड़े-बड़े पेट बढ़ा आराम करते हैं। उनकी बला तकलीफ उठाए। यदि
कोई एक-दो चालाक हुए भी तो थोड़े दिन बड़े ओहदे की फिराक में काम
दिखाया, दौड़-धूप की, कुछ पद-वृद्धि हो गई और सब काम बंद। इस प्रांत में
कोई बाकायदा पुलिस का गुप्तचर विभाग नहीं, जिसको नियमित रूप से शिक्षा दी
जाती हो। फिर काम करते-करते अनुभव हो ही जाता है। मैनपुरी षड्यंत्र तथा
इस षड्यंत्र से इसका पूरा पता लग गया, कि थोड़ी-सी कुशलता से कार्य करने
पर पुलिस के लिए पता पाना बड़ा कठिन है। वास्तव में उनके कुछ भाग्य ही

82 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
अच्छे होते हैं। जब से इस मुकदमे की जाँच शुरू हुई, पुलिस ने इस प्रांत के
संदिग्ध क्रांतिकारी व्यक्तियों पर दृष्टि डाली। उनसे मिली, बातचीत की। एक-दो
को कुछ धमकी दी। "चोर की दाढ़ी में तिनका", वाली जनश्रुति (कहावत) के
अनुसार एक महाशय से पुलिस को सारा भेद मालूम हो गया। हम सबके सब
चक्कर में थे कि इतनी जल्दी पुलिस ने मामले का पता कैसे लगा लिया। उक्त
महाशय की ओर तो ध्यान भी न जा सकता था। पर गिरफ्तारी के समय मुझसे
तथा पुलिस के अफसर से जो बातें हुईं, उनमें पुलिस अफसर ने वे सब बातें
मुझसे कहीं जिनको मेरे तथा उक्त महाशय के अतिरिक्त कोई भी दूसरा नहीं
जान सकता था। और भी बड़े पक्के तथा बुद्धिगम्य (समझ में आने लायक) प्रमाण
मिल गए कि जिन बातों को उक्त महाशय जान सके थे, वे ही पुलिस जान सकी।
जो बातें आपको मालूम न थीं, वे पुलिस को किसी प्रकार न मालूम हो सकीं। उन
बातों से यह निश्चय हो गया कि यह काम उन्हीं महाशय का है। यदि ये महाशय
पुलिस के हाथ न आते और भेद न खोल देते तो पुलिस सिर पटक कर रह जाती,
कुछ भी पता न चलता। बिना दृढ़ प्रमाणों के भयंकर-से-भयंकर व्यक्ति पर हाथ
रखने का साहस नहीं होता, क्योंकि जनता में आंदोलन फैलने से बदनामी हो जाती
है। सरकार पर जवाबदेही आती है। अधिक-से-अधिक दो-चार मनुष्य पकड़े जाते
और अंत में उन्हें भी छोड़ना पड़ता। परन्तु जब पुलिस को वास्तविक सूत्र हाथ आ
गया, उसने अपनी सत्यता को प्रमाणित करने के लिए लिखा हुआ प्रमाण पुलिस को
दे दिया। उस अवस्था में यदि पुलिस गिरफ्तारियाँ न करती तो फिर कब करती ?
जो भी हुआ, परमात्मा उनका भी भला करे। अपना तो जीवनभर यही उसूल रहा-
सताए तुझको जो कोई बेवफा-12 "बिस्मिल"।
तो मुँह से कुछ न कहना आह ! कर लेना ।।
हम शहीदाने-13 वफा-14 का दीनो ईमां-15 और है।
सिजदे-16 करते हैं हमेशा पाँव पर जल्लाद-17 के।।
मैंने इस अभियोग में जो भाग लिया अथवा जिनकी जिंदगी की जिम्मेदारी
मेरे सिर पर थी, उनमें से ज्यादा हिस्सा श्री अशफाकउल्ला खाँ वारसी का है। मैं

बृहत् संगठन 83
अपनी कलम से उनके लिए भी अंतिम समय में दो शब्द लिख देना अपना
कर्त्तव्य समझता हूँ।
मुझे भली-भाँति याद है कि जब मैं
बादशाही एलान के बाद शाहजहाँपुर आया
था, तो तुमसे स्कूल में भेंट हुई थी। तुम्हारी
मुझसे मिलने की बड़ी हार्दिक इच्छा थी।
तुमने मुझसे मैनपुरी षड्यंत्र के संबंध में
कुछ बातचीत करनी चाही थी। मैंने यह
समझकर कि एक स्कूल का मुसलमान
विद्यार्थी मुझसे इस प्रकार की बातचीत क्यों
करता है, तुम्हारी बातों का उत्तर उपेक्षा की
दृष्टि से दे दिया था। तुम्हें उस समय बड़ा
खेद हुआ था। तुम्हारे मुख से हार्दिक भावों
का प्रकाश हो रहा था। तुमने अपने इरादे
को यों ही नहीं छोड़ दिया, अपने निश्चय
पर डटे रहे। जिस प्रकार हो सका कांग्रेस
में बातचीत की। अपने इष्ट-मित्रों द्वारा इस
अशफाक उल्ला खाँ
बात का विश्वास दिलाने की कोशिश की कि तुम बनावटी आदमी नहीं, तुम्हारे
दिल में मुल्क की खिदमत (देश की सेवा) करने की ख्वाहिश (इच्छा) थी। अंत
में तुम्हारी विजय हुई। तुम्हारी कोशिशों ने मेरे दिल में जगह पैदा कर ली।
तुम्हारे बड़े भाई मेरे उर्दू मिडिल के सहपाठी तथा मित्र थे, यह जानकर मुझे बड़ी
प्रसन्नता हुई। थोड़े दिनों में ही तुम मेरे छोटे भाई के समान हो गए थे, किन्तु
छोटे भाई बनकर तुम्हें संतोष न हुआ। तुम समानता का अधिकार चाहते थे। तुम

गोरखपुर जेल की अन्तिम रातें, अशफ़ाक़ के नाम पत्र, सन्देश व अमर आत्मकथा उपसंहार

84 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
मित्र की श्रेणी में अपनी गणना चाहते थे। वही हुआ। तुम सच्चे मित्र बन गए।
सबको आश्चर्य था कि एक कट्टर आर्य समाजी और मुसलमान का मेल कैसा ?
मैं मुसलमानों की शुद्धि करता था। आर्य समाज मंदिर में मेरा निवास था, किंतु
तुम इन बातों की थोड़ी भी चिंता न करते थे। मेरे कुछ साथी तुम्हें मुसलमान
होने के कारण घृणा की दृष्टि से देखते थे, किंतु तुम अपने निश्चय में दृढ़ थे।
मेरे पास आर्य समाज मंदिर में आते-जाते थे। हिन्दू-मुस्लिम झगड़ा होने पर,
तुम्हारे मुहल्ले के सब कोई तुम्हें खुल्लमखुल्ला गालियाँ देते थे, काफिर के नाम से
पुकारते थे, पर तुम कभी भी उनके विचारों से सहमत न हुए। सदैव हिन्दू-मुस्लिम
ऐक्य के पक्षपाती रहे। तुम एक सच्चे मुसलमान तथा सच्चे स्वदेश-भक्त थे। तुम्हें
यदि जीवन में कोई विचार था, तो यही कि मुसलमानों को खुदा अक्ल देता, कि
वे हिन्दुओं के साथ मिलकर हिन्दुस्तान की भलाई करते। जब मैं हिन्दी में कोई
लेख या पुस्तक लिखता तो तुम सदैव यही अनुरोध करते कि उर्दू में क्यों नहीं
लिखते, जो मुसलमान भी पढ़ सकें ? तुमने स्वदेशभक्ति के भावों को भली-भाँति
समझने के लिए ही हिन्दी का अच्छा अध्ययन किया। अपने घर पर जब माताजी
तथा भ्राताजी से बातचीत करते थे, तो तुम्हारे मुँह से हिन्दी शब्द निकलते थे,
जिससे सबको बड़ा आश्चर्य होता था।
तुम्हारी इस प्रकार की प्रवृत्ति को देखकर बहुतों को संदेह होता था कि कहीं
इस्लाम-धर्म त्याग कर शुद्धि न करा लो। पर तुम्हारा हृदय तो किसी प्रकार
अशुद्ध न था, फिर तुम शुद्धि किस वस्तु की कराते ? तुम्हारी इस प्रकार की
प्रगति ने मेरे हृदय पर पूर्ण विजय पा ली। प्रायः मित्र मंडली में बात छिड़ती कि
कहीं मुसलमान पर विश्वास करके धोखा न खाना। तुम्हारी जीत हुई, मुझमें तुममें
भेद न था। प्रायः मैंने तुमने एक थाली में भोजन किए। मेरे हृदय से वह विचार
ही जाता रहा कि हिन्दू-मुसलमान में कोई भेद है। तुम मुझ पर अटल विश्वास
तथा अगाध प्रीति रखते थे। हाँ ! तुम मेरा नाम लेकर पुकार नहीं सकते थे। तुम
तो सदैव "राम" कहा करते थे। एक समय जब तुम्हारे हृदय-कंप का दौरा .

बृहत् संगठन 85

हुआ, तुम अचेत थे, तुम्हारे मुँह से बारंबार “राम”, “हाय राम” शब्द निकल
रहे थे। पास खड़े हुए भाई-बांधवों को आश्चर्य था कि “राम”, “राम” कहता
है। कहते कि अल्लाह अल्लाह कहो, पर तुम्हारी “राम-राम” की रट थी। उसी
समय किसी मित्र का आगमन हुआ, जो “राम” के भेद को जानते थे। तुरंत
मैं बुलाया गया। मुझसे मिलने पर तुम्हें शांति हुई, तब सब लोग “राम-राम”
के भेद को समझे।
अंत में इस प्रेम, प्रीति तथा मित्रता का परिणाम क्या हुआ? मेरे विचारों के
रंग में तुम भी रँग गए। तुम भी कट्टर क्रांतिकारी बन गए। अब तो तुम्हारा दिन-रात
प्रयत्न यही था कि किस प्रकार ही मुसलमान नवयुवकों में भी क्रांतिकारी भावों का
प्रवेश हो। वे भी क्रांतिकारी आंदोलन में योगदान दें। जितने तुम्हारे बंधु तथा मित्र
थे सब पर तुमने अपने विचारों का प्रभाव डालने का प्रयत्न किया। प्रायः क्रांतिकारी
सदस्यों को भी बड़ा आश्चर्य होता है कि मैंने कैसे एक मुसलमान को क्रांतिकारी दल का
प्रतिष्ठित सदस्य बना लिया। मेरे साथ तुमने जो कार्य किए, वे सराहनीय हैं। तुमने
कभी भी मेरी आज्ञा की अवहेलना (अनादर) न की। एक आज्ञाकारी भक्त के
समान मेरी आज्ञा के पालन में तत्पर रहते थे। तुम्हारा हृदय बड़ा विशाल था। तुम्हारे
भाव बड़े उच्च थे।
मुझे यदि शांति है तो यही कि तुमने संसार में मेरा मुख उज्ज्वल कर
दिया। भारत के इतिहास में यह घटना भी उल्लेखनीय हो गई कि अशफाकउल्ला
ने क्रांतिकारी आंदोलन में योग दिया। अपने भाई-बंधु तथा संबंधियों के समझाने
पर कुछ भी ध्यान न दिया। गिरफ्तार हो जाने पर भी अपने विचारों में दृढ़ रहे
जैसे तुम शारीरिक बलशाली थे, वैसे ही मानसिक वीर तथा आत्मा से उच्च सिद्ध
हुए। इन सबके परिणामस्वरूप अदालत में तुमको मेरा सहकारी (लेफ्टिनेंट) ठहराया
गया, और जज ने मुकदमे का फैसला लिखते समय तुम्हारे गले में जयमाला
(फाँसी की रस्सी) पहना दी। प्यारे भाई, तुम्हें यह समझकर संतोष होगा कि
जिसने अपने माता-पिता की धन-संपत्ति को देश-सेवा में अर्पण करके उन्हें

86 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
भिखारी बना दिया, जिसने अपना तन-मन-धन सर्वस्व मातृ-सेवा में अर्पण करके
अपना अंतिम बलिदान भी दे दिया, उसने अपने प्रिय सखा अशफाक को भी
उसी मातृभूमि की भेंट चढ़ा दिया।
"असगर"-18 हरीम-19 इश्क-20 में हस्ती-21 ही जुर्म-22 है।
रखना कभी न पाँव यहाँ सर लिए हुए।।
फाँसी की कोठरी
अंतिम समय निकट है। दो फाँसी की सज़ाएँ सिर पर झूल रही हैं। पुलिस
को साधारण जीवन में और समाचारपत्रों तथा पत्रिकाओं में खूब जी-भर के कोसा
है। खुली अदालत में जज साहब, खुफिया पुलिस के अफसर, मजिस्ट्रेट, सरकारी
वकील तथा सरकार को खूब आड़े हाथों लिया है। हरेक के दिल में मेरी बातें
चुभ रही हैं। कोई दोस्त आशना, अथवा यार मददगार नहीं, जिसका सहारा हो।
एक परम पिता परमात्मा की याद है। गीता पाठ करते हुए संतोष है कि-
जो कुछ किया सो तैं किया, मैं कुछ कीन्हा नाहिं।
जहाँ कहीं कुछ मैं किया, तुम ही थे मुझ माहिं।।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेभ्योः पद्मपत्रमिवाम्भसः।।
--भगवद्गीता/5/10
"जो फल की इच्छा को त्याग करके कर्मों को ब्रह्म में अर्पण करके कर्म
करता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता। जिस प्रकार जल में रहकर भी कमल-पत्र
जल में नहीं होता।" जीवनपर्यन्त जो कुछ किया, स्वदेश की भलाई समझकर
किया। यदि शरीर की पालना की तो इसी विचार से कि सुदृढ़ शरीर से भली
प्रकार स्वदेशी सेवा हो सके। बड़े प्रयत्नों से यह शुभ दिन प्राप्त हुआ। संयुक्त
प्रांत में इस तुच्छ शरीर का ही सौभाग्य होगा जो सन् 1857 ई. के गदर की
घटनाओं के पश्चात् क्रांतिकारी आंदोलन के संबंध में इस प्रांत के निवासी का
पहला बलिदान मातृ-वेदी पर होगा।

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बृहत् संगठन 87
सरकार की इच्छा है कि मुझे घोट-घोटकर मारे। इसी कारण इस गर्मी की
ऋतु में साढ़े तीन महीने बाद अपील की तारीख नियत की गई। साढ़े तीन महीने
तक फाँसी की कोठरी में भेजा गया। यह कोठरी पक्षी के पिंजरे से भी खराब है।
गोरखपुर जेल की फाँसी की कोठरी मैदान में बनी है। किसी प्रकार की छाया
निकट नहीं। प्रातःकाल आठ बजे से रात्रि के आठ बजे तक सूर्य देवता की कृपा
से तथा चारों ओर रेतीली जमीन होने से अग्नि वर्षण होता रहता है। नौ फीट
लंबी तथा नौ फीट चौड़ी कोठरी में केवल छः फीट लंबा और दो फीट चौड़ा द्वार
है। पीछे की ओर जमीन से आठ या नौ फीट की ऊँचाई पर एक-दो फीट लंबी,
एक फुट चौड़ी खिड़की है। इसी कोठरी में भोजन; स्नान, मल-मूत्र त्याग शयनादि
होता है। मच्छर अपनी मधुर ध्वनि रातभर सुनाया करते हैं। बड़े प्रयत्न से रात्रि
में तीन या चार घंटे निद्रा आती है, किसी-किसी दिन एक-दो घंटे ही सोकर
निर्वाह करना पड़ता है। मिट्टी के पात्रों में भोजन दिया जाता है। ओढ़ने-बिछाने
के दो कंबल मिले हैं। बड़े त्याग का जीवन है। साधना के सब साधन एकत्रित
हैं। प्रत्येक क्षण शिक्षा दे रहा है- अंतिम समय के लिए तैयार हो जाओ,
परमात्मा का भजन करो।
मुझे तो इस कोठरी में बड़ा आनन्द आ रहा है। मेरी इच्छा थी कि किसी
साधु की गुफा पर कुछ दिन निवास करके योगाभ्यास किया जाता । अंतिम समय
वह इच्छा भी पूर्ण हो गई। साधु की गुफा न मिली तो क्या, साधना की गुफा तो
मिल गई। इसी कोठरी में यह सुयोग प्राप्त हो गया कि अपनी कुछ अंतिम बात
लिखकर देशवासियों को अर्पण कर दूँ। सम्भव है कि मेरे जीवन के अध्ययन से
किसी आत्मा का भला हो जाए। बड़ी कठिनाई से यह शुभ अवसर प्राप्त हुआ।
महसूस-23 हो रहे हैं बादे-24 फना-25 के झोंके।
खुलने लगे हैं मुझ पर असरार-26 जिंदगी के।।
बारे-27 अलम-28 उठाया रंगे निशात-29 देखा।
आए नहीं हैं यूँ ही अंदाज-30 बेहसी-31 के।।

88 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
वफा-32 पर दिल को सदके-33 जान को नजरे जफा-34 कर दे।
मुहब्बत में यह लाजिम-35 है कि जो कुछ हो फिदा-36 कर दे।।
अब तो यही इच्छा है कि-
बहे बहरे-37 फ़ना-38 में जल्द या रब-39 लाश "बिस्मिल"-40 की।
कि भूखी मछलियाँ हैं जौहरे शमशीर-41 कातिल-42 की।।
समझकर फूँकना इसको ज़रा ऐ दागे नाकामी-43 ।
बहुत से घर भी हैं आबाद इस उजड़े हुए दिल से।।
परिणाम
ग्यारह वर्ष पर्यंत यथाशक्ति प्राणपण से चेष्टा करने पर भी हम अपने
उद्देश्य में कहाँ तक सफल हुए ? क्या लाभ हुआ ? इसका विचार करने से कुछ
अधिक प्रयोजन सिद्ध न होगा, क्योंकि हमने लाभ-हानि अथवा जय-पराजय के
विचार से क्रांतिकारी दल में योग नहीं दिया था। हमने जो कुछ किया वह अपना
कर्त्तव्य समझकर किया। कर्त्तव्य-निर्णय में हमने कहाँ तक बुद्धिमत्ता से काम
लिया, इसका विवेचन करना उचित जान पड़ता है। राजनैतिक दृष्टि से हमारे
कार्यों का इतना ही मूल्य है कि कतिपय होनहार नवयुवकों के जीवन को कष्टमय
बनाकर नीरस कर दिया, और उन्हीं में से कुछ ने व्यर्थ में जान गँवाई। कुछ धन
भी खर्च किया। हिन्दू-शास्त्र के अनुसार किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती,
जिसका जिस विधि से जो काल होता है, वह उसी विधि से समय पर ही प्राण
त्याग करता है। केवल निमित्त-मात्र कारण उपस्थित हो जाते हैं। लाखों भारतवासी
महामारी, हैज़ा, ताऊन आदि अनेक प्रकार के रोगों से मर जाते हैं। करोड़ों दुर्भिक्ष
में अन्न बिना प्राण त्यागते हैं, तो उसका उत्तरदायित्व किस पर है ? रह गया
धन का व्यय, सो इतना धन तो भले आदमियों के विवाहोत्सवों में व्यय हो जाता
है। गण्यमान व्यक्तियों की तो केवल विलासिता की सामग्री का मासिक व्यय
इतना होगा, जितना कि हमने एक षड्यंत्र के निर्माण में व्यय किया। हम लोगों

वृहत् संगठन 89
को डाकू बताकर फाँसी और काले पानी की सज़ाएँ दी गई हैं। किन्तु हम
समझते हैं कि वकील और डाक्टर हमसे कहीं बड़े डाकू हैं। वकील-डॉक्टर दिन
दहाड़े बड़े-बड़े ताल्लुकेदारों की जायदादें लूटकर खा गए। वकीलों के चाटे हुए
अवध के ताल्लुकेदारों को ढूँढे रास्ता भी दिखाई नहीं देता और वकीलों की ऊँची
अट्टालिकाएँ (भवन) उन पर खिलखिला कर हँस रही हैं। इसी प्रकार लखनऊ में
डॉक्टरों के भी ऊँचे-ऊँचे महल बन गए। किंतु राज्य में दिन के डाकुओं की
प्रतिष्ठा है। अन्यथा रात के साधारण डाकुओं और दिन के इन डाकुओं (वकीलों
तथा डॉक्टरों) में कोई भेद नहीं, दोनों अपने-अपने मतलब के लिए बुद्धि की
कुशलता से प्रजा का धन लूटते हैं।
ऐतिहासिक दृष्टि से हम लोगों के कार्य का बहुत बड़ा मूल्य है। जिस प्रकार
भी हो, यह तो मानना ही पड़ेगा कि गिरी हुई अवस्था (दशा) में भी, भारतवासी
युवकों के हृदय में स्वाधीन होने के भाव विराजमान हैं। वे स्वतंत्र होने की
यथाशक्ति चेष्टा भी करते हैं। यदि परिस्थितियाँ अनुकूल होतीं तो यही इने-गिने
नवयुवक अपने प्रयत्नों से संसार को चकित कर देते। उस समय भारतवासियों को
भी फ्रांसीसियों की भाँति कहने का सौभाग्य प्राप्त होता जोकि उस जाति के
नवयुवकों ने फ्रांसीसी प्रजातंत्र की स्थापना करते हुए कहा था: The monument
so raised, may serve as a lesson to the oppressors and an instance
to the oppressed. '
अर्थात स्वाधीनता का जो स्मारक निर्माण किया गया है वह अत्याचारियों के
लिए सबक का कार्य करे और अत्याचार-पीड़ितों के लिए उदाहरण बने।
भारत के इतिहास में हमारे प्रयत्नों का उल्लेख करना ही पड़ेगा, किन्तु इसमें भी
कोई संदेह नहीं है कि भारत की राजनैतिक, धार्मिक तथा सामाजिक किसी प्रकार
की परिस्थिति इस क्रांतिकारी आंदोलन के पक्ष में नहीं है। इसका कारण यही है कि
भारतवासियों में शिक्षा का अभाव है। वे साधारण से साधारण सामाजिक उन्नति
करने में भी असमर्थ हैं। फिर राजनैतिक क्रांति की बात कौन कहे? राजनैतिक क्रांति