रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंUploaded By Rajesh Tanti.
बृहत् संगठन 87
सरकार की इच्छा है कि मुझे घोट-घोटकर मारे। इसी कारण इस गर्मी की
ऋतु में साढ़े तीन महीने बाद अपील की तारीख नियत की गई। साढ़े तीन महीने
तक फाँसी की कोठरी में भेजा गया। यह कोठरी पक्षी के पिंजरे से भी खराब है।
गोरखपुर जेल की फाँसी की कोठरी मैदान में बनी है। किसी प्रकार की छाया
निकट नहीं। प्रातःकाल आठ बजे से रात्रि के आठ बजे तक सूर्य देवता की कृपा
से तथा चारों ओर रेतीली जमीन होने से अग्नि वर्षण होता रहता है। नौ फीट
लंबी तथा नौ फीट चौड़ी कोठरी में केवल छः फीट लंबा और दो फीट चौड़ा द्वार
है। पीछे की ओर जमीन से आठ या नौ फीट की ऊँचाई पर एक-दो फीट लंबी,
एक फुट चौड़ी खिड़की है। इसी कोठरी में भोजन; स्नान, मल-मूत्र त्याग शयनादि
होता है। मच्छर अपनी मधुर ध्वनि रातभर सुनाया करते हैं। बड़े प्रयत्न से रात्रि
में तीन या चार घंटे निद्रा आती है, किसी-किसी दिन एक-दो घंटे ही सोकर
निर्वाह करना पड़ता है। मिट्टी के पात्रों में भोजन दिया जाता है। ओढ़ने-बिछाने
के दो कंबल मिले हैं। बड़े त्याग का जीवन है। साधना के सब साधन एकत्रित
हैं। प्रत्येक क्षण शिक्षा दे रहा है- अंतिम समय के लिए तैयार हो जाओ,
परमात्मा का भजन करो।
मुझे तो इस कोठरी में बड़ा आनन्द आ रहा है। मेरी इच्छा थी कि किसी
साधु की गुफा पर कुछ दिन निवास करके योगाभ्यास किया जाता । अंतिम समय
वह इच्छा भी पूर्ण हो गई। साधु की गुफा न मिली तो क्या, साधना की गुफा तो
मिल गई। इसी कोठरी में यह सुयोग प्राप्त हो गया कि अपनी कुछ अंतिम बात
लिखकर देशवासियों को अर्पण कर दूँ। सम्भव है कि मेरे जीवन के अध्ययन से
किसी आत्मा का भला हो जाए। बड़ी कठिनाई से यह शुभ अवसर प्राप्त हुआ।
महसूस-23 हो रहे हैं बादे-24 फना-25 के झोंके।
खुलने लगे हैं मुझ पर असरार-26 जिंदगी के।।
बारे-27 अलम-28 उठाया रंगे निशात-29 देखा।
आए नहीं हैं यूँ ही अंदाज-30 बेहसी-31 के।।