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सर्वकोश
रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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बृहत् संगठन 79

गया। प्रत्येक माह आपको पर्याप्त धन भेजा
जाता था। मर्यादा की रक्षा के लिए हम
लोग यथाशक्ति बनवारीलाल को मासिक
शुल्क दिया करते थे। अपने पेट काटकर
इनको मासिक व्यय दिया गया। फिर भी
इन्होंने अपने सहायकों की गर्दन पर छुरी
चलाई। अधिक-से-अधिक दस वर्ष की सजा
हो जाती। जिस प्रकार सबूत इनके विरुद्ध
था, वैसे ही, इसी प्रकार के दूसरे अभियुक्तों
पर था, जिन्हें दस-दस वर्ष की सजा हुई।
यही नहीं पुलिस के बहकाने से सेशन में
बयान देते समय जो नई बातें इन्होंने जोड़ीं,
उनमें मेरे संबंध में कहा कि रामप्रसाद
बिस्मिल डकैतियों के रुपये से अपने परिवार
का निर्वाह करता है। इस बात को सुनकर
मुझे हँसी भी आई, पर हृदय पर बड़ा [चित्र: चन्द्रशेखर आजाद]
आघात लगा कि जिनकी उदर-पूर्ति के लिए प्राणों को संकट में डाला, दिनों को
दिन और रात को रात न समझा, बुरी तरह से मार खाई, माता-पिता का कुछ
भी ख्याल न किया, वही इस प्रकार आक्षेप करें।
समिति के सदस्यों ने इस प्रकार का व्यवहार किया। बाहर जो साधारण
जीवन के सहयोगी थे, उन्होंने भी अद्भुत रूप धारण किया। एक ठाकुर साहब
के पास काकोरी डकैती का नोट मिल गया था। वह कहीं शहर में पा गए थे।
जब गिरफ्तारी हुई, मजिस्ट्रेट के यहाँ जमानत नामंजूर हुई, जज साहब ने चार
हज़ार रुपये की जमानत माँगी। कोई जमानती न मिलता था। आपके वृद्ध भाई
मेरे पास आए। पैरों पर सिर रखकर रोने लगे। मैंने जमानत कराने का प्रयत्न